* शिवराज ने लिया था मिढ़ासन को सदानीरा बनाने का संकल्प
* बुन्देलखण्ड विशेष पैकेज और मनरेगा से कराया नदी पुनर्जीवन कार्य
* हर साल गर्मी के मौसम में पूरी तरह सूख जाती है मिढ़ासन नदी
शादिक खान, पन्ना।(www.radaranews.in) मध्यप्रदेश के बुन्देलखण्ड अंचल में सूखे की त्रासदी साल दर साल भयावह रूप ले रही है। इसका एक बड़ा कारण अति पिछड़े इस इलाके में प्राकृतिक जल स्रोतों तथा वर्षा जल संरक्षण-संर्वधन से जुड़े कार्यों का धरातल पर सही तरीके से क्रियान्वयन न होना है। पन्ना जिले की “मिढ़ासन नदी पुनर्जीवन” कार्यक्रम इसका एक उदाहरण मात्र है। इस नदी को पुनर्जीवित करने के नाम पर शिवराज सरकार में करीब 20 करोड़ रूपए विभिन्न कार्यों पर खर्च किए गए थे। जिसका नतीजा यह है कि पिछले पाँच माह से मिढ़ासन नदी अपने उद्गम से संगम तक पूरी तरह सूखी पड़ी है। कभी सदानीरा रहते हुये कल-कल कर प्रवाहित होने वाली मिढ़ासन नदी में वर्तमान में धूल उड़ रही है। वर्ष 2010 में पन्ना में जल अभिषेक अभियान अंतर्गत मिढ़ासन नदी पुनर्जीवन का तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक भव्य कार्यक्रम में शुभारम्भ करते हुए तीन वर्ष में इस नदी को पूर्व की तरह उसका सदानीरा स्वरूप लौटने का संकल्प लिया था। लेकिन शासन-प्रशासन में इच्छाशक्ति के आभाव, कार्यक्रम के क्रियान्वयन में अनियमितताओं और घोर लापरवाही के चलते पूर्व मुख्यमंत्री का संकल्प आज भी न सिर्फ अधूरा पड़ा है बल्कि इसे लेकर उनका अक्सर काफी मजाक भी उड़ता रहता है। क्योंकि, नदी पुनर्जीवन का कार्य प्रारम्भ होने से लेकर अब तक करीब 9 वर्षों में हर साल मिढ़ासन नदी गर्मी के मौसम में पूरी तरह सूख जाती है। मिढ़ासन नदी पुनर्जीवन की जमीनी सच्चाई शिवराज के कार्यकाल में ही उजागर हो गई थी। मजेदार बात तो यह कि पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान वर्ष 2010 के बाद पन्ना के दौरे पर कई बार आए लेकिन उन्होंने फिर कभी मिढ़ासन नदी और उससे जुड़े अपने संकल्प को पूरा करने की सुध नहीं ली।
राशि खर्च की उपयोगिता पर सवाल
मिढ़ासन नदी के प्रवाह क्षेत्र किनारे रहने वाले लोगों की मानें तो पिछले 9 वर्षों से यह नदी गर्मी के मौसम में हर साल सूख जाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि यदि किसी साल बारिस अच्छी हुई तो नदी मार्च-अप्रैल में सूखती है, अगर बारिस कम हुई तो दिसम्बर-जनवरी महीने में ही मिढ़ासन की सतह मैदान में तब्दील हो जाती है। मिढ़ासन को उसका मूल स्वरूप लौटाकर प्रवाह क्षेत्र पर पुनः हरियाली की चादर ओढ़ाने के संकल्प के साथ विभिन्न कार्यों पर 20 करोड़ रूपये पानी की तरह बहाने के बाद भी नदी के पूरी तरह सूखने से पुनर्जीवन कार्यक्रम के क्रियान्वयन की उपयोगिता पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लग रहे हैं। इसे मिढ़ासन नदी के पुनर्जीवन कार्यक्रम की असफलता माना जाये या फिर मृत प्राय नदी को जीवित करने का बीड़ा उठाते हुये प्राकृतिक जल स्त्रोतों के संरक्षण-संर्वधन की सराहनीय पहल की आड़ में महज निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये सरकारी धनराशि के सुनियोजित दुरूपयोग के उदाहरण के रूप में देखा जाये। मामला चाहे जो भी हो पर इतनी बड़ी धनराशि खर्च होने के बाद भी मिढ़ासन नदी के पुनर्जीवित न हो पाने से इस महत्वकांक्षी कार्यक्रम की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच बेहद आवश्यक हो गई है। ताकि उन कारणों का खुलासा हो सके जो कि नदी पुनर्जीवन कार्यक्रम के फ्लॉप होने के लिये जिम्मेदार हैं। विडम्बना यह है कि जल संरक्षण-संवर्धन पर उपदेश देने वाले जिम्मेदार जन प्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी, मिढ़ासन के मामले में चुप्पी साधे हुये बैठे हैं। जिससे इनके दोहरे चरित्र का पता चलता है।
81 किलोमीटर है प्रवाह क्षेत्र
मिढ़ासन नदी मुख्य रूप से केन नदी की एक सहायक नदी है। यह केन गंगा कछार में आने वाली मुख्य नदियों में से एक है। मिढ़ासन नदी का उद्गम पन्ना जिले की पन्ना जनपद पंचायत के ग्राम मुटवाकलॉ से होता है। पहाड़ी नालों और जंगल से पतली धार के रूप में मुटवाकलॉ से प्रारंभ होकर मिढ़ासन नदी गुनौर विकासखण्ड अंतर्गत 81 किलोमीटर तक प्रवाहित होकर अमानगंज के समीप 7 नदियों के प्रसिद्ध संगम स्थल पण्डवन में केन नदी में समाहित हो जाती है।
अत्याधिक दोहन से बनी बरसाती नदी
मिढ़ासन की मौजूदा स्थिति को देखते हुये इसे बरसाती नालों की तरह बरसाती नदी कहना अतिश्योक्तिपूर्ण न होगा। कभी जीवनदायिनी रही मिढ़ासन नदी का अत्याधिक दोहन होने के कारण आज मृत प्राय अवस्था में पहुंच चुकी इस नदी को जीवन की दरकार है। विगत् दो दशक में मिढ़ासन नदी का तेजी से सतत् दोहन तो किया गया किन्तु इसके प्रवाह को वर्ष भर बनाये रखने की ओर जन समुदाय या शासन-प्रशासन द्वारा विशेष ध्यान नहीं दिया गया। फलस्वरूप इसका कछार भी तेजी से नष्ट होता चला गया। पिछले कुछ सालों में पन्ना जिले में साल दर साल गंभीर होते जल संकट के मद्देनजर मिढ़ासन नदी के प्रति जनमानस की घोर उपेक्षा अथवा उदासीनता हैरान करने वाली है। उधर, सूखी पड़ी मिढ़ासन नदी में जल प्रवाहित कर उसका मूल स्वरूप लौटाने के लिये शासन-प्रशासन स्तर पर अब तक जो भी कार्य कराये गये वे अनुपयोगी ही साबित हुये हैं। इन परिस्थितियों में इस नदी का पुनर्जीवन महज छलावा बनकर रह गया है।
पुनर्जीवन हेतु कराये गये कार्य
मिढ़ासन नदी पुनर्जीवन योजना के तहत् निर्मित संरचनाओं को दो भागों वन क्षेत्र एवं राजस्व तथा हितग्राही क्षेत्र में विभाजित किया गया है। इसमें भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार पृथक-पृथक रूप से गतिविधियां चिन्हित कर नदी के उपचार हेतु विभिन्न संरचनाओं का निर्माण कराया गया। वन क्षेत्र में कंटूर ट्रैंच, बोल्डर चेक, चेक डेम, स्टापडेम, नवीन तालाब, तालाब जीर्णोंद्धार, रिंग डेम, वृक्षारोपण, चारागाह विकास तथा राजस्व एवं हितग्राही क्षेत्र में मेड़ बंधान, कच्चा नाला बंधान, बोल्डर चेक, चेक डेम, नवीन तालाब, तालाब जीर्णोंद्धार वीयर व करोड़ों रूपये की लागत से स्टापडेम बनाये गये। निर्माण कार्यों की श्रृंखला खड़ी करने के बाद भी मिढ़ासन नदी के पुनर्जीवित न हो पाने से कराये गये कार्यों की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जिनका जवाब शासन-प्रशासन में शीर्ष पदों पर बैठे कथित जिम्मेदारों के पास नहीं है। इतने महत्वपूर्ण कार्यक्रम पर इतनी बड़ी राशि खर्च करने के बाद भी अपेक्षा अनुरूप परिणाम न मिलना बेहद चिन्ताजनक है।
अधूरा है पूर्व सीएम का संकल्प

उल्लेखनीय है कि जल अभिषेक अभियान 2010 के अंतर्गत मिढ़ासन नदी पुनर्जीवन कार्यक्रम का शुभारंभ तत्कालीन मुख्यमंत्री एवं प्रदेश के सर्वोच्च जल नायक शिवराज सिंह चौहान द्वारा किया गया था। प्राकृतिक जल स्त्रोत के संरक्षण से जुड़े इस महत्वकांक्षी कार्यक्रम के सूत्रधार और प्रेरणास्त्रोत स्वयं मुख्यमंत्री श्री चौहान रहे हैं। प्रदेश के मुखिया के नेतृत्व में नदी पुनर्जीवन के पुनीत कार्य का जोर-शोर से आगाज करने के दौरान यह संकल्प लिया गया था कि लगातार जल संरक्षण तथा मृदा संरक्षण के कार्य कराकर मिट्टी के क्षरण को रोका जायेगा और वर्षा जल को भूमि में समाहित कर इस 3 वर्षीय कार्ययोजना के पूर्ण होने के पश्चात मिढ़ासन नदी को उसका सदानीरा वाला पुनारा स्वरूप लौटाया जायेगा। लेकिन मिढ़ासन नदी के हर साल गर्मी के मौसम में सूखने के कारण इसके पुनर्जीवन का संकल्प धरातल पर आज भी अधूरा है। नर्मदा नदी की परिक्रमा करने वाले और नदियों के संरक्षण को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले शिवराज सीएम रहते हुए अपने पूरे कार्यकाल में मिढ़ासन नदी पर चुप्पी साधे रहे। इसके पुनर्जीवन का का संकल्प लेकर उन्होंने वाहवाही तो खूब बटोरी थी लेकिन ईमानदारी से नदी को पुनर्जीवित कराने पर आवश्यक ध्यान नहीं दिया। जल संकट से मची त्राहि-त्राहि को देखते हुए प्राकृतिक जल का महत्वपूर्ण स्रोत कहलाने वाली नदियों को बचाने सूबे की नई सरकार क्या कदम उठाती है अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

मिढ़ासन नदी पुनर्जीवन योजना एक नजर में
नदी की कुल लम्बाई |
81 किलोमीटर |
नदी का कुल केचमेंट क्षेत्र |
970 वर्ग किलोमीटर |
उद्गम स्थल |
ग्राम पंचायत मुटवा जनपद पन्ना जिला पन्ना |
उपचार हेतु चयनित लंबाई |
24 किलोमीटर |
उपचार हेतु चयनित क्षेत्र |
214 वर्ग किलोमीटर |
उपचार हेतु चयनित ग्राम पंचायतें |
23 |
कार्यों पर व्यय की जाने वाली राशि |
26 करोड़ 69 लाख 54 हजार |
जून 2016 तक व्यय |
19 करोड़ 78 लाख रूपये |
परियोजना की अवधि |
3 वर्ष |




शादिक खान, पन्ना। (www.radarnews.in) पिछले कुछ सालों से अल्प वर्षा के चलते सूखे की भीषण त्रासदी झेलने वाले बुन्देलखण्ड अंचल के पन्ना जिले में इस समय पानी को लेकर त्राहि-त्राहि मची हुई है। ग्रामीण अंचल में प्यास बुझाने के लिये लोग बूंद-बूंद पानी तक को मोहताज है। प्रशासनिक उदासीनता के कारण हालात इस हद तक ख़राब हो चुके हैं कि अब यहाँ लोगों को पानी के लिए पलायन करना पड़ रहा है। बुंदेलखंड अंचल में काम के आभाव में गाँवों से बड़ी तादाद में लोगों का महानगरों के लिए पलायन करना तो आमबात है लेकिन, पानी के लिए पलायन नया है। आग उगलती गर्मी के बीच पन्ना जिले में जल संकट से उत्पन्न त्रासदी का हाल यह है कि यहाँ के छापर ग्राम के लोग जल संकट के कारण तीन माह पहले ही अपना गाँव छोड़ कर ककरहटी में विस्थापित हो चुके हैं। ग्रामीणों के पलायन करने से यहाँ के अधिकांश घरों में ताले लटक रहे है। लगभग वीरान हो चुके इस गांव में सिर्फ तीन बुजुर्ग व्यक्ति और कुछ मवेशी ही अब शेष बचे है। जो कि जिंदा रहने की जद्दोज़हद करते हुये इस चिलचिलाती धूप में करीब 3-4 किलोमीटर दूर से पीने का पानी लाने को मजबूर है।






ब्रह्माकुमारी सीता बहिन जी ने विद्यालय का परिचय एवं उद्देश्य बताते हुए कहा कि ब्रह्माकुमारी विद्यालय का लक्ष्य है सभी को सुसंस्कृत, निर्व्यसन जीवन जीने की कला सिखाना है। इसलिए यहां पर प्रतिदिन आध्यात्मिक शिक्षा दी जाती है एवं राजयोग ध्यान (मेडीटेशन) सिखाया जाता है। जिससे हमारे अन्दर शक्तियों का विकास होता है, मनोबल बढ़ता है और व्यक्ति अन्दर से शक्तिशाली मजबूत अनुभव करता है। जिससे सभी बुराईयों एवं व्यसनों को छोड़ना उसके लिए आसान हो जाता है। आपने कहा कि अगर हमारे अन्दर कोई भी नशीले पदार्थों की लत नहीं है तो अच्छा है। लेकिन, कोई कुसंस्कृत, गलत आदत जैसे – गुस्सा करना, अधिक सोना… आदि है तो उसे भी मन, वचन, कर्म से छोड़ने का संकल्प लें। साथ ही अपने आसपास के एक-दो व्यक्तियों का व्यसन छोड़ने के लिए अवश्य प्रेरित करें।

चुनावी जीत के बाद भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के साथ पार्टी कार्यालय पहुंचे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कार्यकर्ताओं को संबोधित किया। उन्होंने कहा- देश ने फकीर की झोली भर दी। भाजपा की विशेषता है कि हम कभी दो भी हो गए, लेकिन हम कभी अपने मार्ग से विचलित नहीं हुए। आदर्शों को ओझल नहीं होने दिया। ना रुके, ना थके और ना झुके। हम दो हो गए तो भी और आज दोबारा आ गए तो भी। दो से दोबारा आने की यात्रा में अनेक उतार-चढ़ाव आए। दो थे, तब भी निराश नहीं हुए। दोबारा आए तो भी नम्रता विवेक, आदर्श और संस्कार नहीं छोड़ेंगे।


खजुराहो संसदीय क्षेत्र के मतदाताओं ने मोदी के नाम पर दिल खोलकर जितना प्रचण्ड बहुमत दिया है इतने उम्मीद खुद वी. डी. शर्मा और भाजपा ने नहीं की थी। यह अलग बात है कि श्री शर्मा चुनाव प्रचार के अंतिम दिनों में ही अपनी जीत को लेकर पूर्णतः आश्वस्त नजर आ रहे थे। फलस्वरूप मतदान सम्पन्न होने के बाद उन्होंने अपनी जीत का दावा करते हुए पत्रकारों से कहा था कि 2014 के चुनाव में मोदी जी की लहर थी लेकिन 2019 में खजुराहो सीट पर मोदी जी की अंडर ग्राउण्ड सुनामी चल रही है। केन्द्र में पुनः मोदी सरकार बनाने के लिए संकल्पित मतदाताओं की भावनाओं के मद्देनजर भाजपा प्रत्याशी ने करीब दो-ढ़ाई लाख मतों के अंतर् से अपनी जीत का दावा किया था। लेकिन गुरुवार 23 मई की देर शाम चुनावी नतीजों पर जब आधिकारिक मुहर लगी तो जीत का अंतर् उनकी उम्मीद से लगभग दोगुना हो गया।
खजुराहो लोकसभा सीट से इस बार चुनावी समर में 17 उम्मीदवार अपनी किस्मत आजमा रहे थे। आज सम्पन्न हुई चुनाव की मतगणना के पश्चात घोषित चुनावी नतीजों के अनुसार बीजेपी प्रत्याशी विष्णु दत्त शर्मा को 64.49 प्रतिशत एवं कांग्रेस प्रत्याशी महारानी कविता सिंह को 25.34 प्रतिशत वोट हांसिल हुए हैं। जबकि समजवादी पार्टी प्रत्याशी वीर सिंह पटेल समेत शेष सभी 15 उम्मीदवारों में किसी को भी 4 प्रतिशत से अधिक वोट नहीं मिले। परिणामस्वरूप सभी 15 उम्मीदवारों की जमानत जब्त हो गई है। बहुजन समाज पार्टी का समर्थन प्राप्त सपा प्रत्याशी वीर सिंह पटेल महज 40,077 वोट पर सिमट गए। चुनाव के दौरान सपा के प्रचार की बेहद कमजोर स्थिति को देखकर शुरू से ही माना जाने लगा था कि वह त्रिकोणीय मुकाबले की स्थिति निर्मित नहीं कर पाएगी। लेकिन बसपा का समर्थन प्राप्त होने के बाद भी सपा प्रत्याशी वीर सिंह पटेल को उतने वोट भी नहीं मिले जितने पिछले चुनावों में बसपा प्रत्याशियों ने प्राप्त किए थे। इस तरह खजुराहो सीट पर जहाँ कांग्रेस को शर्मनाक हार का सामना करना पड़ा है वहीं सपा प्रत्याशी का प्रदर्शन अत्यंत ही निराशाजनक रहा।
मुरैना जिले के निवासी विष्णु दत्त शर्मा को खजुराहो सीट से बीजेपी द्वारा उम्मीदवार घोषित करने के बाद उन्हें यहाँ चुनाव के शुरूआती दौर में अपनी ही पार्टी के कतिपय नेताओं का कड़ा विरोध झेलना पड़ा था। जिसे देखते हुए कांग्रेस की क्षेत्रीय प्रत्याशी और राजपरिवार से ताल्लुक रखने वालीं कविता सिंह के सामने उन्हें कमजोर करके आँका जा रहा था। लेकिन मोदी के मैजिक और बीजेपी के चुनावी प्रबंधन के चलते विष्णु दत्त शर्मा को मतदाताओं से इतना प्यार और समर्थन मिला कि बाहरी और क्षेत्रीय का मुद्दा टिक नहीं पाया। आज ईव्हीएम से जिस तरह वी. डी. शर्मा के पक्ष में मतदाताओं का भरोसा बाहर आया उससे यह साबित हो गया है कि राजनैतिक हितों के टकराव में उनकी अपनी पार्टी के नेता या फिर विपक्षी दलों के लोग बाहरी बताकर भले ही उनका विरोध करते रहे हों लेकिन यहाँ के मतदाताओं ने उन्हें अपना माना है। यह पहली बार नहीं है कि जब खजुराहो सीट से इस संसदीय क्षेत्र के बाहर का कोई व्यक्ति सांसद निर्वाचित हुआ है। भाजपा के टिकट पर पूर्व में भी कई बाहरी नेता यहाँ से सांसद चुने गए। खजुराहो सीट करीब तीन दशक से भाजपा के सांसद निर्वाचीर होने के कारण इस सीट को मध्यप्रदेश में भाजपा का मजबूत गढ़ माना जाता है।





उप वनमण्डलाधिकारी विश्रामगंज नरेन्द्र सिंह परिहार ने जैव विविधता के संबंध में बताया कि हर गांव में तालाब खुदवाए जाए और तालाबों में मछलीयों को लाया जाए जिससे कि तालाब के अंदर और मृदा में सूक्ष्मजीव विकसित हों। उनके द्वारा यह भी बताया गया कि जंगलों में लगने वाली आग पर रोकथाम लगाया जाए क्योंकि आग लगने से बहुत से सूक्ष्म जीव, कीड़े-मकोड़े मर जाते हैं जिससे जैव विविधता बाधित होती है। श्री सिंह ने यह भी बताया कि हर आदमी को वृक्षारोपण करना चाहिए और पेड़ों की कटाई पर रोकथाम लगाई जाये जिससे जैव विविधता प्रभावित न हो। कार्यक्रम में शासकीय अधिवक्ता श्री निगम ने भी जैव विविधता अधिनियम से संबंधित धाराओं के के बारे में अवगत कराया। संगोष्ठी कार्यक्रम में पन्ना उत्तर पन्ना परिक्षेत्राधिकारी, परिक्षेत्र सहायक, ग्राम वन समिति के सदस्य एवं कृषकों ने भी भाग लिया और जैव विविधता के संबंध में चर्चा की।


