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करीब 73 हजार हेक्टेयर में दलहन-तिलहन की फसलें प्रभावित
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कृषि विभाग ने क्षति की वास्तविक जानकारी जुटाने शुरू किया ग्रामवार प्रारंभिक सर्वे
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लगातार 20 दिन से अधिक बारिश और जलभराव से खरीफ फसलों को भारी नुकसान
शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में अगस्त माह के दूसरे सप्ताह से 4 सितंबर तक हुई लगातार भारी बारिश और जलभराव ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। खेतों में कई दिनों तक पानी भरा रहने से खरीफ की दलहनी और तिलहनी फसलों को व्यापक नुकसान पहुंचा है। खासकर उड़द, मूंग और तिल की खड़ी फसलें पानी में डूबने के बाद गलने और सड़ने लगी हैं। फसलों में फूल आने के समय हुई अतिवृष्टि ने किसानों की महीनों की मेहनत और खेती में लगाई पूंजी को संकट में डाल दिया है। अब प्रभावित किसान फसल क्षति का शीघ्र एवं निष्पक्ष सर्वे कराकर नियमानुसार मुआवजा तथा फसल बीमा का अधिकतम लाभ दिलाने की मांग कर रहे हैं।
लगातार 20 दिन से अधिक समय तक हुई बारिश से जिले में नदी-नाले उफान पर रहे और कई क्षेत्रों में बाढ़ जैसे हालात निर्मित हुए। 2 सितंबर तक जिले में औसत 868.2 मिलीमीटर बारिश दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी, जबकि अजयगढ़ क्षेत्र में 1344.8 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी। इसके बाद 3 और 4 सितंबर को भी कई क्षेत्रों में भारी बारिश का दौर जारी रहा। भू-संसाधन प्रबंधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार 4 सितंबर को जिले में औसत 71.7 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड हुई। इसमें गुनौर तहसील में सर्वाधिक 140 मिलीमीटर, पवई में 118 मिलीमीटर और अमानगंज तहसील क्षेत्र में 98.2 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई।
लगातार बारिश से करीब 20 साल बाद वर्ष 2005 जैसे भीषण बाढ़ के हालात बनने की स्थिति सामने आई। गनीमत रही कि 4 सितंबर को बारिश थम गई और बाढ़ की स्थिति और अधिक विकराल नहीं हुई, लेकिन तब तक अतिवृष्टि खेतों और ग्रामीण क्षेत्रों में भारी नुकसान पहुंचा चुकी थी। जिले में सैकड़ों गरीब परिवारों के कच्चे मकानों के जमींदोज होने की घटनाएं सामने आईं, वहीं पानी में बहने से दो नाबालिगों सहित तीन लोगों की जान भी चली गई।
73 हजार हेक्टेयर में दलहन-तिलहन की बोवनी

कृषि विभाग के प्राथमिक आंकड़ों के अनुसार खरीफ सीजन 2026 में जिले में 2.08 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फसलों की बोवनी की गई है। इसमें करीब 1.40 लाख हेक्टेयर में धान, 33 हजार हेक्टेयर में तिल तथा लगभग 40 हजार हेक्टेयर में मूंग, उड़द और अरहर जैसी दलहनी फसलें शामिल हैं। इस तरह जिले में करीब 73 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में दलहनी-तिलहनी फसलों की बोवनी हुई थी। यह 73 हजार हेक्टेयर वास्तविक क्षतिग्रस्त क्षेत्रफल नहीं है, बल्कि जिले में दलहन-तिलहन की कुल बोवनी का रकबा है। वास्तविक रूप से कितने क्षेत्र में फसल क्षति हुई है, इसका आंकड़ा कृषि विभाग के स्थलीय सर्वे के बाद ही स्पष्ट होगा।
बारिश का सबसे अधिक असर निचले इलाकों के खेतों में दिखाई दे रहा है। पानी की निकासी नहीं होने के कारण कई खेत कई दिनों तक तालाब में तब्दील रहे। पानी में डूबी उड़द, मूंग और तिल की फसलें अब गलने और सड़ने लगी हैं। कई जगह खेतों में खड़ी फसल पीली पड़ गई है। किसानों का कहना है कि पिछले माह फसलों में फूल आने शुरू हुए थे और उन्हें अच्छी पैदावार की उम्मीद थी, लेकिन लगातार बारिश ने पूरा गणित बिगाड़ दिया।
अजयगढ़ से रैपुरा तक फसलों पर अतिवृष्टि की मार

फसल नुकसान की तस्वीरें जिले के कई क्षेत्रों से सामने आ रही हैं। बृजपुर-पहाड़ीखेड़ा, सुनवानी, अमानगंज, सलेहा, सिमरिया, गुनौर, रैपुरा, अजयगढ़ और देवेंद्रनगर क्षेत्रों में मूंग, उड़द और तिल की फसलों को खासा नुकसान होने की जानकारी सामने आई है। निचले क्षेत्रों में स्थिति अधिक गंभीर है। लंबे समय तक जलभराव रहने के कारण फसलों के खराब होने की आशंका बढ़ गई है। जहां खेतों में अभी फसल खड़ी दिखाई दे रही है, वहां भी लगातार नमी के कारण पौधे पीले पड़ने लगे हैं। कुछ स्थानों पर फसल जमीन पर गिर गई है, जबकि पानी में डूबी फसल सड़ने लगी है। इसके विपरीत धान की फसल को कई क्षेत्रों में अधिक बारिश से अपेक्षाकृत लाभ होने की बात कही जा रही है। हालांकि धान समेत सभी खरीफ फसलों की अंतिम स्थिति का आकलन कृषि विभाग के सर्वे के बाद ही स्पष्ट होगा।
खेतों में तबाही, किसानों के सामने आर्थिक संकट
अतिवृष्टि ने सबसे अधिक चिंता छोटे और सीमांत किसानों की बढ़ा दी है। किसानों ने खाद, बीज, दवा, मजदूरी, जुताई और बोवनी पर पहले ही पैसा खर्च कर दिया था। जब फसल तैयार होने की उम्मीद बनी तो लगातार बारिश ने उसे बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया। कई किसानों के लिए खरीफ की फसल पूरे साल की आय का प्रमुख आधार होती है। ऐसे में फसल खराब होने से खेती की लागत की भरपाई, परिवार का भरण-पोषण, कृषि ऋण की अदायगी और आगामी रबी सीजन की तैयारी को लेकर संकट खड़ा हो गया है। किसानों का कहना है कि यदि समय पर राहत नहीं मिली तो आर्थिक परेशानी और बढ़ सकती है।
बारिश के दौरान कई ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों तक पहुंचने वाले रास्ते भी जलमग्न रहे। ऐसे में किसान चाहकर भी खेतों में जमा पानी की निकासी नहीं कर सके। अब बारिश थमने के बाद खेतों में पानी कम होने लगा है तो फसलों की वास्तविक बर्बादी सामने आने लगी है।
बाढ़ जैसे हालात में भी खेतों तक पहुंचा कृषि अमला

फसल क्षति की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए कृषि विभाग का मैदानी अमला लगातार प्रभावित क्षेत्रों का भ्रमण कर रहा है। उप संचालक किसान कल्याण तथा कृषि विकास ओपी तिवारी के निर्देशन में अनुविभागीय कृषि अधिकारी, वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी और कृषि विस्तार अधिकारी प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचकर फसल क्षति की जानकारी जुटा रहे हैं। विभाग के निर्देश के अनुसार अतिवृष्टि प्रभावित फसलों की ग्रामवार और फसलवार जानकारी, प्रभावित क्षेत्रफल तथा नुकसान की स्थिति दर्ज की जा रही है। एसडीओ कृषि उत्तम बागरी को इस कार्य के लिए नोडल अधिकारी बनाया गया है। वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में लगातार भ्रमण कर स्थलीय निरीक्षण करने और किसानों से संपर्क के आधार पर वास्तविक स्थिति जुटाकर नोडल अधिकारी को रिपोर्ट भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
उप संचालक ओपी तिवारी और एसडीओ उत्तम बागरी ने संयुक्त रूप से रैपुरा, सुंदरा, देवेंद्रनगर, ककरहटी, पवई, कल्दा पठार और पहाड़ीखेड़ा सहित विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण कर फसलों की स्थिति का जायजा लिया है। बाढ़ जैसे हालात और कई स्थानों पर मार्ग अवरुद्ध होने के बावजूद मैदानी अमला खेतों तक पहुंचकर फसल क्षति की जानकारी जुटाने में लगा रहा।
जीपीएस लोकेशन वाले फोटो से हो रहा ग्राउंड ट्रूथिंग
कृषि विभाग द्वारा किसानों से प्राप्त जानकारी के साथ ग्राउंड ट्रूथिंग यानी स्थलीय सत्यापन के माध्यम से फसल क्षति का आकलन किया जा रहा है। मैदानी अमला प्रभावित खेतों का निरीक्षण कर फसलों के जीपीएस लोकेशन वाले फोटो अलग-अलग एंगल से ले रहा है। इन फोटो और आवश्यक विवरण को उन्नति ऐप पर अपलोड किया जा रहा है। प्रभावित ग्राम, फसल का नाम, प्रभावित क्षेत्रफल और नुकसान की स्थिति जैसी जानकारी संकलित कर स्थलीय निरीक्षण एवं किसानों से संपर्क के आधार पर उसका परीक्षण किया जा रहा है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य फसल नुकसान का वास्तविक और प्रमाणित रिकॉर्ड तैयार करना है, ताकि आगे किसानों को फसल बीमा और शासन स्तर से मिलने वाली राहत का लाभ दिलाने में आवश्यक दस्तावेजी आधार उपलब्ध हो सके।
उप संचालक कृषि ओपी तिवारी के अनुसार, यदि अगले कुछ दिनों में बारिश का नया दौर नहीं आता है तो प्रभावित फसलों के प्रारंभिक आकलन का कार्य सप्ताह के अंत तक पूरा किया जा सकता है। कृषि विभाग के अधिकारी-कर्मचारी किसानों को खेतों में जमा पानी की जल्द निकासी के लिए मेड़ काटकर पानी बाहर निकालने की सलाह भी दे रहे हैं, ताकि जो फसल बचने की स्थिति में है उसे आगे होने वाले नुकसान से बचाया जा सके।
बीमा कंपनी को दी गई सूचना, सर्वेयरों से क्षति आकलन की मांग
कृषि विभाग ने अतिवृष्टि से फसलों को हुए नुकसान की जानकारी एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी के क्षेत्रीय प्रतिनिधि पंकज कुशवाहा को पत्र के माध्यम से दी है। विभाग द्वारा मोबाइल पर भी चर्चा कर कंपनी से अपने सर्वेयरों के माध्यम से प्रभावित क्षेत्रों में फसल हानि की वास्तविक स्थिति का शीघ्र आकलन कराने के लिए कहा गया है। उन्नति ऐप पर अपलोड किए जा रहे फसल क्षति से संबंधित जीपीएस लोकेशन वाले फोटो और अन्य जानकारी संबंधित अधिकारियों के साथ बीमा कंपनी तक भी पहुंचाई जा रही है। कृषि विभाग और बीमा कंपनी के बीच समन्वय के जरिए प्रभावित किसानों के फसल बीमा दावों की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की तैयारी है।
किसान संगठन बोले- ‘सर्वे में एक भी खेत न छूटे‘
अतिवृष्टि प्रभावित किसानों और किसान संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि राजस्व और कृषि विभाग की संयुक्त टीमें गांव-गांव पहुंचकर फसल क्षति का पारदर्शी और समयबद्ध सर्वे करें। किसी भी प्रभावित किसान या खेत को सर्वे से बाहर नहीं रखा जाए और वास्तविक नुकसान के आधार पर पात्र किसानों को नियमानुसार राहत राशि उपलब्ध कराई जाए। किसान कांग्रेस के जिलाध्यक्ष सेवालाल पटेल ने कहा कि लगातार बारिश से किसानों की फसल उत्पादन की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है। किसानों ने खाद, बीज, मजदूरी और अन्य कृषि कार्यों पर पैसा खर्च किया था। फसल खराब होने से उनकी पूरी आर्थिक गणित बिगड़ गई है। उन्होंने मांग की कि प्रभावित किसानों को नियमानुसार राहत राशि के साथ प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का अधिकतम संभव लाभ दिलाया जाए।
वहीं भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष शंकर पटेल ने कहा कि जिले के किसान पिछले कई वर्षों से प्राकृतिक आपदाओं की मार झेल रहे हैं। हाल की भारी बारिश ने किसानों को आर्थिक रूप से तोड़ दिया है। उन्होंने खरीफ फसलों की क्षति का तत्परता और संवेदनशीलता के साथ सर्वे कराने तथा प्रभावित किसानों को फसल बीमा के साथ शासन स्तर से समुचित राहत उपलब्ध कराने की मांग की।









मोहन्द्रा-कोटा मार्ग पर कुछ गड्ढे इतने गहरे हैं कि उनमें वाहन के पहिए तक समा जाते हैं। दोपहिया और छोटे चार पहिया वाहन चालकों के लिए ऐसे स्थान सबसे अधिक जोखिम वाले हैं। ई-रिक्शा चालकों की परेशानी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि स्थानीय लोगों के अनुसार कई बार वे गड्ढों वाले हिस्से से पहले सवारियों को उतारकर वाहन को धीरे-धीरे निकालते हैं। बारिश के दौरान समस्या और बढ़ जाती है। गड्ढों में जमा पानी के ऊपर से जब भारी वाहन गुजरते हैं तो पानी की तेज बौछार आसपास की दीवारों और किनारे तक पहुंचती है। वहीं लोडर और भारी वाहनों के आवागमन के दौरान सड़क धंसने या वाहन के असंतुलित होने की आशंका बनी रहती है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल सड़क की पांच साल की गारंटी को लेकर है। सड़क अभी गारंटी पीरियड में है, लेकिन लंबे समय से आवश्यक मरम्मत और संधारण नहीं होने के कारण इसकी हालत लगातार बिगड़ती गई। यानी जिस अवधि में सड़क को बेहतर स्थिति में बनाए रखने के लिए गारंटी की व्यवस्था की गई है, उसी अवधि में सड़क जगह-जगह बड़े गड्ढों में बदल रही है। लोक निर्माण विभाग द्वारा ठेका कंपनी हिलवेज कंस्ट्रक्शन कंपनी को पिछले चार माह के दौरान दो बार सख्त कार्रवाई की चेतावनी वाले पत्र भेजे जाने की बात सामने आई है। इसके बावजूद ठेका कंपनी प्रबंधन के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर गारंटी की शर्तों के तहत ठेका कंपनी से सड़क का आवश्यक रखरखाव और सुधार कार्य क्यों नहीं कराया जा सका।
लोक निर्माण विभाग उप संभाग पवई के अनुविभागीय अधिकारी राजमणि बागरी ने बताया कि सड़क के अत्यधिक क्षतिग्रस्त होने की जानकारी विभाग को है। लोनिवि द्वारा अपने स्तर पर आज से गड्ढों की मरम्मत और जल निकासी का कार्य प्रारंभ कराया गया है। सड़क वर्तमान में गारंटी पीरियड में है, इसलिए संबंधित ठेका कंपनी को पत्र भेजकर तत्काल आवश्यक सुधार कार्य कराने के निर्देश दिए गए हैं। सुधार कार्य नहीं कराने पर ठेका कंपनी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी।










इसी प्रकार मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना के 1,450 विस्थापित परिवारों को भी बड़ी राहत मिली है। पहले यहां भी प्रति परिवार 5 लाख रुपये की पुनर्वास सहायता निर्धारित थी। पहले यहां भी प्रति परिवार 5 लाख रुपये की पुनर्वास सहायता निर्धारित थी। डूब प्रभावितों के हित एवं परियोजना के क्रियान्वयन के दृष्टिगत अब प्रत्येक पात्र परिवार को 
जांच दल ने ग्राम कटन, तहसील गुनौर स्थित मेसर्स बागरी ड्रग एजेंसी का निरीक्षण किया। जांच के दौरान पाया गया कि एजेंसी ने पिछले लगभग एक माह में करीब 45 हजार बोतल ऑनरेक्स कफ सिरप खरीदी थीं, लेकिन उनकी बिक्री अथवा वितरण से संबंधित आवश्यक अभिलेख प्रस्तुत नहीं किए। निरीक्षण में औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 तथा नियम, 1945 के विभिन्न प्रावधानों के उल्लंघन भी पाए गए। इसके आधार पर एजेंसी को तत्काल प्रभाव से सीलबंद कर दिया गया।
इसी क्रम में देवेंद्रनगर स्थित मेसर्स देवनाथ फार्मा की जांच की गई। जांच में सामने आया कि एजेंसी अपने लाइसेंस में दर्ज स्थान के बजाय दूसरे स्थान से संचालित की जा रही थी। यहां पिछले दो माह में लगभग 89 हजार बोतल ऑनरेक्स कफ सिरप खरीदे जाने का रिकॉर्ड मिला। जांच दल ने लगातार दो दिन तक अभिलेखों का परीक्षण और अन्य औषधियों की जब्ती संबंधी कार्रवाई की। तीसरे दिन जब टीम दोबारा पहुंची तो प्रतिष्ठान पर ताला लगा मिला तथा मकान मालिक एवं एजेंसी संचालक परिवार सहित गायब था। इसके बाद नियमानुसार परिसर को भी सीलबंद कर दिया गया।
विशेष जांच दल की कार्रवाई के बाद पन्ना सहित आसपास के जिलों के दवा कारोबारियों में हड़कंप की स्थिति है। माना जा रहा है कि अब ऐसे अन्य थोक एवं फुटकर दवा प्रतिष्ठानों की भी जांच की जा सकती है, जहां नियंत्रित औषधियों की असामान्य मात्रा में खरीद-बिक्री हुई है। यदि जांच में और अनियमितताएं सामने आती हैं तो कार्रवाई का दायरा और बढ़ सकता है। इस विशेष जांच दल में पन्ना की औषधि निरीक्षक महिमा जैन, छतरपुर के औषधि निरीक्षक अजीत जैन, सतना की औषधि निरीक्षक प्रियंका चौबे तथा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय, पन्ना का स्टाफ शामिल रहा।






