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अतिवृष्टि से बर्बाद खरीफ फसलों का सर्वे शुरू, 25 सितंबर तक खेत-खेत पहुंचेगी संयुक्त टीमें

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पन्ना जिले में विगत दिनों हुई अतिवृष्टि से जलमग्न एक खेत का दृश्य। (फाइल फोटो)
  • राजस्व, कृषि, पंचायत और उद्यानिकी विभाग के अमले को जिम्मेदारी

  • मौके पर फसल क्षति की प्रमाणित जानकारी जुटाई जाएगी

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) जिले में अगस्त के अंतिम दिनों से सितंबर के पहले सप्ताह तक हुई लगातार बारिश और अतिवृष्टि से प्रभावित खरीफ फसलों की वास्तविक क्षति का संयुक्त सर्वे सोमवार से शुरू हो गया। जिले के सभी अनुविभागों में गठित संयुक्त टीमें अब गांव-गांव और खेत-खेत पहुंचकर जलभराव एवं अतिवृष्टि से फसलों को हुए नुकसान का मौके पर आकलन कर प्रमाणित जानकारी जुटाएंगी। सर्वे की प्रक्रिया 25 सितंबर तक चलेगी। सर्वे दलों में राजस्व, कृषि, पंचायत एवं ग्रामीण विकास तथा संबंधित विभागों के अधिकारी-कर्मचारियों को शामिल किया गया है। खेतों में पहुंचकर फसल की स्थिति, प्रभावित रकबे और नुकसान की वास्तविक स्थिति का आकलन निर्धारित मापदंडों एवं प्रपत्रों के अनुसार किया जाएगा। सर्वे पूरा होने के बाद ही जिले में अतिवृष्टि से वास्तविक रूप से प्रभावित फसल क्षेत्र और पात्र किसानों की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।

खेतों में जलभराव से उड़द-मूंग को ज्यादा नुकसान

हालिया अतिवृष्टि का सबसे अधिक असर खरीफ की दलहनी फसलों पर दिखाई दिया है। लगातार बारिश के कारण निचले इलाकों के अनेक खेतों में कई दिनों तक पानी भरा रहा। फूल आने के दौर में खड़ी उड़द और मूंग की फसल लंबे समय तक पानी में डूबे रहने के कारण सड़ने लगी। तिल की फसल को भी नुकसान पहुंचा है, हालांकि किसानों के अनुसार उड़द और मूंग की तुलना में तिल की फसल पर नुकसान अपेक्षाकृत कम है। पूर्व में कृषि विभाग के प्राथमिक आंकड़ों के अनुसार जिले में इस खरीफ सीजन में करीब 2.08 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फसलों की बोवनी बताई गई थी। इसमें करीब 1.40 लाख हेक्टेयर धान, 33 हजार हेक्टेयर तिल तथा लगभग 40 हजार हेक्टेयर में मूंग, उड़द और अरहर जैसी दलहनी फसलें शामिल थीं। इस तरह दलहन-तिलहन का कुल बोवनी रकबा करीब 73 हजार हेक्टेयर बताया गया था।हालांकि यह कुल बोवनी का आंकड़ा है, इसे क्षतिग्रस्त क्षेत्रफल नहीं माना जा सकता। अतिवृष्टि से वास्तव में कितने क्षेत्र में फसल को नुकसान हुआ है, इसका प्रमाणित आंकड़ा संयुक्त स्थलीय सर्वे पूरा होने के बाद ही सामने आएगा।

25 सितंबर तक चलेगा खेत-खेत आकलन

सोमवार से शुरू हुए सर्वे के दौरान संयुक्त दल संबंधित गांवों और खेतों में पहुंचकर फसल की वास्तविक स्थिति दर्ज करेंगे। लगातार बारिश के कारण जलमग्न रहे खेतों में फसल की स्थिति, नुकसान का स्वरूप और प्रभावित क्षेत्र का मौके पर आकलन किया जाएगा। गुनौर एसडीएम कार्यालय से 18 सितंबर को जारी आदेश में कलेक्टर पन्ना के 16 सितंबर के पत्र के पालन में अतिवृष्टि से प्रभावित फसलों के सर्वे के लिए संयुक्त दल गठित किए जाने की जानकारी दी गई थी। आदेश में राजस्व पुस्तक परिपत्र खंड-6 क्रमांक-4 में निर्धारित मापदंडों के अनुसार फसल क्षति का सर्वे कर निर्धारित प्रपत्रों में जानकारी तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। गुनौर अनुभाग में तहसीलदार गुन्नौर एवं अमानगंज, संबंधित नायब तहसीलदार, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत गुन्नौर, वरिष्ठ कृषि विस्तार अधिकारी तथा वरिष्ठ उद्यान विकास अधिकारी को सर्वे की जिम्मेदारी दी गई है। आदेश के साथ जारी सूची में समस्त ग्राम पंचायतों एवं नगरीय निकाय क्षेत्रों के लिए हल्का पटवारी, पंचायत सचिव/रोजगार सहायक और संबंधित कृषि विस्तार अधिकारी की 99 टीम निर्धारित की गई हैं। इसी तर्ज पर जिले के अन्य अनुविभागों में भी संयुक्त दल गठित किए गए हैं।

सर्वे रिपोर्ट से तय होगी वास्तविक क्षति

लगातार बारिश और जलभराव के कारण फसलों को हुए नुकसान को लेकर किसान लंबे समय से सर्वे और राहत की मांग कर रहे थे। अब संयुक्त दलों के खेतों में पहुंचने के बाद किसानों की निगाहें सर्वे की पारदर्शिता और तैयार होने वाली क्षति रिपोर्ट पर हैं। मौके पर जुटाई जाने वाली जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट होगा कि अतिवृष्टि से कितने किसानों की कितनी फसल प्रभावित हुई है और नुकसान किस स्तर का है। इसके बाद तैयार होने वाली रिपोर्ट के आधार पर शासन के निर्धारित प्रावधानों के अनुसार राहत एवं अन्य सहायता की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद तेज हुई प्रक्रिया

पन्ना में आयोजित बलराम महोत्सव के जिला स्तरीय कार्यक्रम को वर्चुअली संबोधित करते हुए मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव। (फाइल फोटो)
फसल क्षति सर्वे की प्रशासनिक कवायद की पृष्ठभूमि में हाल ही में पन्ना में आयोजित बलराम कृषि महोत्सव भी महत्वपूर्ण रहा। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वर्चुअली संवाद किया था। इस दौरान गुन्नौर विधायक डॉ. राजेश कुमार वर्मा ने अतिवृष्टि से विधानसभा क्षेत्र सहित पन्ना जिले में हुए फसल नुकसान का मुद्दा उठाते हुए प्रभावित किसानों के लिए फसल क्षति का सर्वे और राहत की मांग रखी थी। इसके बाद कलेक्टर पन्ना की ओर से 16 सितंबर को जारी पत्र के पालन में गुन्नौर सहित जिले के अन्य अनुविभागों में संयुक्त सर्वे दल गठित किए गए। अब 25 सितंबर तक चलने वाले स्थलीय सर्वे के दौरान जुटाई जाने वाली प्रमाणित जानकारी से जिले में अतिवृष्टि से फसल नुकसान की वास्तविक तस्वीर सामने आने की उम्मीद है।
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दिन में रेकी, रात में चोरी; टीआई समेत 6 आरोपी गिरफ्तार, 10 चोरियों के खुलासे का दावा

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देवेंद्रनगर थाना पुलिस टीम की अभिरक्षा में कथित अंतरजिला चोर गिरोह के सदस्य।
  • पुलिस की कथित बड़ी कार्रवाई की प्रेस विज्ञप्ति में कई अहम सवालों के जवाब नहीं

  • घटनाओं में चोरी गए कुल माल की कीमत और चोरी हुए आभूषणों का स्पष्ट ब्योरा नहीं

  • स्क्रिप्ट राइटर की चूक या फिर अधिकारियों ने सीमित खुलासे की दी स्वीकृति!

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) पन्ना पुलिस ने सूने मकानों, निर्माणाधीन भवनों और शासकीय उचित मूल्य की दुकानों को निशाना बनाने वाले कथित अंतरजिला चोर गिरोह के छह आरोपियों को गिरफ्तार करने और देवेन्द्रनगर व गुनौर थाना क्षेत्रों की 10 चोरी की घटनाओं का खुलासा करने का दावा किया है। पुलिस की ओर से रविवार 20 सितंबर को जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार आरोपियों से चोरी के सामान के रूप में 30 प्लाई, 20 बोरी गेहूं, 4 बोरी चावल और 3 हजार रुपए नकद बरामद किए गए हैं। इसके अलावा चोरी की वारदातों में इस्तेमाल किए जाने का दावा किए गए एक आर्टिका वाहन, एक पिकअप और एक अपाचे मोटरसाइकिल को भी जब्त किया गया है। पुलिस ने इन सभी जब्त वस्तुओं का कुल मूल्य करीब 16 लाख 82 हजार रुपए बताया है।
प्रेस में जारी विज्ञप्ति में चोरियों के खुलासे से जुड़े कई महत्वपूर्ण जानकारियों, प्रश्नों के जवाब नहीं मिलते हैं। क्या इसे पुलिस के स्क्रिप्ट राइटर की त्रुटि माना जाए या फिर यह समझा जाए अधिकारियों ने सिर्फ इतना ही (सीमित) खुलासा करने की स्वीकृति दी है। आधे-अधूरे खुलासे के पीछे असल कारण क्या है यह तो स्क्रिप्ट राइटर और संबंधित पुलिस अफसर ही बता सकते हैं।
पुलिस के मुताबिक आरोपियों को सतना और रीवा जिलों से पकड़ा गया। पूछताछ के बाद पुलिस ने देवेन्द्रनगर और गुनौर थाना क्षेत्रों की अलग-अलग 10 चोरी की घटनाओं में उनकी कथित संलिप्तता का दावा किया है। पुलिस के अनुसार देवेन्द्रनगर थाना क्षेत्र में आर्टिका कार चोरी के प्रयास, बड़ागांव में सूने मकान से आभूषण व नकदी चोरी, सिलगी और गिरवारा में निर्माणाधीन भवनों से प्लाई व लोहे की सामग्री चोरी तथा गोल्ही मुड़िया स्थित शासकीय उचित मूल्य की दुकान से खाद्यान्न चोरी की घटनाएं शामिल हैं। इसी तरह गुनौर थाना क्षेत्र के सिली गुनौर, लुहरगांव, हरद्वाही, भटगवां और पटनाकला में चोरी की वारदातों में शामिल होने का भी पुलिस ने दावा किया है।

सतना-रीवा से पकड़े गए छह आरोपी

पुलिस द्वारा गिरफ्तार बताए गए आरोपियों में शिवम पटेल पिता राम मनोहर पटेल 21 वर्ष निवासी ग्राम नंदहा थाना नागौद जिला सतना हाल ढेकहा जिला रीवा, अमन उर्फ नसीम खान 22 वर्ष, टीआई उर्फ राजेश पटेल पिता रामराज पटेल 29 वर्ष, अमर पटेल पिता रामराज पटेल, 22 वर्ष, अजय पाठक पिता रामकृष्ण पाठक 31 वर्ष, सभी निवासी जिला रीवा तथा अनुज विश्वकर्मा पिता राजेंद्र प्रसाद विश्वकर्मा 21 वर्ष, निवासी ग्राम नंदहा जिला सतना शामिल हैं।पुलिस का कहना है कि छहों को सतना और रीवा जिले से पुलिस अभिरक्षा में लिया गया और पूछताछ के बाद चोरी की घटनाओं में उनकी कथित संलिप्तता सामने आई।
वारदात से पहले करते थे रेकी
कथित अंतरजिला चोर गिरोह से बरामद चुराया हुआ सामान और चोरी की घटनाओं में उपयोग में लाए गए वाहन।
पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार आरोपी दिन के समय गांवों और अन्य क्षेत्रों में घूमकर सूने मकान, दुकान और निर्माणाधीन भवनों की रेकी करते थे। स्थान चिन्हित करने के बाद रात में पिकअप वाहन और मोटरसाइकिल से पहुंचकर चोरी की वारदातों को अंजाम देने का दावा किया गया है। पुलिस ने आरोपियों से 30 नग प्लाई की कीमत करीब 53 हजार रुपए, 20 बोरी गेहूं और 4 बोरी चावल की कीमत करीब 26 हजार रुपए तथा 3 हजार रुपए नकद बरामद होना बताया है। इस तरह प्रेस विज्ञप्ति में चोरी के सामान और नकदी के रूप में बताई गई जब्ती का मूल्य करीब 82 हजार रुपए है। इसके अलावा पुलिस ने एक आर्टिका कार की कीमत करीब 5 लाख रुपए, एक पिकअप की कीमत करीब 10 लाख रुपए और एक अपाचे मोटरसाइकिल सहित कुल 16 लाख 82 हजार रुपए का मशरूका जब्त करने की जानकारी दी है।

चोरी हुए माल का कुल मशरूका कितना था?

पुलिस के दावे के अनुसार 10 चोरी की घटनाओं का खुलासा हुआ है, लेकिन प्रेस विज्ञप्ति में यह महत्वपूर्ण जानकारी नहीं दी गई है कि इन 10 घटनाओं में कुल कितने रुपए मूल्य का सामान चोरी हुआ था। यहां दो अलग-अलग आंकड़ों को समझना जरूरी है। पुलिस ने चोरी के सामान और नकदी के रूप में करीब 82 हजार रुपए की जब्ती बताई है। वहीं करीब 16.82 लाख रुपए के कुल मशरूका में वारदातों में इस्तेमाल किए जाने वाले तीन वाहन भी शामिल हैं, जिनकी कीमत ही करीब 16 लाख रुपए बताई गई है। इसलिए 16.82 लाख रुपए को 10 चोरी की घटनाओं में बरामद चोरी का माल मानना सही नहीं होगा। असल सवाल यह है कि जिन 10 घटनाओं का खुलासा करने का पुलिस दावा कर रही है, उन सभी में कुल कितने मूल्य की संपत्ति चोरी हुई थी और उसमें से कितने मूल्य की चोरी की संपत्ति बरामद की गई? प्रेस विज्ञप्ति में इस तुलना के लिए आवश्यक आंकड़ा उपलब्ध नहीं है। परिणामस्वरूप चोरी गए कुल माल और बरामद चोरी के माल के मूल्य के बीच का अंतर भी स्पष्ट नहीं हो पाता।

सोने-चांदी के आभूषणों का क्या हुआ?

मामले में एक और महत्वपूर्ण सवाल चोरी किए गए सोने-चांदी के आभूषणों को लेकर है। पुलिस ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में बड़ागांव के सूने मकान से आभूषण और नकदी चोरी होने का उल्लेख किया है। इसके अलावा शुरुआती विवरण में भी आरोपियों द्वारा सोने-चांदी के आभूषण एवं नकदी चोरी करना स्वीकार किए जाने की बात कही गई है। लेकिन जब्त मशरूका की सूची में किसी भी सोने या चांदी के आभूषण का उल्लेख नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि कथित रूप से चोरी किए गए आभूषण कहां हैं? क्या वे अभी बरामद नहीं हुए हैं, आरोपियों ने उन्हें किसी अन्य व्यक्ति को बेच दिया, या उनकी बरामदगी के लिए पुलिस की कार्रवाई जारी है? प्रेस विज्ञप्ति में इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया है।
यह सवाल इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पुलिस ने स्वयं दावा किया है कि छह संदिग्धों को पुलिस अभिरक्षा में लेकर कड़ाई से पूछताछ की गई और पूछताछ में उन्होंने अलग-अलग चोरी की घटनाओं में शामिल होना स्वीकार किया। ऐसे में कथित रूप से चोरी किए गए आभूषणों की बरामदगी और उनकी वर्तमान स्थिति की जानकारी भी सार्वजनिक की जानी चाहिए थी। इन सवालों के साथ 10 चोरी की घटनाओं में चोरी गए कुल माल के मूल्य के संबंध में थाना प्रभारी देवेन्द्रनगर संतोष सिंह यादव से बात की गई, लेकिन इन बिंदुओं पर स्पष्ट और संतोषजनक जानकारी नहीं मिल सकी।

सराहनीय योगदान का उल्लेख, घटनाओं की जवाबदेही पर सवाल

पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति में कार्रवाई में शामिल अधिकारियों और कर्मचारियों के योगदान का विस्तार से उल्लेख किया गया है। अपराध का खुलासा करने वाली टीम के अच्छे काम की सराहना किया जाना स्वाभाविक है। लेकिन इस मामले का एक दूसरा पहलू भी है-जिन क्षेत्रों में ये 10 चोरी की घटनाएं हुईं, वहां अपराधों की रोकथाम और निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी? यदि पुलिस के दावे के अनुसार आरोपी दिन में अलग-अलग क्षेत्रों में घूमकर सूने मकानों, दुकानों और निर्माणाधीन भवनों की रेकी करते थे और रात में वाहनों से पहुंचकर चोरी करते थे, तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि संबंधित क्षेत्रों की बीट व्यवस्था, रात्रि गश्त और संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी किस स्तर तक प्रभावी थी।
पुलिस ने प्रेस विज्ञप्ति में सराहनीय योगदान देने वाले अधिकारियों-कर्मचारियों का नाम तक दर्ज किया है। ऐसे में पारदर्शिता के लिहाज से यह सवाल भी महत्वपूर्ण है कि इन घटनाओं के समय संबंधित क्षेत्रों में तैनात पुलिस अमले की कार्यप्रणाली की समीक्षा हुई या नहीं। यदि विभागीय समीक्षा में किसी स्तर पर लापरवाही या जिम्मेदारी के निर्वहन में कमी सामने आती है तो तत्कालीन बीट प्रभारी सहित संबंधित पुलिसकर्मियों की जवाबदेही तय किया जाना भी जरूरी होगा। अपराध के बाद आरोपियों को पकड़ना महत्वपूर्ण है, लेकिन अपराधों की रोकथाम और प्रभावी निगरानी भी पुलिस की जिम्मेदारी का अहम हिस्सा है।
फिलहाल छह आरोपियों की गिरफ्तारी और 10 चोरी की घटनाओं के खुलासे का दावा पुलिस की ओर से किया गया है। आगे की विवेचना में चोरी गए कुल माल का वास्तविक मूल्य, बरामदगी का पूरा ब्योरा, कथित रूप से चोरी किए गए आभूषणों की स्थिति और प्रत्येक घटना में आरोपियों की भूमिका स्पष्ट होने पर मामले की पूरी तस्वीर सामने आ सकेगी।
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बड़ी कार्रवाई: पन्ना में देवनाथ फार्मा एजेंसी के सील परिसर से 1.30 करोड़ की दवाएं जब्त, जांच के दौरान ताला लगाकर गायब हुआ था प्रोप्राइटर

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देवनाथ फार्मा एजेंसी के सील परिसर के खुलने के बाद वहां रखीं दवाओं को जब्त करने की कार्रवाई करती औषधि निरीक्षकों की टीम।
  • 2.39 लाख कोडीन कफ सिरप की खरीद की जांच में बिक्री रिकॉर्ड नहीं मिला, बीते सप्ताह चार दिन चली जब्ती कार्रवाई

  • कफ सिरप बिक्री दस्तावेज नहीं मिलने और एजेंसी दूसरे पते पर संचालित पाए जाने के बाद जुलाई में लाइसेंस हुआ था निरस्त

  • दवा एजेंसी की आड़ में नशे के संगठित कारोबार की आशंका, जांच में अब तक कई गंभीर सवाल

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में देवेंद्रनगर कस्बा स्थित मेसर्स देवनाथ फार्मा के खिलाफ कफ सिरप की असामान्य खरीद और दवा कारोबार से जुड़ी अनियमितताओं की जांच के बीच खाद्य एवं औषधि प्रशासन की कार्रवाई आगे बढ़ी है। जुलाई में जांच के दौरान सील किए गए एजेंसी और मकान को 10 सितंबर को खोलकर शुरू की गई कार्रवाई 13 सितंबर तक चली। इस दौरान जांच दल ने एक करोड़ 30 लाख रुपये से अधिक मूल्य की दवाएं और मेडिकल डिवाइस जब्त किए। जब्त सामग्री में 201 कार्टून एलोपैथिक दवाएं, 13 कार्टून मेडिकल डिवाइस तथा दो कार्टून और तीन बोरियों में एक्सपायर दवाएं शामिल हैं।
यह कार्रवाई उस जांच की अगली कड़ी है, जिसकी शुरुआत जुलाई में देवनाथ फार्मा समेत जिले की दो दवा एजेंसियों में बड़ी मात्रा में ऑनरेक्स कफ सिरप की खरीद की पड़ताल से हुई थी। जांच के दौरान कफ सिरप की बिक्री और वितरण से संबंधित आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जा सके थे। देवनाथ फार्मा में जांच आगे बढ़ने के बीच एजेंसी और संबंधित मकान पर ताला लगा मिला तथा प्रोप्राइटर और मकान मालिक परिवार सहित गायब हो गए थे। इसके बाद परिसर को सील कर दिया गया था।

जुलाई में सामने आई थी 1.34 लाख बोतल कफ सिरप की खरीद

नियंत्रक, खाद्य एवं औषधि प्रशासन, भोपाल के निर्देश और पन्ना कलेक्टर के मार्गदर्शन में गठित विशेष जांच दल (SIT) ने 3 से 5 जुलाई 2026 तक जिले में कफ सिरप की खरीद-बिक्री की जांच की थी। इस कार्रवाई में ग्राम कटन की मेसर्स बागरी ड्रग एजेंसी और देवेंद्रनगर की मेसर्स देवनाथ फार्मा की जांच की गई। जांच में दोनों एजेंसियों द्वारा महज कुछ महीनों में लगभग 1 लाख 34 हजार बोतल ऑनरेक्स कफ सिरप खरीदे जाने की जानकारी सामने आई थी। बागरी एजेंसी में करीब 45 हजार और देवनाथ फार्मा में करीब 89 हजार बोतल की खरीद का रिकॉर्ड पाया गया था। लेकिन इतनी बड़ी मात्रा में खरीदे गए कफ सिरप की बिक्री अथवा वितरण से संबंधित आवश्यक अभिलेख और चिकित्सकीय प्रिस्क्रिप्शन रिकॉर्ड जांच दल के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए जा सके। यही तथ्य पूरे मामले की जांच का प्रमुख आधार बना।

जांच के बीच एजेंसी और मकान पर लगा ताला

(फाइल फोटो)
देवनाथ फार्मा की जांच के दौरान यह भी सामने आया कि फर्म अपने औषधि लाइसेंस में दर्ज स्वीकृत स्थल के बजाय अन्य स्थान से संचालित हो रही थी। जांच दल ने लगातार दो दिनों तक दस्तावेजों की जांच और अन्य औषधियों से संबंधित कार्रवाई की। तीसरे दिन जब जांच दल दोबारा पहुंचा तो प्रतिष्ठान पर ताला लगा मिला। मकान मालिक और दुकान संचालक परिवार सहित वहां मौजूद नहीं थे। इसके बाद नियमानुसार परिसर को सील कर दिया गया। उपलब्ध कार्रवाई विवरण के अनुसार 5 जुलाई को तहसीलदार के समक्ष परिसर सील किया गया था। इस घटनाक्रम के बाद देवनाथ फार्मा की भूमिका और उसके दवा कारोबार के रिकॉर्ड को लेकर जांच और महत्वपूर्ण हो गई।

लाइसेंस पहले ही निरस्त

खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की टीम ने बागरी एजेंसी में कफ सीरप खरीदी एवं बिक्री की जांच उपरांत एजेंसी को सील कर दिया। (फाइल फोटो)
उल्लेखनीय है कि देवनाथ फार्मा एजेंसी के संचालन में गड़बड़ी पाए जाने पर ड्रग लाइसेंस पूर्व में निरस्त कर दिया गया था। औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 तथा संबंधित नियमों के उल्लंघन के आधार पर औषधि अनुज्ञापन प्राधिकारी, पन्ना द्वारा फर्म का ड्रग लाइसेंस 20 जुलाई 2026 को ही निरस्त किया जा चुका था। लाइसेंस निरस्तीकरण की कार्रवाई फर्म के लाइसेंस में स्वीकृत स्थल बिरवाही रोड गल्ला मंडी के पास के बजाय दूसरे स्थान (मड़ैयन पंचायत रेलवे पुल के आगे देवेंद्रनगर) से संचालन और जांच के दौरान संबंधित दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए जाने के आधार पर हुई थी। इसी तरह जुलाई की जांच में शामिल ग्राम कटन स्थित बागरी ड्रग एजेंसी का लाइसेंस भी बिक्री अभिलेख उपलब्ध नहीं कराने और अन्य अनियमितताओं के बाद 14 जुलाई 2026 को निरस्त किया जा चुका है।

सील खुलने के बाद मिलीं बड़ी मात्रा में दवाएं

देवनाथ फार्मा के प्रोपराइटर द्वारा कार्यालय में आवेदन दिए जाने के बाद जांच दल ने 10 सितंबर को सील परिसर को खोलकर कार्रवाई आगे बढ़ाई। पन्ना, छतरपुर और सतना के औषधि निरीक्षकों ने पुलिस बल की मौजूदगी में 10 से 13 सितंबर तक परिसर की जांच की। कार्रवाई में करीब एक करोड़ 30 लाख रुपये से अधिक मूल्य की दवाएं और अन्य सामग्री जब्त की गई। इनमें 201 कार्टून एलोपैथिक दवाएं, 13 कार्टून मेडिकल डिवाइस तथा एक्सपायर दवाओं के दो कार्टून और तीन बोरियां शामिल थीं। इस बरामदगी से जांच का दायरा केवल कफ सिरप की खरीद तक सीमित नहीं रहा है। अब एजेंसी में उपलब्ध अन्य दवाओं की खरीद, बिक्री, स्टॉक और संबंधित दस्तावेजों की भी जांच महत्वपूर्ण हो गई है। बड़ी मात्र में दवाएं एवं मेडिकल डिवाइस एवं जब्त करने की कार्यवाही पन्ना की औषधि निरीक्षक महिमा जैन, छतरपुर के औषधि निरीक्षक अजीत जैन, सतना की औषधि निरीक्षक प्रियंका चौबे की टीम द्वारा की गई।

सबसे बड़ा सवाल- कफ सिरप की बिक्री आखिर कहां हुई?

(फाइल फोटो)
पूरे मामले में सबसे महत्वपूर्ण सवाल बड़ी मात्रा में खरीदे गए कफ सिरप की बिक्री और वितरण को लेकर है। दोनों एजेंसियों की जांच में कफ सिरप की बड़ी खरीद का रिकॉर्ड सामने आया, लेकिन उसके बाद की बिक्री या वितरण से संबंधित आवश्यक दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए जा सके। ऐसे में जांच का प्रमुख बिंदु यह है कि करीब 1.34 लाख बोतल ऑनरेक्स कफ सिरप आखिर किन लोगों, मेडिकल प्रतिष्ठानों या अन्य खरीदारों तक पहुंचा। इसके लिए खरीद-बिक्री बिल, स्टॉक रजिस्टर, वितरण संबंधी रिकॉर्ड और चिकित्सकीय प्रिस्क्रिप्शन समेत उपलब्ध दस्तावेजों की पड़ताल महत्वपूर्ण होगी।

नशे के संभावित कारोबार को लेकर बढ़ी चिंता

कफ सिरप का चिकित्सकीय उपयोग वैध है, लेकिन कुछ कफ सिरप के दुरुपयोग को लेकर समय-समय पर चिंता सामने आती रही है। ऐसे में कम अवधि में बड़ी मात्रा में कफ सिरप की खरीद, उसकी बिक्री का आवश्यक रिकॉर्ड उपलब्ध न होना और जांच के दौरान एजेंसी प्रोप्राइटर का प्रतिष्ठान बंद कर रहस्मय तरीके से गायब होना पूरे मामले में कई सवाल खड़े करता है। हालांकि उपलब्ध कार्रवाई के आधार पर अभी यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि देवनाथ फार्मा के माध्यम से नशे का कारोबार संचालित हो रहा था। यह जांच का विषय है कि खरीदा गया कफ सिरप वैध चिकित्सकीय उपयोग के लिए वितरित हुआ या नियमविरुद्ध तरीके से कहीं और पहुंचा। यदि जांच में अवैध आपूर्ति या दुरुपयोग के प्रमाण सामने आते हैं तो मामले का स्वरूप और गंभीर हो सकता है।

आगे की जांच में खुलेगा दवा कारोबार का पूरा हिसाब

अब जांच एजेंसियों के सामने देवनाथ फार्मा के दवा कारोबार का विस्तृत हिसाब खंगालने की चुनौती है। कफ सिरप के अलावा सितंबर में जब्त की गई बड़ी मात्रा में अन्य दवाओं और मेडिकल डिवाइस के खरीद-बिक्री रिकॉर्ड की जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि फर्म का वास्तविक कारोबार किस स्तर पर था और उसका रिकॉर्ड कितना व्यवस्थित था। फिलहाल खाद्य एवं औषधि प्रशासन की कार्रवाई जारी है। कफ सिरप की खरीद और बिक्री से जुड़े दस्तावेज, जब्त दवाओं का विवरण और अन्य वैधानिक पहलुओं की जांच के बाद ही पूरे मामले की तस्वीर स्पष्ट होगी।
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पन्ना की धरती ने फिर उगला नायाब रत्न: एनएमडीसी की मझगवां खदान में मिला 27.29 कैरेट का जेम क्वालिटी हीरा

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पन्ना के मझगवां स्थित एनएमडीसी हीरा खनन परियोजना से प्राप्त 27.29 कैरेट जेम क्वालिटी प्राकृतिक हीरा।
  • मार्च 2024 में खनन दोबारा शुरू होने के बाद अब तक का सबसे बड़ा जेम श्रेणी का हीरा

  • जानकारों के मुताबिक करीब 2 करोड़ रुपये हो सकता है अनुमानित बाजार मूल्य

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्य प्रदेश के पन्ना की रत्नगर्भा धरती ने एक बार फिर अपनी हीरा संपदा की चमक दुनिया के सामने ला दी है। जिले के मझगवां में संचालित एनएमडीसी लिमिटेड की हीरा खनन परियोजना (DMP) में 15 सितंबर 2026 को 27.29 कैरेट का जेम क्वालिटी प्राकृतिक हीरा प्राप्त हुआ है। मार्च 2024 में खनन कार्य दोबारा शुरू होने के बाद यह परियोजना से प्राप्त अब तक का सबसे बड़ा जेम श्रेणी का डायमंड है। एनएमडीसी की जानकारी के अनुसार यह कंपनी द्वारा पन्ना में अब तक उत्पादित दूसरा सबसे बड़ा हीरा भी है। डायमंड ज्वैलरी कारोबार से जुड़े जानकारों के अनुसार हीरे का अनुमानित बाजार कीमत करीब 2 करोड़ रुपये हो सकती है। हालांकि वास्तविक कीमत नीलामी के दौरान हीरे की गुणवत्ता, कटिंग-पॉलिशिंग की संभावनाओं और बाजार की मांग के आधार पर तय होगी।

13.16 कैरेट का रिकॉर्ड टूटा

मझगवां हीरा खदान में जुलाई 2026 में ही 13.16 कैरेट का जेम क्वालिटी प्राकृतिक हीरा मिला था। मार्च 2024 में खदान का परिचालन दोबारा शुरू होने के बाद उस समय यह परियोजना से प्राप्त सबसे बड़ा जेम श्रेणी का हीरा था। इससे पहले इसी अवधि में 10.04 कैरेट का जेम क्वालिटी हीरा मिलने का रिकॉर्ड था। अब महज दो महीने बाद मिले 27.29 कैरेट के हीरे ने 13.16 कैरेट के उस रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया है। इस तरह मार्च 2024 के बाद जेम क्वालिटी हीरों की श्रेणी में मझगवां परियोजना को लगातार दूसरी बड़ी उपलब्धि मिली है।

टीम एनएमडीसी के लिए एक और गर्व का क्षण

एनएमडीसी ने जुलाई में मिले 13.16 कैरेट के हीरे के बारे में बताया था कि वह किम्बरलाइट अयस्क की नियमित प्रोसेसिंग के दौरान प्राप्त हुआ था। मझगवां परियोजना में हीरा-युक्त किम्बरलाइट अयस्क का यंत्रीकृत तरीके से प्रसंस्करण किया जाता है। 27.29 कैरेट के हीरे की प्राप्ति को लेकर डायमंड माइनिंग प्रोजेक्ट प्रबंधन ने इसे एनएमडीसी की खनन क्षमता, तकनीकी दक्षता और कर्मठ टीम के समर्पित प्रयासों का परिणाम बताया है। प्रबंधन ने कहा कि पन्ना के हीरों की चमक देश का गौरव बढ़ाती रहे। वहीं एनएमडीसी लिमिटेड ने अपनी सोशल मीडिया पोस्ट में ‘जुलाई 2026 में 13.16 कैरेट में जेम क्वालिटी हीरे के प्राप्त होने के तुरंत बाद मिली इस सफलता को टीम एनएमडीसी के लिए एक और गर्व का क्षण बताया है।’ बहुमूल्य हीरा मिलने की ख़ुशी डायमंड माइनिंग प्रोजेक्ट मझगवां, पन्ना से लकेर एनएमडीसी मुख्यालय हैदराबाद तक देखी जा रही है।

एशिया की इकलौती यंत्रीकृत हीरा खदान

पन्ना के मझगवां में स्थित एनएमडीसी लिमिटेड की हीरा खदान।
मझगवां स्थित एनएमडीसी की हीरा खनन परियोजना एशिया महाद्वीप की इकलौती यंत्रीकृत हीरा खदान है, जहां बड़े पैमाने पर उत्कृष्ट प्राकृतिक हीरों का निष्कर्षण किया जाता है। परियोजना के अनुसार यहां संगठित हीरा उत्पादन 1967 में शुरू हुआ, जबकि व्यापक रूप से सुव्यवस्थित उत्पादन 1971-72 से प्रारंभ हुआ। यंत्रीकृत खनन और प्रसंस्करण व्यवस्था के चलते मझगवां परियोजना पन्ना की हीरा संपदा के संगठित दोहन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। परियोजना से समय-समय पर जेम क्वालिटी के प्राकृतिक हीरे प्राप्त होते रहे हैं।

सदियों पुरानी है पन्ना की हीरा पहचान

एनएमडीसी की मझगवां खदान में मिले 27.29 कैरेट जेम क्वालिटी के बहुमूल्य हीरे की तस्वीरें सोशल मीडिया पर हुईं वायरल।
पन्ना की पहचान केवल मझगवां की आधुनिक खनन परियोजना तक सीमित नहीं है। पन्ना क्षेत्र में हीरा खनन का इतिहास 1675 ईस्वी से प्रारंभ माना जाता है। जिले की हीरा-धारित पट्टी की उथली खदानों के माध्यम से भी समय-समय पर बड़े और उच्च गुणवत्ता वाले प्राकृतिक हीरे मिलते रहे हैं। मझगवां परियोजना के इतिहास में भी कई बड़े और दुर्लभ हीरे दर्ज हैं। हालांकि मार्च 2024 में खनन कार्य दोबारा शुरू होने के बाद प्राप्त जेम क्वालिटी हीरों में 27.29 कैरेट का यह हीरा अब तक का सबसे बड़ा है।
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घर डूबे, बस्तियां टापू बनीं तो पानी में उतरे विस्थापित; अब पन्ना के मझगांय डैम में ‘चिता आंदोलन’

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पन्ना जिले के मझगांय बांध का पानी आसपास की बस्तियों-घरों में भरने से प्रभावित ग्रामीणों ने भूअर्जन-विस्थापन एवं पुनर्वास की मांग को लेकर बांध के पानी में "चिता आंदोलन" शुरू कर दिया।
  • चिता पर जिंदा लेटने को मजबूर महिलाएं, पुरुषों ने लगाई प्रतीकात्मक फांसी

  • मुआवजा-पुनर्वास की मांग पर अमित भटनागर ने खोला मोर्चा

  • बांध प्रभावित परिवारों के धरना-प्रदर्शन को कांग्रेस पार्टी ने दिया समर्थन

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना के डैम में पहली बार जलभराव शुरू होने के बाद डूब क्षेत्र की तस्वीर अब चिंताजनक होती जा रही है। जलस्तर बढ़ने से आसपास की कई बस्तियां चारों ओर पानी से घिरकर टापू में तब्दील हो गई हैं, जबकि कई घरों में भी पानी पहुंच गया है। इसी बीच उचित मुआवजा, विस्थापन और पुनर्वास की मांग को लेकर प्रभावित ग्रामीणों का आक्रोश एक बार फिर फूट पड़ा है। कुंवरपुर के नजदीक जय किसान संगठन के नेतृत्व में चिता आंदोलन शुरू किया गया है। महिलाओं ने पानी के बीच प्रतीकात्मक चिता पर लेटकर विरोध जताया, जबकि पुरुषों ने गले में फांसी का फंदा डालकर अपना आक्रोश प्रदर्शित किया।
आंदोलन का नेतृत्व सामाजिक कार्यकर्ता और जय किसान संगठन के प्रमुख अमित भटनागर कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि बांध में पहली बार पानी भरने के बाद अब उन्हें केवल मुआवजे का इंतजार नहीं, बल्कि अपने घरों और परिवारों की सुरक्षा की चिंता भी सताने लगी है। उनका आरोप है कि जलस्तर बढ़ने के साथ डूब क्षेत्र की वास्तविक स्थिति सामने आने लगी है, लेकिन कई प्रभावित परिवारों की मुआवजा और पुनर्वास संबंधी समस्याओं का समाधान अभी बाकी है।

पानी में चिता, गले में फंदा और ‘न्याय दो या मार दो’ के नारे

मझगांय बांध के पानी में खड़े होकर फांसी का फंदा पहन प्रदर्शन करते हुए प्रभावित ग्रामीण।
मझगांय बांध के आसपास चल रहे प्रदर्शन में विरोध का तरीका बेहद प्रतीकात्मक और भावनात्मक रहा। पानी से घिरे क्षेत्र में प्रभावित महिलाओं ने चिता सजाकर उस पर लेटकर प्रदर्शन किया। वहीं पुरुषों ने पानी के बीच खड़े होकर गले में फांसी का सांकेतिक फंदा डालकर विरोध जताया। प्रदर्शन स्थल पर प्रभावित परिवारों की ओर से न्याय की मांग को लेकर नारेबाजी की गई। आंदोलनकारियों ने कहा कि जब उनके घर और जमीन परियोजना के लिए जा रहे हैं तो उन्हें ऐसा पुनर्वास मिलना चाहिए जिससे वे सम्मान के साथ अपने परिवार को सुरक्षित स्थान पर ले जा सकें। अमित भटनागर ने कहा कि विकास परियोजनाओं का विरोध नहीं है, लेकिन विकास की कीमत उन परिवारों से नहीं वसूली जानी चाहिए जिनके घर, खेत और जीवन परियोजना के डूब क्षेत्र में आ रहे हैं। उन्होंने मझगांय परियोजना में मुआवजा और पुनर्वास से जुड़े मामलों में पारदर्शिता की मांग दोहराई।

कटऑफ डेट 2018 से बढ़ाकर 2026 करने की मांग

घरों और बस्ती में जलभराव होने से प्रभावित परिवारों की महिलाएं प्रशासन को जगाने के लिए जिंदा “जल चिता” में लेटने को मजबूर।
आंदोलनकारियों की प्रमुख मांगों में मझगांय परियोजना की कटऑफ डेट को 1 जुलाई 2018 से बढ़ाकर 2026 करना शामिल है। उनका कहना है कि वर्ष 2018 में प्रभावित परिवारों में जो सदस्य नाबालिग थे और अब बालिग हो चुके हैं, उन्हें भी अलग परिवार मानते हुए पुनर्वास पैकेज का लाभ दिया जाना चाहिए। इसके अलावा ऐसे परिवारों के मामलों में भी लाभ दिए जाने की मांग की जा रही है, जिनके डूब क्षेत्र में झोपड़ी अथवा दूसरा आवास था, लेकिन वे किसी अन्य मकान में निवास कर रहे थे। प्रभावित ग्रामीणों का कहना है कि बांध में पानी बढ़ने के बाद अब स्थिति कागजों और सर्वे से आगे निकलकर जमीन पर दिखाई देने लगी है। कई बस्तियों का संपर्क आसपास के इलाकों से प्रभावित हुआ है और घरों में पानी पहुंचने से परिवारों की चिंता बढ़ी है।

कांग्रेस भी आंदोलन के समर्थन में उतरी

विस्थापितों के आंदोलन को कांग्रेस ने भी समर्थन दिया। पूर्व विधानसभा प्रत्याशी शिवजीत सिंह, जिला कांग्रेस उपाध्यक्ष राकेश गर्ग, अजयगढ़ ब्लॉक अध्यक्ष जगदीश यादव, कुंवरपुर मंडल अध्यक्ष बाल करण यादव, पिसता मंडल अध्यक्ष कामता अहिरवार, मझगांय सेक्टर अध्यक्ष चंद्रपाल सिंह, युवा कांग्रेस नेता कमलेश गुप्ता और वरिष्ठ कांग्रेसी मैकू नन्ना अहिरवार सहित कांग्रेस पदाधिकारी और कार्यकर्ता प्रदर्शन स्थल पहुंचे। कांग्रेस नेताओं ने प्रभावित ग्रामीणों के साथ खड़े रहने और उनकी मांगों को उठाने की बात कही। आंदोलन में मझगांय के अलावा रूंझ और अन्य सिंचाई परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों की भी सहभागिता रही।

प्रशासन का दावा- तीन गांव प्रभावित, पैकेज पहले ही दिया जा चुका

मामले में अजयगढ़ एसडीएम आलोक मार्को ने प्रशासन का पक्ष रखते हुए कहा कि मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना से कुल तीन गांव प्रभावित हैं। इनमें बालूपुर, बनहरी और कुंवरपुर आंशिक रूप से प्रभावित हैं। प्रशासन के अनुसार बालूपुर के 229, बनहरी के 375 और कुंवरपुर के 615 परिवारों को पूर्व में भू-अर्जन एवं विस्थापन पैकेज दिया जा चुका है। एसडीएम ने बताया कि राज्य सरकार ने हाल ही में मझगांय और रूंझ सिंचाई परियोजना प्रभावितों के लिए अतिरिक्त विशेष पुनर्वास पैकेज घोषित किया है। इस राशि का प्रभावितों के खातों में प्राथमिकता के साथ अंतरण किया जा रहा है।
आलोक मार्को के अनुसार वर्तमान आंदोलन में मुख्य रूप से दो मांगें सामने आ रही हैं। पहली मांग मझगांय परियोजना की कटऑफ डेट 1 जुलाई 2018 से बढ़ाकर 2026 करने की है, ताकि 2018 में नाबालिग रहे परिवार के सदस्यों को वर्तमान में बालिग होने के बाद अलग परिवार मानकर पुनर्वास पैकेज दिया जा सके। दूसरी मांग ऐसे लोगों को अतिरिक्त लाभ देने की है जिनके डूब क्षेत्र में दूसरे स्थान पर भी घर अथवा झोपड़ी थी, लेकिन उनका निवास अन्यत्र था।

प्रशासन बोला- पात्र व्यक्ति दस्तावेज लेकर आए, दावे की जांच होगी

एसडीएम ने कहा कि भू-अर्जन और पुनर्वास की प्रक्रिया में प्रशासन ने पूरी सतर्कता और पारदर्शिता बरती है। प्रत्येक परिवार के दस्तावेजों की जांच की गई और सघन भौतिक सत्यापन कराया गया, ताकि वास्तविक रूप से पात्र एक भी व्यक्ति लाभ से वंचित न रहे। उन्होंने कहा कि प्रशासन लगातार प्रभावितों से यह कह रहा है कि यदि कोई व्यक्ति पात्रता के बावजूद भू-अर्जन अथवा पुनर्वास पैकेज से वंचित रह गया है तो वह अपने दस्तावेजों के साथ सामने आए। वर्ष 2018 की स्थिति से संबंधित भौतिक सत्यापन के साक्ष्य उपलब्ध कराने पर उसके दावे का परीक्षण किया जाएगा। एसडीएम के मुताबिक अभी तक प्रशासन के समक्ष ऐसा कोई पात्र व्यक्ति सामने नहीं आया है जो पात्र होने के बावजूद सूची से छूट गया हो। उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 की स्थिति के आधार पर भू-अर्जन मुआवजा वितरण और पुनर्वास पैकेज के पात्र परिवारों की सूची संबंधित गांवों में उपलब्ध कराई गई है।

अब असली सवाल- बढ़ते पानी के बीच राहत और पुनर्वास कब?

मझगांय बांध में पहली बार जलभराव और उसके बाद बस्तियों के टापू में बदलने तथा घरों में पानी पहुंचने की स्थिति ने विस्थापन के सवाल को एक नया मानवीय आयाम दे दिया है। एक ओर प्रशासन का दावा है कि पात्र परिवारों को भू-अर्जन और पुनर्वास पैकेज दिया जा चुका है तथा अतिरिक्त पैकेज का भुगतान भी जारी है। दूसरी ओर प्रभावित ग्रामीण कटऑफ डेट बढ़ाने और अन्य मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मझगांय बांध के बढ़ते जलस्तर के बीच जिन परिवारों के घर पानी की जद में आ रहे हैं, उनकी तत्काल सुरक्षा, पुनर्वास और लंबित दावों का समाधान किस तरह और कितनी जल्दी होगा। चिता आंदोलन के दोबारा शुरू होने से मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना के प्रभावितों का मुद्दा एक बार फिर पन्ना की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था के केंद्र में आ गया है।
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ओवरलोडेड भारी वाहनों के दबाव में जर्जर हुआ ककरहटा पुल, हादसे का मंडराया खतरा

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ओवरलोडेड भारी मालवाहक वाहनों के दबाव से जर्जर हुआ पन्ना-ककरहटी-गुनौर मार्ग पर मिढ़ासन नदी पर स्थित ककरहटा पुल की तस्वीरें।
  • मिढ़ासन नदी के पुल के एक्सपेंशन जॉइंट में बढ़ा खतरनाक गैप, स्लैब भी क्षतिग्रस्त

  • जेके सीमेंट समेत भारी मालवाहक वाहनों की आवाजाही का दबाव, सड़क के बाद पुल भी जर्जर

  • 20 साल पुराने पुल पर ओवरलोड का कहर, समय रहते नहीं संभले तो हो सकता है बड़ा हादसा

पन्ना।(www.radarnews.in) जिले के दो राष्ट्रीय राजमार्गों को जोड़ने वाले महत्वपूर्ण सकरिया-ककरहटी-गुनौर- डिघोरा मार्ग पर ग्राम ककरहटा के समीप मिढ़ासन नदी पर बना करीब 20 वर्ष पुराना पुल भारी और ओवरलोडेड मालवाहक वाहनों के लगातार दबाव से जर्जर हो गया है। पुल के एक्सपेंशन जॉइंट का गैप खतरनाक रूप से बढ़ गया है और कई स्थानों पर स्लैब भी क्षतिग्रस्त दिखाई दे रहा है। पुल की मौजूदा स्थिति को देखते हुए राहगीरों और स्थानीय लोगों में किसी बड़े हादसे की आशंका बनी हुई है। खासतौर पर प्रतिदिन गुजरने वाले भारी ट्रेलर, हाइवा और डंपरों का दबाव चिंता बढ़ा रहा है। यह मार्ग पन्ना जिले में राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 39 और राष्ट्रीय राजमार्ग क्रमांक 943 को जोड़ने वाला लिंक रोड है। इसलिए स्थानीय आवागमन के साथ बड़ी संख्या में मालवाहक वाहन भी इसी रास्ते से गुजरते हैं। आरोप है कि मार्ग पर निर्धारित क्षमता से कहीं अधिक वजन लेकर चलने वाले भारी वाहनों की लगातार आवाजाही सड़क और पुल दोनों की सेहत पर भारी पड़ रही है।

जेके सीमेंट के मालवाहक वाहनों का भारी दबाव

इस मार्ग से गुजरने वाले भारी वाहनों में जेके सीमेंट कंपनी के ग्राम हरदुआकेन स्थित प्लांट से क्लिंकर एवं अन्य खनिज सामग्री लेकर दूसरे जिलों के प्लांटों की ओर जाने वाले ट्रेलर और हाइवा प्रमुख रूप से शामिल बताए जा रहे हैं। इसके अलावा अन्य औद्योगिक एवं खनिज सामग्री का परिवहन करने वाले डंपर और भारी वाहन भी इस मार्ग से निकलते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार कुछ वाहनों में निर्धारित मालवाहक क्षमता से डेढ़ से दो गुना तक अधिक सामग्री लादे जाने की स्थिति भी सामने आती रही है। उनका कहना है कि टोल टैक्स से बचने के लिए भारी वाहनों का इस मार्ग पर बढ़ा दबाव सड़क और पुल की क्षति का एक प्रमुख कारण बनता जा रहा है। हालांकि ओवरलोडिंग और टोल बचाने के संबंध में संबंधित विभागों द्वारा जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

नई सड़क भी बार-बार हो रही क्षतिग्रस्त

विडंबना यह है कि भारी वाहनों के बढ़ते दबाव का असर केवल पुराने पुल पर ही नहीं, बल्कि इस मार्ग पर कराए गए सड़क निर्माण कार्य पर भी दिखाई दे रहा है। हाल ही में निर्मित सड़क के कई हिस्से बार-बार क्षतिग्रस्त हो रहे हैं। निर्माण एजेंसी द्वारा लोक निर्माण विभाग के निर्देश पर सड़क के क्षतिग्रस्त हिस्सों का मेंटेनेंस कराया जा रहा है, लेकिन भारी वाहनों की लगातार आवाजाही के कारण समस्या स्थायी रूप से खत्म नहीं हो पा रही है।

खुलते एक्सपेंशन जॉइंट ने बढ़ाई चिंता

ककरहटा पुल की सबसे गंभीर स्थिति इसके एक्सपेंशन जॉइंट को लेकर सामने आ रही है। पुल के जॉइंट में गैप बढ़ने के साथ स्लैब भी क्षतिग्रस्त हो चुका है। ऐसे में भारी वाहनों के लगातार गुजरने से पुल पर कंपन और अतिरिक्त भार बढ़ना स्वाभाविक रूप से चिंता का विषय है। यदि समय रहते तकनीकी परीक्षण और आवश्यक सुधार नहीं कराया गया तो पुल की स्थिति और बिगड़ सकती है। लोक निर्माण विभाग संभाग पन्ना के कार्यपालन यंत्री इंद्रदेव पटेल ने भी पुल की स्थिति और वहां से भारी मालवाहक वाहनों की आवाजाही को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने बताया कि जानकारी मिलने के बाद उन्होंने स्वयं पुल का निरीक्षण किया था और इसकी वस्तुस्थिति से सेतु निगम के संबंधित सहायक यंत्री को अवगत कराया है।

समय रहते नहीं चेता प्रशासन तो बढ़ सकता है खतरा

स्थानीय लोगों का कहना है कि पुल पर स्थिति अभी चेतावनी देने वाली है। यदि पुल की तकनीकी जांच कराकर क्षतिग्रस्त हिस्सों की तत्काल मरम्मत नहीं कराई गई तथा ओवरलोडेड वाहनों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में किसी गंभीर दुर्घटना की स्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता। लोगों ने प्रशासन और संबंधित विभाग से पुल की तत्काल तकनीकी जांच, ओवरलोडिंग पर रोक और भारी वाहनों के यातायात को नियंत्रित करने की मांग की है। पुल की तस्वीर में एक्सपेंशन जॉइंट का बढ़ा हुआ गैप और क्षतिग्रस्त हिस्सा साफ दिखाई दे रहा है, जो इसकी मौजूदा स्थिति की गंभीरता को सामने लाता है।

इनका कहना है-

“ककरहटा पुल के एक्सपेंशन जॉइंट का गैप बढ़ने और जॉइंट खुलने की जानकारी लोक निर्माण विभाग संभाग पन्ना के अधिकारियों से मिली है। जल्द ही पन्ना आकर पुल का सघन निरीक्षण करूंगा। निरीक्षण उपरांत वरिष्ठ अधिकारियों को वस्तुस्थिति से अवगत कराकर उनके निर्देश अनुसार अग्रिम कार्यवाही की जाएगी।”

– दिनेश कुमार ओमरे, सहायक यंत्री, सेतु निगम उप संभाग दमोह।

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पन्ना में भारी बारिश का कहर: उड़द-मूंग और तिल की फसलें तबाह, किसानों ने मुआवजे की मांग

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पन्ना जिले में विगत दिनों हुई अतिवृष्टि से जलमग्न एक खेत का दृश्य। (फाइल फोटो)
  • करीब 73 हजार हेक्टेयर में दलहन-तिलहन की फसलें प्रभावित

  • कृषि विभाग ने क्षति की वास्तविक जानकारी जुटाने शुरू किया ग्रामवार प्रारंभिक सर्वे

  • लगातार 20 दिन से अधिक बारिश और जलभराव से खरीफ फसलों को भारी नुकसान

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में अगस्त माह के दूसरे सप्ताह से 4 सितंबर तक हुई लगातार भारी बारिश और जलभराव ने किसानों की उम्मीदों पर पानी फेर दिया है। खेतों में कई दिनों तक पानी भरा रहने से खरीफ की दलहनी और तिलहनी फसलों को व्यापक नुकसान पहुंचा है। खासकर उड़द, मूंग और तिल की खड़ी फसलें पानी में डूबने के बाद गलने और सड़ने लगी हैं। फसलों में फूल आने के समय हुई अतिवृष्टि ने किसानों की महीनों की मेहनत और खेती में लगाई पूंजी को संकट में डाल दिया है। अब प्रभावित किसान फसल क्षति का शीघ्र एवं निष्पक्ष सर्वे कराकर नियमानुसार मुआवजा तथा फसल बीमा का अधिकतम लाभ दिलाने की मांग कर रहे हैं।
लगातार 20 दिन से अधिक समय तक हुई बारिश से जिले में नदी-नाले उफान पर रहे और कई क्षेत्रों में बाढ़ जैसे हालात निर्मित हुए। 2 सितंबर तक जिले में औसत 868.2 मिलीमीटर बारिश दर्ज होने की जानकारी सामने आई थी, जबकि अजयगढ़ क्षेत्र में 1344.8 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई थी। इसके बाद 3 और 4 सितंबर को भी कई क्षेत्रों में भारी बारिश का दौर जारी रहा। भू-संसाधन प्रबंधन विभाग के आंकड़ों के अनुसार 4 सितंबर को जिले में औसत 71.7 मिलीमीटर बारिश रिकॉर्ड हुई। इसमें गुनौर तहसील में सर्वाधिक 140 मिलीमीटर, पवई में 118 मिलीमीटर और अमानगंज तहसील क्षेत्र में 98.2 मिलीमीटर बारिश दर्ज की गई।
लगातार बारिश से करीब 20 साल बाद वर्ष 2005 जैसे भीषण बाढ़ के हालात बनने की स्थिति सामने आई। गनीमत रही कि 4 सितंबर को बारिश थम गई और बाढ़ की स्थिति और अधिक विकराल नहीं हुई, लेकिन तब तक अतिवृष्टि खेतों और ग्रामीण क्षेत्रों में भारी नुकसान पहुंचा चुकी थी। जिले में सैकड़ों गरीब परिवारों के कच्चे मकानों के जमींदोज होने की घटनाएं सामने आईं, वहीं पानी में बहने से दो नाबालिगों सहित तीन लोगों की जान भी चली गई।
73 हजार हेक्टेयर में दलहन-तिलहन की बोवनी
जिले में 20 से अधिक दिनों तक हुई भारी बारिश से खरीफ की दलहनी-तिलहनी फसलों को भारी नुकसान पहुंचा।
कृषि विभाग के प्राथमिक आंकड़ों के अनुसार खरीफ सीजन 2026 में जिले में 2.08 लाख हेक्टेयर से अधिक क्षेत्र में फसलों की बोवनी की गई है। इसमें करीब 1.40 लाख हेक्टेयर में धान, 33 हजार हेक्टेयर में तिल तथा लगभग 40 हजार हेक्टेयर में मूंग, उड़द और अरहर जैसी दलहनी फसलें शामिल हैं। इस तरह जिले में करीब 73 हजार हेक्टेयर क्षेत्र में दलहनी-तिलहनी फसलों की बोवनी हुई थी। यह 73 हजार हेक्टेयर वास्तविक क्षतिग्रस्त क्षेत्रफल नहीं है, बल्कि जिले में दलहन-तिलहन की कुल बोवनी का रकबा है। वास्तविक रूप से कितने क्षेत्र में फसल क्षति हुई है, इसका आंकड़ा कृषि विभाग के स्थलीय सर्वे के बाद ही स्पष्ट होगा।
बारिश का सबसे अधिक असर निचले इलाकों के खेतों में दिखाई दे रहा है। पानी की निकासी नहीं होने के कारण कई खेत कई दिनों तक तालाब में तब्दील रहे। पानी में डूबी उड़द, मूंग और तिल की फसलें अब गलने और सड़ने लगी हैं। कई जगह खेतों में खड़ी फसल पीली पड़ गई है। किसानों का कहना है कि पिछले माह फसलों में फूल आने शुरू हुए थे और उन्हें अच्छी पैदावार की उम्मीद थी, लेकिन लगातार बारिश ने पूरा गणित बिगाड़ दिया।

अजयगढ़ से रैपुरा तक फसलों पर अतिवृष्टि की मार

लगातार कई दिनों तक हुई भारी बारिश के चलते खेत तालाब में तब्दील हो गए, खेतों में खड़ी फसलें पानी में डूबी रहीं।
फसल नुकसान की तस्वीरें जिले के कई क्षेत्रों से सामने आ रही हैं। बृजपुर-पहाड़ीखेड़ा, सुनवानी, अमानगंज, सलेहा, सिमरिया, गुनौर, रैपुरा, अजयगढ़ और देवेंद्रनगर क्षेत्रों में मूंग, उड़द और तिल की फसलों को खासा नुकसान होने की जानकारी सामने आई है। निचले क्षेत्रों में स्थिति अधिक गंभीर है। लंबे समय तक जलभराव रहने के कारण फसलों के खराब होने की आशंका बढ़ गई है। जहां खेतों में अभी फसल खड़ी दिखाई दे रही है, वहां भी लगातार नमी के कारण पौधे पीले पड़ने लगे हैं। कुछ स्थानों पर फसल जमीन पर गिर गई है, जबकि पानी में डूबी फसल सड़ने लगी है। इसके विपरीत धान की फसल को कई क्षेत्रों में अधिक बारिश से अपेक्षाकृत लाभ होने की बात कही जा रही है। हालांकि धान समेत सभी खरीफ फसलों की अंतिम स्थिति का आकलन कृषि विभाग के सर्वे के बाद ही स्पष्ट होगा।
खेतों में तबाही, किसानों के सामने आर्थिक संकट
अतिवृष्टि ने सबसे अधिक चिंता छोटे और सीमांत किसानों की बढ़ा दी है। किसानों ने खाद, बीज, दवा, मजदूरी, जुताई और बोवनी पर पहले ही पैसा खर्च कर दिया था। जब फसल तैयार होने की उम्मीद बनी तो लगातार बारिश ने उसे बर्बादी के कगार पर पहुंचा दिया। कई किसानों के लिए खरीफ की फसल पूरे साल की आय का प्रमुख आधार होती है। ऐसे में फसल खराब होने से खेती की लागत की भरपाई, परिवार का भरण-पोषण, कृषि ऋण की अदायगी और आगामी रबी सीजन की तैयारी को लेकर संकट खड़ा हो गया है। किसानों का कहना है कि यदि समय पर राहत नहीं मिली तो आर्थिक परेशानी और बढ़ सकती है।
बारिश के दौरान कई ग्रामीण क्षेत्रों में खेतों तक पहुंचने वाले रास्ते भी जलमग्न रहे। ऐसे में किसान चाहकर भी खेतों में जमा पानी की निकासी नहीं कर सके। अब बारिश थमने के बाद खेतों में पानी कम होने लगा है तो फसलों की वास्तविक बर्बादी सामने आने लगी है।
बाढ़ जैसे हालात में भी खेतों तक पहुंचा कृषि अमला
बारिश से प्रभावित फसलों की जानकारी जुटाने के कार्य की निगरानी और फील्ड की वास्तविक स्थिति का जायजा लेने उप संचालक कृषि ओपी तिवारी एवं एसडीओ उत्तम बागरी ने संयुक्त रूप से खेतों में पहुंचकर क्षति का अवलोकन किया।
फसल क्षति की वास्तविक स्थिति सामने लाने के लिए कृषि विभाग का मैदानी अमला लगातार प्रभावित क्षेत्रों का भ्रमण कर रहा है। उप संचालक किसान कल्याण तथा कृषि विकास ओपी तिवारी के निर्देशन में अनुविभागीय कृषि अधिकारी, वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारी और कृषि विस्तार अधिकारी प्रभावित क्षेत्रों में पहुंचकर फसल क्षति की जानकारी जुटा रहे हैं। विभाग के निर्देश के अनुसार अतिवृष्टि प्रभावित फसलों की ग्रामवार और फसलवार जानकारी, प्रभावित क्षेत्रफल तथा नुकसान की स्थिति दर्ज की जा रही है। एसडीओ कृषि उत्तम बागरी को इस कार्य के लिए नोडल अधिकारी बनाया गया है। वरिष्ठ कृषि विकास अधिकारियों को अपने-अपने क्षेत्रों में लगातार भ्रमण कर स्थलीय निरीक्षण करने और किसानों से संपर्क के आधार पर वास्तविक स्थिति जुटाकर नोडल अधिकारी को रिपोर्ट भेजने के निर्देश दिए गए हैं।
उप संचालक ओपी तिवारी और एसडीओ उत्तम बागरी ने संयुक्त रूप से रैपुरा, सुंदरा, देवेंद्रनगर, ककरहटी, पवई, कल्दा पठार और पहाड़ीखेड़ा सहित विभिन्न क्षेत्रों का भ्रमण कर फसलों की स्थिति का जायजा लिया है। बाढ़ जैसे हालात और कई स्थानों पर मार्ग अवरुद्ध होने के बावजूद मैदानी अमला खेतों तक पहुंचकर फसल क्षति की जानकारी जुटाने में लगा रहा।
जीपीएस लोकेशन वाले फोटो से हो रहा ग्राउंड ट्रूथिंग
कृषि विभाग द्वारा किसानों से प्राप्त जानकारी के साथ ग्राउंड ट्रूथिंग यानी स्थलीय सत्यापन के माध्यम से फसल क्षति का आकलन किया जा रहा है। मैदानी अमला प्रभावित खेतों का निरीक्षण कर फसलों के जीपीएस लोकेशन वाले फोटो अलग-अलग एंगल से ले रहा है। इन फोटो और आवश्यक विवरण को उन्नति ऐप पर अपलोड किया जा रहा है। प्रभावित ग्राम, फसल का नाम, प्रभावित क्षेत्रफल और नुकसान की स्थिति जैसी जानकारी संकलित कर स्थलीय निरीक्षण एवं किसानों से संपर्क के आधार पर उसका परीक्षण किया जा रहा है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य फसल नुकसान का वास्तविक और प्रमाणित रिकॉर्ड तैयार करना है, ताकि आगे किसानों को फसल बीमा और शासन स्तर से मिलने वाली राहत का लाभ दिलाने में आवश्यक दस्तावेजी आधार उपलब्ध हो सके।
उप संचालक कृषि ओपी तिवारी के अनुसार, यदि अगले कुछ दिनों में बारिश का नया दौर नहीं आता है तो प्रभावित फसलों के प्रारंभिक आकलन का कार्य सप्ताह के अंत तक पूरा किया जा सकता है। कृषि विभाग के अधिकारी-कर्मचारी किसानों को खेतों में जमा पानी की जल्द निकासी के लिए मेड़ काटकर पानी बाहर निकालने की सलाह भी दे रहे हैं, ताकि जो फसल बचने की स्थिति में है उसे आगे होने वाले नुकसान से बचाया जा सके।
बीमा कंपनी को दी गई सूचना, सर्वेयरों से क्षति आकलन की मांग
कृषि विभाग ने अतिवृष्टि से फसलों को हुए नुकसान की जानकारी एग्रीकल्चर इंश्योरेंस कंपनी के क्षेत्रीय प्रतिनिधि पंकज कुशवाहा को पत्र के माध्यम से दी है। विभाग द्वारा मोबाइल पर भी चर्चा कर कंपनी से अपने सर्वेयरों के माध्यम से प्रभावित क्षेत्रों में फसल हानि की वास्तविक स्थिति का शीघ्र आकलन कराने के लिए कहा गया है। उन्नति ऐप पर अपलोड किए जा रहे फसल क्षति से संबंधित जीपीएस लोकेशन वाले फोटो और अन्य जानकारी संबंधित अधिकारियों के साथ बीमा कंपनी तक भी पहुंचाई जा रही है। कृषि विभाग और बीमा कंपनी के बीच समन्वय के जरिए प्रभावित किसानों के फसल बीमा दावों की प्रक्रिया आगे बढ़ाने की तैयारी है।
किसान संगठन बोले- ‘सर्वे में एक भी खेत न छूटे
अतिवृष्टि प्रभावित किसानों और किसान संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि राजस्व और कृषि विभाग की संयुक्त टीमें गांव-गांव पहुंचकर फसल क्षति का पारदर्शी और समयबद्ध सर्वे करें। किसी भी प्रभावित किसान या खेत को सर्वे से बाहर नहीं रखा जाए और वास्तविक नुकसान के आधार पर पात्र किसानों को नियमानुसार राहत राशि उपलब्ध कराई जाए। किसान कांग्रेस के जिलाध्यक्ष सेवालाल पटेल ने कहा कि लगातार बारिश से किसानों की फसल उत्पादन की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है। किसानों ने खाद, बीज, मजदूरी और अन्य कृषि कार्यों पर पैसा खर्च किया था। फसल खराब होने से उनकी पूरी आर्थिक गणित बिगड़ गई है। उन्होंने मांग की कि प्रभावित किसानों को नियमानुसार राहत राशि के साथ प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का अधिकतम संभव लाभ दिलाया जाए।
वहीं भारतीय किसान यूनियन के जिलाध्यक्ष शंकर पटेल ने कहा कि जिले के किसान पिछले कई वर्षों से प्राकृतिक आपदाओं की मार झेल रहे हैं। हाल की भारी बारिश ने किसानों को आर्थिक रूप से तोड़ दिया है। उन्होंने खरीफ फसलों की क्षति का तत्परता और संवेदनशीलता के साथ सर्वे कराने तथा प्रभावित किसानों को फसल बीमा के साथ शासन स्तर से समुचित राहत उपलब्ध कराने की मांग की।
पन्ना जिले में 04 सितंबर 2026 तक हुई बारिश के तहसीलवार आंकड़े।
फिलहाल बारिश थम चुकी है, लेकिन खेतों में जमा पानी और सड़ती फसलें किसानों की परेशानी बयां कर रही हैं। अब अन्नदाता किसानों की निगाहें कृषि एवं राजस्व विभाग के सर्वे, फसल बीमा के आकलन और शासन से मिलने वाली राहत पर टिकी हैं। कृषि विभाग की ग्रामवार प्रारंभिक रिपोर्ट सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगा कि अतिवृष्टि से जिले में वास्तव में कितने क्षेत्र में फसल प्रभावित हुई और किसानों को कितना नुकसान उठाना पड़ा। किसानों की मांग है कि सरकारी सर्वे खेतों में दिखाई दे रही वास्तविक तबाही के आधार पर हो और राहत की प्रक्रिया जल्द पूरी कर सहायता सीधे प्रभावित किसानों तक पहुंचाई जाए।
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पन्ना: उफनती नदी में पुल से छलांग लगाने वाले युवक का 23 घंटे बाद मिला शव, SDRF टीम ने चलाया सर्च ऑपरेशन

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मिढ़ासन नदी के तेज बहाव के बीच सुशील की तलाश में मोटर बोट से सर्च ऑपरेशन चलाती एसडीआरएफ टीम।
  • अमानगंज में सोने-चांदी की ज्वेलरी दुकान चलाता था सुशील सोनी

  • पुलिस की प्रारंभिक जांच में आत्महत्या के कारणों का अब तक नहीं हो सका खुलासा

पन्ना।(www.radarnews.in) मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के अमानगंज में मिढ़ासन नदी के पुल से छलांग लगाने वाले 32 वर्षीय सुशील सोनी का शव करीब 23 घंटे बाद बुधवार सुबह चकदही घाट के पास नदी में तैरता मिला। मंगलवार सुबह करीब 11 बजे हुई घटना के बाद पुलिस और एसडीआरएफ की टीम ने नदी में लगातार सर्च ऑपरेशन चलाया। मंगलवार देर शाम तक तलाश के बाद अंधेरा होने पर अभियान रोकना पड़ा, जिसे बुधवार सुबह फिर शुरू किया गया। करीब 10 बजे चकदही घाट के पास शव दिखाई देने के बाद टीम ने उसे नदी से बाहर निकाला। सुशील की मौत की खबर से अमानगंज में शोक का माहौल है।

मिढ़ासन नदी के पुल से लगाई थी छलांग

जानकारी के अनुसार वार्ड नंबर 8 अमानगंज निवासी सुशील सोनी, पिता कैलास सोनी ने मंगलवार सुबह करीब 11 बजे मिढ़ासन नदी के पुल से नदी में छलांग लगा दी थी। घटना के बाद पुल पर उसका मोबाइल फोन मिला। सूचना मिलते ही अमानगंज थाना प्रभारी हेमंत नायक पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे और युवक की तलाश शुरू कराई गई। घटना की गंभीरता को देखते हुए पन्ना से एसडीआरएफ की रेस्क्यू टीम को बुलाया गया। टीम ने पुलिस के सहयोग से नदी में सर्च ऑपरेशन शुरू किया। चकदही घाट से मिढ़ासन नदी के पुल घाट तक नदी के अलग-अलग हिस्सों में युवक की तलाश की गई।

सुबह फिर शुरू हुई तलाश

करीब 23 घंटे बाद नदी मिढ़ासन नदी के चकदही घाट के समीप युवक का शव बरामद कर पानी से बाहर लाते हुए एसडीआरएफ टीम।
मंगलवार देर शाम तक एसडीआरएफ और पुलिस की टीम नदी में तलाश करती रही, लेकिन सुशील का कोई पता नहीं चल सका। नदी में पानी के बहाव और अंधेरा होने के कारण रात में सर्च ऑपरेशन रोक दिया गया। बुधवार सुबह टीम ने दोबारा तलाश शुरू की। करीब 10 बजे चकदही घाट के पास नदी में सुशील का शव तैरता दिखाई दिया। पुलिस और एसडीआरएफ की टीम ने मौके पर पहुंचकर शव को नदी से बाहर निकाला। इसके बाद पुलिस ने आवश्यक कार्रवाई शुरू की।

एक साल पहले मां का निधन

सुशील के परिवार पर पिछले कुछ समय में लगातार दुखों का साया रहा है। उसके पिता कैलास सोनी अमानगंज तहसील कार्यालय में पदस्थ रहे और कुछ महीने पहले ही सेवानिवृत्त हुए हैं। करीब एक वर्ष पहले बीमारी के चलते सुशील की मां का भी निधन हो गया था। अब बेटे की मौत से परिवार पर एक बार फिर दुखों का पहाड़ टूट पड़ा है। सुशील की शादी करीब दो वर्ष पहले सतना में हुई थी। वह परिवार का बड़ा बेटा था। उसका छोटा भाई मनीष सोनी कन्या शाला के पास सोने-चांदी की दुकान संचालित करता है। सुशील भी बड़गूजा आटा चक्की के पास सोने-चांदी की दुकान चलाकर परिवार का पालन-पोषण कर रहा था। इससे पहले वह सहारा बैंक में नौकरी कर चुका था।

मिलनसार और धार्मिक प्रवृत्ति का था सुशील

मृतक सुशील सोनी।
स्थानीय लोगों के अनुसार सुशील मिलनसार, हंसमुख और धार्मिक प्रवृत्ति का युवक था। वह धार्मिक आयोजनों में बढ़-चढ़कर हिस्सा लेता था और जरूरत के समय लोगों की मदद के लिए भी आगे रहता था। यही वजह है कि उसकी अचानक मौत की खबर से परिवार के साथ परिचितों और क्षेत्र के लोगों में भी गहरा शोक है।
मौत की वजह की पुलिस कर रही जांच
अमानगंज में मिढ़ासन नदी घाट पर खड़े स्थानीय लोग एसडीआरएफ टीम के रेस्क्यू ऑपरेशन को देखते हुए।
सुशील ने यह कदम क्यों उठाया, इसका कारण फिलहाल स्पष्ट नहीं हो सका है। क्षेत्र में अलग-अलग तरह की चर्चाएं जरूर हैं, लेकिन किसी विवाद या तनाव को लेकर सामने आ रही बातों की पुष्टि नहीं हुई है। पुलिस पूरे मामले की जांच कर रही है और घटना से जुड़े तथ्यों की जानकारी जुटाई जा रही है। सुशील की मौत ने परिवार को गहरे सदमे में डाल दिया है। परिजनों ने अपना बेटा और भाई खोया है, वहीं परिचितों के बीच एक हंसमुख और मिलनसार युवक के असमय चले जाने से शोक का माहौल है।
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5 साल की गारंटी वाली मोहन्द्रा-कोटा सड़क गड्ढों में तब्दील, मरम्मत के इंतजार में राहगीर

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मोहन्द्रा-कोटा मार्ग पर जगह-जगह बने बड़े गड्ढों में बारिश का पानी भरने से सड़क की बदहाल स्थिति।
  • न्यू डेवलपमेंट बैंक से वित्त पोषित एमडीआर मार्ग का 3 साल पहले हुआ था      अपग्रेडेशन-रिकंस्ट्रक्शन

  • गारंटी पीरियड में लंबे समय से मरम्मत का अभाव, ठेका कंपनी को नोटिस पर नोटिस, फिर भी सड़क बदहाल

पन्ना/मोहन्द्रा।(www.radarnews.in) पन्ना जिले की पवई विधानसभा के मोहन्द्रा-बनौली क्षेत्र को पड़ोसी जिला दमोह से जोड़ने वाला करीब 40 किलोमीटर लंबा मोहन्द्रा-बनौली-कोटा मार्ग इन दिनों जगह-जगह बड़े-बड़े गड्ढों के कारण बदहाल हो गया है। हैरानी की बात यह है कि यह कोई सामान्य ग्रामीण सड़क नहीं, बल्कि पन्ना जिले का एमडीआर यानी मेजर डिस्ट्रिक्ट रोड है। न्यू डेवलपमेंट बैंक से वित्त पोषित इस सड़क का अपग्रेडेशन एवं रिकंस्ट्रक्शन लोक निर्माण विभाग संभाग पन्ना की देखरेख में करीब तीन वर्ष पूर्व कराया गया था। सड़क की पांच साल की गारंटी है, लेकिन गारंटी पीरियड में ही लंबे समय से आवश्यक मरम्मत के अभाव में यह सड़क अब धीरे-धीरे गड्ढों की सड़क में तब्दील होती जा रही है।
सड़क की तस्वीरें इसकी बदहाली की कहानी खुद बयां कर रही हैं। जगह-जगह बड़े और गहरे गड्ढे हो गए हैं। बारिश का पानी इनमें भर जाने से गड्ढों की गहराई दिखाई नहीं देती और वाहन चालकों को अंदाजे से सड़क पार करनी पड़ती है। कई स्थानों पर सड़क की सतह उखड़ चुकी है और कीचड़ के कारण वाहनों के फिसलने का खतरा भी बना हुआ है।

गड्ढों में समा जाते हैं वाहनों के पहिए

मोहन्द्रा-कोटा मार्ग पर कुछ गड्ढे इतने गहरे हैं कि उनमें वाहन के पहिए तक समा जाते हैं। दोपहिया और छोटे चार पहिया वाहन चालकों के लिए ऐसे स्थान सबसे अधिक जोखिम वाले हैं। ई-रिक्शा चालकों की परेशानी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि स्थानीय लोगों के अनुसार कई बार वे गड्ढों वाले हिस्से से पहले सवारियों को उतारकर वाहन को धीरे-धीरे निकालते हैं। बारिश के दौरान समस्या और बढ़ जाती है। गड्ढों में जमा पानी के ऊपर से जब भारी वाहन गुजरते हैं तो पानी की तेज बौछार आसपास की दीवारों और किनारे तक पहुंचती है। वहीं लोडर और भारी वाहनों के आवागमन के दौरान सड़क धंसने या वाहन के असंतुलित होने की आशंका बनी रहती है।

सिमरिया-हटा मार्ग खराब, इस सड़क पर बढ़ा दबाव

मोहन्द्रा-बनौली-कोटा मार्ग से संबंधित सड़क साइन बोर्ड, जिसकी पांच साल की गारंटी अवधि के बावजूद सड़क कई स्थानों पर जर्जर हो चुकी है।
सिमरिया-हटा मार्ग की खराब स्थिति के कारण वर्तमान में दमोह की ओर जाने वाले वाहनों की आवाजाही के लिए मोहन्द्रा-कोटा मार्ग का उपयोग बढ़ा है। ऐसे में इस महत्वपूर्ण मार्ग की बदहाल स्थिति वाहन चालकों की परेशानी को और बढ़ा रही है। स्थानीय लोगों के अनुसार पवई विधायक के घर के आसपास तक सड़क पर गहरे गड्ढे हो चुके हैं। जब जिले के महत्वपूर्ण एमडीआर मार्ग की स्थिति इतनी खराब हो जाए तो ग्रामीण क्षेत्रों की सड़कों का हाल कैसा होगा, इसका सहज ही अंदाजा लगाया जा सकता है। सड़क की वर्तमान हालत यह भी सवाल खड़ा करती है कि करीब तीन वर्ष पूर्व कराए गए अपग्रेडेशन और रिकंस्ट्रक्शन के बाद गारंटी अवधि में सड़क के रखरखाव की जिम्मेदारी कितनी प्रभावी ढंग से निभाई जा रही है।

पांच साल की गारंटी, फिर भी मरम्मत के लिए इंतजार

सबसे महत्वपूर्ण सवाल सड़क की पांच साल की गारंटी को लेकर है। सड़क अभी गारंटी पीरियड में है, लेकिन लंबे समय से आवश्यक मरम्मत और संधारण नहीं होने के कारण इसकी हालत लगातार बिगड़ती गई। यानी जिस अवधि में सड़क को बेहतर स्थिति में बनाए रखने के लिए गारंटी की व्यवस्था की गई है, उसी अवधि में सड़क जगह-जगह बड़े गड्ढों में बदल रही है। लोक निर्माण विभाग द्वारा ठेका कंपनी हिलवेज कंस्ट्रक्शन कंपनी को पिछले चार माह के दौरान दो बार सख्त कार्रवाई की चेतावनी वाले पत्र भेजे जाने की बात सामने आई है। इसके बावजूद ठेका कंपनी प्रबंधन के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर गारंटी की शर्तों के तहत ठेका कंपनी से सड़क का आवश्यक रखरखाव और सुधार कार्य क्यों नहीं कराया जा सका।

भोपाल मुख्यालय से जारी हुई थी निविदा

जानकारी अनुसार इस सड़क की निविदा भोपाल स्थित लोक निर्माण विभाग के मुख्यालय द्वारा जारी की गई थी। ठेका अनुबंध कार्यवाही और सुरक्षा निधि भी राजधानी भोपाल में जमा है। यही वजह है कि पन्ना लोक निर्माण विभाग के तकनीकी अधिकारियों के स्तर पर ठेका कंपनी के विरुद्ध सीधे बड़ी कार्रवाई की स्थिति सीमित है। स्थानीय स्तर से ठेका कंपनी को भेजे गए पत्रों की प्रतिलिपि आवश्यक कार्रवाई के लिए वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी जा रही है। ऐसे में अब सवाल सिर्फ सड़क की मरम्मत का नहीं, बल्कि गारंटी अनुबंध की शर्तों को प्रभावी रूप से लागू कराने का भी है। लंबे समय से सड़क की बदहाली और राहगीरों की परेशानी के बीच ठेका कंपनी से तत्काल सुधार कार्य कराने की जिम्मेदारी आखिर कौन सुनिश्चित करेगा, यह देखना महत्वपूर्ण होगा।

विभाग ने अपने स्तर पर शुरू कराया मरम्मत कार्य

लोक निर्माण विभाग उप संभाग पवई के अनुविभागीय अधिकारी राजमणि बागरी ने बताया कि सड़क के अत्यधिक क्षतिग्रस्त होने की जानकारी विभाग को है। लोनिवि द्वारा अपने स्तर पर आज से गड्ढों की मरम्मत और जल निकासी का कार्य प्रारंभ कराया गया है। सड़क वर्तमान में गारंटी पीरियड में है, इसलिए संबंधित ठेका कंपनी को पत्र भेजकर तत्काल आवश्यक सुधार कार्य कराने के निर्देश दिए गए हैं। सुधार कार्य नहीं कराने पर ठेका कंपनी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी।
वहीं लोक निर्माण विभाग संभाग पन्ना के कार्यपालन यंत्री इन्द्रदेव पटेल ने बताया कि मोहन्द्रा-कोटा सड़क की समुचित मरम्मत कराने के लिए ठेका कंपनी हिलवेज कंस्ट्रक्शन कंपनी को पत्र भेजा गया है। ठेका कंपनी को सख्त चेतावनी दी गई है। यदि तत्परता से सड़क का सुधार कार्य नहीं कराया गया तो उसकी जमा सुरक्षा निधि राजसात करने तथा ठेका फर्म को ब्लैक लिस्ट करने के लिए शीर्ष अधिकारियों को प्रस्ताव भेजा जाएगा। फिलहाल आवागमन में हो रही असुविधा को देखते हुए विभाग द्वारा अपने स्तर पर सड़क की आवश्यक मरम्मत कराई जा रही है।

अब वरिष्ठ अधिकारियों की कार्रवाई पर नजर

फाइल फोटो।
करीब तीन वर्ष पहले अपग्रेडेशन और रिकंस्ट्रक्शन के बाद तैयार हुई 40 किलोमीटर लंबी एमडीआर सड़क का पांच साल की गारंटी अवधि में ही इस तरह गड्ढों में तब्दील होना सड़क के रखरखाव, विभागीय निगरानी और ठेका अनुबंध की शर्तों के पालन पर सवाल खड़े करता है। गारंटी की अवधि में सड़क की मरम्मत के लिए ठेका कंपनी को बार-बार चेतावनी दिए जाने के बावजूद स्थिति लंबे समय तक नहीं सुधरी। अब देखना यह है कि राहगीरों को लगातार हो रही परेशानी और अनुबंध की शर्तों के पालन के लिए लोक निर्माण विभाग के वरिष्ठ अधिकारी ठेका कंपनी के विरुद्ध क्या ठोस कार्रवाई करते हैं और इस महत्वपूर्ण मार्ग को पूरी तरह सुरक्षित एवं सुगम बनाने में कितना समय लगता है।
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पन्ना बोरवेल हादसा: ONGC देहरादून की टीम ने लिए पानी और गैस के सैंपल, 2-3 सप्ताह में आएगी रिपोर्ट

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नारायणपुरा में बोरवेल के बाजू में स्थित विद्युत मोटर वाले गहरे गड्ढे में उपकरण डालकर गैस के नमूने लेते ONGC टीम के सदस्य।
  • तीन सदस्यीय विशेषज्ञ टीम करीब दो घंटे तक नारायणपुरा में रही; मोटर वाले गड्ढे में उपकरण डालकर लिए गैस के नमूने

  • ऑक्सीजन की कमी समेत संभावित कारणों की होगी जांच

  • बोरवेल की मोटर वाले गड्ढे में उतरने से किसान परिवार के मुखिया और दो बेटों की आठ दिन में अलग-अलग हादसों में मौत

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्य प्रदेश के पन्ना जिले की पवई तहसील के ग्राम नारायणपुरा में आठ दिन के भीतर एक ही परिवार के तीन सदस्यों की मौत के मामले में अब वैज्ञानिक जांच शुरू हो गई है। सोमवार को तेल एवं प्राकृतिक गैस निगम लिमिटेड (ONGC) देहरादून की तीन सदस्यीय विशेषज्ञ टीम नारायणपुरा पहुंची और करीब दो घंटे तक घटनास्थल पर रहकर बोरवेल तथा उसके बाजू में स्थित उस गहरे गड्ढे की जांच की, जिसमें उतरने के दौरान दो अलग-अलग हादसों में किसान परिवार के मुखिया और उनके दो बेटों की मौत हो चुकी है। विशेषज्ञ टीम ने बोरवेल के पानी के सैंपल लिए। इसके अलावा बोरवेल के पास स्थित उस गहरे गड्ढे में विशेष उपकरण डालकर वहां मौजूद गैस के नमूने भी एकत्र किए। सैंपल लेने की प्रक्रिया पूरी होने के बाद गड्ढे को पुनः ढक दिया गया। अब पानी और गैस के नमूनों को प्रयोगशाला जांच के लिए भेजा गया है।
विशेषज्ञों के अनुसार लैब जांच और पूरी प्रक्रिया में करीब दो से तीन सप्ताह का समय लग सकता है। रिपोर्ट आने के बाद ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि गड्ढे में वास्तव में किस प्रकार की गैस या अन्य घातक परिस्थितियां मौजूद थीं अथवा वहां ऑक्सीजन की कमी थी और क्या इनमें से कोई स्थिति दोनों हादसों का कारण बनी।

मोटर वाले गड्ढे से लिए गैस के नमूने

प्रशासनिक अधिकारियों, पुलिस बल एवं ग्रामीणों की मौजूदगी में करीब दो घंटे तक जांच करती ONGC टीम; बोरवेल के पानी और गड्ढे में मौजूद गैस के सैंपल लेते विशेषज्ञ।
ONGC टीम ने घटनास्थल पर पहुंचकर सबसे पहले पूरे क्षेत्र का निरीक्षण किया। इसके बाद बोरवेल के पानी का नमूना लिया गया। टीम ने बोरवेल के ठीक बाजू में स्थित उस गहरे गड्ढे की भी जांच की, जिसमें विद्युत मोटर रखी गई थी और जिसे निकालने के दौरान हादसे हुए थे। विशेषज्ञों ने उपकरण की मदद से गड्ढे के भीतर से गैस के नमूने एकत्र किए। इस जांच का उद्देश्य गड्ढे में मौजूद वातावरण की वैज्ञानिक स्थिति का पता लगाना है। गैस की प्रकृति, उसकी मात्रा तथा गड्ढे में ऑक्सीजन की उपलब्धता जैसे पहलुओं की जांच रिपोर्ट के बाद ही वास्तविक स्थिति सामने आने की उम्मीद है। सैंपल लेने के बाद गड्ढे को दोबारा ढक दिया गया। इससे यह भी सुनिश्चित किया गया कि जांच पूरी होने के बाद कोई व्यक्ति अनजाने में गड्ढे के भीतर न उतर सके।
20 अगस्त को पिता-पुत्र की हुई थी मौत
नारायणपुरा में पहला हादसा 20 अगस्त को हुआ था। किसान उजागर लाल वर्मन (55) अपने बेटे अटील वर्मन (30) के साथ बोरवेल के बाजू में स्थित गहरे गड्ढे में रखी विद्युत मोटर को निकालने के लिए उतरे थे। दोनों की मौत हो गई थी। पोस्टमार्टम रिपोर्ट में दोनों की मौत का कारण दम घुटना बताया गया था। घटना के बाद गड्ढे में जहरीली गैस होने अथवा ऑक्सीजन की कमी की आशंका को लेकर चर्चा शुरू हुई थी। हालांकि उस समय इन आशंकाओं की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं हुई थी। पहली घटना के बाद ग्रामीणों ने प्रशासन से मामले की जांच कराने और गड्ढे को सुरक्षित कराने की मांग की थी।

आठ दिन बाद फिर हादसा, सतीश की गई जान

पिता और बड़े भाई की मृत्यु होने के 8वें दिन पुनः उसी गलती को दोहराते हुए बोरवेल की मोटर निकालने गड्ढे में उतरे सतीश वर्मन की भी दर्दनाक मौत हो गई।
पहली घटना के आठ दिन बाद 28 अगस्त को उसी परिवार के 32 वर्षीय सतीश वर्मन भी विद्युत मोटर निकालने के लिए गड्ढे में उतर गए। कुछ देर बाद उनकी तबीयत बिगड़ गई और उनकी मौत हो गई। एक ही परिवार के पिता और दो बेटों की आठ दिन के भीतर मौत से नारायणपुरा गांव में शोक के साथ दहशत और आक्रोश का माहौल बन गया। ग्रामीणों का कहना है कि पहली घटना के बाद यदि गड्ढे को तत्काल सुरक्षित तरीके से बंद कर दिया जाता और विशेषज्ञों की जांच होने तक उसमें उतरने पर रोक लगा दी जाती तो संभवतः दूसरे हादसे को टाला जा सकता था।

प्रशासन की लापरवाही पर भारी जनाक्रोश

वैज्ञानिक जांच पूरी होने के बाद विद्युत मोटर वाले गहरे गड्ढे को प्रशासनिक अधिकारियों ने सुरक्षित तरीके से ढंकवाकर ग्रामीणों से ऊपर पत्थर रखवाए।
सतीश वर्मन की मौत के बाद पुलिस और प्रशासन की कार्यप्रणाली को लेकर ग्रामीणों में भारी नाराजगी सामने आई। लोगों का स्पष्ट आरोप था कि पहली घटना के बाद गड्ढे को तत्काल बंद या सुरक्षित नहीं कराया गया। ग्रामीणों के अनुसार जब पहली घटना में पिता-पुत्र की मौत हो चुकी थी और गड्ढे के वातावरण को लेकर गंभीर आशंका पैदा हो गई थी, तब पुलिस और प्रशासन को विशेषज्ञों की जांच तथा रिपोर्ट आने तक गड्ढे को बंद करवा देना चाहिए था।
ग्रामीणों ने आरोप लगाया कि प्रशासन की इस कथित लापरवाही के कारण ही दूसरे हादसे की पुनरावृत्ति हुई। लोगों का कहना था कि यदि पहले हादसे के बाद गड्ढे को बंद करा दिया गया होता तो सतीश वर्मन को उसमें उतरने का मौका ही नहीं मिलता और संभवतः उनकी जान बच सकती थी। दूसरे हादसे के बाद जनाक्रोश बढ़ने पर पवई तहसीलदार रत्नराशि पाण्डेय ने नारायणपुरा पहुंचकर ग्रामीणों की मदद से गड्ढे में रखी विद्युत मोटर को बाहर निकलवाया। इसके बाद गड्ढे में पत्थर भरवाकर उसे ऊपर से बंद करवा दिया गया।
कांग्रेस ने किया था चक्काजाम
सतीश वर्मन की मौत के बाद कांग्रेस कार्यकर्ताओं ने भी प्रशासन की कार्यप्रणाली के खिलाफ आवाज उठाई थी। पवई कस्बे के सलेहा मोड़ तिराहे पर ब्लॉक कांग्रेस कमेटी अध्यक्ष सुरेंद्र कुमार नामदेव के नेतृत्व में चक्काजाम किया गया था। कांग्रेस ने पहली घटना के बाद गड्ढे को सुरक्षित नहीं कराए जाने को पुलिस और प्रशासन की गंभीर लापरवाही बताते हुए जिम्मेदारी तय करने की मांग की थी। मृतकों के आश्रितों को 50 लाख रुपये मुआवजा, परिवार के एक सदस्य को सरकारी नौकरी तथा गड्ढे में संभावित गैस रिसाव की विशेषज्ञों से जांच कराने की मांग को लेकर शाहनगर एसडीएम रामनिवास चौधरी को ज्ञापन भी सौंपा गया था। एसडीएम की समझाइश के बाद चक्काजाम समाप्त किया गया।
कुआं-बोरवेल में उतरने से पहले बरतें सावधानी 
नारायणपुरा में बोरवेल हादसे की जांच के लिए पहुंची ONGC देहरादून की टीम के साथ पवई एसडीएम समीक्षा जैन, तहसीलदार रत्नराशि पाण्डेय, पंचायत प्रतिनिधि, पुलिस अधिकारी एवं स्थानीय ग्रामीण।
ONGC (Oil and Natural Gas Corporation) विशेषज्ञों ने जांच के दौरान ग्रामीणों को खुले कुएं और बोरवेल में उतरने को लेकर सावधानी बरतने की सलाह दी। विशेषज्ञों के अनुसार बरसात के मौसम में गहरे और बंद स्थानों में ऑक्सीजन की कमी अथवा हानिकारक गैसों की मौजूदगी का खतरा हो सकता है। ऐसे स्थानों में बिना जांच किए उतरना जानलेवा साबित हो सकता है। विशेषज्ञों ने प्राथमिक स्तर पर ऑक्सीजन की स्थिति का अंदाजा लगाने के लिए मोमबत्ती की लौ का उदाहरण भी बताया, लेकिन यह सुरक्षित गैस या ऑक्सीजन जांच का वैज्ञानिक विकल्प नहीं है। ऐसे स्थानों में प्रवेश से पहले प्रशिक्षित विशेषज्ञों और उपयुक्त उपकरणों से जांच कराना जरूरी है।
अब नारायणपुरा में ONGC देहरादून की टीम द्वारा लिए गए पानी और गैस के नमूनों की रिपोर्ट का इंतजार है। करीब दो से तीन सप्ताह बाद आने वाली लैब रिपोर्ट से यह पता चल सकेगा कि गड्ढे में वास्तव में किस प्रकार की गैस या अन्य घातक परिस्थितियां मौजूद थीं अथवा ऑक्सीजन की कमी थी और क्या वही 20 अगस्त तथा 28 अगस्त को हुए दोनों हादसों का कारण बनीं। रिपोर्ट के बाद ही हादसे के वास्तविक वैज्ञानिक कारणों और आगे की सुरक्षा व्यवस्था को लेकर तस्वीर स्पष्ट हो सकेगी।
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