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राजस्व, कृषि, पंचायत और उद्यानिकी विभाग के अमले को जिम्मेदारी
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मौके पर फसल क्षति की प्रमाणित जानकारी जुटाई जाएगी
शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) जिले में अगस्त के अंतिम दिनों से सितंबर के पहले सप्ताह तक हुई लगातार बारिश और अतिवृष्टि से प्रभावित खरीफ फसलों की वास्तविक क्षति का संयुक्त सर्वे सोमवार से शुरू हो गया। जिले के सभी अनुविभागों में गठित संयुक्त टीमें अब गांव-गांव और खेत-खेत पहुंचकर जलभराव एवं अतिवृष्टि से फसलों को हुए नुकसान का मौके पर आकलन कर प्रमाणित जानकारी जुटाएंगी। सर्वे की प्रक्रिया 25 सितंबर तक चलेगी। सर्वे दलों में राजस्व, कृषि, पंचायत एवं ग्रामीण विकास तथा संबंधित विभागों के अधिकारी-कर्मचारियों को शामिल किया गया है। खेतों में पहुंचकर फसल की स्थिति, प्रभावित रकबे और नुकसान की वास्तविक स्थिति का आकलन निर्धारित मापदंडों एवं प्रपत्रों के अनुसार किया जाएगा। सर्वे पूरा होने के बाद ही जिले में अतिवृष्टि से वास्तविक रूप से प्रभावित फसल क्षेत्र और पात्र किसानों की स्थिति स्पष्ट हो सकेगी।
खेतों में जलभराव से उड़द-मूंग को ज्यादा नुकसान
हालिया अतिवृष्टि का सबसे अधिक असर खरीफ की दलहनी फसलों पर दिखाई दिया है। लगातार बारिश के कारण निचले इलाकों के अनेक खेतों में कई दिनों तक पानी भरा रहा। फूल आने के दौर में खड़ी उड़द और मूंग की फसल लंबे समय तक पानी में डूबे रहने के कारण सड़ने लगी। तिल की फसल को भी नुकसान पहुंचा है, हालांकि किसानों के अनुसार उड़द और मूंग की तुलना में तिल की फसल पर नुकसान अपेक्षाकृत कम है। पूर्व में कृषि विभाग के प्राथमिक आंकड़ों के अनुसार जिले में इस खरीफ सीजन में करीब 2.08 लाख हेक्टेयर क्षेत्र में फसलों की बोवनी बताई गई थी। इसमें करीब 1.40 लाख हेक्टेयर धान, 33 हजार हेक्टेयर तिल तथा लगभग 40 हजार हेक्टेयर में मूंग, उड़द और अरहर जैसी दलहनी फसलें शामिल थीं। इस तरह दलहन-तिलहन का कुल बोवनी रकबा करीब 73 हजार हेक्टेयर बताया गया था।हालांकि यह कुल बोवनी का आंकड़ा है, इसे क्षतिग्रस्त क्षेत्रफल नहीं माना जा सकता। अतिवृष्टि से वास्तव में कितने क्षेत्र में फसल को नुकसान हुआ है, इसका प्रमाणित आंकड़ा संयुक्त स्थलीय सर्वे पूरा होने के बाद ही सामने आएगा।
25 सितंबर तक चलेगा खेत-खेत आकलन
सोमवार से शुरू हुए सर्वे के दौरान संयुक्त दल संबंधित गांवों और खेतों में पहुंचकर फसल की वास्तविक स्थिति दर्ज करेंगे। लगातार बारिश के कारण जलमग्न रहे खेतों में फसल की स्थिति, नुकसान का स्वरूप और प्रभावित क्षेत्र का मौके पर आकलन किया जाएगा। गुनौर एसडीएम कार्यालय से 18 सितंबर को जारी आदेश में कलेक्टर पन्ना के 16 सितंबर के पत्र के पालन में अतिवृष्टि से प्रभावित फसलों के सर्वे के लिए संयुक्त दल गठित किए जाने की जानकारी दी गई थी। आदेश में राजस्व पुस्तक परिपत्र खंड-6 क्रमांक-4 में निर्धारित मापदंडों के अनुसार फसल क्षति का सर्वे कर निर्धारित प्रपत्रों में जानकारी तैयार करने के निर्देश दिए गए हैं। गुनौर अनुभाग में तहसीलदार गुन्नौर एवं अमानगंज, संबंधित नायब तहसीलदार, मुख्य कार्यपालन अधिकारी जनपद पंचायत गुन्नौर, वरिष्ठ कृषि विस्तार अधिकारी तथा वरिष्ठ उद्यान विकास अधिकारी को सर्वे की जिम्मेदारी दी गई है। आदेश के साथ जारी सूची में समस्त ग्राम पंचायतों एवं नगरीय निकाय क्षेत्रों के लिए हल्का पटवारी, पंचायत सचिव/रोजगार सहायक और संबंधित कृषि विस्तार अधिकारी की 99 टीम निर्धारित की गई हैं। इसी तर्ज पर जिले के अन्य अनुविभागों में भी संयुक्त दल गठित किए गए हैं।
सर्वे रिपोर्ट से तय होगी वास्तविक क्षति
लगातार बारिश और जलभराव के कारण फसलों को हुए नुकसान को लेकर किसान लंबे समय से सर्वे और राहत की मांग कर रहे थे। अब संयुक्त दलों के खेतों में पहुंचने के बाद किसानों की निगाहें सर्वे की पारदर्शिता और तैयार होने वाली क्षति रिपोर्ट पर हैं। मौके पर जुटाई जाने वाली जानकारी के आधार पर यह स्पष्ट होगा कि अतिवृष्टि से कितने किसानों की कितनी फसल प्रभावित हुई है और नुकसान किस स्तर का है। इसके बाद तैयार होने वाली रिपोर्ट के आधार पर शासन के निर्धारित प्रावधानों के अनुसार राहत एवं अन्य सहायता की प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।
मुख्यमंत्री के निर्देश के बाद तेज हुई प्रक्रिया

फसल क्षति सर्वे की प्रशासनिक कवायद की पृष्ठभूमि में हाल ही में पन्ना में आयोजित बलराम कृषि महोत्सव भी महत्वपूर्ण रहा। कार्यक्रम के दौरान मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने वर्चुअली संवाद किया था। इस दौरान गुन्नौर विधायक डॉ. राजेश कुमार वर्मा ने अतिवृष्टि से विधानसभा क्षेत्र सहित पन्ना जिले में हुए फसल नुकसान का मुद्दा उठाते हुए प्रभावित किसानों के लिए फसल क्षति का सर्वे और राहत की मांग रखी थी। इसके बाद कलेक्टर पन्ना की ओर से 16 सितंबर को जारी पत्र के पालन में गुन्नौर सहित जिले के अन्य अनुविभागों में संयुक्त सर्वे दल गठित किए गए। अब 25 सितंबर तक चलने वाले स्थलीय सर्वे के दौरान जुटाई जाने वाली प्रमाणित जानकारी से जिले में अतिवृष्टि से फसल नुकसान की वास्तविक तस्वीर सामने आने की उम्मीद है।
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मामले में एक और महत्वपूर्ण सवाल चोरी किए गए सोने-चांदी के आभूषणों को लेकर है। पुलिस ने अपनी प्रेस विज्ञप्ति में बड़ागांव के सूने मकान से आभूषण और नकदी चोरी होने का उल्लेख किया है। इसके अलावा शुरुआती विवरण में भी आरोपियों द्वारा सोने-चांदी के आभूषण एवं नकदी चोरी करना स्वीकार किए जाने की बात कही गई है। लेकिन जब्त मशरूका की सूची में किसी भी सोने या चांदी के आभूषण का उल्लेख नहीं है। ऐसे में सवाल उठता है कि कथित रूप से चोरी किए गए आभूषण कहां हैं? क्या वे अभी बरामद नहीं हुए हैं, आरोपियों ने उन्हें किसी अन्य व्यक्ति को बेच दिया, या उनकी बरामदगी के लिए पुलिस की कार्रवाई जारी है? प्रेस विज्ञप्ति में इसका कोई स्पष्ट जवाब नहीं दिया गया है।
पुलिस की प्रेस विज्ञप्ति में कार्रवाई में शामिल अधिकारियों और कर्मचारियों के योगदान का विस्तार से उल्लेख किया गया है। अपराध का खुलासा करने वाली टीम के अच्छे काम की सराहना किया जाना स्वाभाविक है। लेकिन इस मामले का एक दूसरा पहलू भी है-जिन क्षेत्रों में ये 10 चोरी की घटनाएं हुईं, वहां अपराधों की रोकथाम और निगरानी की जिम्मेदारी किसकी थी? यदि पुलिस के दावे के अनुसार आरोपी दिन में अलग-अलग क्षेत्रों में घूमकर सूने मकानों, दुकानों और निर्माणाधीन भवनों की रेकी करते थे और रात में वाहनों से पहुंचकर चोरी करते थे, तो यह भी जांच का विषय होना चाहिए कि संबंधित क्षेत्रों की बीट व्यवस्था, रात्रि गश्त और संदिग्ध गतिविधियों की निगरानी किस स्तर तक प्रभावी थी।
नियंत्रक, खाद्य एवं औषधि प्रशासन, भोपाल के निर्देश और पन्ना कलेक्टर के मार्गदर्शन में गठित विशेष जांच दल (SIT) ने 3 से 5 जुलाई 2026 तक जिले में कफ सिरप की खरीद-बिक्री की जांच की थी। इस कार्रवाई में ग्राम कटन की मेसर्स बागरी ड्रग एजेंसी और देवेंद्रनगर की मेसर्स देवनाथ फार्मा की जांच की गई। जांच में दोनों एजेंसियों द्वारा महज कुछ महीनों में लगभग 1 लाख 34 हजार बोतल ऑनरेक्स कफ सिरप खरीदे जाने की जानकारी सामने आई थी। बागरी एजेंसी में करीब 45 हजार और देवनाथ फार्मा में करीब 89 हजार बोतल की खरीद का रिकॉर्ड पाया गया था। लेकिन इतनी बड़ी मात्रा में खरीदे गए कफ सिरप की बिक्री अथवा वितरण से संबंधित आवश्यक अभिलेख और चिकित्सकीय प्रिस्क्रिप्शन रिकॉर्ड जांच दल के समक्ष प्रस्तुत नहीं किए जा सके। यही तथ्य पूरे मामले की जांच का प्रमुख आधार बना।

देवनाथ फार्मा के प्रोपराइटर द्वारा कार्यालय में आवेदन दिए जाने के बाद जांच दल ने 10 सितंबर को सील परिसर को खोलकर कार्रवाई आगे बढ़ाई। पन्ना, छतरपुर और सतना के औषधि निरीक्षकों ने पुलिस बल की मौजूदगी में 10 से 13 सितंबर तक परिसर की जांच की। कार्रवाई में करीब एक करोड़ 30 लाख रुपये से अधिक मूल्य की दवाएं और अन्य सामग्री जब्त की गई। इनमें 201 कार्टून एलोपैथिक दवाएं, 13 कार्टून मेडिकल डिवाइस तथा एक्सपायर दवाओं के दो कार्टून और तीन बोरियां शामिल थीं। इस बरामदगी से जांच का दायरा केवल कफ सिरप की खरीद तक सीमित नहीं रहा है। अब एजेंसी में उपलब्ध अन्य दवाओं की खरीद, बिक्री, स्टॉक और संबंधित दस्तावेजों की भी जांच महत्वपूर्ण हो गई है। बड़ी मात्र में दवाएं एवं मेडिकल डिवाइस एवं जब्त करने की कार्यवाही पन्ना की औषधि निरीक्षक महिमा जैन, छतरपुर के औषधि निरीक्षक अजीत जैन, सतना की औषधि निरीक्षक प्रियंका चौबे की टीम द्वारा की गई।
कफ सिरप का चिकित्सकीय उपयोग वैध है, लेकिन कुछ कफ सिरप के दुरुपयोग को लेकर समय-समय पर चिंता सामने आती रही है। ऐसे में कम अवधि में बड़ी मात्रा में कफ सिरप की खरीद, उसकी बिक्री का आवश्यक रिकॉर्ड उपलब्ध न होना और जांच के दौरान एजेंसी प्रोप्राइटर का प्रतिष्ठान बंद कर रहस्मय तरीके से गायब होना पूरे मामले में कई सवाल खड़े करता है। हालांकि उपलब्ध कार्रवाई के आधार पर अभी यह निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा कि देवनाथ फार्मा के माध्यम से नशे का कारोबार संचालित हो रहा था। यह जांच का विषय है कि खरीदा गया कफ सिरप वैध चिकित्सकीय उपयोग के लिए वितरित हुआ या नियमविरुद्ध तरीके से कहीं और पहुंचा। यदि जांच में अवैध आपूर्ति या दुरुपयोग के प्रमाण सामने आते हैं तो मामले का स्वरूप और गंभीर हो सकता है।
अब जांच एजेंसियों के सामने देवनाथ फार्मा के दवा कारोबार का विस्तृत हिसाब खंगालने की चुनौती है। कफ सिरप के अलावा सितंबर में जब्त की गई बड़ी मात्रा में अन्य दवाओं और मेडिकल डिवाइस के खरीद-बिक्री रिकॉर्ड की जांच से यह स्पष्ट हो सकेगा कि फर्म का वास्तविक कारोबार किस स्तर पर था और उसका रिकॉर्ड कितना व्यवस्थित था। फिलहाल खाद्य एवं औषधि प्रशासन की कार्रवाई जारी है। कफ सिरप की खरीद और बिक्री से जुड़े दस्तावेज, जब्त दवाओं का विवरण और अन्य वैधानिक पहलुओं की जांच के बाद ही पूरे मामले की तस्वीर स्पष्ट होगी।
मझगवां हीरा खदान में जुलाई 2026 में ही 13.16 कैरेट का जेम क्वालिटी प्राकृतिक हीरा मिला था। मार्च 2024 में खदान का परिचालन दोबारा शुरू होने के बाद उस समय यह परियोजना से प्राप्त सबसे बड़ा जेम श्रेणी का हीरा था। इससे पहले इसी अवधि में 10.04 कैरेट का जेम क्वालिटी हीरा मिलने का रिकॉर्ड था। अब महज दो महीने बाद मिले 27.29 कैरेट के हीरे ने 13.16 कैरेट के उस रिकॉर्ड को भी पीछे छोड़ दिया है। इस तरह मार्च 2024 के बाद जेम क्वालिटी हीरों की श्रेणी में मझगवां परियोजना को लगातार दूसरी बड़ी उपलब्धि मिली है।




विस्थापितों के आंदोलन को कांग्रेस ने भी समर्थन दिया। पूर्व विधानसभा प्रत्याशी शिवजीत सिंह, जिला कांग्रेस उपाध्यक्ष राकेश गर्ग, अजयगढ़ ब्लॉक अध्यक्ष जगदीश यादव, कुंवरपुर मंडल अध्यक्ष बाल करण यादव, पिसता मंडल अध्यक्ष कामता अहिरवार, मझगांय सेक्टर अध्यक्ष चंद्रपाल सिंह, युवा कांग्रेस नेता कमलेश गुप्ता और वरिष्ठ कांग्रेसी मैकू नन्ना अहिरवार सहित कांग्रेस पदाधिकारी और कार्यकर्ता प्रदर्शन स्थल पहुंचे। कांग्रेस नेताओं ने प्रभावित ग्रामीणों के साथ खड़े रहने और उनकी मांगों को उठाने की बात कही। आंदोलन में मझगांय के अलावा रूंझ और अन्य सिंचाई परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों की भी सहभागिता रही।
एसडीएम ने कहा कि भू-अर्जन और पुनर्वास की प्रक्रिया में प्रशासन ने पूरी सतर्कता और पारदर्शिता बरती है। प्रत्येक परिवार के दस्तावेजों की जांच की गई और सघन भौतिक सत्यापन कराया गया, ताकि वास्तविक रूप से पात्र एक भी व्यक्ति लाभ से वंचित न रहे। उन्होंने कहा कि प्रशासन लगातार प्रभावितों से यह कह रहा है कि यदि कोई व्यक्ति पात्रता के बावजूद भू-अर्जन अथवा पुनर्वास पैकेज से वंचित रह गया है तो वह अपने दस्तावेजों के साथ सामने आए। वर्ष 2018 की स्थिति से संबंधित भौतिक सत्यापन के साक्ष्य उपलब्ध कराने पर उसके दावे का परीक्षण किया जाएगा। एसडीएम के मुताबिक अभी तक प्रशासन के समक्ष ऐसा कोई पात्र व्यक्ति सामने नहीं आया है जो पात्र होने के बावजूद सूची से छूट गया हो। उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 की स्थिति के आधार पर भू-अर्जन मुआवजा वितरण और पुनर्वास पैकेज के पात्र परिवारों की सूची संबंधित गांवों में उपलब्ध कराई गई है।
मझगांय बांध में पहली बार जलभराव और उसके बाद बस्तियों के टापू में बदलने तथा घरों में पानी पहुंचने की स्थिति ने विस्थापन के सवाल को एक नया मानवीय आयाम दे दिया है। एक ओर प्रशासन का दावा है कि पात्र परिवारों को भू-अर्जन और पुनर्वास पैकेज दिया जा चुका है तथा अतिरिक्त पैकेज का भुगतान भी जारी है। दूसरी ओर प्रभावित ग्रामीण कटऑफ डेट बढ़ाने और अन्य मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मझगांय बांध के बढ़ते जलस्तर के बीच जिन परिवारों के घर पानी की जद में आ रहे हैं, उनकी तत्काल सुरक्षा, पुनर्वास और लंबित दावों का समाधान किस तरह और कितनी जल्दी होगा। चिता आंदोलन के दोबारा शुरू होने से मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना के प्रभावितों का मुद्दा एक बार फिर पन्ना की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था के केंद्र में आ गया है।
इस मार्ग से गुजरने वाले भारी वाहनों में जेके सीमेंट कंपनी के ग्राम हरदुआकेन स्थित प्लांट से क्लिंकर एवं अन्य खनिज सामग्री लेकर दूसरे जिलों के प्लांटों की ओर जाने वाले ट्रेलर और हाइवा प्रमुख रूप से शामिल बताए जा रहे हैं। इसके अलावा अन्य औद्योगिक एवं खनिज सामग्री का परिवहन करने वाले डंपर और भारी वाहन भी इस मार्ग से निकलते हैं। स्थानीय लोगों के अनुसार कुछ वाहनों में निर्धारित मालवाहक क्षमता से डेढ़ से दो गुना तक अधिक सामग्री लादे जाने की स्थिति भी सामने आती रही है। उनका कहना है कि टोल टैक्स से बचने के लिए भारी वाहनों का इस मार्ग पर बढ़ा दबाव सड़क और पुल की क्षति का एक प्रमुख कारण बनता जा रहा है। हालांकि ओवरलोडिंग और टोल बचाने के संबंध में संबंधित विभागों द्वारा जांच के बाद ही स्थिति स्पष्ट हो सकती है।
ककरहटा पुल की सबसे गंभीर स्थिति इसके एक्सपेंशन जॉइंट को लेकर सामने आ रही है। पुल के जॉइंट में गैप बढ़ने के साथ स्लैब भी क्षतिग्रस्त हो चुका है। ऐसे में भारी वाहनों के लगातार गुजरने से पुल पर कंपन और अतिरिक्त भार बढ़ना स्वाभाविक रूप से चिंता का विषय है। यदि समय रहते तकनीकी परीक्षण और आवश्यक सुधार नहीं कराया गया तो पुल की स्थिति और बिगड़ सकती है। लोक निर्माण विभाग संभाग पन्ना के कार्यपालन यंत्री इंद्रदेव पटेल ने भी पुल की स्थिति और वहां से भारी मालवाहक वाहनों की आवाजाही को लेकर चिंता जताई है। उन्होंने बताया कि जानकारी मिलने के बाद उन्होंने स्वयं पुल का निरीक्षण किया था और इसकी वस्तुस्थिति से सेतु निगम के संबंधित सहायक यंत्री को अवगत कराया है।
स्थानीय लोगों का कहना है कि पुल पर स्थिति अभी चेतावनी देने वाली है। यदि पुल की तकनीकी जांच कराकर क्षतिग्रस्त हिस्सों की तत्काल मरम्मत नहीं कराई गई तथा ओवरलोडेड वाहनों पर प्रभावी कार्रवाई नहीं हुई तो भविष्य में किसी गंभीर दुर्घटना की स्थिति से इनकार नहीं किया जा सकता।
लोगों ने प्रशासन और संबंधित विभाग से पुल की तत्काल तकनीकी जांच, ओवरलोडिंग पर रोक और भारी वाहनों के यातायात को नियंत्रित करने की मांग की है। पुल की तस्वीर में एक्सपेंशन जॉइंट का बढ़ा हुआ गैप और क्षतिग्रस्त हिस्सा साफ दिखाई दे रहा है, जो इसकी मौजूदा स्थिति की गंभीरता को सामने लाता है।


कृषि विभाग द्वारा किसानों से प्राप्त जानकारी के साथ ग्राउंड ट्रूथिंग यानी स्थलीय सत्यापन के माध्यम से फसल क्षति का आकलन किया जा रहा है। मैदानी अमला प्रभावित खेतों का निरीक्षण कर फसलों के जीपीएस लोकेशन वाले फोटो अलग-अलग एंगल से ले रहा है। इन फोटो और आवश्यक विवरण को उन्नति ऐप पर अपलोड किया जा रहा है। प्रभावित ग्राम, फसल का नाम, प्रभावित क्षेत्रफल और नुकसान की स्थिति जैसी जानकारी संकलित कर स्थलीय निरीक्षण एवं किसानों से संपर्क के आधार पर उसका परीक्षण किया जा रहा है। इस प्रक्रिया का उद्देश्य फसल नुकसान का वास्तविक और प्रमाणित रिकॉर्ड तैयार करना है, ताकि आगे किसानों को फसल बीमा और शासन स्तर से मिलने वाली राहत का लाभ दिलाने में आवश्यक दस्तावेजी आधार उपलब्ध हो सके।
अतिवृष्टि प्रभावित किसानों और किसान संगठनों ने प्रशासन से मांग की है कि राजस्व और कृषि विभाग की संयुक्त टीमें गांव-गांव पहुंचकर फसल क्षति का पारदर्शी और समयबद्ध सर्वे करें। किसी भी प्रभावित किसान या खेत को सर्वे से बाहर नहीं रखा जाए और वास्तविक नुकसान के आधार पर पात्र किसानों को नियमानुसार राहत राशि उपलब्ध कराई जाए। किसान कांग्रेस के जिलाध्यक्ष सेवालाल पटेल ने कहा कि लगातार बारिश से किसानों की फसल उत्पादन की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा है। किसानों ने खाद, बीज, मजदूरी और अन्य कृषि कार्यों पर पैसा खर्च किया था। फसल खराब होने से उनकी पूरी आर्थिक गणित बिगड़ गई है। उन्होंने मांग की कि प्रभावित किसानों को नियमानुसार राहत राशि के साथ प्रधानमंत्री फसल बीमा योजना का अधिकतम संभव लाभ दिलाया जाए।





मोहन्द्रा-कोटा मार्ग पर कुछ गड्ढे इतने गहरे हैं कि उनमें वाहन के पहिए तक समा जाते हैं। दोपहिया और छोटे चार पहिया वाहन चालकों के लिए ऐसे स्थान सबसे अधिक जोखिम वाले हैं। ई-रिक्शा चालकों की परेशानी का अंदाजा इसी से लगाया जा सकता है कि स्थानीय लोगों के अनुसार कई बार वे गड्ढों वाले हिस्से से पहले सवारियों को उतारकर वाहन को धीरे-धीरे निकालते हैं। बारिश के दौरान समस्या और बढ़ जाती है। गड्ढों में जमा पानी के ऊपर से जब भारी वाहन गुजरते हैं तो पानी की तेज बौछार आसपास की दीवारों और किनारे तक पहुंचती है। वहीं लोडर और भारी वाहनों के आवागमन के दौरान सड़क धंसने या वाहन के असंतुलित होने की आशंका बनी रहती है।
सबसे महत्वपूर्ण सवाल सड़क की पांच साल की गारंटी को लेकर है। सड़क अभी गारंटी पीरियड में है, लेकिन लंबे समय से आवश्यक मरम्मत और संधारण नहीं होने के कारण इसकी हालत लगातार बिगड़ती गई। यानी जिस अवधि में सड़क को बेहतर स्थिति में बनाए रखने के लिए गारंटी की व्यवस्था की गई है, उसी अवधि में सड़क जगह-जगह बड़े गड्ढों में बदल रही है। लोक निर्माण विभाग द्वारा ठेका कंपनी हिलवेज कंस्ट्रक्शन कंपनी को पिछले चार माह के दौरान दो बार सख्त कार्रवाई की चेतावनी वाले पत्र भेजे जाने की बात सामने आई है। इसके बावजूद ठेका कंपनी प्रबंधन के कानों में जूं तक नहीं रेंगी। इससे यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर गारंटी की शर्तों के तहत ठेका कंपनी से सड़क का आवश्यक रखरखाव और सुधार कार्य क्यों नहीं कराया जा सका।
लोक निर्माण विभाग उप संभाग पवई के अनुविभागीय अधिकारी राजमणि बागरी ने बताया कि सड़क के अत्यधिक क्षतिग्रस्त होने की जानकारी विभाग को है। लोनिवि द्वारा अपने स्तर पर आज से गड्ढों की मरम्मत और जल निकासी का कार्य प्रारंभ कराया गया है। सड़क वर्तमान में गारंटी पीरियड में है, इसलिए संबंधित ठेका कंपनी को पत्र भेजकर तत्काल आवश्यक सुधार कार्य कराने के निर्देश दिए गए हैं। सुधार कार्य नहीं कराने पर ठेका कंपनी के विरुद्ध कठोर कार्रवाई की जाएगी।





