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पन्ना: स्वास्थ्य संस्थाओं में आउटसोर्स कर्मचारियों का आर्थिक शोषण, बंधुआ मजदूरों से भी बदतर हैं हालात! न्यूनतम मजदूरी नसीब नहीं, ईपीएफ कटौती-ईएसआईसी का भी अता-पता नहीं

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मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय पन्ना। (फाइल फोटो)
  • ठेका कर्मचारियों के खून-पसीने की कमाई के हर महीने डकारे जा रहे लाखों रुपए

  • ‘स्काई बुल’ कंपनी पर मनमाने वेतन भुगतान और धांधली के गंभीर आरोप

  • स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और ठेका कंपनी की मिलीभगत से 10 साल से जारी है भ्रष्टाचार

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्य प्रदेश की डबल इंजन सरकार में भ्रष्टाचार, पिछले सभी रिकार्ड तोड़ते हुए कई गुना बढ़ गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ और ‘न खाऊंगा-ना खाने दूंगा’ जैसे सत्तासीनों के वादे जुमले साबित हो रहे हैं। प्रदेश में ‘शिवराज’ की तरह मौजूदा मोहन सरकार में भी सिस्टम को खोखला करने वाले भ्रष्टाचारी दीमकों को पूर्ण संरक्षण प्राप्त है। पन्ना जिले के स्वास्थ्य विभाग में सेवाएं देने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों के आर्थिक शोषण का मामला इसका एक उदाहरण मात्र है। जिले की विभिन्न स्वास्थ्य संस्थाओं में कार्यरत लगभग 300 से अधिक आउटसोर्स कर्मचारियों का आर्थिक शोषण थमने का नाम नहीं ले रहा है। लंबे समय से व्यवस्था की मार झेल रहे इन कर्मचारियों को शासन द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी और वैधानिक लाभों से वंचित रखा जा रहा है। इनकी खून-पसीने की कमाई रूपी मासिक पारिश्रमिक (वेतन) के लाखों रुपए ठेका कंपनी ‘स्काई बुल सिक्योरिटी प्राइवेट लिमिटेड, इंदौर’ और विभागीय अधिकारियों की कथित मिलीभगत के कारण हर महीने डकारे जा रहे हैं।
ठेका कर्मचारियों के आर्थिक शोषण का खेल विगत 10 वर्षों से लगातार जारी है। इस दौरान ठेका एजेंसी से लेकर स्वास्थ्य विभाग में अधिकारी बदले, अगर कुछ नहीं बदला तो वह ठेका श्रमिकों के हालात हैं। जरा सोचिए! इन दस सालों में न्यूनतम मजदूरी का अपना हक पाने के लिए ठेका कर्मचारियों ने दर्जनों बार कामबंद हड़ताल की, सैकड़ों ज्ञापन और आवेदन पत्र सौंपे, लेकिन इस बेरहम व्यवस्था से इन्हें इंसाफ नहीं मिल सका। कभी न पूरे होने वाले कोरे आश्वासन देकर या फिर नौकरी से निकालकर इन्हें हमेशा चुप कराया जाता रहा है।

न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का खुला उल्लंघन

सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अजयगढ़ में मई 2026 ठेका कर्मचारियों द्वारा की गई कामबंद हड़ताल के दौरान सौंपे गए ज्ञापन की प्रति।
मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय, जिला चिकित्सालय पन्ना (DH) समेत आंचलिक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और उप स्वास्थ्य केंद्रों (SHC) में कंप्यूटर ऑपरेटर, सिक्योरिटी गार्ड, सफाईकर्मी, मल्टीपरपज वर्कर और रसोइया के पद पर कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारियों को स्वास्थ्य विभाग की निविदा, अनुबंध शर्तों एवं श्रम कानूनों के अनुसार ठेका एजेंसी द्वारा शासन द्वारा निर्धारित दैनिक न्यूनतम मजदूरी दर के आधार पर समय पर पारिश्रमिक देना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इसके साथ ही प्रत्येक कर्मचारी के लिए ईपीएफ (EPF) और ईएसआईसी (ESIC) का लाभ देना भी अनिवार्य शर्तों में शामिल है। लेकिन धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। स्काई बुल कंपनी द्वारा कर्मचारियों को प्रचलित दर के अनुसार न्यूनतम मजदूरी देने के बजाय मनमाने तरीके से मात्र 6,800/-, 7,000/-, 7,500/- और 8,500/- रुपए ही थमाए जा रहे हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि विरोध करने पर उन्हें शेष राशि की ईपीएफ कटौती किए जाने का रटा-रटाया झूठा जवाब दिया जाता है, जबकि स्काई बुल ठेका कंपनी ने अपने दो साल के कार्यकाल में आज तक किसी भी कर्मचारी को उसके ईपीएफ खाते की कोई जानकारी नहीं दी है। ईएसआईसी से भी कर्मचारी पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं।

शासन द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी दरें:

 01 अप्रैल 2026 से 30 सितंबर 2026 तक की दरें-
   अकुशल श्रमिक: 12,125 रुपए मासिक (466 रुपए प्रतिदिन)
   अर्द्धकुशल श्रमिक: 13,121 रुपए मासिक (505 रुपए प्रतिदिन)
   कुशल श्रमिक: 14,844 रुपए मासिक (571 रुपए प्रतिदिन)
 वर्तमान (01 अक्टूबर 2026 से 31 मार्च 2027) की निर्धारित दरें:
   अकुशल श्रमिक: 12,575 रुपए मासिक (484 रुपए प्रतिदिन)
   अर्द्धकुशल श्रमिक: 13,571 रुपए मासिक (522 रुपए प्रतिदिन)
   कुशल श्रमिक: 15,224 रुपए मासिक (588 रुपए प्रतिदिन)

समय पर वेतन न मिलने से बढ़ी आर्थिक बदहाली

कामबंद हड़ताल की समाप्ति पर चर्चा उपरांत ठेका कंपनी के प्रतिनिधि द्वारा कर्मचारियों की मांगों का निराकरण करने का लिखित आश्वासन देने के बाद भी उस पर अमल नहीं किया गया।
नियमों के तहत ठेका कर्मचारियों को प्रचलित न्यूनतम मजदूरी दर के अनुसार पारिश्रमिक (वेतन) का भुगतान हर महीने की 01 से 05 तारीख के बीच सुनिश्चित किया जाना चाहिए, परंतु स्काई बुल कंपनी द्वारा इस प्रावधान की भी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। ठेका कंपनी और स्वास्थ्य विभाग के मध्य निष्पादित अनुबंध में यह शर्त शामिल है। शर्तों का पालन न करने पर कंपनी का ठेका निरस्त कर उसकी धरोहर राशि को जब्त करने तथा कंपनी के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई करने की बात कही गई है। इसके बाद भी जिले भर में तैनात कर्मचारियों को न तो न्यूनतम मजदूरी दर के अनुसार वेतन मिल रहा है और ना ही तय समयावधि में वेतन का भुगतान किया जाता है। कुछ संस्थाओं में कर्मचारियों को महीने की 20-25 तारीख को वेतन भुगतान किया जाता है, जबकि अधिकांश जगहों पर 2-3 महीने तक वेतन का इंतजार करना पड़ता है। समय से वेतन न मिलने के कारण अल्प वेतनभोगी इन कर्मचारियों को गंभीर आर्थिक तंगी से जूझना पड़ता है।
सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अजयगढ़ में न्यूनतम मजदूरी भुगतान और अन्य मांगों को लेकर कामबंद हड़ताल करते ठेका कर्मचारी। (फाइल फोटो)
ठेका कंपनी द्वारा नियम-शर्तों का पालन न कर खुली मनमानी करने की जानकारी के बाद भी सीएमएचओ, सिविल सर्जन तथा अन्य स्वास्थ्य संस्था प्रभारी ठेकेदार से मिलने वाले कमीशन के चक्कर में तमाशबीन बनकर भ्रष्टाचार और शोषण को संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि पन्ना जिले के इस विशाल स्वास्थ्य नेटवर्क-जिसमें 01 जिला अस्पताल, 06 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 17 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और लगभग 160 उप स्वास्थ्य केंद्र शामिल हैं- वहां तैनात यह मैदानी अमला खून-पसीना एक करने के बावजूद भुखमरी की कगार पर है। विभागीय सूत्रों की मानें तो स्काई बुल कंपनी से पहले ‘मेसर्स कामथीन सिक्योरिटी सर्विस’ नामक एजेंसी भी इसी परिवार से जुड़ी थी, जो जिले के युवाओं के करोड़ों रुपए डकार चुकी है।

प्रशासनिक आश्वासन के बाद भी नहीं सुधरे हालात

माह मई 2026 में सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अजयगढ़ के ठेका कर्मचारियों की हड़ताल समाप्त कराने उनसे चर्चा करते हुए एसडीएम संजय कुमार नागवंशी।
वित्तीय अनियमितताओं और शोषण से त्रस्त होकर कुछ समय पूर्व अजयगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के ठेका कर्मचारियों ने 19 एवं 20 मई 2026 को कामबंद हड़ताल की थी। इस दौरान 21 मई 2026 को एसडीएम संजय कुमार नागवंशी, तहसीलदार सुरेंद्र कुमार अहिरवार और सीबीएमओ डॉ. शोभाराम शर्मा ने कंपनी के प्रतिनिधि को बुलाकर लिखित आश्वासन के साथ हड़ताल समाप्त कराई थी। हालांकि, चार महीने बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है और कंपनी की वादाखिलाफी से कर्मचारी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि लिखित आश्वासन पर हस्ताक्षर करने वाले राजस्व अधिकारियों ने उस पर अमल कराने की अब तक कोई सुध नहीं ली।

लंबित वेतन मांगने पर गंवानी पड़ी नौकरी

लंबित वेतन की मांग करने पर नौकरी गंवाने वाला ठेका श्रमिक रनमत अहिरवार।
स्वास्थ्य विभाग के ठेका कर्मचारियों के हालात बंधुआ मजदूरों से भी बदतर हैं। आर्थिक शोषण का शिकार इन कर्मचारियों को अपना हक मांगने पर न सिर्फ प्रताड़ना सहन करनी पड़ती है, बल्कि कई बार अपनी नौकरी भी गंवानी पड़ती है। अजयगढ़ सीएचसी अंतर्गत आने वाले शानगुरैया उप स्वास्थ्य केंद्र में तैनात रहे रनमत अहिरवार (मल्टी स्किल्ड ग्रुप-डी वर्कर) ठेकेदार की मनमानी और तानाशाही का ताजा शिकार हैं। सफाईकर्मी के पद पर पदस्थ किए गए रनमत के अनुसार, माह फरवरी 2026 से माह सितंबर 2026 तक सात महीने के लंबित वेतन की मांग करने पर उन्हें सीबीएमओ डॉ. शोभाराम शर्मा के इशारे पर ठेकेदार ने नौकरी से ही निकाल दिया। पीड़ित ने पन्ना आकर कलेक्टर की जनसुनवाई में आवेदन दिया तथा क्षेत्रीय विधायक एवं पूर्व श्रम मंत्री बृजेंद्र प्रताप सिंह से गुहार लगाई, लेकिन अब तक न्याय नहीं मिला।
न्यूनतम मजदूरी दर अनुसार समय पर वेतन न मिलने की शिकायत करती सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र अजयगढ़ में पदस्थ रसोइया।
दलित रनमत अहिरवार अकेले नहीं हैं, उनके जैसे सैकड़ों ठेका कर्मचारी मौजूद हैं जिनसे पूर्व में कामथीन सिक्योरिटी सर्विस ने कई महीनों तक बिना पगार के काम कराने के बाद नौकरी से निकाल दिया। बीते दो साल से स्काई बुल कंपनी भी इसी तर्ज पर तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर अपने कर्मचारियों की वेतन और ईपीएफ आदि की राशि डकार रही है। वहीं, सीएचसी अजयगढ़ में ही कुक के रूप में सेवाएं दे रहीं सुदामा बाई कुशवाहा और संजय विश्वास को पगार के रूप में महज 5,500/- रुपए ही मिल रहे हैं। विगत दिनों इन महिलाओं ने पत्रकारों के समक्ष अपनी पीड़ा बताते हुए न्यूनतम मजदूरी दिलाए जाने की मांग उठाई थी। उन्होंने बताया था कि पिछले दो महीनों का उनका वेतन भी लंबित है।

श्रम विभाग की टीम करेगी गहन जांच

इस पूरे मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए नए श्रम पदाधिकारी राजेश कुमार गुप्ता ने स्पष्ट किया है कि यदि स्वास्थ्य विभाग के ठेका कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी का भुगतान नहीं किया जा रहा है, तो ठेकेदार के विरुद्ध श्रम कानूनों के तहत प्रकरण पंजीबद्ध कर श्रम न्यायालय में पेश किया जाएगा। श्रम पदाधिकारी ने जानकारी दी कि दशहरा अवकाश के तुरंत बाद सीएमएचओ कार्यालय और जिला अस्पताल का निरीक्षण किया जाएगा तथा स्वास्थ्य संस्थाओं में जाकर मैदानी कर्मचारियों के बयान दर्ज किए जाएंगे। वेतन भुगतान संबंधी प्रमाणित साक्ष्यों की गहन जांच की जाएगी।
राजेश कुमार गुप्ता, श्रम पदाधिकारी, जिला पन्ना।
उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक श्रमिक को उसका हक और न्यूनतम मजदूरी दिलाना उनका पदीय दायित्व है, और यदि स्काई बुल कंपनी पर कम भुगतान के आरोप प्रमाणित होते हैं, तो प्रभावित कर्मचारियों को बकाया राशि का भुगतान एरियर्स (एरियर) के रूप में दिलवाया जाएगा। अब देखना यह होगा कि श्रम विभाग की इस आगामी कार्रवाई से भ्रष्ट ठेका प्रथा पर लगाम लगती है या फिर कर्मचारियों का शोषण यूं ही बदस्तूर जारी रहता है। ठेका श्रमिकों के शोषण में पिछले दस साल से संलिप्त स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध भी क्या कोई ठोस वैधानिक कार्रवाई होगी या फिर हर बार की तरह भ्रष्टाचार के खेल में बड़े मगरमच्छ बच निकलेंगे?

इनका कहना है-

“ठेकेदार द्वारा सभी आउटसोर्स कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी दर अनुसार वेतन देने तथा ईपीएफ आदि का कटौती करने का शपथ पत्र देने के बाद ही बिलों का भुगतान किया जाता है। सभी संस्था प्रमुख भी इसका प्रमाणीकरण करते हैं, फिर भी यदि किसी से कम वेतन मिलने की शिकयत प्राप्त होती है तो उस पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।”

-डॉ. राजेश प्रसाद तिवारी, सीएमएचओ, जिला पन्ना।

“पूरे जिले में कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी दर अनुसार वेतन दिया जा रहा है। यह बात सही है कि इस दावे के प्रमाण के तौर पर वेतन संबंधित के बैंक खाते में अंतरित की जानी चाहिए लेकिन हम अधिकांश जगह नकद या फिर सुविधानुसार खाते में ट्रांसफर करते हैं। कर्मचारियों को समय पर वेतन भुगतान सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है, हम इसमें सुधार के प्रयास कर रहे हैं।”

-पंकज मिश्रा, मैनेजर, स्काई बुल कंपनी।

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न्याय की नीलामी! अजयगढ़ के राजस्व न्यायालयों में अधिकारियों की शह पर बिचौलियों का राज, कलेक्टर के आदेश भी बेअसर

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अनुविभागीय अधिकारी राजस्व अजयगढ़ एवं तहसीलदार अजयगढ़ का संयुक्त कार्यालय भवन। (फाइल फोटो)
  • अशासकीय व्यक्ति राजस्व न्यायालयों में खुलेआम कर रहे लिपिकीय कार्य

  • अभिभाषक संघ ने कड़ी आपत्ति जताते हुए अनाधिकृत व्यक्तियों को हटाने सौंपा ज्ञापन

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) न्याय के मंदिर कहे जाने वाले अदालती प्रांगण में यदि मुकदमों की फाइलें सरकारी कर्मचारियों के बजाय बाहरी दलालों की टेबल से होकर गुजरने लगें, तो व्यवस्था पर से आम जनता का विश्वास उठना स्वाभाविक है। पन्ना जिले के अजयगढ़ अनुभाग अंतर्गत राजस्व न्यायालयों और कार्यालयों से प्रशासनिक शुचिता को तार-तार कर देने वाला ऐसा ही एक गंभीर और संवेदनशील मामला सामने आया है। यहां शासकीय पीठ पर बैठे जिम्मेदार अधिकारियों की शह पर अनाधिकृत (अशासकीय) व्यक्तियों का समानांतर साम्राज्य चल रहा है। आलम यह है कि अजयगढ़ के राजस्व न्यायालयों में ‘दाम कराए काम’ की तर्ज पर दलाली का खेल धड़ल्ले से जारी है, जहां न्याय और विभागीय कार्यों की बाकायदा बोली लगाई जा रही है।

अभिभाषक संघ के नामजद ज्ञापन से पर्दाफाश

अजयगढ़ के राजस्व न्यायालयों में व्याप्त इस अराजकता और बाहरी दखलंदाजी के खिलाफ स्थानीय अभिभाषक संघ ने मोर्चा खोल दिया है। अभिभाषक संघ अजयगढ़ ने स्थानीय अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) को ज्ञापन सौंपकर राजस्व न्यायालयों में अनाधिकृत रूप से लिपिकीय कार्य व लिखा-पढ़ी कर रहे बाहरी व्यक्तियों को तत्काल हटाने और इस पूरी अवैध प्रक्रिया की उच्च स्तरीय जांच कराने की मांग की है। अभिभाषक संघ ने अपने ज्ञापन में बकायदा न्यायालयवार नामजद उल्लेख करते हुए बताया है कि कौन-सा बाहरी व्यक्ति किस न्यायालय में गैर-कानूनी तरीके से काम संभाल रहा है-
  • एसडीएम न्यायालय (SDM Court): दीपक रैकवार एवं काशी केवट
  • तहसीलदार न्यायालय अजयगढ़: राजेश साहू
  • नायब तहसीलदार धरमपुर मण्डल: अनिल रजक एवं विनोद शिवहरे (कोटवार)
  • नायब तहसीलदार बीरा मण्डल: बेटा लोध एवं संतराम

वरिष्ठ अधिकारियों तक पहुंची शिकायत

मामले की गंभीरता को देखते हुए अभिभाषक संघ अजयगढ़ ने ज्ञापन की प्रतियां आवश्यक कार्यवाही हेतु पन्ना कलेक्टर के अलावा मध्य प्रदेश शासन के सर्वोच्च प्रशासनिक तंत्र तक भेजी हैं। ज्ञापन की प्रतियां मुख्य सचिव मध्य प्रदेश शासन भोपाल, प्रमुख सचिव राजस्व विभाग भोपाल, संभागीय आयुक्त सागर संभाग तथा कलेक्टर जिला पन्ना को डाक के माध्यम से प्रेषित की गई हैं।

एकल खिड़की प्रणाली की तरह सक्रिय बिचौलिये

तराई अंचल में यह चर्चा अब आम हो चुकी है कि अजयगढ़ के राजस्व न्यायालयों में ‘न्याय की नीलामी’ का खेल इन्हीं बिचौलियों के इशारे पर हो रहा है। ये अनाधिकृत व्यक्ति किसी ‘सिंगल विंडो सिस्टम’ (एकल खिड़की व्यवस्था) की तरह काम कर रहे हैं, जहां हर काम की दरें तय हैं। जब तक इन कथित दलालों के माध्यम से ‘सेटिंग’ नहीं हो जाती, तब तक साहब की टेबल से फाइल आगे नहीं खिसकती। बिना शासकीय नियुक्ति के इन बाहरी तत्वों द्वारा सरकारी फाइलों को छूना और लिखा-पढ़ी करना न केवल गंभीर वित्तीय और प्रशासनिक अनियमितता है, बल्कि यह न्याय व्यवस्था पर सीधा प्रहार है।

कलेक्टर पन्ना का पत्र: व्यवस्था की नाकामी की स्वीकारोक्ति

पन्ना कलेक्टर ऊषा परमार द्वारा राजस्व न्यायालयों में अशासकीय व्यक्तियों से कार्य न कराने के संबंध जारी पत्र।
इस पूरे प्रकरण में पन्ना कलेक्टर ऊषा परमार का पत्र प्रशासनिक तंत्र पर सबसे बड़ा दस्तावेज बनकर सामने आया है। कलेक्टर ने 21 सितंबर 2026 को जिले के समस्त एसडीएम, तहसीलदार और नायब तहसीलदारों को पत्र जारी कर अजयगढ़ अभिभाषक संघ के ज्ञापन का स्पष्ट उल्लेख किया। कलेक्टर ने अपने आदेश में स्वीकार किया कि “इसके अतिरिक्त जिले के अन्य राजस्व न्यायालयों में भी अशासकीय व्यक्तियों द्वारा बिना वेतन के अनाधिकृत रूप से लिपिकीय कार्य कर लाभ प्राप्त करने की सूचनाएं यदा-कदा प्राप्त होती रहती हैं, जो कि सर्वथा अनुचित है।”
कलेक्टर ने कड़ा रुख अपनाते हुए स्पष्ट निर्देश दिए थे कि इस पत्र के जारी होने के दिनांक से जिले के समस्त राजस्व न्यायालयों में केवल अधिकृत शासकीय कर्मचारी ही कार्य का संपादन करेंगे और वे अनिवार्य रूप से कार्यालयों में अपना आईडी कार्ड (ID Card) धारण करेंगे। इसके साथ ही जिला स्तर से एक पृथक निरीक्षण टीम का गठन किया जा रहा है, जो किसी भी समय किसी भी राजस्व न्यायालय का औचक निरीक्षण करेगी। यदि इस दौरान किसी भी शासकीय कर्मचारी के साथ कोई अशासकीय या अनाधिकृत व्यक्ति शासकीय कार्य करता हुआ पाया जाता है, तो संबंधित शासकीय कर्मचारी की दो वार्षिक वेतन वृद्धियां बिना किसी कारण बताओ नोटिस जारी किए ही असंचयी प्रभाव से रोक दी जाएंगी।

कलेक्टर के आदेशों की उड़ रही धज्जियां

पन्ना जिला मुख्यालय के पत्रकारों से सिंचाई परियोजना प्रभावितों के मुद्दे पर चर्चा करते अजयगढ़ एसडीएम आलोक मार्को एवं तहसीलदार सुरेंद्र कुमार अहिरवार। (फाइल फोटो)
कलेक्टर द्वारा दो वार्षिक वेतन वृद्धि रोकने जैसी कठोर कार्रवाई की लिखित चेतावनी देने के एक माह बाद भी अजयगढ़ के राजस्व न्यायालयों के हालात में रत्ती भर भी बदलाव नहीं आया है। स्थानीय अधिवक्ताओं की तीखी आपत्ति और जिले की शीर्ष प्रशासनिक अधिकारी (कलेक्टर) के स्पष्ट आदेशों को ठेंगा दिखाते हुए आज भी उन्हीं अनाधिकृत व्यक्तियों से धड़ल्ले से काम कराया जा रहा है।
यह स्थिति अजयगढ़ के राजस्व अधिकारियों की घोर स्वेच्छाचारिता, मनमानी और प्रशासनिक बेलगाम रवैये को उजागर करती है। अब सवाल यह उठता है कि आखिर अजयगढ़ के एसडीएम और तहसीलदारों को किसका संरक्षण प्राप्त है, जो वे पन्ना कलेक्टर के स्पष्ट और सख्त आदेशों की भी खुलेआम धज्जियां उड़ा रहे हैं? क्या इन बाहरी व्यक्तियों और बिचौलियों के माध्यम से फल-फूल रहे ‘दाम कराए काम’ के खेल में राजस्व अधिकारियों का भी प्रत्यक्ष या अप्रत्यक्ष हित जुड़ा हुआ है? जब जिले की सर्वोच्च प्रशासनिक अधिकारी (कलेक्टर) की लिखित चेतावनी और अनुशासनात्मक कार्रवाई के भय का भी अजयगढ़ के राजस्व अधिकारियों पर कोई असर नहीं हो रहा है, तो क्या जिला प्रशासन इन लापरवाह और मनमाने अधिकारियों पर सीधे निलंबन जैसी कड़ी दंडात्मक कार्रवाई करने का साहस दिखाएगा?
स्थानीय अधिवक्ताओं और आम जनता ने मांग की है कि इस पूरे रिश्वतखोरी और अनाधिकृत दखल के नेटवर्क को तत्काल ध्वस्त किया जाए और दोषी राजस्व अधिकारियों के खिलाफ दंडात्मक कार्रवाई की जाए। उल्लेखनीय है कि अभिभाषक संघ के आरोपों के संबंध में एसडीएम अजयगढ़ आलोक मार्को से विभाग का पक्ष जानने के लिए संपर्क किया गया लेकिन उनका मोबाइल फोन रिसीव नहीं हुआ।
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पन्ना को मिले नए कलेक्टर: युवा आईएएस हर्ष सिंह संभालेंगे अब जिले की कमान, ऊषा परमार का भोपाल तबादला

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हर्ष सिंह (आईएएस 2015 बैच)
  • बुरहानपुर कलेक्टर हर्ष सिंह को मिली पन्ना की जिम्मेदारी, जल्द ग्रहण करेंगे पदभार

  • निवर्तमान पन्ना कलेक्टर ऊषा परमार बनीं उद्यानिकी विभाग की अपर सचिव

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्य प्रदेश शासन के सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी किए गए भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) अधिकारियों के तबादला आदेश के तहत पन्ना जिले में बड़ा प्रशासनिक फेरबदल हुआ है। राज्य शासन ने बुरहानपुर जिले के कलेक्टर हर्ष सिंह को पन्ना जिले का नया कलेक्टर नियुक्त किया है। वहीं, पन्ना की निवर्तमान कलेक्टर ऊषा परमार का स्थानांतरण कर उन्हें भोपाल में उद्यानिकी एवं खाद्य प्रसंस्करण विभाग का अपर सचिव बनाया गया है।
पन्ना के नए कलेक्टर बनाए गए युवा आईएएस अधिकारी हर्ष सिंह।
नवागत कलेक्टर का परिचय और अनुभव: 41 वर्षीय नवागत कलेक्टर हर्ष सिंह वर्ष 2015 बैच के भारतीय प्रशासनिक सेवा (IAS) के अधिकारी हैं और वे मूलतः संस्कारधानी जबलपुर के निवासी हैं। वर्तमान में वे बुरहानपुर जिले के कलेक्टर के रूप में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। प्रशासनिक कार्यकुशलता, त्वरित निर्णय क्षमता और योजनाओं के सख्त क्रियान्वयन के लिए पहचाने जाने वाले हर्ष सिंह आदेश जारी होने के बाद जल्द ही पन्ना पहुंचकर विधिवत रूप से नए कलेक्टर का पदभार ग्रहण करेंगे।
राज्य शासन ने निवर्तमान पन्ना कलेक्टर ऊषा परमार का भोपाल तबादला कर उद्यानिकी विभाग की अपर सचिव की जिम्मेदारी सौंपी है।
पन्ना जिले में नई उम्मीदें: सामान्य प्रशासन विभाग द्वारा जारी इस आदेश के बाद पन्ना जिले के प्रशासनिक महकमे और आम जनता में नए नेतृत्व को लेकर खासा उत्साह है। उम्मीद जताई जा रही है कि नए कलेक्टर के पदभार संभालने के बाद जिले की जनसमस्याओं के त्वरित निस्तारण, सुशासन और विकास परियोजनाओं को नई गति मिलेगी।
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बदमाशों का दुस्साहस: तड़के किराना दुकान में बोला धावा, दुकानदार को गोली मारने की धमकी देकर नकदी और सामान लूट ले गए

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अज्ञात नकाबपोशों द्वारा की गई लूटपाट की घटना की जानकारी देते हुए पीड़ित दुकानदार रामस्वरूप लोधी का प्रदीप कुमार पुत्र।
  • आहट सुनकर जागा दुकानदार, बिस्तर के नजदीक खड़े थे नकाबपोश बदमाश

  • विरोध करने पर दी जान से मारने की धमकी, पुलिस की कार्यप्रणाली पर खड़े हुए गंभीर सवाल

  • सनातन हिन्दू एकता रथयात्रा के दौरान चोरी की घटनाओं के बीच पन्ना में एक और बड़ी वारदात

शादिक खान, पन्ना/रैपुरा ।(www.radarnews.in) मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के दूरस्थ सीमावर्ती रैपुरा थाना क्षेत्र में अपराधियों के हौसले पूरी तरह बुलंद नजर आ रहे हैं। रैपुरा-पन्ना मुख्य मार्ग पर मनकौरा और ताखौरी गांव के बीच स्थित एक किराना दुकान में सोमवार तड़के बदमाशों ने दुस्साहस की हदें पार करते हुए लूटपाट की इस सनसनीखेज वारदात को अंजाम दिया। काले रंग की बोलेरो जैसी गाड़ी से पहुंचे 4 से 5 अज्ञात नकाबपोश बदमाशों ने न केवल दुकान को निशाना बनाया, बल्कि जागने पर दुकानदार को गोली मारने की धमकी देकर फरार हो गए।

आहट पर जागा दुकानदार, बिस्तर के पास खड़ा था बदमाश

पुलिस को लूटपाट की घटना की जानकारी देते हुए पीड़ित दुकानदार रामस्वरूप लोधी।
पीड़ित दुकान संचालक रामस्वरूप लोधी (48) ने बताया कि सोमवार सुबह करीब 3 से 4 बजे के बीच वह दुकान के पास ही सो रहे थे। दुकान के भीतर से आ रही आहट से उनकी नींद खुल गई। जब उन्होंने उठकर देखा तो बाउंड्री के पास और बिस्तर के नजदीक एक संदिग्ध व्यक्ति खड़ा था, जबकि अन्य बदमाश दुकान के अंदर मौजूद थे और बाहर काले रंग की बोलेरो जैसी गाड़ी खड़ी थी। रामस्वरूप ने जब हिम्मत जुटाकर विरोध किया और वहां आने का कारण पूछा, तो बदमाशों ने उन्हें तुरंत गोली मारने की धमकी दी और चुप रहने को कहा। अंधेरा होने के कारण पीड़ित उनके हाथ में मौजूद हथियार को ठीक से नहीं पहचान सका। कुछ ही देर में बदमाश दुकान से सारा सामान समेटकर मोहन्द्रा रोड की ओर फरार हो गए।
नकदी, पेट्रोल और किराना सामग्री ले गए बदमाश
रैपुरा-पन्ना मुख्य मार्ग पर मनकौरा और ताखौरी गांव के बीच स्थित किराना दुकान, जिसे अज्ञात बदमाशों ने निशाना बनाया।
अज्ञात नकाबपोश बदमाशों ने इस वारदात को बेहद शातिर तरीके से अंजाम दिया। पीड़ित के अनुसार, आरोपी दुकान से लगभग 10 हजार रुपये नकद, 30 से 40 लीटर पेट्रोल, बीड़ी के 10 बंडल, राजश्री गुटखा के 15 पैकेट और नमकीन सहित अन्य जरूरी किराना सामग्री समेत करीब 30 हजार रुपए का सामान लूटकर ले गए। घटना के बाद दहशत में आए दुकानदार ने अपने घर पहुंचकर परिजनों को पूरी बात बताई। सुबह करीब 7 बजे पीड़ित के बेटे ने रैपुरा थाने पहुंचकर इस मामले की लिखित शिकायत दर्ज कराई।

सीमावर्ती क्षेत्र में लचर पुलिसिंग पर सवाल

फाइल फोटो।
तीन जिलों की सीमाओं से सटे होने के कारण रैपुरा थाना क्षेत्र आपराधिक दृष्टिकोण से अत्यंत संवेदनशील है। यहाँ वारदातों को अंजाम देने के बाद अपराधी आसानी से पड़ोसी जिलों में स्थित सुरक्षित ठिकानों की ओर भाग निकलते हैं, जिससे उनकी गिरफ्तारी पुलिस के लिए आसान नहीं होती। क्षेत्र की इस भौगोलिक संवेदनशीलता के बावजूद यहाँ पुलिस व्यवस्था चुस्त-दुरुस्त होने के बजाय बेहद लचर बनी हुई है, जिसका सीधा फायदा ये बेखौफ बदमाश उठा रहे हैं।
एक तरफ जहाँ पन्ना जिले में बागेश्वर पीठाधीश्वर धीरेन्द्र शास्त्री की सनातन हिंदू एकता रथयात्रा के दौरान अजयगढ़ और अमानगंज में श्रद्धालुओं (विशेषकर महिलाओं व पुरुषों) के गहने और नकदी चोरी होने की घटनाएं सामने आ रही हैं, वहीं दूसरी तरफ इस तरह सीमावर्ती क्षेत्र की मुख्य सड़क पर तड़के लूटपाट होना पुलिस की कार्यप्रणाली और सक्रियता पर गंभीर सवालिया निशान खड़े करता है। स्थानीय लोगों में इस बात को लेकर भी भारी रोष है कि क्षेत्र में पूर्व में हुई चोरी की वारदातों का पुलिस आज तक खुलासा नहीं कर पाई है। ऐसे में, इस सनसनीखेज वारदात के बाद पन्ना पुलिस के लिए संदिग्ध काली बोलेरो गाड़ी का सुराग लगाना और अंतरजिला गिरोह के बदमाशों को जल्द सलाखों के पीछे पहुंचाना एक बड़ी चुनौती बन गया है।
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अजयगढ़ तहसीलदार पर विधि विरुद्ध आदेश पारित करने का गंभीर आरोप, पन्ना कलेक्टर से की गई शिकायत

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तहसील कार्यालय अजयगढ़, जिला पन्ना (म.प्र.)। (फाइल फोटो)
  •   प्रमाण के तौर पर संलग्न किए गए आवश्यक दस्तावेज

  •   सभी प्रकरणों की उच्चस्तरीय निष्पक्ष जांच करवाने की मांग
शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्य प्रदेश के पन्ना जिले की अजयगढ़ तहसील इन दिनों प्रभारी तहसीलदार सुरेन्द्र कुमार अहिरवार द्वारा कथित तौर पर नियम-कायदों को ताक पर रखकर मनमाने और विधि विरुद्ध आदेश पारित किए जाने को लेकर सुर्खियों में आ गई है। इस मामले में अजयगढ़ के एडवोकेट एम.के. यादव ने पन्ना कलेक्टर को एक गंभीर शिकायती पत्र सौंपा है, जिसमें तहसीलदार के कार्यकाल के दौरान लिए गए कई विवादित निर्णयों को चुनौती देते हुए उच्चस्तरीय एवं निष्पक्ष जांच की मांग की गई है। शिकायतकर्ता अधिवक्ता का आरोप है कि इन मनमाने आदेशों के कारण न केवल आम नागरिकों को परेशानियों का सामना करना पड़ रहा है, बल्कि शासन के हितों को भी भारी क्षति पहुंच रही है। शिकायत के साथ प्रमाण के तौर पर आवश्यक दस्तावेज भी संलग्न किए गए हैं।
गौरतलब है कि प्रभारी तहसीलदार अजयगढ़ सुरेन्द्र कुमार अहिरवार लंबे समय से अजयगढ़ में पदस्थ हैं। रेल लाइन निर्माण हेतु प्रस्तावित भूमियों के नामांतरण तथा अन्य राजस्व प्रकरणों में इनके द्वारा पारित आदेशों को लेकर पूर्व में भी गंभीर शिकायतें सामने आ चुकी हैं।

ग्राम कगरे का बारा और सब्दुआ में शासकीय भूमि का नामांतरण

शिकायत में पहला प्रमुख मामला ग्राम कगरे का बारा और सब्दुआ से जुड़ा हुआ है। आरोप है कि ग्राम कगरे का बारा स्थित आराजी नंबर 551/01/01 कुल रकबा 0.460 हेक्टेयर शासन से बंटन व्यवस्थापन के द्वारा प्राप्त हुई थी, जो शासकीय रिकॉर्ड अधिकार अभिलेख में शासकीय पट्टेदार के रूप में दर्ज थी। इस भूमि का नामांतरण रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के आधार पर राजस्व प्रकरण क्रमांक 0197/अ-6/2023-24 के तहत 16 अगस्त 2023 को पारित आदेश से कर दिया गया, जबकि इसी भूमि के अंश भाग का नामांतरण राजस्व प्रकरण क्रमांक 0196/अ-6/2023-24 के जरिए भी उसी तिथि 16 अगस्त 2023 को किया गया। इसी प्रकार, ग्राम सबदुआ स्थित आराजी नंबर 1148 रकबा 0.2500 हेक्टेयर भी शासकीय अभिलेखों में पट्टेदार के नाम दर्ज है, जिसका रजिस्टर्ड विक्रय पत्र के आधार पर नामांतरण राजस्व प्रकरण क्रमांक 0195/अ-6/2026-27 के अंतर्गत पारित आदेश दिनांक 08 जुलाई 2026 के माध्यम से क्रेता के पक्ष में किया गया है। शिकायतकर्ता का तर्क है कि शासकीय पट्टे की जमीनों के संबंध में कानूनी प्रावधानों की अनदेखी कर ये आदेश पारित किए गए हैं।

रेलवे लाइन निर्माण हेतु प्रस्तावित भूमि पर विरोधाभासी निर्णय

दूसरा मामला ग्राम मझगांय की बड़ी आराजी (नंबर 641/01/01/01/01/01/01/01/01/01) से संबंधित है। शिकायती पत्र में बताया गया है कि इस भूमि के संबंध में भूमिस्वामियों द्वारा कई रजिस्टर्ड विक्रय पत्र निष्पादित किए गए थे। पूर्व में न्यायालय तहसीलदार अजयगढ़ द्वारा मुख्य रूप से इस आधार पर नामांतरण आवेदन निरस्त कर दिए गए थे कि उक्त भूमि ललितपुर-सतना-रीवा-सिंगरौली-महोबा-खजुराहो बड़ी रेल लाइन के निर्माण हेतु प्रस्तावित सीमा के अंतर्गत आती है। लेकिन हैरानी की बात यह है कि इस संबंध में जब दोबारा नामांतरण आवेदन प्रस्तुत किए गए, तो उन्हें स्वीकार कर लिया गया, और कुछ मामलों में तो प्रथम आवेदन प्राप्त होने पर ही नामांतरण मंजूर कर दिए गए। इस विरोधाभासी कार्यप्रणाली से न्यायिक प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

वर्ष 1943-44 के शासकीय अभिलेख में ‘जंगल’ दर्ज भूमि का नामांतरण

तीसरा और बेहद संवेदनशील मामला ग्राम बहादुरगंज की आराजी नंबर 100 से जुड़ा है। रिकॉर्ड के अनुसार, यह भूमि वर्ष 1943-44 के शासकीय अभिलेखों में स्पष्ट रूप से ‘जंगल’ के रूप में दर्ज है। इसके बावजूद, इस भूमि को लेकर कई रजिस्टर्ड विक्रय पत्र निष्पादित किए गए हैं। तहसीलदार अजयगढ़ द्वारा इनमें से कुछ विक्रय पत्रों के आधार पर तो नामांतरण की कार्रवाई कर दी गई, जबकि कुछ अन्य विक्रय पत्रों के नामांतरण आवेदन पत्र निरस्त कर दिए गए। एक ही प्रकृति की भूमि पर अलग-अलग तरह के आदेश पारित किए जाने से मनमानी और अनियमितता की आशंका बलवती होती है।

निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की मांग

शिकायतकर्ता एडवोकेट एम.के. यादव ने पन्ना कलेक्टर का ध्यान आकर्षित करते हुए कहा है कि उपर्युक्त तमाम प्रकरण इस बात की गवाही देते हैं कि अजयगढ़ तहसीलदार मनमाने ढंग से विधि विरुद्ध आदेश पारित करने के आदी हो चुके हैं। उन्होंने मांग की है कि तहसीलदार के कार्यकाल में पारित किए गए समस्त आदेशों की एक स्वतंत्र और निष्पक्ष समिति से जांच कराई जानी चाहिए। अधिवक्ता ने चेतावनी दी है कि यदि समय रहते ऐसे लापरवाह और पक्षपातपूर्ण आदेशों की समीक्षा कर उचित वैधानिक कार्रवाई नहीं की गई, तो सरकारी संपत्तियों और व्यवस्था के प्रति लोगों का विश्वास डगमगा जाएगा।
इनका कहना है-
“शिकायतकर्ता मुझसे और एसडीएम सर से नाराज हैं। उनके द्वारा शिकायत में जिन मामलों को उठाया गया है, उसकी वास्तविक स्थिति की उन्हें जानकारी नहीं है। आधी-अधूरी जानकारी के आधार पर की गई शिकायत पूर्णतः असत्य और आधारहीन है। मैंने जो भी निर्णय पारित किए हैं, वे नियमानुसार और विधि सम्मत हैं।”

– सुरेन्द्र कुमार अहिरवार, प्रभारी तहसीलदार, अजयगढ़, जिला पन्ना।

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अब दो साल बाद जन्म-मृत्यु पंजीयन आसान नहीं: प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही बन सकेगा प्रमाण पत्र

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प्रतीकात्मक चित्र।
  • 6 अगस्त 2026 को राजपत्र में प्रकाशित संशोधन 01 अक्टूबर से लागू

शादिक खान पन्ना।(www.radarnews.in) यदि आपने किसी कारणवश अपने परिवार में बच्चे के जन्म या किसी परिजन की मृत्यु का पंजीकरण दो वर्ष के भीतर नहीं कराया है, तो अब यह प्रक्रिया आपके लिए पहले जैसी आसान नहीं रहेगी। भारत के महारजिस्ट्रार कार्यालय द्वारा जन्म एवं मृत्यु रजिस्ट्रेशन अधिनियम में किए गए नवीन संशोधनों के बाद अब दो वर्ष पुरानी घटना के पंजीकरण के लिए प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट (JMFC) का आदेश अनिवार्य कर दिया गया है। भारत के राजपत्र में 06 अगस्त 2026 को प्रकाशित यह नया प्रावधान 01 अक्टूबर 2026 से प्रभावशील हो चुका है, जिसके लागू होने से देरी से पंजीयन (विलंबित पंजीयन) कराने की प्रक्रिया अब काफी जटिल और पूर्णतः न्यायिक प्रक्रिया के अधीन हो गई है।
नवीन संशोधनों के अनुसार समय सीमा के आधार पर सक्षम प्राधिकारियों के अधिकार तय किए गए हैं। यदि किसी घटना (जन्म या मृत्यु) की सूचना एक वर्ष के बाद और दो वर्ष के भीतर दी जाती है, तो पंजीकरण कराने के लिए जिला मजिस्ट्रेट (कलेक्टर), एसडीएम अथवा जिला मजिस्ट्रेट द्वारा अधिकृत किसी कार्यपालिक मजिस्ट्रेट की अनुमति व आदेश आवश्यक होगा। वहीं, यदि घटना की सूचना दो वर्ष के बाद दी जाती है, तो अब कोई प्रशासनिक अधिकारी इसका सीधा आदेश जारी नहीं कर सकेगा और ऐसी स्थिति में केवल प्रथम श्रेणी न्यायिक मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही जन्म या मृत्यु का पंजीकरण किया जा सकेगा।

कलेक्टर ने आवश्यक कार्रवाई करने दिए निर्देश

इस संशोधित अधिनियम का पालन सुनिश्चित कराने के लिए कलेक्टर एवं अतिरिक्त मुख्य रजिस्ट्रार (जन्म-मृत्यु) ऊषा परमार द्वारा पन्ना जिले के सभी तहसीलदारों को पत्र जारी कर निर्देशित किया गया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि 01 अक्टूबर 2026 से प्रभावशील इन नए नियमों के अनुसार ही सभी लंबित एवं नए आवेदनों पर आवश्यक कार्रवाई सुनिश्चित की जाए। जानकारों ने आमजन को सलाह दी है कि किसी भी कानूनी जटिलता और अदालती प्रक्रिया से बचने के लिए जन्म या मृत्यु की घटना का पंजीकरण निर्धारित समय सीमा के भीतर ही संबंधित स्थानीय निकाय, आंगनबाड़ी या अस्पताल के माध्यम से अनिवार्य रूप से करा लें।
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पन्ना टाइगर रिजर्व की सुरक्षा व्यवस्था पर फिर उठे गंभीर सवाल: कड़ी सुरक्षा वाले कोर एरिया में मेटल डिटेक्टर और जीपीएस लेकर घुसे अपराधी, गढ़ा धन खोजने का सनसनीखेज मामला

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पन्ना टाइगर रिजर्व क्षेत्र में गढ़ा धन खोदने के इरादे से अवैध प्रवेश करने वाले आरोपीगण।
  • पन्ना पार्क में लचर मॉनिटरिंग और नाकारा प्रबंधन के चलते बाघों की सुरक्षा खतरे में

  • क्या PTR में मंडरा रहा है 2009 जैसा बाघ विहीन होने का खतरा?

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) देश और दुनिया में अपनी जैव-विविधता और बाघों की पुनर्स्थापना के लिए मशहूर पन्ना टाइगर रिजर्व (PTR) अब अपनी ही सुरक्षा व्यवस्था की पोल खुलने के कारण गंभीर चर्चाओं के केंद्र में आ गया है। पार्क के अति-संवेदनशील और कड़ी सुरक्षा वाले कोर एरिया में मेटल डिटेक्टर, जीपीएस और आधुनिक उपकरणों के साथ गढ़ा धन खोजने पहुंचे चार आरोपियों के अवैध प्रवेश ने पन्ना टाइगर रिजर्व के निगरानी तंत्र को पूरी तरह से कठघरे में खड़ा कर दिया है। इस घटना ने एक बार फिर पार्क में विचरण करने वाले लगभग एक सैकड़ा बाघों और अन्य वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर गहरी चिंता पैदा कर दी है।

सुरक्षा हुई तार-तार, नाकारा प्रबंधन पर उठे सवाल

फाइल फोटो।
पन्ना टाइगर रिजर्व का कोर क्षेत्र वह सुरक्षित दायरा माना जाता है जहां इंसानी गतिविधियों पर पूरी तरह प्रतिबंध होता है और परिंदा भी मजाल है कि पर मार सके। लेकिन हालिया घटना ने साबित कर दिया है कि पीटीआर का यह तथाकथित सुरक्षित कोर एरिया अब पूरी तरह असुरक्षित हो चुका है। पार्क के मौजूदा भ्रष्ट और नाकारा प्रबंधन,  के चलते अपराधियों और असामाजिक तत्वों के हौसले इस कदर बुलंद हैं कि वे बिना किसी रोकटोक के मीलों अंदर तक घुसपैठ करने में कामयाब हो रहे हैं। यह घटना महज एक अवैध प्रवेश की नहीं, बल्कि पार्क की सुरक्षा में एक बड़ी सेंध है, जिससे समूचे पार्क प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवालिया निशान लग गए हैं।

3 माह पूर्व कोर एरिया में बंदूक से हुआ था चीतल का शिकार

पार्क की लचर कार्यशैली का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि यह कोई इकलौती लापरवाही नहीं है। इससे पहले माह जुलाई 2026 में पन्ना टाइगर रिजर्व की चंद्रनगर कोर रेंज के अंतर्गत आधा दर्जन से अधिक शिकारियों द्वारा एक चीतल का शिकार करने का बेहद सनसनीखेज मामला सामने आया था। हालांकि, पार्क प्रबंधन ने दबाव में आरोपियों की गिरफ्तारी का दावा तो कर दिया, लेकिन इस गंभीर घटना में प्रयुक्त मुख्य हथियार (बंदूक) आज तक बरामद नहीं की जा सकी। इस घटना के बमुश्किल तीन महीने के भीतर ही उसी चंद्रनगर कोर रेंज में अपराधियों का इस तरह पूरी तैयारी के साथ मेटल डिटेक्टर और जीपीएस लेकर अंदर तक घुस जाना यह चीख-चीख कर कह रहा है कि मैदानी अमला अपनी ड्यूटी निभाने में पूरी तरह विफल साबित हो रहा है।

गढ़ा धन खोजने की दूसरी बड़ी घटना

पार्क क्षेत्र में गढ़ा धन खोदने के लिए अवैध रूप से प्रवेश करने की यह दूसरी बड़ी और चिंताजनक घटना है। इससे पहले लगभग 2 वर्ष पूर्व भी पन्ना टाइगर रिजर्व की मड़ला रेंज के अंतर्गत इसी तरह गढ़ा धन खोदने की कोशिश का मामला सामने आने पर जबरदस्त हड़कंप मचा था। उस दौरान मड़ला रेंज की बिलैया बीट के महिलन सेहा इलाके से मेटल डिटेक्टर जैसे साजो-सामान के साथ 3-4 व्यक्तियों को पकड़ा गया था। बार-बार इस तरह की घटनाओं का दोहराया जाना यह बताता है कि पार्क प्रबंधन पिछली गलतियों से सबक सीखने के बजाय हाथ पर हाथ धरे बैठा है।

पार्क प्रबंधन के जवाबों से खड़े हुए संदेह

पन्ना टाइगर रिजर्व के उप संचालक वीरेन्द्र पटेल।
हैरानी की बात तो यह है कि इस गंभीर घटना की जानकारी पार्क प्रबंधन द्वारा मीडिया या आम जनता को तब दी गई जब छतरपुर जिले के स्थानीय अखबारों और मीडिया में खबरें प्रमुखता से प्रकाशित होने लगीं। जब इस मामले में पन्ना टाइगर रिजर्व के उप संचालक बीरेंद्र कुमार पटेल से संपर्क किया गया, तो उनके पास कई बुनियादी और महत्वपूर्ण सवालों के कोई संतोषजनक जवाब नहीं थे। पकड़े गए आरोपियों की संख्या को लेकर भी असमंजस की स्थिति है। जहां चर्चाएं हैं कि गढ़ा धन खोदने आए इस गिरोह में कुल 8 से 10 लोग शामिल थे, वहीं पार्क प्रबंधन ने महज 04 लोगों को ही गिरफ्तार करने की बात कही है। जब उप संचालक श्री पटेल से पूछा गया कि अन्य संदिग्ध कहां हैं, तो वे कोई स्पष्ट संतोषजनक उत्तर नहीं दे सके। इसके अलावा, पूछताछ के नाम पर प्रबंधन क्या कर रहा है और आरोपी गढ़े धन की तलाश किस विशिष्ट स्थान पर करने आए थे, इन सवालों पर भी अधिकारी चुप्पी साधते नजर आए।

कोर्ट के आदेश पर जेल भेजे गए आरोपी

पन्ना टाइगर रिजर्व का मड़ला ग्राम में स्थित प्रवेश द्वार। (फाइल फोटो)
पन्ना टाइगर रिजर्व के चंद्रनगर परिक्षेत्र की राजगढ़ बीट (कोर क्षेत्र) में अवैध रूप से प्रवेश कर गढ़ा धन की खोज कर रहे इस चार सदस्यीय गिरोह को दिनांक 05 अक्टूबर 2026 को पकड़ा गया। आरोपियों के विरुद्ध वन्यजीव (संरक्षण) अधिनियम, 1972 की सुसंगत धाराओं के अंतर्गत वन अपराध प्रकरण (पी.ओ.आर.) पंजीबद्ध किया गया है। पन्ना टाइगर रिजर्व के कार्यालय क्षेत्र संचालक द्वारा जारी प्रेस विज्ञप्ति के अनुसार चारों आरोपियों को माननीय न्यायालय, राजनगर में प्रस्तुत किया गया, जहां से न्यायालय के आदेशानुसार सभी को न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेज दिया गया है। पकड़े गए आरोपियों में- बिहारी पटेल पिता महादेव पटेल 35 वर्ष, निवासी ग्राम टपरियन, तहसील राजनगर, जिला छतरपुर मध्य प्रदेश, चंद्रिका प्रसाद तिवारी पिता केशव दास तिवारी 42 वर्ष, निवासी इंद्रपुरी कॉलोनी, पन्ना, मध्य प्रदेश, छोटेलाल राजपूत पिता शारदा राजपूत 46 वर्ष, निवासी ग्राम तिंदवारा, तहसील बांदा, जिला बांदा, उत्तर प्रदेश और ओम नरेंद्र कोरी पिता कामता प्रसाद कोरी 26 वर्ष, निवासी ग्राम मुरारपुर, तहसील नरैनी, जिला बांदा, उत्तर प्रदेश शामिल हैं।
उल्लेखनीय है कि यह पूरी घटना चंद्रनगर रेंज की राजगढ़ बीट से जुड़ी है। इतिहास के पन्नों में राजगढ़ का यह इलाका पन्ना के बुंदेली शासकों के दौर में एक अहम केंद्र रहा है, जहाँ प्राचीन राजमहल स्थित है जो अब हेरिटेज होटल में तब्दील हो चुका है। ऐतिहासिक धरोहरों के इस क्षेत्र में इस तरह की गतिविधियां सुरक्षा प्रबंधों की पोल खोलती हैं।

…तो फिर दोहराया जा सकता है वर्ष 2009 का काला दौर

फाइल फोटो।
पन्ना टाइगर रिजर्व में आज लगभग एक सैकड़ा बाघ और अनगिनत वन्यजीव मौजूद हैं। लेकिन शिकार की इन वारदातों और गंभीर आपराधिक लापरवाहियों के चलते यह वही पार्क है जो पूर्व में लचर मॉनिटरिंग और सुरक्षा कमियों के कारण वर्ष 2009 में पूरी तरह बाघ विहीन हो चुका है। यदि वर्तमान में मिल रहे इन चिंताजनक संकेतों से सबक नहीं सीखा गया और त्वरित कड़े कदम नहीं उठाए गए, तो यह कहना अतिश्योक्तिपूर्ण न होगा कि पन्ना पार्क एक बार फिर बाघ विहीन होने के कगार पर पहुंच सकता है। समय की मांग है कि शासन स्तर पर इस पूरे लचर प्रबंधन की उच्चस्तरीय जांच कराई जाए और दोषियों पर सख्त कार्रवाई हो, अन्यथा पन्ना की शान कहे जाने वाले इन बेजुबानों का वजूद एक बार फिर गहरे संकट में पड़ जाएगा।
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पन्ना पुलिस में थानों के स्तर से उलट पदस्थापना! टीआई संभाल रहे एसआई स्तर के थाने, एसआई के हाथ टीआई स्तर की कमान

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पुलिस अधीक्षक कार्यालय पन्ना। (फाइल फोटो)
  • सुनवानी-मड़ला में निरीक्षक थाना प्रभारी, गुनौर-देवेंद्रनगर-शाहनगर में एसआई को जिम्मेदारी

  • पदस्थापनाओं के आधार को लेकर पुलिस महकमे के अंदर-बाहर चर्चाएं तेज

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में थाना प्रभारियों की हालिया पदस्थापना को लेकर पुलिस महकमे में चर्चाओं का दौर तेज है। उपलब्ध पदस्थापना सूची में थानों के स्वीकृत स्तर और वहां तैनात थाना प्रभारी के पद के बीच अंतर दिखाई दे रहा है। एसआई स्तर के सुनवानी और मड़ला थानों में निरीक्षक स्तर के अधिकारियों को थाना प्रभारी बनाया गया है, जबकि टीआई स्तर के गुनौर, देवेंद्रनगर और शाहनगर थानों की कमान उप निरीक्षक स्तर के अधिकारियों को सौंपी गई है। इसी अंतर को लेकर अब पन्ना पुलिस की पदस्थापना व्यवस्था और प्रशासनिक निर्णयों पर सवाल उठ रहे हैं। हालांकि थाना प्रभारी की नियुक्ति पुलिस अधीक्षक के प्रशासनिक अधिकार क्षेत्र में आती है, इसलिए केवल अधिकारी के पद और थाने के स्तर में अंतर को अपने आप में नियमों का उल्लंघन नहीं माना जा सकता। सवाल इस बात को लेकर है कि थानों की श्रेणी और अधिकारियों की उपलब्धता के बावजूद मौजूदा पदस्थापनाओं के लिए कौन-सा प्रशासनिक आधार अपनाया गया है।

सुनवानी-मड़ला में टीआई, बड़े थानों में एसआई

उपलब्ध सूची के अनुसार सुनवानी थाना एसआई स्तर का है, लेकिन इसकी कमान निरीक्षक रतिराम प्रजापति को दी गई है। इसी तरह मड़ला थाने, जिसे एसआई स्तर का बताया गया है, में निरीक्षक बखत सिंह थाना प्रभारी हैं। इसके उलट गुनौर थाना टीआई स्तर का है, जहां उप निरीक्षक बलबीर सिंह प्रभारी हैं। देवेंद्रनगर थाना भी टीआई स्तर का बताया गया है और यहां उप निरीक्षक संतोष यादव को जिम्मेदारी दी गई है। वहीं शाहनगर थाने की कमान उप निरीक्षक रवि सिंह जादौन के पास है।

पदस्थापना का यह पैटर्न क्यों चर्चा में?

पुलिस थानों की संवेदनशीलता, क्षेत्रफल, अपराध का स्वरूप, कानून-व्यवस्था की जिम्मेदारी और कार्यभार के लिहाज से अलग-अलग प्रशासनिक व्यवस्थाएं होती हैं। ऐसे में थाने के स्वीकृत स्तर और प्रभारी के पद में अंतर होने पर यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि क्या संबंधित थाने के लिए उपलब्ध वरिष्ठता और पद के आधार पर कोई विशेष प्रशासनिक आवश्यकता मानी गई है या फिर यह सामान्य पदस्थापना नीति का हिस्सा है? खास बात यह भी है कि दूसरी ओर निरीक्षक हरवचन सिंह कुड़ापे, गिरिजाशंकर वाजपेई पुलिस लाइन में संबद्ध बताए जा रहे हैं, जबकि मैदानी थानों की कमान एसआई स्तर के अधिकारियों को दी गई है। इससे विभागीय हलकों में अधिकारियों के पदस्थापन और उपलब्ध मानव संसाधन (पुलिस बल) के उपयोग को लेकर चर्चा हो रही है।

तीन एसडीओपी के एक साथ तबादले ने बढ़ाई चर्चा

इसी बीच जिले के तीन एसडीओपी के एक साथ तबादले का घटनाक्रम भी पुलिस महकमे में चर्चा का विषय बना हुआ है। पन्ना जिले में एसडीओपी के चार पद- पन्ना, पवई, अजयगढ़ और गुनौर में स्वीकृत हैं, जिनमें गुनौर का पद पहले से रिक्त था। तीन अधिकारियों के एक साथ तबादले के बाद पुलिस प्रशासन में इसे लेकर अलग-अलग चर्चाएं हैं। कुछ हलकों में अधिकारियों और पुलिस अधीक्षक के बीच कथित तालमेल को लेकर बातें कही जा रही हैं, लेकिन इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे तथ्य के बजाय विभागीय चर्चाओं के रूप में ही देखा जाना चाहिए।

पहले भी विवादों में रही पुलिस कप्तान की कार्यप्रणाली

पन्ना पुलिस अधीक्षक निवेदिता नायडू की कार्यप्रणाली एवं निर्णयों को लेकर इससे पहले भी कई विवाद सामने आए हैं। मड़ला क्षेत्र में वाहन चेकिंग के दौरान एक सेवानिवृत्त डीएसपी और पुलिस के बीच हुए विवाद के बाद मामला प्रदेश स्तर तक चर्चा में आया था। मड़ला में वाहन चैकिंग के दौरान सीट बेल्ट नहीं लगाने को लेकर स्थानीय पुलिस और एक सेवानिवृत्त डीएसपी के बीच तीखी नोंकझोंक के वीडियो वायरल हुए थे। इस मामले में डीएसपी के विरुद्ध अपराध पंजीबद्ध किए जाने को लेकर सेवानिवृत्त पुलिस अधिकारियों की ओर से कड़ा विरोध दर्ज कराया गया था। यह घटनाक्रम प्रदेश स्तर पर मुद्दा बना और आईपीएस अधिकारी श्रीमती नायडू के खिलाफ डीजीपी से लेकर मुख्यमंत्री के नाम ज्ञापन सौंपे गए थे। इसके अलावा हाल के महीनों में पुलिस कार्रवाई और थाना स्तर की कार्यप्रणाली से जुड़े अन्य आरोप भी सार्वजनिक हुए हैं।
अब नई पदस्थापनाओं ने एक बार फिर पन्ना पुलिस में थाना प्रभारियों की नियुक्ति के मानदंड को चर्चा के केंद्र में ला दिया है। फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब थानों का स्तर अलग-अलग निर्धारित है तो वहां टीआई और एसआई की पदस्थापना का आधार क्या है? पुलिस कप्तान की ओर से यदि इस संबंध में प्रशासनिक आवश्यकता अथवा पदस्थापना नीति स्पष्ट की जाती है तो इन चर्चाओं पर स्थिति अधिक साफ हो सकती है।
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पन्ना में खाकी फिर सवालों के घेरे में: निर्दोष को झूठे केस में फंसाने की धमकी देकर 20 हजार ऐंठने का आरोप; सवाल पूछने पर कट गया एसपी का फोन

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पुलिस अधीक्षक कार्यालय पन्ना। (फाइल फोटो)
शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में पुलिस की कार्यप्रणाली और निष्पक्षता पर एक बार फिर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। जिले के देवेन्द्रनगर थाना क्षेत्र में एक नागरिक को अवैध रूप से हिरासत में रखने, एनडीपीएस (कोरेक्स) जैसे संगीन मामलों में फंसाने की धमकी देने और रुपयों की उगाही करने का मामला सामने आया है। पीड़ित ने पुलिस अधीक्षक कार्यालय पहुंचकर लिखित शिकायत दर्ज कराई है। चौंकाने वाली बात यह है कि जब इस गंभीर मामले में पुलिस का पक्ष जानने के लिए पन्ना एसपी से संपर्क किया गया, तो उन्होंने आरोपों पर बात करने के बजाय फोन काट दिया।

क्या है पूरा मामला?

पन्ना में पुलिस अधीक्षक कार्यालय के बाहर पत्रकारों को अपनी शिकायत की जानकारी देते हुए पीड़ित युवक राजा शुक्ला।
पीड़ित राजा शुक्ला उर्फ शैलेंद्र कुमार शुक्ला (उम्र 42 वर्ष, निवासी बड़वारा) के अनुसार, बीते 15 सितंबर की शाम करीब 6 बजे वे मकरी कुठार से अपने घर लौट रहे थे। पन्ना-सतना मार्ग पर पुलिस ने उन्हें रोककर जुआ खेलने का आरोप लगाया और देवेन्द्रनगर थाने ले आई। पीड़ित का आरोप है कि रात 11 बजे तक उन्हें थाने में बैठाकर रखा गया और एनडीपीएस एक्ट में फंसाकर जिंदगी बर्बाद करने की धमकी दी गई। शिकायत के मुताबिक, शुरुआत में बड़ी रकम मांगी गई, लेकिन अंततः थाने के एक पुलिसकर्मी लक्ष्मी यादव द्वारा कथित रूप से 20 हजार रुपये लेने के बाद ही उन्हें रिहा किया गया।
आवेदन में यह भी आरोप लगाया गया है कि उस दौरान कुल 8 लोगों को लाया गया था, जिनमें से 7 पर कार्रवाई हुई, जबकि मुख्य जुआ संचालित करने वाले एक व्यक्ति को राजनीतिक सिफारिश या पैसे के लेन-देन के बाद छोड़ दिया गया। पीड़ित ने थाने के सीसीटीवी फुटेज की जांच और दोषियों पर कार्रवाई की मांग की है।

पन्ना पुलिस पर पहले भी लग चुके हैं गंभीर आरोप

पन्ना जिले में फर्जी केस में फंसाने या वसूली के आरोप का यह पहला मामला नहीं है- मड़ला थाना मामला: तत्कालीन थाना प्रभारी उप निरीक्षक रचना पटेल और उनके अमले पर वाहन चेकिंग के दौरान गांजा रखकर वसूली करने के आरोप विभागीय जांच में सिद्ध हुए थे, जिसके बाद एसपी के आदेश पर ही मड़ला थाने में संबधितों के विरुद्ध एफआईआर दर्ज की गई थी।
अमानगंज थाना मामला: पन्ना निवासी नरेंद्र खरे पर दर्ज SC-ST एक्ट का मामला जांच में फर्जी पाया गया था, जिसके बाद तत्कालीन संवेदनशील पुलिस अधीक्षक साईं थोटा के निर्देश पर पुलिस ने खात्मा लगाने की कार्रवाई शुरू की थी।

जिम्मेदार अधिकारियों का पक्ष

फाइल फोटो।
थाना प्रभारी का दावा: आरोप निराधार और दबाव बनाने की साजिश-  मामले में देवेन्द्रनगर थाना प्रभारी संदीप यादव का कहना है- “राजा उर्फ शैलेंद्र कुमार शुक्ला के विरुद्ध थाने में जुआ एक्ट के तहत प्रकरण दर्ज है। पकड़े गए अन्य जुआरियों ने भी साथ में जुआ खेलने का जुर्म स्वीकार किया है। जुआ फड़ पर कार्रवाई का वीडियो बनाया जाता है, जो साक्ष्य के रूप में उपलब्ध है। जिस व्यक्ति पर कार्रवाई न करने का आरोप है, वह पुलिस का मुखबिर था। राजा की गतिविधियां संदिग्ध हैं और वह पुलिस पर दबाव बनाने के लिए असत्य, निराधार और मनगढ़ंत आरोप लगा रहा है।”
निष्पक्षता का सवाल: आरोपों पर जवाब देने के बजाय एसपी ने टला सवाल
पुलिस अधीक्षक कार्यालय पन्ना में दिए गए आवेदन पत्र की पावती।
इस पूरे संवेदनशील मामले, पीड़ित की शिकायत और की घटनाओं का हवाला देते हुए जब जिले की पुलिस प्रमुख एसपी निवेदिता नायडू से संपर्क कर विभाग का पक्ष जानना चाहा, तो उन्होंने शिकायत के बिंदुओं पर कोई सीधा जवाब नहीं दिया। मोबाइल पर हुई बातचीत के दौरान एसपी ने केवल इतना कहा–
“आप अगर विस्तृत जानकारी चाहते हैं तो कार्यालय आकर मुझसे समक्ष में बात करें। मोबाइल पर बात करके रिकॉर्डिंग न करें। आपके मोबाइल से जिस तरह की आवाज आ रही है उससे स्पष्ट है, आप मेरी बात रिकॉर्ड कर रहे हैं… किसी को सुनाने के लिए।”
इतना कहने के बाद, पीड़ित द्वारा लगाए गए गंभीर आरोपों और थाने में हुई कथित वसूली के संबंध में कोई आधिकारिक वक्तव्य दिए बिना ही उन्होंने कॉल समाप्त कर दिया।
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बिजली का रोना-बिल भुगतान पर चुप्पी: पन्ना जिले में उपभोक्ताओं पर 207 करोड़ बकाया, हर महीने बिलिंग के मुकाबले 50% वसूली

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पन्ना में सतना नाका के समीप एमपीईबी कॉलोनी में स्थित कार्यालय, अधीक्षण अभियंता, मध्य प्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड।
  • कुल सप्लाई में सिर्फ 70 प्रतिशत की बिलिंग, 30 फीसदी बिजली लाइन लॉस में जाने का कंपनी का दावा

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्य प्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड अंतर्गत आने वाले पन्ना जिले में बिजली की अघोषित कटौती, लो वोल्टेज और आपूर्ति से जुड़ी शिकायतें आम हैं। ग्रामीण और आंचलिक क्षेत्रों में तो बिजली की समस्या को लेकर उपभोक्ता आए दिन अपनी परेशानी बताते हैं। बिजली आज जीवन की बुनियादी जरूरत है, इसलिए आपूर्ति में थोड़ी भी गड़बड़ी लोगों की दिनचर्या को प्रभावित करती है। लेकिन बिजली व्यवस्था की इस तस्वीर का एक दूसरा पहलू भी है, जिस पर अपेक्षाकृत कम चर्चा होती है। मध्य प्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड के पन्ना वृत्त में बिजली उपभोक्ताओं पर करीब 207 करोड़ रुपये के बिल बकाया हैं, जबकि कंपनी हर महीने जितनी बिजली की बिलिंग करती है, उसकी तुलना में वसूली लगभग आधी ही हो पा रही है।
यहां यह समझना भी जरूरी है कि 207 करोड़ रुपये का पूरा बकाया किसी एक श्रेणी या केवल घरेलू उपभोक्ताओं का नहीं है। इसमें घरेलू उपभोक्ताओं के साथ सरकारी विभाग, जल प्रदाय संस्थाएं, व्यवसायिक उपभोक्ता और कृषि कनेक्शन भी शामिल हैं। दूसरी ओर, कंपनी के अनुसार जिले में बिजली की कुल सप्लाई में करीब 30 से 32 प्रतिशत हिस्सा लाइन लॉस में चला जाता है। इसमें बिजली चोरी के साथ तकनीकी और अन्य कारण भी शामिल हैं। यानी बिजली की समस्या को केवल उपभोक्ता या केवल विद्युत कंपनी के नजरिए से देखने के बजाय उपलब्ध आंकड़ों के दोनों पहलुओं को समझना जरूरी है।

विभिन्न श्रेणी के 2 लाख से अधिक उपभोक्ता

पन्ना वृत्त के अंतर्गत पन्ना और पवई दो विद्युत संभाग आते हैं और दोनों की भौगोलिक सीमा पूरा पन्ना जिला है। जिले में सभी श्रेणियों को मिलाकर करीब 2 लाख 8 हजार विद्युत उपभोक्ता हैं। इन उपभोक्ताओं तथा विभिन्न संस्थागत श्रेणियों पर कुल करीब 207 करोड़ रुपये की विद्युत बिल राशि लंबित है। श्रेणीवार आंकड़ों के अनुसार घरेलू उपभोक्ताओं पर करीब 140 करोड़ रुपये का बकाया है। इसके अलावा सरकारी विभागों पर करीब 8 करोड़, जल प्रदाय करने वाली संस्थाओं पर करीब 45 करोड़, व्यवसायिक उपभोक्ताओं पर करीब 4 करोड़ और कृषि कार्य के लिए लिए गए कनेक्शनों पर करीब 6 करोड़ रुपये की राशि लंबित है। कंपनी द्वारा समय-समय पर बकाया बिलों के भुगतान के लिए समाधान योजना भी चलाई जाती है। इन योजनाओं में उपभोक्ताओं को विभिन्न शर्तों के तहत राहत और छूट देने का प्रावधान रहता है। इसके बावजूद बकाया राशि में अपेक्षित कमी नहीं आ रही है।
हर महीने 10 करोड़ रुपये और बढ़ रहा बकाया
फाइल फोटो।
विद्युत कंपनी के अनुसार पन्ना जिले में प्रतिदिन औसतन करीब 18 लाख यूनिट बिजली की खपत होती है। महीने में बिजली की कुल सप्लाई की तुलना में करीब 70 प्रतिशत यूनिट की ही बिलिंग हो पा रही है, जबकि करीब 30 से 32 प्रतिशत बिजली लाइन लॉस में चली जाती है। लाइन लॉस का मतलब यह नहीं है कि उपभोक्ता 100 प्रतिशत बिजली का इस्तेमाल कर रहे हैं और कंपनी केवल 70 प्रतिशत की बिलिंग कर रही है। सप्लाई की गई बिजली का एक हिस्सा तकनीकी खराबियों, लाइन की स्थिति, ट्रांसफॉर्मर संबंधी नुकसान, बिजली चोरी तथा अन्य कारणों से वितरण प्रणाली में ही दर्ज नहीं हो पाता। विद्युत कंपनी इसी अंतर को लाइन लॉस के रूप में दर्ज करती है। राजस्व वसूली की स्थिति भी कंपनी के लिए चिंता का विषय है। जिले में औसत मासिक बिलिंग करीब 20 करोड़ रुपये होती है, लेकिन इसके मुकाबले वसूली बमुश्किल 50 प्रतिशत के आसपास रहती है।
अगस्त 2026 में जिले में 18 करोड़ रुपये से अधिक की बिलिंग हुई, जबकि उपभोक्ताओं और अन्य बकायादारों से करीब 9 करोड़ रुपये की वसूली हो सकी। इसी तरह अप्रैल से अगस्त 2026 तक पांच महीनों में करीब 103 करोड़ रुपये की बिलिंग हुई, लेकिन इसकी तुलना में लगभग 51 करोड़ रुपये ही वसूल किए जा सके। इस तरह हर महीने चालू बिलिंग और वसूली के बीच करीब 10 करोड़ रुपये का अंतर बना रह रहा है। इसका सीधा असर पहले से लंबित बकाया राशि पर पड़ रहा है और जिले का कुल बकाया लगातार बढ़ रहा है।

घरेलू उपभोक्ताओं पर सबसे ज्यादा देनदारी

पन्ना जिले के कुल बकाये में घरेलू उपभोक्ताओं की हिस्सेदारी सबसे अधिक है। करीब 140 करोड़ रुपये का बकाया घरेलू उपभोक्ताओं पर बताया गया है। हालांकि इसका अर्थ यह नहीं है कि बिजली की आपूर्ति से जुड़ी शिकायतों को केवल बकाया बिल से जोड़कर देखा जाए। उपभोक्ताओं की आपूर्ति संबंधी शिकायतें और विद्युत कंपनी की राजस्व वसूली दो अलग-अलग मुद्दे हैं। फिर भी नियमित बिल भुगतान वितरण व्यवस्था के वित्तीय प्रबंधन का महत्वपूर्ण हिस्सा है। यदि बिलिंग के मुकाबले वसूली लगातार कम रहती है और बकाया बढ़ता जाता है तो कंपनी के लिए बिजली खरीद, वितरण व्यवस्था के संचालन और अन्य खर्चों का प्रबंधन चुनौतीपूर्ण होता है।

बिल पर सब्सिडी योजना के बावजूद बकाया

फाइल फोटो।
किफायती तरीके से बिजली का उपयोग करने वाले घरेलू उपभोक्ताओं को सरकार की ओर से बिजली बिल में सब्सिडी का लाभ भी दिया जाता है। अटल गृह ज्योति योजना के तहत पात्र उपभोक्ताओं को निर्धारित सीमा तक की खपत पर राहत मिलती है। 100 यूनिट तक की खपत वाले पात्र उपभोक्ताओं से अधिकतम 100 रुपये तक का बिल लिए जाने का प्रावधान है, जबकि शेष राशि सरकार सब्सिडी के रूप में वहन करती है। यदि किसी पात्र उपभोक्ता की मासिक खपत 100 से 150 यूनिट के बीच है तो पहले 100 यूनिट के लिए निर्धारित राशि और इसके बाद की खपत का भुगतान निर्धारित टैरिफ के अनुसार करना होता है। इसके बावजूद घरेलू श्रेणी में करीब 140 करोड़ रुपये का बकाया होना कंपनी के लिए बड़ी चुनौती है। समय पर बिल भुगतान नहीं होने से यह राशि आगे बढ़ती जाती है और अंततः कुल बकाया का बोझ बढ़ता है।

अब बड़े बकायादारों पर होगी सख्ती

अशोक कुमार निकोसे, अधीक्षण अभियंता, मध्य प्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड, वृत्त पन्ना।
मध्य प्रदेश पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड, (MPPKVVCL) पन्ना वृत्त के अधीक्षण अभियंता अशोक कुमार निकोसे ने उपभोक्ताओं से हर महीने निर्धारित समय पर बिजली बिल का भुगतान करने की अपील की है। उन्होंने कहा कि बकाया राशि लगातार बढ़ने के कारण कंपनी को वसूली के लिए सख्त कदम उठाने पड़ सकते हैं। उन्होंने बताया कि यदि बड़े बकायादारों ने जल्द लंबित राशि जमा नहीं की तो उनके विद्युत कनेक्शन विच्छेद किए जा सकते हैं। इसके अलावा कंपनी के अधिकारी और कर्मचारी बकायादारों के घर और प्रतिष्ठानों तक पहुंचकर भुगतान के लिए समझाइश देंगे। आवश्यकता के अनुसार अन्य कदम भी उठाए जाएंगे।
फिलहाल पन्ना जिले की बिजली व्यवस्था के सामने चुनौती दो स्तरों पर है- एक ओर उपभोक्ताओं को निर्बाध और बेहतर बिजली आपूर्ति की अपेक्षा है, तो दूसरी ओर विद्युत कंपनी को लाइन लॉस कम करने के साथ करीब 207 करोड़ रुपये के पुराने बकाये और हर महीने बनने वाले नए अंतर की वसूली करनी है। आने वाले दिनों में कंपनी की कार्रवाई और उपभोक्ताओं के भुगतान से यह तय होगा कि बढ़ते बकाये पर कितना अंकुश लग पाता है।
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