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संघर्ष के बीच डूब प्रभावितों को बड़ी राहत: केन-बेतवा लिंक समेत 3 सिंचाई परियोजनाओं के पुनर्वास के लिए 202.50 करोड़ रुपये अतिरिक्त मंजूर

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पन्ना एवं छतरपुर जिले के केन-बेतवा लिंक परियोजना, रूंज मध्यम सिंचाई परियोजना और मझगांव मध्यम सिंचाई परियोजना डूब प्रभावित परिवारों का जारी है आंदोलन।

*     केबीएलपी अंतर्गत 8 ग्रामों के 313 नए परिवार विशेष विस्थापन पुनर्वास पैकेज में शामिल

*     रूंज और मझगांय परियोजनाओं के प्रत्येक विस्थापित परिवार को मिलेगा 7.50 लाख रुपये का अतिरिक्त अनुदान

*     लंबे समय से चल रहे आंदोलन के बीच मंत्रि-परिषद का बड़ा फैसला

*     पन्ना जिले के हजारों डूब प्रभावित परिवारों को मिलेगा सीधा लाभ

शादिक खान, पन्ना/भोपाल।(www.radarnews.in) केन-बेतवा लिंक परियोजना (KBLP), रूंज मध्यम सिंचाई परियोजना और मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना से प्रभावित हजारों डूब प्रभावित परिवारों के लंबे संघर्ष के बीच गत दिवस मध्यप्रदेश सरकार ने बड़ा फैसला लिया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की अध्यक्षता में हुई मंत्रि-परिषद की बैठक में तीनों परियोजनाओं के पुनर्वास एवं विस्थापन के लिए 202 करोड़ 50 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि मंजूर की गई। इस अतिरिक्त राशि में केन-बेतवा लिंक परियोजना के लिए 39 करोड़ 12.50 लाख रुपये, रूंज मध्यम सिंचाई परियोजना के लिए 54 करोड़ 75 लाख रुपये तथा मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना के लिए 108 करोड़ 75 लाख रुपये के विशेष पुनर्वास पैकेज शामिल हैं। यह निर्णय ऐसे समय आया है, जब पन्ना और छतरपुर जिले के प्रभावित ग्रामीण उचित मुआवजा और समान पुनर्वास पैकेज की मांग को लेकर जय किसान संगठन के बैनर तले युवा समाजसेवी अमित भटनागर के नेतृत्व में चरणबद्ध आंदोलन कर रहे हैं। वर्तमान में भी आंदोलन जारी है। ऐसे में क्षेत्र में इस फैसले को डूब प्रभावितों के लंबे संघर्ष की महत्वपूर्ण उपलब्धि के रूप में देखा जा रहा है।
मंत्रि-परिषद की बैठक में प्रस्तुत प्रस्तावों को चर्चा को के बाद स्वीकृति प्रदान की गई।
मंत्रि-परिषद ने केन-बेतवा लिंक परियोजना के अंतर्गत पन्ना जिले के आठ डूब प्रभावित गांवों के लिए पुनर्वास नीति में महत्वपूर्ण संशोधन करते हुए कट-ऑफ तिथि बढ़ाने का निर्णय लिया है। पहले कृषि भूमि अधिग्रहण के लिए 21 जनवरी 2022 (भू-अर्जन अधिनियम की धारा-11 के प्रकाशन की तिथि) को कट-ऑफ मानकर 1,890 प्रभावित परिवारों को पुनर्वास पैकेज में शामिल किया गया था। बाद में आबादी भूमि एवं निजी मकानों के लिए धारा-11 का प्रकाशन 15 मार्च 2024 को हुआ। प्रभावित ग्रामीणों और जनप्रतिनिधियों की लंबे समय से यह मांग थी कि आबादी भूमि एवं मकानों के पुनर्वास के लिए 15 मार्च 2024 को ही आधार माना जाए। मंत्रि-परिषद ने इस मांग को स्वीकार करते हुए आबादी भूमि एवं मकानों के लिए 15 मार्च 2024 को नई कट-ऑफ तिथि मंजूर कर दी है। इसके परिणामस्वरूप 313 नए प्रभावित परिवार भी विशेष पुनर्वास पैकेज के दायरे में आ जाएंगे। इसके लिए 39 करोड़ 12.50 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि स्वीकृत की गई है। अब केन-बेतवा लिंक परियोजना के विशेष पुनर्वास पैकेज पर कुल स्वीकृत व्यय बढ़कर 439 करोड़ 3.25 लाख रुपये हो जाएगा।
मंत्रि-परिषद ने रूंज मध्यम सिंचाई परियोजना से प्रभावित 730 डूब क्षेत्र प्रभावित परिवारों को भी बड़ी राहत दी है। पहले इन परिवारों के लिए 5 लाख रुपये प्रति परिवार की एकमुश्त पुनर्वास सहायता स्वीकृत थी। डूब प्रभावितों के हित एवं परियोजना के क्रियान्वयन के दृष्टिगत अब केन-बेतवा लिंक परियोजना के समान पुनर्वास पैकेज देने के उद्देश्य से प्रत्येक परिवार को 7.50 लाख रुपये अतिरिक्त विशेष अनुदान देने का निर्णय लिया गया है। इसके लिए 54 करोड़ 75 लाख रुपये की अतिरिक्त राशि मंजूर की गई है। यह राशि रुंज मध्यम सिंचाई परियोजना के लिए प्रशासकीय स्वीकृति राशि 269 करोड़ 79 लाख रुपये के अतिरिक्त होगी।
इसी प्रकार मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना के 1,450 विस्थापित परिवारों को भी बड़ी राहत मिली है। पहले यहां भी प्रति परिवार 5 लाख रुपये की पुनर्वास सहायता निर्धारित थी। पहले यहां भी प्रति परिवार 5 लाख रुपये की पुनर्वास सहायता निर्धारित थी। डूब प्रभावितों के हित एवं परियोजना के क्रियान्वयन के दृष्टिगत अब प्रत्येक पात्र परिवार को 7.50 लाख रुपये अतिरिक्त विशेष पुनर्वास सहायता दी जाएगी। इसके लिए 108 करोड़ 75 लाख रुपये की मंजूरी दी गई है। यह राशि मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना के ‍लिए भूमि एवं परिसंपत्ति अधिग्रहण के लिए कुल स्वीकृत राशि 364 करोड़ 56 लाख रुपये के अतिरिक्त होगी।
उल्लेखनीय है कि केन-बेतवा लिंक परियोजना, रूंज मध्यम सिंचाई परियोजना और मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना से प्रभावित पन्ना एवं छतरपुर जिले के हजारों ग्रामीण लंबे समय से समान पुनर्वास पैकेज, उचित मुआवजा और विस्थापन संबंधी मांगों को लेकर आंदोलनरत हैं। जय किसान संगठन के नेतृत्व में प्रभावित परिवार लगातार चरणबद्ध आंदोलन कर रहे हैं। आंदोलन के दौरान प्रमुख मांगों में केन-बेतवा परियोजना की कट-ऑफ तिथि बढ़ाना तथा रूंज एवं मझगांय परियोजनाओं के प्रभावित परिवारों को भी केन-बेतवा परियोजना के समान 12.50 लाख रुपये प्रति परिवार के पुनर्वास पैकेज का लाभ देना शामिल रहा है।
इसी आंदोलन के बीच मंत्रि-परिषद का यह फैसला सामने आया है। कट-ऑफ डेट में संशोधन के कारण केन-बेतवा परियोजना के 313 नए परिवारों को विशेष पुनर्वास पैकेज का लाभ मिलेगा, जबकि रूंज और मझगांय परियोजनाओं के हजारों विस्थापित परिवारों को भी अतिरिक्त आर्थिक सहायता प्राप्त होगी। हालांकि आंदोलनकारी संगठनों का कहना है कि उनकी अन्य लंबित मांगों के समाधान तक आंदोलन जारी रहेगा। वहीं क्षेत्र में इस निर्णय को डूब प्रभावित परिवारों के लंबे संघर्ष की एक महत्वपूर्ण उपलब्धि माना जा रहा है।
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MP News: दवा एजेंसियों की आड़ में नशे का कारोबार? 1.34 लाख बोतल ऑनरेक्स कफ सिरप का हिसाब नहीं, दो एजेंसियां सील

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खाद्य एवं औषधि प्रशासन विभाग की टीम ने बागरी एजेंसी में कफ सीरप खरीदी एवं बिक्री की जांच उपरांत एजेंसी को सील कर दिया।

*    पन्ना की दो एजेंसियों ने महज 2-3माह में रिकॉर्ड मात्रा में खरीदा कफ सिरप

*    बिक्री के दस्तावेज और प्रिस्क्रिप्शन रिकॉर्ड नहीं मिले

*    जांच के दौरान एक एजेंसी संचालक प्रतिष्ठान बंद कर परिवार सहित गायब

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में क्या थोक एवं फुटकर दवा एजेंसियों की आड़ में नशे के लिए ऑनरेक्स कफ सिरप की अवैध आपूर्ति का नेटवर्क संचालित हो रहा था? खाद्य एवं औषधि प्रशासन की विशेष जांच में सामने आए तथ्य इस आशंका को बल देते नजर आ रहे हैं। जिले की दो दवा एजेंसियों द्वारा महज दो से तीन माह के भीतर लगभग 1 लाख 34 हजार बोतल ऑनरेक्स कफ सिरप खरीदे जाने के बावजूद उसकी बिक्री अथवा वितरण से संबंधित अनिवार्य अभिलेख और चिकित्सकीय प्रिस्क्रिप्शन रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं किया जा सका। जांच के तीसरे दिन एक एजेंसी का संचालक प्रतिष्ठान बंद कर परिवार सहित गायब मिला, जिसके बाद दोनों एजेंसियों को नियमानुसार सीलबंद कर दिया गया। मामले में वैधानिक कार्रवाई जारी है।
नियंत्रक, खाद्य एवं औषधि प्रशासन, मध्यप्रदेश, भोपाल के निर्देश तथा पन्ना कलेक्टर के मार्गदर्शन में वरिष्ठ कार्यालय भोपाल द्वारा गठित विशेष जांच दल ने 3 से 5 जुलाई 2026 तक जिले में व्यापक जांच अभियान चलाया। सूत्रों के अनुसार पन्ना जिले में कफ सिरप के नियमविरुद्ध वितरण और संभावित दुरुपयोग को लेकर पहली बार इतनी व्यापक कार्रवाई की गई है। इससे जिले सहित आसपास के क्षेत्रों के दवा कारोबारियों में हड़कंप मच गया है। इस कार्रवाई की जानकारी सामने आने के बाद पन्ना जिले में भी इसकी व्यापक चर्चा है। आम लोगों का कहना है कि यदि महज दो-तीन माह के भीतर इतनी बड़ी मात्रा में ऑनरेक्स कफ सिरप खरीदा गया और उसका विधिवत बिक्री रिकॉर्ड उपलब्ध नहीं है, तो यह अत्यंत गंभीर विषय है। लोगों ने युवाओं में बढ़ती नशे की प्रवृत्ति को लेकर चिंता व्यक्त करते हुए पूरे मामले की निष्पक्ष और गहन जांच कर दोषियों के विरुद्ध कड़ी कार्रवाई की मांग की है।

45 हजार बोतलों का रिकॉर्ड नहीं दे सकी बागरी एजेंसी

जांच दल ने ग्राम कटन, तहसील गुनौर स्थित मेसर्स बागरी ड्रग एजेंसी का निरीक्षण किया। जांच के दौरान पाया गया कि एजेंसी ने पिछले लगभग एक माह में करीब 45 हजार बोतल ऑनरेक्स कफ सिरप खरीदी थीं, लेकिन उनकी बिक्री अथवा वितरण से संबंधित आवश्यक अभिलेख प्रस्तुत नहीं किए। निरीक्षण में औषधि एवं प्रसाधन सामग्री अधिनियम, 1940 तथा नियम, 1945 के विभिन्न प्रावधानों के उल्लंघन भी पाए गए। इसके आधार पर एजेंसी को तत्काल प्रभाव से सीलबंद कर दिया गया।

89 हजार बोतलों की खरीद, संचालक गायब

इसी क्रम में देवेंद्रनगर स्थित मेसर्स देवनाथ फार्मा की जांच की गई। जांच में सामने आया कि एजेंसी अपने लाइसेंस में दर्ज स्थान के बजाय दूसरे स्थान से संचालित की जा रही थी। यहां पिछले दो माह में लगभग 89 हजार बोतल ऑनरेक्स कफ सिरप खरीदे जाने का रिकॉर्ड मिला। जांच दल ने लगातार दो दिन तक अभिलेखों का परीक्षण और अन्य औषधियों की जब्ती संबंधी कार्रवाई की। तीसरे दिन जब टीम दोबारा पहुंची तो प्रतिष्ठान पर ताला लगा मिला तथा मकान मालिक एवं एजेंसी संचालक परिवार सहित गायब था। इसके बाद नियमानुसार परिसर को भी सीलबंद कर दिया गया।

आखिर 1.34 लाख बोतल गई कहां?

दोनों एजेंसियां थोक एवं फुटकर दवा विक्रेता के रूप में पंजीकृत हैं। नियमानुसार इस प्रकार की दवाओं की बिक्री और वितरण का पूरा रिकॉर्ड, संबंधित चिकित्सकीय प्रिस्क्रिप्शन तथा अन्य आवश्यक अभिलेख सुरक्षित रखना अनिवार्य होता है। लेकिन जांच के दौरान एजेंसियां इतनी बड़ी मात्रा में खरीदे गए ऑनरेक्स कफ सिरप की बिक्री अथवा वितरण का वैध रिकॉर्ड प्रस्तुत नहीं कर सकीं। ऐसे में सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि आखिर करीब 1 लाख 34 हजार बोतल ऑनरेक्स कफ सिरप किन लोगों को और किस आधार पर उपलब्ध कराया गया। यही अब जांच का सबसे महत्वपूर्ण विषय बन गया है।

नशे के रूप में दुरुपयोग की आशंका 

कफ सिरप का चिकित्सकीय उपयोग पूरी तरह वैध और आवश्यक है, लेकिन लंबे समय से यह भी सामने आता रहा है कि कुछ लोग विशेष प्रकार के कफ सिरप का नशे के रूप में दुरुपयोग करते हैं। ऐसे में ग्रामीण क्षेत्र की दो एजेंसियों द्वारा बेहद कम समय में इतनी बड़ी मात्रा में ऑनरेक्स कफ सिरप की खरीद, उसके वितरण का रिकॉर्ड उपलब्ध न होना तथा जांच के दौरान एक संचालक का प्रतिष्ठान बंद कर गायब हो जाना पूरे मामले को और गंभीर बना रहा है। इसी कारण जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि दवा वास्तविक मरीजों तक पहुंची या उसका कहीं अवैध उपयोग अथवा दुरुपयोग हुआ।

जिलेभर के दवा कारोबारियों में मचा हड़कंप

विशेष जांच दल की कार्रवाई के बाद पन्ना सहित आसपास के जिलों के दवा कारोबारियों में हड़कंप की स्थिति है। माना जा रहा है कि अब ऐसे अन्य थोक एवं फुटकर दवा प्रतिष्ठानों की भी जांच की जा सकती है, जहां नियंत्रित औषधियों की असामान्य मात्रा में खरीद-बिक्री हुई है। यदि जांच में और अनियमितताएं सामने आती हैं तो कार्रवाई का दायरा और बढ़ सकता है। इस विशेष जांच दल में पन्ना की औषधि निरीक्षक महिमा जैन, छतरपुर के औषधि निरीक्षक अजीत जैन, सतना की औषधि निरीक्षक प्रियंका चौबे तथा मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी कार्यालय, पन्ना का स्टाफ शामिल रहा।
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पन्ना: वन क्षेत्र में कथित अवैध खनन की जांच, राज्य स्तरीय उड़नदस्ता दल ने किया निरीक्षण

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भोपाल से आए वन विभाग के राज्य स्तरीय उड़नदस्ता दल द्वारा अमित साहू प्रभारी अधिकारी के नेतृत्व में अवैध खनन संबंधी शिकायत की जांच की गई।

*      उत्तर सामान्य वन मण्डल के वन परिक्षेत्र धरमपुर का मामला

*     कांग्रेस नेता की विस्तृत शिकायत पर हरकत में आया वन विभाग

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) जिले के उत्तर सामान्य वन मंडल की धरमपुर रेंज में कथित अवैध खनन और विभागीय अनियमितताओं का मामला अब राज्य स्तर तक पहुंच गया है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख के निर्देश पर वन विभाग के राज्य स्तरीय उड़नदस्ता (स्टेट लेवल फ्लाइंग स्क्वॉड) ने बीते सप्ताह पन्ना पहुंचकर 2 और 3 जुलाई को लगातार दो दिन धरमपुर वन क्षेत्र में कथित अवैध खनन से जुड़े स्थलों का सघन निरीक्षण किया। जांच दल ने वन सीमा चिन्हित कर मौके की स्थिति का परीक्षण किया और पंचनामा तैयार किए। कई माह से सुर्ख़ियों में बने वन परिक्षेत्र धरमपुर एवं अजयगढ़ की उच्च स्तरीय शिकायतों के बाद पन्ना से लेकर वन भवन भोपाल तक हलचल तेज हो गई है। जांच दल के अधिकारियों ने मीडिया में किसी भी प्रकार की टिप्पणी करने से इनकार करते हुए स्पष्ट किया कि इसके लिए वे अधिकृत नहीं है। स्थानीय कांग्रेस नेता की शिकायत पर हुई इस जांच की रिपोर्ट संभवतः इसी सप्ताह पीसीसीएफ को सौंपी जाएगी।

9 बिंदुओं की विस्तृत शिकायत

जांच के दौरान तैयार पंचनमा पर हस्ताक्षर करते हुए शिकायतकर्ता भरत मिलन पांडेय।
जानकारी के अनुसार वरिष्ठ कांग्रेस नेता भरत मिलन पांडेय ने 27 मई 2026 को प्रधान मुख्य वन संरक्षक (पीसीसीएफ) भोपाल से नौ बिंदुओं पर आधारित विस्तृत लिखित शिकायत की गई थी। शिकायत में धरमपुर वन परिक्षेत्र में अवैध खनन, वन भूमि के दुरुपयोग, वित्तीय अनियमितताओं तथा विभिन्न विकास कार्यों में भ्रष्टाचार के गंभीर आरोप लगाए गए हैं। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि नीलम कंस्ट्रक्शन एवं भगवती कंस्ट्रक्शन द्वारा वन भूमि कथित रूप से से क्रेशर लगाकर बड़े पैमाने पर अवैध खनन किया और वन एवं पर्यावरण के साथ शासन के राजस्व को भारी क्षति पहुंचाई गई। इसके अलावा शिकायत में पिष्टा क्षेत्र में भारा तालाब निर्माण की आड़ में बड़े पैमाने पर खनिज संपदा के अवैध उत्खनन का आरोप भी लगाया गया है। शिकायतकर्ता का कहना है कि तालाब निर्माण की आड़ में निकाले गए खनिज का वैधानिक लेखा-जोखा उपलब्ध नहीं है, जिसकी निष्पक्ष जांच कराई जानी चाहिए।

पौधारोपण और सड़क निर्माण कार्य भी शामिल

कांग्रेस नेता की शिकायत केवल कथित अवैध खनन तक सीमित नहीं है। इसमें तेंदूपत्ता शाखा-कर्तन कार्यों में वन समिति अध्यक्षों के कथित फर्जी हस्ताक्षर कर भुगतान निकाले जाने, वन भूमि पर अतिक्रमण की अनदेखी, बिना वैधानिक स्वीकृति ग्रामीण पहुंच मार्गों का निर्माण कराने तथा पौधारोपण क्षेत्र तैयारी कार्यों में व्यापक आर्थिक अनियमितताओं और गुणवत्ताहीन कार्य कराए जाने के आरोप भी शामिल हैं। शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया है कि अटल भूजल योजना के तहत धरमपुर रेंज में निर्मित कई जल संरचनाएं गुणवत्ता के मानकों पर खरी नहीं उतरतीं और इनमें शासकीय राशि का दुरुपयोग हुआ है। हालांकि उड़नदस्ता दल ने स्पष्ट किया कि इन कार्यों की जांच उसके अधिकार क्षेत्र में नहीं आती। शिकायतकर्ता को उक्त कार्यों की जांच हेतु विभागीय शिकायत एवं सतर्कता प्रकोष्ठ से संपर्क करने का सुझाव दिया गया।

तत्कालीन रेंजर के संरक्षण में हुई अनियमितताएं

प्रधान मुख्य वन संरक्षक भोपाल से की गई शिकायत का प्रथम पृष्ठ।
शिकायत में तत्कालीन धरमपुर रेंजर वैभव सिंह चंदेल का उल्लेख करते हुए आरोप लगाया गया है कि उनके द्वारा मैदानी वन अमले की मिलीभगत से वन संपदा के दोहन की अघोषित छूट देकर और विभागीय कार्यों में फर्जीवाड़ा करके अनुपातहीन संपत्ति अर्जित की गई। शिकायतकर्ता ने मांग की है कि पूरे प्रकरण की स्वतंत्र एवं निष्पक्ष जांच कर दोषियों के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई की जाए। इसी शिकायत को गंभीरता से लेते हुए प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख शुभरंजन सेन ने राज्य स्तरीय उड़नदस्ता दल को जांच के निर्देश दिए। इसके बाद अमित साहू प्रभारी अधिकारी के नेतृत्व में उड़नदस्ता दल ने पन्ना पहुंचकर दो दिनों तक विभिन्न स्थलों का निरीक्षण किया। जांच के दौरान उड़नदस्ता दल ने कथित अवैध खनन से जुड़े स्थलों का निरीक्षण कर वन सीमा का चिन्हांकन कराया तथा मौके की वास्तविक स्थिति के आधार पर पंचनामे तैयार किए। जांच के समय धरमपुर रेंज के प्रभारी रेंजर अजय बाजपेयी, संबंधित सर्किल प्रभारी, बीटगार्ड, शिकायतकर्ता भरत मिलन पांडेय तथा स्थानीय पत्रकार भी मौजूद रहे। सूत्रों के अनुसार राज्य स्तरीय उड़नदस्ता दल अपनी जांच रिपोर्ट इसी सप्ताह अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक (संरक्षण) अमित दुबे को सौंपेगा। इसके बाद रिपोर्ट प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख के समक्ष प्रस्तुत की जाएगी। स्थानीय स्तर पर इस बात को लेकर उत्सुकता बनी हुई है कि जांच में कौन-कौन से तथ्य सामने आते हैं और उनके आधार पर आगे क्या निर्णय लिया जाता है।

भ्रष्टाचार की भेंट चढ़े विभागीय कार्य

राज्य स्तरीय उड़नदस्ता दल द्वारा वन क्षेत्र में कथित अवैध खनन की फोटोग्राफी-वीडियोग्राफी की गई।
धरमपुर और अजयगढ़ रेंज पिछले काफी समय से विभागीय कार्यों में कथित अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोपों को लेकर चर्चा में है। विशेष रूप से पौधारोपण क्षेत्र तैयारी कार्य, अटल भूजल योजना के तहत निर्मित जल संरचनाएं, वन संरक्षण से जुड़े विकास कार्य तथा अन्य निर्माण गतिविधियों को लेकर समय-समय पर गंभीर सवाल उठते रहे हैं। इन मामलों से संबंधित शिकायतें लोकायुक्त संगठन से लेकर उच्च स्तर तक पहुंचने के बाद विभागीय स्तर पर हलचल तेज हुई और अंततः दोनों रेंजों के तत्कालीन रेंजरों का स्थानांतरण भी हो गया। हालांकि स्थानांतरण के बावजूद उनके कार्यकाल में कराए गए कार्यों को लेकर उठे सवाल अभी भी पूरी तरह शांत नहीं हुए हैं। बीते कुछ महीनों में धरमपुर और अजयगढ़ रेंज में पौधारोपण क्षेत्र तैयारी कार्यों की गुणवत्ता, अटल भूजल योजना के अंतर्गत बनाए गए तालाबों की उपयोगिता तथा अन्य निर्माण कार्यों में कथित वित्तीय अनियमितताओं को लेकर सुर्खियों में हैं। इन मामलों में प्रकाशित समाचारों और उच्च स्तर पर हुई शिकायतों के बाद विभागीय अधिकारियों की कार्यप्रणाली भी सवालों के घेरे में है।

शिकायत की टाइमिंग पर भी उठ रहे सवाल

वन विभाग के राज्य स्तरीय उड़नदस्ता दल ने शिकायत में उल्लेखित कथित अवैध खनन वाले स्थलों का दो दिन तक सघन निरीक्षण किया।
धरमपुर वन परिक्षेत्र में कथित अवैध खनन और विभागीय अनियमितताओं को लेकर की गई शिकायत की टाइमिंग चर्चा का विषय बनी है। पूरे मामले कुछ माह पहले हुई वन अपराध संबंधी कार्रवाई की पृष्ठभूमि से जोड़कर देखा जा रहा है। विदित हो कि लगभग तीन माह पूर्व धरमपुर वन परिक्षेत्र के मैदानी वन अमले ने कथित रूप से वन क्षेत्र से पत्थर का अवैध परिवहन करते हुए एक ट्रैक्टर-ट्रॉली को पकड़ा था। वन विभाग का दावा था कि उक्त ट्रैक्टर-ट्रॉली कांग्रेस नेता भरत मिलन पांडेय के भाई से संबंधित थी। कार्रवाई की जानकारी मिलने पर भरत मिलन पांडेय, उनके बड़े भाई और भतीजे मौके पर पहुंच गए थे। इस दौरान वन अमले और संबंधित लोगों के बीच विवाद हुआ। विभाग का आरोप था कि विवाद के बाद ट्रैक्टर-ट्रॉली को जबरन छुड़ाकर ले जाया गया। इसके बाद वन विभाग की ओर से अजयगढ़ थाना में लिखित शिकायत करने पर पुलिस ने कई संगीन धाराओं में अपराध पंजीबद्ध किया। इस प्रकरण में पुलिस ने भरत मिलन पांडेय को जबलपुर से गिरफ्तार कर न्यायालय में पेश किया था, जहां से उन्हें न्यायिक अभिरक्षा में जेल भेजा गया। बाद में उन्हें उच्च न्यायालय से जमानत मिल गई। इस मामले में उनके भतीजे की भी गिरफ्तारी हुई थी। जेल से रिहा होने के बाद भरत मिलन पांडेय ने तत्कालीन धरमपुर रेंजर और मैदानी वन अमले के विरुद्ध विस्तृत शिकायत दर्ज कराई। वन विभाग और राजनीतिक हलकों में शिकायत को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं हैं। कुछ लोग इस वन कर्मचारियों को सबक सिखाने अथवा बदले की भावना से जोड़कर देख रहे हैं। उल्लेखनीय है कि कांग्रेस नेता भरत मिलन पांडेय और उनके परिजनों पर भी पहले भी कई बार अवैध खनन कारोबार से जुड़े होने गंभीर आरोप लग चुके हैं।
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व्यापारी पुत्र के अपहरण और फिरौती कांड का खुलासा, 3 आरोपी गिरफ्तार

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पवई थाना पुलिस टीम की अभिरक्षा में व्यापारी पुत्र का अपहरण करने वाले आरोपीगण।

*     पहले युवक को सकुशल छुड़ाया अब तीनों अपहरणकर्ताओं को हथियार समेत दबोंचा

*     सोशल मीडिया पर अमीरी का प्रदर्शन बना अपहरण की वजह

*     युवक की रील्स देखकर आरोपियों ने बनाई थी अपहरण की योजना

पन्ना।(www.radarnews.in) मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में पवई क़स्बा निवासी कपड़ा व्यापारी के 19 वर्षीय पुत्र अंशुल उर्फ कान्हा डेंगरे के अपहरण एवं फिरौती मांगने के सनसनीखेज मामले में पन्ना पुलिस ने तीन आरोपियों को गिरफ्तार कर प्रकरण का खुलासा करने का दावा किया है। पुलिस के अनुसार गिरफ्तार आरोपियों के कब्जे से घटना में प्रयुक्त एक देशी पिस्टल, दो देशी कट्टे, एक जिंदा कारतूस तथा दो मोटरसाइकिल बरामद की गई हैं। साथ ही फिरौती के रूप में भेजी गई 1.48 लाख रुपये की राशि भी आरोपी के बैंक खाते में होल्ड करा दी गई है।
गौरतलब है कि गत दिनों पवई के कपड़ा व्यापारी राजेश कुमार डेंगरे के पुत्र अंशुल उर्फ कान्हा का अपहरण कर उसके परिजनों से 10 लाख रुपये की फिरौती मांगी गई थी। घटना सामने आते ही पवई क्षेत्र सहित पूरे जिले में भय और दहशत का माहौल बन गया था। मामले को लेकर लोगों में पुलिस की कार्यप्रणाली को लेकर भी नाराजगी और चिंता देखने को मिली थी। घटना के प्रकाश में आने के बाद से ही पुलिस ने इसे चुनौती के रूप में लेते हुए एसडीओपी पवई श्रीमती भावना दांगी के मार्गदर्शन तथा थाना प्रभारी पवई निरीक्षक सुशील कुमार अहिरवार के नेतृत्व में कार्रवाई शुरू की थी। पुलिस टीम ने त्वरित प्रयास करते हुए अपहृत युवक को सकुशल दस्तयाब कर उसके परिजनों को सौंप दिया था, हालांकि उस समय आरोपी फरार होने में सफल रहे थे।
पुलिस के अनुसार इसके बाद आरोपियों की गिरफ्तारी के लिए लगातार विशेष अभियान चलाया गया। चौतरफा घेराबंदी, तकनीकी साक्ष्यों, मुखबिर सूचना तथा सतत पतारसी के आधार पर तीनों आरोपियों को गिरफ्तार कर लिया गया। पुलिस का दावा है कि पूछताछ में आरोपियों ने बताया कि अपहृत युवक सोशल मीडिया पर महंगे मोबाइल और अपनी समृद्ध जीवनशैली का प्रदर्शन करता था। इसी आधार पर उसे आर्थिक रूप से संपन्न मानते हुए अपहरण की योजना बनाई गई और उसके परिजनों से फिरौती मांगी गई।
अपहरणकर्ताओं के कब्जे से बरामद अवैध हथियारों को पुलिस ने जब्त किया।
पुलिस के मुताबिक घटना के दौरान भयवश परिजनों ने आरोपी राजकमल रजक के बैंक खाते में 1 लाख 48 हजार रुपये स्थानांतरित किए थे। साइबर सेल की सहायता से एनसीआरपी पोर्टल के माध्यम से उक्त राशि पर तत्काल होल्ड लगवा दिया गया, जिससे आरोपी रकम नहीं निकाल सके। पुलिस का कहना है कि न्यायालय के आदेश के बाद यह राशि फरियादी को वापस कराई जाएगी।
जानकारी अनुसार गिरफ्तार आरोपियों में सिमराकला निवासी 19 वर्षीय राजकमल रजक, 25 वर्षीय राजकुमार पाल तथा 18 वर्षीय शिवेंद्र सिंह शामिल हैं। तीनों को न्यायालय में पेश करने के बाद न्यायिक अभिरक्षा में उप जेल पवई भेज दिया गया है। पुलिस ने आरोपियों के कब्जे से एक देशी पिस्टल, दो देशी कट्टे, एक जिंदा कारतूस तथा घटना में प्रयुक्त दो मोटरसाइकिल जब्त करने का दावा किया है।
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48 घंटे तक मोर्चरी में क्यों रखा रहा बाघिन का शव! आखिर दो दिन बाद क्यों हुआ शवदाह?

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फाइल फोटो।

*     एनटीसीए की गाइडलाइन बनी वजह, फील्ड डायरेक्टर की मौजूदगी में पूरी हुई अंतिम प्रक्रिया

*    पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघ के हमले में हुई थी डेढ़ वर्षीय अर्धवयस्क बाघिन की मौत, पी-151 की थी संतान

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्यप्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व (पीटीआर) में बाघ के हमले में मृत अर्धवयस्क बाघिन का शवदाह उसकी मौत के करीब 48 घंटे बाद किए जाने का मामला सामने आया है। सामान्य परिस्थितियों में वन्यजीवों का पोस्टमार्टम और शवदाह (भस्मीकरण) आवश्यक औपचारिकताओं के बाद शीघ्र कर दिया जाता है, लेकिन इस मामले में मृत बाघिन का शव दो दिनों तक वन्यप्राणी चिकित्सालय की मोर्चरी के फ्रीजर में सुरक्षित रखा गया। इससे स्वाभाविक रूप से यह सवाल उठने लगा कि आखिर इस असामान्य विलंब की वजह क्या थी?
जानकारी के अनुसार मंगलवार 30 जून को पन्ना टाइगर रिजर्व की मड़ला रेंज के कंचन नाला क्षेत्र में बाघ पी-661 के साथ हुए आपसी संघर्ष (In-fighting) में लगभग डेढ़ वर्षीय अर्धवयस्क बाघिन की मौत हो गई थी। मृत बाघिन, बाघिन पी-151 की संतान थी। घटना के बाद उसका शव बरामद कर निर्धारित प्रक्रिया के तहत वन्यप्राणी चिकित्सालय की मोर्चरी में सुरक्षित रख दिया गया।

एनटीसीए की प्रक्रिया के कारण करना पड़ा इंतजार

पड़ताल में सामने आया कि शवदाह में हुई देरी की मुख्य वजह राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (एनटीसीए) की निर्धारित प्रक्रिया थी। एनटीसीए के Standard Operating Procedure (SOP) के अनुसार बाघ, तेंदुआ, चीता एवं हाथी जैसे संरक्षित वन्यजीवों की मृत्यु होने पर पोस्टमार्टम तथा शवदाह की पूरी प्रक्रिया वरिष्ठ वन अधिकारियों की उपस्थिति में कराई जाती है। सामान्यतः यह कार्रवाई संबंधित टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर (क्षेत्र संचालक) अथवा उनके समकक्ष मुख्य वन संरक्षक की निगरानी में संपन्न होती है।
संयोगवश जिस दिन बाघिन की मौत हुई, उसी समय पन्ना टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक बृजेन्द्र श्रीवास्तव सहित प्रदेश के सभी टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर एवं मुख्य वन संरक्षक स्तर के अधिकारी विभागीय बैठक में शामिल होने भोपाल गए हुए थे। बताया जाता है कि छतरपुर और रीवा वृत्त के मुख्य वन संरक्षक भी उसी बैठक में मौजूद थे। ऐसे में निर्धारित प्रक्रिया का पालन सुनिश्चित करने के लिए मृत बाघिन के शव को मोर्चरी के फ्रीजर में सुरक्षित रखा गया और वरिष्ठ अधिकारी के लौटने की प्रतीक्षा की गई। भोपाल से क्षेत्र संचालक के वापस लौटने के बाद गुरुवार 2 जुलाई को उनकी उपस्थिति में पोस्टमार्टम की शेष औपचारिकताएं पूरी की गईं तथा निर्धारित प्रक्रिया के अनुसार मृत बाघिन का अंतिम दाह संस्कार कर दिया गया।

हर पहलू की होती है वैज्ञानिक जांच

फाइल फोटो।
एनटीसीए (National Tiger Conservation Authority) की मानक प्रक्रिया के अनुसार बाघ, तेंदुआ, चीता एवं हाथी की मृत्यु होने पर पोस्टमार्टम से पहले शव का विस्तृत परीक्षण किया जाता है। इस दौरान दांत, नाखून, त्वचा, हड्डियां, मूंछ के बाल, शरीर पर मौजूद घावों की संख्या, आकार और गहराई सहित अन्य महत्वपूर्ण साक्ष्यों का परीक्षण एवं दस्तावेजीकरण किया जाता है। पूरी प्रक्रिया की वीडियोग्राफी और फोटोग्राफी कराई जाती है तथा आवश्यक नमूने संरक्षित किए जाते हैं। पोस्टमार्टम कम से कम दो अधिकृत पशु चिकित्सकों द्वारा किया जाता है। प्रक्रिया के दौरान वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों के अलावा प्रशासनिक प्रतिनिधि (तहसीलदार), स्थानीय जनप्रतिनिधि तथा अन्य अधिकृत पर्यवेक्षकों की उपस्थिति सुनिश्चित की जाती है। इसके बाद पूरी रिपोर्ट और आवश्यक विवरण एनटीसीए के निर्धारित ऑनलाइन पोर्टल पर अपलोड किए जाते हैं। पीटीआर में संभवतः यह पहला अवसर माना जा रहा है, जब किसी मृत बाघिन का शव निर्धारित प्रक्रिया के पालन के लिए लगभग 48 घंटे तक मोर्चरी के फ्रीजर में सुरक्षित रखने के बाद शवदाह किया गया।
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ग्राउंड रिपोर्ट: वन विभाग की बड़ी लापरवाही! बदइंतजामी की भेंट चढ़े 1.5 लाख से अधिक सागौन के पौधे, पत्ते झड़ने से डंठल में हो रहे तब्दील

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उत्तर वन मण्डल की धरमपुर रेंज अंतर्गत बीट भैरहा में एक स्थान पर रखे पौधे सिंचाई और छाया की व्यवस्था न होने से तेजी से सूख रहे।

*     उत्तर वन मंडल पन्ना के अजयगढ़ और धरमपुर वन परिक्षेत्र का मामला

*    जानकारी के बाद भी कार्रवाई करने के बजाए मूकदर्शक बने बड़े अफसर

*    “एक पेड़ मां के नाम” अभियान चलाने वाली सरकार क्या जिम्मेदारों के खिलाफ लेगी एक्शन?

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में वन विभाग का पौधारोपण अभियान एक बार फिर सवालों के घेरे में है। उत्तर सामान्य वन मंडल के अजयगढ़ और धरमपुर वन परिक्षेत्र में मानसून के इंतजार में रखे गए डेढ़ लाख से अधिक सागौन के पौधे बदइंतजामी और लापरवाही के कारण तेजी से सूखते नजर आ रहे हैं। अधिकांश पौधों के पत्ते पीले पड़कर झड़ चुके हैं और वे डंठल में तब्दील होते दिखाई दे रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि इस स्थिति की जानकारी एसडीओ से लेकर डीएफओ तथा मुख्य वन संरक्षक, छतरपुर तक को होने के बावजूद पौधों को बचाने के लिए प्रभावी कदम उठाने के बजाय मामला दबाने के आरोप लग रहे हैं। विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस गंभीर स्थिति पर पूरी बेशर्मी से मूकदर्शक बने हुए हैं। विडंबना यह है कि यह सब उस समय हो रहा है, जब प्रदेश सरकार पूरे प्रदेश में ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान को व्यापक स्तर पर चला रही है।
उत्तर वन मंडल पन्ना के तीनों वन परिक्षेत्रों में यदि पौधारोपण (वृक्षारोपण) कार्यों की स्थिति का तुलनात्मक आकलन किया जाए तो सबसे अधिक अव्यवस्था अजयगढ़ और धरमपुर रेंज में दिखाई देती है। धरमपुर वन परिक्षेत्र के नरदहा सर्किल में गत वर्ष किए गए पौधारोपण के हजारों पौधों को मवेशियों द्वारा चर लिए जाने का बहुचर्चित मामला अभी जांच के दायरे में ही है। इसी बीच नए पौधारोपण की तैयारियों से जुड़ी जो तस्वीरें सामने आई हैं, उन्होंने विभागीय कार्यप्रणाली पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के अनुसार अजयगढ़ और धरमपुर वन परिक्षेत्र के दर्जनभर से अधिक वन कक्षों में आगामी दिनों में रोपित किए जाने के लिए लगभग डेढ़ लाख से अधिक सागौन पौधे पहले ही संबंधित स्थलों तक पहुंचा दिए गए हैं। मानसून में विलंब के कारण ये पौधे कई दिनों से खुले आसमान अथवा अपर्याप्त छाया में रखे हुए हैं। भीषण गर्मी, तेज धूप और उमस के बीच पर्याप्त संरक्षण एवं नियमित देखभाल के अभाव में बड़ी संख्या में पौधों के पत्ते पीले पड़कर सूख रहे हैं तथा लगातार झड़ते जा रहे हैं। कई पौधे लगभग डंठल के रूप में दिखाई देने लगे हैं।
उत्तर वन मण्डल कार्यालय पन्ना। (फाइल फोटो)
स्थिति यह है कि पौधों की बदहाली की जानकारी वन विभाग के एसडीओ से लेकर डीएफओ और मुख्य वन संरक्षक तक को है। इसके बावजूद पौधों को बचाने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने के बजाय विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों पर मामले को दबाने के प्रयास के आरोप लग रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि मैदानी अमले द्वारा किए जा रहे कार्यों में कथित अनियमितताओं और वित्तीय गड़बड़ियों पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है। यही कारण है कि लगातार शिकायतें सामने आने के बावजूद अधिकांश स्थानों पर हालात जस के तस बने हुए हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि पौधों की सुरक्षा के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं- ग्रीन नेट, नियमित सिंचाई, अस्थायी छाया, पानी के परिवहन और निगरानी- इन सभी मदों के लिए परियोजना में पर्याप्त बजट उपलब्ध होने के बावजूद अनेक स्थलों पर इनके प्रभावी इंतजाम दिखाई नहीं देते। नतीजतन, करोड़ों रुपये की लागत से तैयार किया गया पौधारोपण अभियान शुरुआती चरण में ही संकट का सामना कर रहा है।
विडंबना यह भी है कि प्रदेश सरकार पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे महत्वाकांक्षी अभियान को जन-आंदोलन का स्वरूप देने का प्रयास कर रही है, जबकि दूसरी ओर उसी सरकार के अधीन वन विभाग के कुछ क्षेत्रों में पौधों की सुरक्षा और संरक्षण को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आ रही है। यदि समय रहते हालात नहीं सुधरे तो मानसून शुरू होने से पहले ही बड़ी संख्या में पौधों की वृद्धि प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

करोड़ों खर्च, फिर भी सवालों के घेरे में पौधारोपण की तैयारियां

पन्ना जिले के अजयगढ़ कस्बा में स्थित वन परिक्षेत्र अधिकारी अजयगढ़ एवं धरमपुर का कार्यालय भवन। (फाइल फोटो)
उत्तर वन मंडल पन्ना के अन्य वन परिक्षेत्रों की तरह अजयगढ़ और धरमपुर रेंज में भी वर्ष 2025-26 के पौधारोपण कार्यक्रम के लिए कई हेक्टेयर वन भूमि पर क्षेत्र तैयारी कार्य कराए गए। इन कार्यों में स्थल की साफ-सफाई, गड्ढों की खुदाई, सुरक्षा जाली, निरीक्षण पथ (आंतरिक मार्ग), भूजल संरक्षण संबंधी संरचनाएं तथा अन्य तैयारियों पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं। स्थानीय स्तर पर आरोप हैं कि इन कार्यों में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं। आरोप यह भी हैं कि कई स्थानों पर विभागीय नियमों की अनदेखी करते हुए मशीनों से कार्य कराए गए और कुल स्वीकृत राशि का बड़ा हिस्सा कथित रूप से बंदरबांट की भेंट चढ़ गया। इन आरोपों में बीटगार्ड से लेकर रेंजर, एसडीओ और डीएफओ स्तर तक की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। रिपोर्ट तैयार करने के दौरान कई ऐसे दस्तावेज और स्थानीय स्तर पर प्राप्त जानकारियां भी सामने आई हैं, जिनके आधार पर इन आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है। विचारणीय प्रश्न यह है कि जिस विभाग का दायित्व प्रदेश की वन संपदा का संरक्षण और संवर्धन करना है, वहीं यदि पौधारोपण जैसे पर्यावरणीय कार्यों में अनियमितताओं और लापरवाही के आरोप लगातार सामने आएं तो इससे सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

रोपण के इंतजार में खुले आसमान के नीचे पड़े पौधे

धरमपुर रेंज की बीट नरदहा अंतर्गत छनिहापुरवा में रोपण के रखे पौधों की सुध लेने वाला कोई नहीं।
उल्लेखनीय है कि वन परिक्षेत्र अजयगढ़ और धरमपुर में इस वर्ष प्रस्तावित पौधारोपण के लिए लगभग पखवाड़े भर पहले क्रमशः करीब 50 हजार तथा एक लाख से अधिक सागौन के पौधे संबंधित बीटों में पहुंचा दिए गए थे। मानसून की दस्तक में देरी होने के कारण ये पौधे कई दिनों से रोपण का इंतजार कर रहे हैं। इस दौरान तेज धूप, भीषण गर्मी और उमस ने उनकी स्थिति लगातार खराब कर दी है। अधिकांश स्थानों पर पौधों के पत्ते पीले पड़कर सूख रहे हैं और तेजी से झड़ रहे हैं। अपवादस्वरूप एक-दो स्थानों को छोड़ दें तो अधिकांश बीटों में नाजुक पौधों को मौसम की मार से बचाने के लिए न तो पर्याप्त छाया की व्यवस्था की गई और न ही मानक अनुरूप संरक्षण के इंतजाम दिखाई दिए।
पौधों की सुरक्षा को लेकर मैदानी वन अमले की उदासीनता उनकी ग्रोथ पर भारी पड़ती नजर आ रही है। संबंधित वन परिक्षेत्राधिकारियों की ओर से भी मौके पर प्रभावी निगरानी नहीं दिखी। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि क्षेत्र तैयारी कार्यों से जुड़े अधिकांश भुगतान पहले ही हो चुके हैं, ऐसे में पौधों की नियमित देखभाल अपेक्षित प्राथमिकता नहीं बन पाई। परिणामस्वरूप डेढ़ लाख से अधिक सागौन के पौधे भगवान भरोसे नजर आ रहे हैं। बताया जाता है कि उत्तर सामान्य वन मंडल पन्ना के डीएफओ धीरेन्द्र प्रताप सिंह द्वारा लगातार निर्देश दिए जा रहे हैं कि पौधों को ग्रीन नेट (हरी जाली) की छाया में रखा जाए, नियमित सिंचाई कराई जाए तथा उनकी सतत निगरानी सुनिश्चित की जाए। पौधारोपण परियोजना में इन व्यवस्थाओं के लिए अलग से बजट का भी प्रावधान है। इसके बावजूद कई स्थानों पर इन निर्देशों का पालन होता दिखाई नहीं दिया। मैदानी अमले द्वारा वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों की कथित अनदेखी का खामियाजा अब सीधे पौधों की स्थिति पर दिखाई दे रहा है। इसी क्रम में रडार न्यूज़ की टीम ने अजयगढ़ और धरमपुर वन परिक्षेत्र के विभिन्न पौधारोपण स्थलों का मौके पर पहुंचकर निरीक्षण किया। इस दौरान अनेक बीटों में पौधों की सुरक्षा और रखरखाव से जुड़ी गंभीर लापरवाहियां सामने आईं।

श्रमिकों के भरोसे चल रही संवेदनशील बीट

धरमपुर रेंज की बीट नरदहा अंतर्गत छनिहापुरवा में रोपण के लिए रखे पौधों की सिंचाई और छाया आदि के प्रबंध मौके पर नहीं दिखे।
वन परिक्षेत्र धरमपुर की नरदहा बीट अंतर्गत ग्राम छनिहापुरवा में सिंचाई जलाशय के समीप रोपण के इंतजार में हजारों सागौन पौधे वृक्षों की छाया में रखे मिले। निरीक्षण के दौरान यहां पौधों की नियमित सिंचाई की कोई समुचित व्यवस्था दिखाई नहीं दी। मौके पर मौजूद एक सुरक्षा श्रमिक ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि पौधों के लिए पानी तालाब से लाना पड़ता है। ऐसे में प्रतिदिन सुबह-शाम दोनों समय सिंचाई कर पाना संभव नहीं हो पाता। उन्होंने कहा कि उनकी कोशिश रहती है कि कम-से-कम दो दिन में एक बार पौधों को पानी अवश्य मिल जाए। जब उनसे पीले पड़कर सूख रहे पौधों के संबंध में पूछा गया तो उन्होंने बिना किसी लागलपेट के स्वीकार किया कि प्रतिकूल मौसम और पानी परिवहन की समुचित व्यवस्था नहीं होने से पौधों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। इसी दौरान सुरक्षा श्रमिक ने एक और महत्वपूर्ण जानकारी दी। उसके अनुसार संबंधित बीटगार्ड अर्पित रूसिया लगभग 80 किलोमीटर दूर पन्ना में निवास करते हैं। विशेष कार्य होने पर वे कुछ घंटों के लिए बीट में आते हैं, मोबाइल से निरीक्षण संबंधी कुछ तस्वीरें लेते हैं, आवश्यक निर्देश देकर शाम तक वापस लौट जाते हैं। यदि यह स्थिति सही है तो अंतर्राज्जीय सीमावर्ती इलाके में स्थित संवेदनशील बीट नरदहा की नियमित निगरानी को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

कुड़रा बीट में पानी की व्यवस्था बनी चुनौती

धरमपुर रेंज की कुड़रा बीट में पौधों को प्रचंड गर्मी से बचाने के लिए उन्हें अस्थायी झोपड़ी की छाया में रखा गया था। यह व्यवस्था अन्य कई बीटों की तुलना में बेहतर दिखाई दी, लेकिन चंबल के बीहड़ों जैसी दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यहां भी नियमित सिंचाई सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। पानी की स्थायी व्यवस्था नहीं होने से बड़ी संख्या में पौधे सूखते नजर आए। हालांकि इस बीट में एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया। स्थानीय लोगों के अनुसार बीटगार्ड राजेंद्र शाक्य स्वयं तथा उनके साथ कार्यरत सुरक्षा श्रमिक उपलब्ध संसाधनों में पौधों को बचाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। इसके बावजूद प्राकृतिक परिस्थितियां और संसाधनों की कमी उनकी मेहनत पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है।

स्थानीय दबंग को सौंप दी बीट की जिम्मेदारी!

डीएफओ समेत अन्य वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देश के बावजूद पौधों को मौसम की मार से बचाने भैरहा बीट में कोई इंतजाम नहीं किए गए।
धरमपुर रेंज की भैरहा बीट के संबंध में जांच के दौरान एक बेहद गंभीर मामला सामने आया। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि संबंधित बीटगार्ड उमंग खरे ने बीट के अधिकांश कार्य ग्राम कल्याणपुर के एक स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति को अनौपचारिक रूप से सौंप रखे हैं। यदि यह आरोप सही हैं तो यह विभागीय व्यवस्था और जवाबदेही दोनों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। भैरहा बीट के वन कक्ष पी-33, पी-37 पार्ट-1 एवं पार्ट-2 के निरीक्षण के दौरान कंटीली झाड़ियों से घिरे सुरक्षा घेरे के भीतर रोपण के लिए रखे हजारों पौधों में बड़ी संख्या में पौधे सूखे हुए मिले। कई पौधों के पत्ते पूरी तरह झड़ चुके थे और उनकी स्थिति देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कई दिनों से उन्हें पर्याप्त पानी नहीं मिला हो। आसपास रखे मिट्टी के घड़े भी खाली और सूखे पड़े थे।
इसी दौरान मौके पर मौजूद एक व्यक्ति ने स्वयं को सुरक्षा श्रमिक बताते हुए दावा किया कि पौधों को प्रतिदिन पानी दिया जाता है। हालांकि पौधों की वास्तविक स्थिति इस दावे से मेल नहीं खा रही थी। बातचीत के दौरान उस व्यक्ति के मोबाइल पर एक स्थानीय व्यक्ति का फोन आया। कुछ देर बातचीत के बाद उसने पत्रकारों से कहा कि “दाऊ साहब कह रहे हैं कि जाली बंद करनी है, आप लोग बाहर आ जाइए।” बाद में स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार पौधारोपण क्षेत्र तैयारी से जुड़े अधिकांश कार्य उसी प्रभावशाली व्यक्ति की देखरेख में कराए गए थे। गड्ढों की खुदाई, परकोलेशन पिट और परकोलेशन टैंक निर्माण में भी उसी की मशीनरी लगाए जाने की बात सामने आई। इन तथ्यों की स्वतंत्र विभागीय जांच आवश्यक प्रतीत होती है।

स्प्रिंकलर सिंचाई, लेकिन छाया के अभाव में मुरझा रहे पौधे

धरमपुर रेंज अंतर्गत बीट भसूड़ा में पौधों की सिंचाई स्प्रिंकलर से की जा रही है लेकिन छाया के इंतजाम न होने से वे सूखकर मुरझा रहे।
धरमपुर रेंज की भसूड़ा बीट में रोपण के लिए रखे पौधों की सिंचाई व्यवस्था अन्य बीटों की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई दी। गांव के पहुंच मार्ग के किनारे, रोपण क्षेत्र के प्रवेश द्वार के समीप एक गड्ढे में रखे हजारों सागौन पौधों को स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति से सुबह-शाम पानी दिया जा रहा था। दूर से देखने पर यह व्यवस्था कृत्रिम वर्षा जैसी प्रतीत हो रही थी और प्रथम दृष्टया संतोषजनक भी लगी। इसके बावजूद बड़ी संख्या में पौधों के पत्ते पीले पड़ चुके थे तथा लगातार सूखकर झड़ रहे थे। निरीक्षण के दौरान स्पष्ट हुआ कि नियमित सिंचाई के बावजूद पौधों को तेज धूप और भीषण गर्मी से बचाने के लिए ग्रीन नेट अथवा अन्य किसी प्रकार की पर्याप्त छाया की व्यवस्था नहीं की गई थी। परिणामस्वरूप पानी मिलने के बावजूद गर्म हवाओं और प्रचंड तापमान का प्रतिकूल प्रभाव पौधों पर साफ दिखाई दे रहा था। बीटगार्ड ऋषि कपूर यादव ने बताया कि रुंज नदी के किनारे स्थित लगभग 50 हेक्टेयर वन भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराकर पौधारोपण के लिए क्षेत्र तैयारी से जुड़े सभी कार्य पूरे करा लिए गए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि सुरक्षा जाली के भीतर अभी भी तीन परिवार निवासरत हैं और उनके पालतू मवेशी भी उसी क्षेत्र में रहते हैं। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि लाखों रुपये खर्च कर प्रस्तावित पौधारोपण के बाद इन पौधों को मवेशियों से कैसे सुरक्षित रखा जाएगा? इस संबंध में मौके पर ऐसा कोई ठोस प्रबंधन दिखाई नहीं दिया, जिससे भविष्य में पौधों की सुरक्षा सुनिश्चित होती नजर आए।

पानी, छाया और सुरक्षा- तीनों मोर्चे पर सवाल

वन परिक्षेत्र अजयगढ़ की बीट बरकोला के कक्ष क्रमांक पी-188 में रखे पौधों की सुरक्षा को लेकर वरिष्ठ अधिकारियों के निर्दशों पर अमल नहीं किया गया।
उत्तर सामान्य वन मंडल की अजयगढ़ रेंज भी अव्यवस्था और कथित अनियमितताओं के आरोपों से अछूती नहीं है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि निवर्तमान रेंजर पंकज दुबे के कार्यकाल में विभिन्न वानिकी कार्यों, विशेषकर अटल भूजल तालाबों और क्षेत्र तैयारी कार्यों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं। यही नहीं, उनके कार्यकाल के दौरान अवैध खनन और वन संपदा के दोहन को लेकर भी लगातार शिकायतें सामने आती रहीं। इन मामलों की अलग से पड़ताल की जा रही है। यदि वर्तमान पौधारोपण तैयारियों की बात करें तो बरकोला बीट के वन कक्ष क्रमांक पी-188 में कैम्पा मद से प्रस्तावित 20 हेक्टेयर पौधारोपण के लिए हजारों सागौन पौधे पहले से भंडारित मिले। निरीक्षण के दौरान न तो पौधों को तेज धूप से बचाने के लिए ग्रीन नेट जैसी व्यवस्था दिखाई दी और न ही जंगली अथवा पालतू मवेशियों से सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नजर आए। बीटगार्ड रामलखन शाक्य ने दावा किया कि पौधों की प्रतिदिन सुबह-शाम टैंकर से सिंचाई कराई जा रही है। हालांकि मौके पर पौधों की स्थिति देखकर इस दावे की पुष्टि सहज रूप से नहीं हो सकी। बड़ी संख्या में पौधों के पत्ते सूख चुके थे और कई पौधे तेजी से डंठल में तब्दील होते दिखाई दे रहे थे। जब उनसे पूछा गया कि पौधों को झुलसाने वाली धूप से बचाने के लिए क्या व्यवस्था की गई है, तो उन्होंने स्वीकार किया कि इस संबंध में कोई विशेष इंतजाम नहीं किए गए हैं।

पुराने रोपण में चरते मिले मवेशी, नए की सुरक्षा पर सवाल

बरकोला बीट के प्रस्तावित नवीन पौधारोपण क्षेत्र के ठीक सामने मुख्य सड़क के दूसरी ओर तीन-चार वर्ष पुराने पौधारोपण क्षेत्र के भीतर दिनदहाड़े आधा दर्जन भैंसें चरती हुई मिलीं। वहां मौजूद किसी भी कर्मचारी द्वारा उन्हें बाहर निकालने का प्रयास नहीं किया जा रहा था। यह दृश्य कई सवाल खड़े करता है। यदि वर्षों पुराने पौधारोपण क्षेत्र में भी मवेशियों की बेरोकटोक आवाजाही जारी है, तो आगामी दिनों में लगाए जाने वाले नए पौधों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी? स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो लाखों रुपये खर्च कर किए जाने वाले नए पौधारोपण का भी वही हश्र हो सकता है, जैसा पहले के कई रोपणों का हुआ। ऐसे में विभागीय दावों और जमीनी हकीकत के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।

धवारी और दमचुआ में भी नहीं थम रही पौधों की बदहाली

अजयगढ़ रेंज की बीट दमचुआ में पौधों को धूप और गर्मी से बचाने के लिए ग्रीन नेट लगाकर सिंचाई की जा रही है बावजूद इसके बड़ी संख्या में पौधे सूख गए।
अजयगढ़ रेंज की दमचुआ तथा धवारी बीट के वन कक्ष क्रमांक पी-195 में भी रोपण के लिए रखे हजारों पौधों की स्थिति चिंताजनक मिली। दोनों स्थानों पर सिंचाई की व्यवस्था होने का दावा किया गया, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में पौधों के पत्ते सूखकर झड़ चुके थे। धवारी बीट में पौधों को केवल पेड़ों की प्राकृतिक छाया के नीचे रखा गया था। भीषण गर्मी जैसे हालात में यह व्यवस्था अपर्याप्त साबित होती दिखाई दी। पौधों को सुरक्षित रखने के लिए ग्रीन नेट या अन्य वैज्ञानिक उपाय मौके पर नहीं मिले। इसके विपरीत दमचुआ बीट में पौधों को ग्रीन नेट की छाया में रखकर नियमित सिंचाई की जा रही थी। यहां व्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर होने के बावजूद कई पौधों के पत्ते सूख चुके थे और वे डंठल में तब्दील होते दिखाई दे रहे थे। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि अत्यधिक तापमान और मानसून में हो रही देरी का असर यहां भी पड़ रहा है।

टौरिया बीट में सिंचाई जारी, छांव का आभाव

अजयगढ़ रेंज की बीट टौरिया में पेड़ की छांव में रखे पौधे पीले पड़कर मुरझाने लगे। (छायाकार सनी सारस्वत )
टौरिया बीट के वन कक्ष क्रमांक पी-176 एवं पी-177 में रोपण के लिए रखे पौधों की टैंकर से सिंचाई की जा रही थी। निरीक्षण के दौरान बीटगार्ड प्रतीक तिवारी तथा सुरक्षा श्रमिक मौके पर मौजूद मिले। बीटगार्ड ने बताया कि जब तक क्षेत्र में पर्याप्त वर्षा नहीं हो जाती, तब तक पौधारोपण शुरू नहीं किया जाएगा। उनका कहना था कि फिलहाल सभी पौधे एक स्थान पर रखे होने से उनकी देखभाल अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन रोपण के बाद इनकी सुरक्षा कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होगी। हालांकि निरीक्षण के दौरान यहां भी यह स्पष्ट दिखाई दिया कि पौधों को तेज धूप से बचाने के लिए पर्याप्त छायादार व्यवस्था नहीं थी। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में पौधों के पत्ते पीले पड़ चुके थे और सूखने की प्रक्रिया लगातार जारी थी।
कुल मिलाकर अजयगढ़ और धरमपुर वन परिक्षेत्र की अधिकांश बीटों में एक जैसी तस्वीर सामने आई। कहीं सिंचाई की व्यवस्था कमजोर मिली, कहीं छाया का अभाव दिखाई दिया तो कहीं सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे। कुछ स्थानों पर प्रयास जरूर नजर आए, लेकिन अधिकांश जगह पौधों की मौजूदा स्थिति यह संकेत देती है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो करोड़ों रुपये की लागत से तैयार पौधारोपण अभियान की सफलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग सकते हैं।

निरीक्षण में उजागर हुई अनियमितताएं, बीटगार्ड निलंबित

उत्तर सामान्य वन मंडल पन्ना के डीएफओ धीरेन्द्र प्रताप सिंह ने हाल ही में वन परिक्षेत्र अजयगढ़ का भ्रमण कर पौधारोपण क्षेत्र तैयारी से जुड़े कार्यों का सघन निरीक्षण किया था। निरीक्षण के दौरान दमचुआ बीट में एक स्थान पर बड़ी संख्या में सागौन के सूखे पौधे भंडारित पाए गए। इसके अलावा निर्धारित मानकों के विपरीत प्रतिबंधित करंज प्रजाति के पौधों का रोपण किया जाना भी सामने आया। निरीक्षण में यह भी पाया गया कि कई स्थानों पर रोपण कार्य निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप नहीं कराया गया था। गड्ढों में नीम खली का उपयोग नहीं किया गया था तथा अन्य आवश्यक मानकों की भी अनदेखी की गई थी। इन कमियों को गंभीर लापरवाही मानते हुए डीएफओ ने मौके पर ही संबंधित बीटगार्ड रामनरेश राजपूत तथा रेंजर अभिषेक दुबे की कार्यप्रणाली पर खुलकर नाराजगी व्यक्त की। विभागीय सूत्रों के अनुसार निरीक्षण में सामने आई गंभीर अनियमितताओं के बाद बीटगार्ड रामनरेश राजपूत को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। हालांकि रेंजर की कार्यप्रणाली पर भी डीएफओ ने असंतोष जताया था, उनके विरुद्ध क्या विभागीय कार्रवाई की गई, इसकी जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं हो सकी है। इसे लेकर विभागीय गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं।

तीखी नोकझोंक भी बनी चर्चा का विषय

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर विभागीय कर्मचारियों के बीच एक और चर्चा भी जोर पकड़ रही है। बताया जाता है कि निरीक्षण के दौरान कथित गंभीर अनियमितताओं को देखकर डीएफओ काफी नाराज हो गए थे। इसी दौरान उनकी और संबंधित बीटगार्ड के बीच तीखी बहस भी हुई। सूत्रों के मुताबिक, बातचीत के दौरान डीएफओ द्वारा की गई कथित अपमानजनक टिप्पणी पर बीटगार्ड ने तत्काल आपत्ति दर्ज कराई और यहां तक कह दिया कि “कोई भी आपके साथ काम नहीं करना चाहता, इसलिए एक के बाद एक तीन-तीन रेंजर तबादला कराकर जा रहे हैं।” हालांकि इस कथित घटनाक्रम की विभाग की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विभागीय कर्मचारियों के बीच यह चर्चा लंबे समय तक होती रही। इसके कुछ समय बाद बीटगार्ड के विरुद्ध निलंबन की कार्रवाई भी हो गई।

सवाल- क्या अन्य बीटों में भी होगी कार्रवाई?

वन भवन भोपाल। (फाइल फोटो)
रडार न्यूज़ की टीम द्वारा अजयगढ़ और धरमपुर वन परिक्षेत्र की अनेक बीटों का स्थलीय निरीक्षण करने पर पौधों की सुरक्षा, सिंचाई, छाया की व्यवस्था तथा विभागीय निगरानी से जुड़ी कमियां सामने आईं। कई स्थानों पर पौधे तेजी से सूखते मिले तो कहीं सुरक्षा के इंतजाम बेहद कमजोर पाए गए। कुछ बीटों में कर्मचारियों द्वारा सीमित संसाधनों के बावजूद पौधों को बचाने के प्रयास भी दिखाई दिए, लेकिन अधिकांश स्थानों पर स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि दमचुआ बीट में अनियमितताओं पर तत्काल निलंबन की कार्रवाई हो सकती है, तो अजयगढ़ और धरमपुर की अन्य बीटों में सामने आई कथित गंभीर लापरवाही, वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों की अवहेलना तथा पौधों की सुरक्षा में बरती गई उदासीनता के मामलों में भी क्या इसी प्रकार निष्पक्ष कार्रवाई होगी?
या फिर डेढ़ लाख से अधिक सागौन पौधों की बदहाली का यह मामला भी पूर्व की कई शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा? यह प्रश्न केवल विभागीय जवाबदेही का नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के सरकारी व्यय, पर्यावरण संरक्षण और प्रदेश सरकार के महत्वाकांक्षी ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान की विश्वसनीयता से भी जुड़ा हुआ है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो पौधों की ग्रोथ प्रभावित होने के साथ-साथ आगामी पौधारोपण अभियान की सफलता भी संदेह के घेरे में आ सकती है। ऐसे में जरूरत केवल पौधारोपण के लक्ष्य पूरे करने की नहीं, बल्कि उन पौधों को सुरक्षित और जीवित रखने की भी है, जिन पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
इनका कहना है-
“वन परिक्षेत्र अजयगढ़ में लगभग 50 हजार पौधों का परिवहन कराया जा चुका है। पिछले 10-15 दिनों से ये पौधे निर्धारित स्थलों पर रखे हैं और उनकी नियमित सिंचाई कराई जा रही है। गर्मी के कारण कुछ पौधे सूखे जरूर हैं, लेकिन वे मरे नहीं हैं। मानसून सक्रिय होने के बाद रोपण होने पर सूखे हुए पौधों में दोबारा पत्तियां निकल आएंगी।”

पंकज दुबे, रेंजर, वन परिक्षेत्र अजयगढ़

“वन परिक्षेत्र धरमपुर में एक लाख से अधिक सागौन पौधे नर्सरी से लाकर संबंधित स्थलों पर रखे गए हैं। सागौन ऐसी प्रजाति है जो विषम परिस्थितियों में भी जीवित रहती है। इसलिए केवल पत्ते सूखने या पौधे के डंठल जैसे दिखने से यह नहीं माना जा सकता कि पौधा मर गया है। हां, इतना जरूर है कि इस स्थिति से पौधों की प्रारंभिक ग्रोथ प्रभावित हो सकती है।”

वैभव सिंह चंदेल, रेंजर, वन परिक्षेत्र धरमपुर

“पौधों को धूप और गर्मी से बचाने के लिए ग्रीन नेट लगाने, नियमित सिंचाई कराने तथा समुचित देखभाल के निर्देश लगातार दिए जा रहे हैं। इन व्यवस्थाओं के लिए परियोजना में पर्याप्त बजट का प्रावधान है। किसी भी कर्मचारी को यह खर्च अपनी जेब से नहीं करना है। दमचुआ बीट के निरीक्षण के दौरान प्रतिबंधित करंज प्रजाति के पौधों का रोपण, मानक के विपरीत कार्य तथा गड्ढों में नीम खली नहीं डाले जाने जैसी गंभीर अनियमितताएं मिली थीं। इसलिए संबंधित बीटगार्ड को निलंबित किया गया। यदि गंभीर लापरवाही पर भी कार्रवाई नहीं होगी तो विभाग में अराजकता फैल जाएगी। आप अन्य बीटों के भी फोटो और तथ्य उपलब्ध कराइए। यदि कहीं इसी प्रकार की गंभीर लापरवाही पाई जाती है तो संबंधित अधिकारियों एवं कर्मचारियों के विरुद्ध भी नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।”

धीरेन्द्र प्रताप सिंह, डीएफओ, उत्तर सामान्य वन मंडल पन्ना 

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मध्यप्रदेश: रिश्वतखोरी के मामले में नायब तहसीलदार और चौकीदार को 5-5 वर्ष का सश्रम कारावास

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जिला एवं सत्र न्यायालय पन्ना, मध्य प्रदेश। (फाइल फोटो)

*     लोकायुक्त ट्रैप कार्रवाई के मामले में विशेष न्यायालय पन्ना ने सुनाया फैसला

*     अवैध उत्खनन प्रकरण में जब्त ट्रैक्टर छोड़ने के एवज मांगी गई थी रिश्वत

पन्ना। (www.radarnews.in) मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में घूसखोरी के एक चर्चित मामले में विशेष न्यायालय ने तत्कालीन नायब तहसीलदार एवं उसके सहयोगी को दोषी ठहराते हुए सश्रम कारावास और अर्थदंड की सजा सुनाई है। मामला गुनौर तहसील में ट्रैक्टर छोड़ने के एवज में रिश्वत मांगने और लेने से जुड़ा था। विशेष न्यायाधीश (भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम) पन्ना श्री सुरेन्द्र मेश्राम की अदालत ने आरोपी तत्कालीन नायब तहसीलदार रविशंकर शुक्ला तथा चौकीदार देवीदयाल दहायत को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के विभिन्न धाराओं के तहत दोषसिद्ध पाते हुए 5-5 वर्ष के सश्रम कारावास और 25-25 हजार रुपए के अर्थदंड से दंडित किया है।
अभियोजन के अनुसार गुनौर तहसील क्षेत्र के ग्राम सिली निवासी ब्रजबिहारी प्रजापति ने जनवरी 2020 में लोकायुक्त पुलिस सागर से शिकायत की थी कि उनका ट्रैक्टर कथित अवैध उत्खनन के मामले में जब्त कर थाना गुनौर में खड़ा कराया गया था। शिकायत में आरोप लगाया गया कि ट्रैक्टर छोड़ने के बदले तत्कालीन नायब तहसीलदार रविशंकर शुक्ला ने 40 हजार रुपये की रिश्वत मांगी थी, जो बाद में 35 हजार रुपये पर तय हुई। शिकायतकर्ता के अनुसार बातचीत के दौरान 10 हजार रुपये पहले ही ले लिए गए थे, जबकि शेष 25 हजार रुपये देने के लिए कहा गया था। लोकायुक्त द्वारा सत्यापन के बाद 25 जनवरी 2020 को जाल बिछाया गया। अभियोजन के मुताबिक आरोपी के शासकीय आवास पर शिकायतकर्ता द्वारा 25 हजार रुपये देने पर नायब तहसीलदार ने राशि अपने पास खड़े चौकीदार देवीदयाल दहायत को लेने के लिए कहा। इसके बाद लोकायुक्त टीम ने कार्रवाई करते हुए राशि बरामद की थी। मामले की विवेचना पूर्ण होने के बाद अभियुक्तों के विरुद्ध विशेष न्यायालय में अभियोग पत्र प्रस्तुत किया गया।
विचारण के दौरान शासन की ओर से सहायक जिला लोक अभियोजन अधिकारी मानवेन्द्र सिंह ने पैरवी करते हुए साक्ष्यों एवं गवाहों के आधार पर आरोपों को प्रमाणित किया। अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और अभियोजन पक्ष के तर्कों से संतुष्ट होकर तत्कालीन नायब तहसीलदार रविशंकर शुक्ला को भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम की धारा 7 के तहत तीन वर्ष के सश्रम कारावास एवं 10 हजार रुपये अर्थदंड तथा धारा 13(1)(बी) सहपठित धारा 13(2) के तहत पांच वर्ष के सश्रम कारावास एवं 15 हजार रुपये अर्थदंड से दंडित किया है।
प्रतीकात्मक चित्र।
वहीं सहआरोपी देवीदयाल दहायत को धारा 13(1)(बी) सहपठित धारा 13(2) के तहत पांच वर्ष के सश्रम कारावास एवं 15 हजार रुपये अर्थदंड तथा धारा 12 के तहत तीन वर्ष के सश्रम कारावास एवं 10 हजार रुपये अर्थदंड की सजा सुनाई गई है। अभियोजन कार्यालय से प्राप्त जानकारी के अनुसार अर्थदंड की राशि जमा नहीं करने की स्थिति में आरोपियों को अतिरिक्त कारावास भी भुगतना होगा। यह मामला लोकसेवकों द्वारा अवैध पारितोषिक की मांग एवं स्वीकार किए जाने से संबंधित था, जिसमें न्यायालय ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को पर्याप्त मानते हुए दोषसिद्धि का निर्णय दिया।
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पन्ना: नवविवाहित जोड़े ने जहर खाकर दी जान! पुलिस जांच में जुटी

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नवयुगल के जीवित अवस्था के फोटो।

*    3 साल पहले हुआ था विवाह, घटना का कारण अज्ञात

पन्ना।(www.radarnews.in) मध्यप्रदेश के पन्ना जिले के अजयगढ़ तहसील क्षेत्र से एक ऐसी स्तब्ध करने वाली खबर सामने आई है जिसने पूरे इलाके को झकझोर कर रख दिया है। धरमपुर थाना क्षेत्र के भखुरी गांव में एक नवविवाहित जोड़े (पति-पत्नी) ने अज्ञात कारणों के चलते कथित तौर पर जहरीले पदार्थ का सेवन कर लिया। अस्पताल ले जाते समय और इलाज के दौरान दोनों की ही मौत हो गई। इस दोहरे सुसाइड से हंसते-खेलते परिवार की खुशियां पल भर में मातम में बदल गईं।
प्राप्त जानकारी अनुसार शनिवार की रात करीब 8 बजे पूरे परिवार ने एक साथ बैठकर हंसी-खुशी खाना खाया था। इसके बाद 25 वर्षीय सागर यादव और उसकी 23 वर्षीय पत्नी श्याम कली अपने कमरे में सोने चले गए। लेकिन कुछ ही देर बाद कमरे से अचानक चीखने-चिल्लाने और उल्टियां करने की आवाजें आने लगीं। परिजन जब कमरे में पहुंचे तो दोनों की हालत बेहद खराब थी। आनन-फानन में दोनों को अजयगढ़ स्वास्थ्य केंद्र ले जाया गया, जहाँ से गंभीर हालत में उन्हें पन्ना जिला अस्पताल रेफर किया गया। लेकिन बदकिस्मती से पत्नी श्याम कली ने रास्ते में ही दम तोड़ दिया, जबकि पति सागर की मौत जिला अस्पताल में इलाज के दौरान हो गई।
मृतक सागर चार बहनों का इकलौता भाई था और उसकी शादी को महज 3 साल ही हुए थे। थाना प्रभारी अनिल राजपूत के मुताबिक, चूंकि मृतिका नवविवाहिता है, इसलिए मर्ग कायम कर पुलिस हर एंगल से मामले की बारीकी से तफ्तीश कर रही है। दोनों के शवों का रविवार को पोस्टमार्टम कराकर परिजनों को सौंप दिया गया है। समाचार लिखे जाने तक नवयुगल (पति-पत्नी) द्वारा आत्मघाती कदम उठाने के पीछे की असली वजह का पता नहीं चल सका। पुलिस का कहना है प्रकरण की विस्तृत जांच के बाद ही घटना के कारणों का आधिकारिक तौर पर खुलासा हो सकेगा।
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अप्रैल का मानदेय अटका: बजट आवंटन के बाद भी भुगतान को तरस रहे अतिथि शिक्षक

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फाइल फोटो।

*     ज्ञापन सौंपकर बजट उपयोग की निष्पक्ष जांच की मांग

*     मानदेय भुगतान में देरी से बढ़ीं आर्थिक परेशानियां

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) जिले के अजयगढ़ विकासखंड के अतिथि शिक्षकों ने अप्रैल माह के मानदेय भुगतान में हो रही देरी को लेकर प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराया है। अतिथि शिक्षक संघ ने अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) अजयगढ़ को ज्ञापन सौंपकर मामले की जांच तथा लंबित मानदेय के शीघ्र भुगतान की मांग की है। संघ द्वारा सौंपे गए आवेदन के अनुसार लोक शिक्षण संचालनालय, भोपाल द्वारा 9 अप्रैल 2026 को अतिथि शिक्षकों के मानदेय भुगतान के लिए बजट आवंटित किया गया था। आवेदन में दावा किया गया है कि जिले के अन्य विकासखंडों में अप्रैल माह का मानदेय जारी हो चुका है, जबकि अजयगढ़ विकासखंड के अतिथि शिक्षकों को अब तक भुगतान प्राप्त नहीं हुआ है।

बजट उपयोग को लेकर उठाए सवाल

अतिथि शिक्षक संघ का आरोप है कि अप्रैल माह के लिए उपलब्ध कराई गई राशि से पूर्ववर्ती महीनों का भुगतान किया गया, जिसके कारण अप्रैल माह का मानदेय लंबित रह गया। संघ ने फरवरी, मार्च और अप्रैल माह के बजट आवंटन तथा व्यय की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट किए जाने की मांग की है। ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि यदि समय पर मांग पत्र नहीं भेजा गया अथवा बजट प्रबंधन में किसी स्तर पर लापरवाही बरती गई है तो इसकी जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और मामले में प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक जांच रिपोर्ट अभी सामने नहीं आई है। अतिथि शिक्षक संघ के पदाधिकारियों के अनुसार अधिकारियों से चर्चा के दौरान उन्हें बताया गया कि वर्तमान में उपलब्ध राशि पूरे विकासखंड के अतिथि शिक्षकों के मानदेय भुगतान के लिए पर्याप्त नहीं है। साथ ही उच्च स्तर पर अतिरिक्त बजट की मांग भेजे जाने की जानकारी भी दी गई है।

मामूली मानदेय पर निर्भर शिक्षकों के सामने आर्थिक संकट

अतिथि शिक्षक (Guest Teacher) लंबे समय से नियमित और समयबद्ध मानदेय भुगतान की समस्या उठाते रहे हैं। सीमित मानदेय पर सेवाएं दे रहे इन शिक्षकों के लिए भुगतान में देरी सीधे उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती है। बढ़ती महंगाई के बीच अधिकांश अतिथि शिक्षक अपने परिवार का भरण-पोषण इसी आय के सहारे करते हैं। ऐसे में मानदेय में एक-दो माह की देरी का अर्थ अक्सर किराना, बच्चों की पढ़ाई, दवाइयों और अन्य आवश्यक खर्चों के लिए उधार या कर्ज पर निर्भर होना होता है। शिक्षकों का कहना है कि समय पर भुगतान न होने से उन्हें बार-बार आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है।

शिक्षा व्यवस्था पर उठ रहे व्यापक सवाल

यह मामला एक बार फिर प्रदेश में अतिथि शिक्षकों की स्थिति को लेकर बहस का विषय बन गया है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि शिक्षा और शिक्षकों के सम्मान को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अतिथि शिक्षकों को समय पर मानदेय तक उपलब्ध नहीं हो पाता। शिक्षक संगठनों का आरोप है कि सरकारी स्कूलों और अतिथि शिक्षकों से जुड़ी समस्याएं वर्षों से बनी हुई हैं। वहीं सरकार शिक्षा क्षेत्र में सुधार और संसाधनों के विस्तार के दावे करती रही है। ऐसे में समय पर मानदेय भुगतान जैसे बुनियादी मुद्दे प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करते हैं।

जांच और भुगतान की मांग

अतिथि शिक्षक संघ अजयगढ़ के ब्लॉक अध्यक्ष संजय कुमार रैकवार सहित अतुल्य जैन, अश्विनी कुमार रैकवार, दीपक कुमार पाण्डेय, दिलीप यादव, दिनेश पाल एवं सुनील पाल ने संयुक्त रूप से प्रशासन से मांग की है कि फरवरी, मार्च एवं अप्रैल माह के बजट आवंटन और व्यय की निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही लंबित अप्रैल माह के मानदेय का शीघ्र भुगतान सुनिश्चित किया जाए, ताकि विकासखंड के अतिथि शिक्षकों को आर्थिक कठिनाइयों से राहत मिल सके। ज्ञापन में कहा गया है कि यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई भी की जानी चाहिए।
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खौफनाक वारदात: आशा कार्यकर्ता की निर्मम हत्या के बाद देवर ने भी दे दी जान

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फाइल फोटो

*  हत्या के कारणों पर बना रहस्य, पुलिस हर पहलू की बारीकी से जांच में जुटी

पन्ना।(www.radarnews.in) मध्यप्रदेश के पन्ना जिले के पवई कस्बा में स्थित वार्ड क्रमांक 14 में सोमवार को सामने आई एक दिल दहला देने वाली घटना ने पूरे क्षेत्र को स्तब्ध कर दिया। एक व्यक्ति ने कथित तौर पर अपनी ही भाभी, जो आशा कार्यकर्ता के रूप में स्वास्थ्य विभाग में कार्यरत थीं, पर धारदार हथियार से हमला कर उनकी निर्मम हत्या कर दी। इसके बाद आरोपी ने भी जहरीला पदार्थ खाकर अपनी जीवनलीला समाप्त कर ली। घटना के बाद पवई से लेकर सुनवानी क्षेत्र तक तरह-तरह की चर्चाओं का दौर जारी है, जबकि पुलिस पूरे मामले की गंभीरता से जांच कर रही है।

कमरे में बंद कर वारदात को दिया अंजाम

प्राप्त जानकारी के अनुसार सुनवानी क्षेत्र में पदस्थ 37 वर्षीय आशा कार्यकर्ता रजनी शुक्ला पवई में किराये के मकान में रहकर अपने बच्चों की पढ़ाई-लिखाई की देखरेख कर रही थीं। उनके पति अलग रहते बताए जाते हैं। प्रारंभिक जानकारी के मुताबिक आरोपी सुरेंद्र उर्फ सीताराम तिवारी ने वारदात से पहले मृतका की 17 वर्षीय बेटी को कमरे से बाहर कर दिया और इसके बाद कमरे का दरवाजा बंद कर रजनी शुक्ला पर धारदार हथियार से हमला कर दिया। गंभीर चोटों के कारण उनकी मौके पर ही मौत हो गई।

हत्या के बाद आरोपी ने उठाया आत्मघाती कदम

बताया जा रहा है कि वारदात को अंजाम देने के बाद आरोपी ने भी जहरीला पदार्थ खा लिया। जब परिजनों और पुलिस को घटना की जानकारी मिली तथा दरवाजा खोला गया, तब कमरे के भीतर दोनों मृत अवस्था में पाए गए। पुलिस का मानना है कि आरोपी की मौत जहरीले पदार्थ के सेवन से हुई है, हालांकि इसकी अंतिम पुष्टि पोस्टमार्टम और जांच रिपोर्ट के बाद ही हो सकेगी।
सबसे बड़ा सवाल: आखिर हत्या की वजह क्या थी?
इस पूरे घटनाक्रम में सबसे बड़ा और महत्वपूर्ण प्रश्न यह है कि आखिर ऐसी कौन-सी परिस्थितियां थीं, जिनके चलते आरोपी ने अपनी ही भाभी की इतनी निर्ममता से हत्या कर दी? क्या इसके पीछे कोई पारिवारिक विवाद था, पुरानी रंजिश थी, मानसिक तनाव था या फिर कोई अन्य कारण? फिलहाल इन सवालों का कोई स्पष्ट और आधिकारिक जवाब सामने नहीं आया है। घटना के बाद क्षेत्र में अनेक तरह की चर्चाएं और अटकलें लगाई जा रही हैं, लेकिन पुलिस ने अभी तक किसी भी संभावित कारण की पुष्टि नहीं की है। ऐसे में जांच पूरी होने से पहले किसी निष्कर्ष पर पहुंचना जल्दबाजी होगी।

पुलिस जुटी हर पहलू की पड़ताल में जुटी

घटना की सूचना मिलते ही एसडीओपी भावना सिंह दांगी और थाना प्रभारी सुशील अहिरवार पुलिस बल के साथ मौके पर पहुंचे। पुलिस ने घटनास्थल का निरीक्षण कर साक्ष्य जुटाए और दोनों शवों को पोस्टमार्टम के लिए भेज दिया। पुलिस अधिकारियों के अनुसार मामले की जांच विभिन्न पहलुओं को ध्यान में रखकर की जा रही है। परिजनों और संबंधित लोगों से पूछताछ की जा रही है तथा घटना के वास्तविक कारणों का पता लगाने का प्रयास किया जा रहा है। एक ही परिवार से जुड़े दो लोगों की मौत और वह भी इस तरह की परिस्थितियों में होने से क्षेत्र में शोक और दहशत का माहौल है। लोगों के बीच सबसे अधिक चर्चा इसी बात को लेकर है कि आखिर ऐसा क्या हुआ कि मामला हत्या और फिर आरोपी की मौत तक पहुंच गया। समाचार लिखे जाने तक यह प्रश्न का अनुत्तरित था और पुलिस की जांच जारी थी।
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