* ज्ञापन सौंपकर बजट उपयोग की निष्पक्ष जांच की मांग
* मानदेय भुगतान में देरी से बढ़ीं आर्थिक परेशानियां
शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) जिले के अजयगढ़ विकासखंड के अतिथि शिक्षकों ने अप्रैल माह के मानदेय भुगतान में हो रही देरी को लेकर प्रशासन का ध्यान आकृष्ट कराया है। अतिथि शिक्षक संघ ने अनुविभागीय अधिकारी (राजस्व) अजयगढ़ को ज्ञापन सौंपकर मामले की जांच तथा लंबित मानदेय के शीघ्र भुगतान की मांग की है। संघ द्वारा सौंपे गए आवेदन के अनुसार लोक शिक्षण संचालनालय, भोपाल द्वारा 9 अप्रैल 2026 को अतिथि शिक्षकों के मानदेय भुगतान के लिए बजट आवंटित किया गया था। आवेदन में दावा किया गया है कि जिले के अन्य विकासखंडों में अप्रैल माह का मानदेय जारी हो चुका है, जबकि अजयगढ़ विकासखंड के अतिथि शिक्षकों को अब तक भुगतान प्राप्त नहीं हुआ है।
बजट उपयोग को लेकर उठाए सवाल
अतिथि शिक्षक संघ का आरोप है कि अप्रैल माह के लिए उपलब्ध कराई गई राशि से पूर्ववर्ती महीनों का भुगतान किया गया, जिसके कारण अप्रैल माह का मानदेय लंबित रह गया। संघ ने फरवरी, मार्च और अप्रैल माह के बजट आवंटन तथा व्यय की जांच कर वास्तविक स्थिति स्पष्ट किए जाने की मांग की है। ज्ञापन में यह भी कहा गया है कि यदि समय पर मांग पत्र नहीं भेजा गया अथवा बजट प्रबंधन में किसी स्तर पर लापरवाही बरती गई है तो इसकी जवाबदेही भी तय की जानी चाहिए। हालांकि इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है और मामले में प्रशासन की ओर से कोई आधिकारिक जांच रिपोर्ट अभी सामने नहीं आई है। अतिथि शिक्षक संघ के पदाधिकारियों के अनुसार अधिकारियों से चर्चा के दौरान उन्हें बताया गया कि वर्तमान में उपलब्ध राशि पूरे विकासखंड के अतिथि शिक्षकों के मानदेय भुगतान के लिए पर्याप्त नहीं है। साथ ही उच्च स्तर पर अतिरिक्त बजट की मांग भेजे जाने की जानकारी भी दी गई है।
मामूली मानदेय पर निर्भर शिक्षकों के सामने आर्थिक संकट
अतिथि शिक्षक (Guest Teacher) लंबे समय से नियमित और समयबद्ध मानदेय भुगतान की समस्या उठाते रहे हैं। सीमित मानदेय पर सेवाएं दे रहे इन शिक्षकों के लिए भुगतान में देरी सीधे उनके परिवारों की आर्थिक स्थिति को प्रभावित करती है। बढ़ती महंगाई के बीच अधिकांश अतिथि शिक्षक अपने परिवार का भरण-पोषण इसी आय के सहारे करते हैं। ऐसे में मानदेय में एक-दो माह की देरी का अर्थ अक्सर किराना, बच्चों की पढ़ाई, दवाइयों और अन्य आवश्यक खर्चों के लिए उधार या कर्ज पर निर्भर होना होता है। शिक्षकों का कहना है कि समय पर भुगतान न होने से उन्हें बार-बार आर्थिक संकट का सामना करना पड़ता है।
शिक्षा व्यवस्था पर उठ रहे व्यापक सवाल
यह मामला एक बार फिर प्रदेश में अतिथि शिक्षकों की स्थिति को लेकर बहस का विषय बन गया है। शिक्षक संगठनों का कहना है कि शिक्षा और शिक्षकों के सम्मान को लेकर बड़े-बड़े दावे किए जाते हैं, लेकिन जमीनी स्तर पर अतिथि शिक्षकों को समय पर मानदेय तक उपलब्ध नहीं हो पाता। शिक्षक संगठनों का आरोप है कि सरकारी स्कूलों और अतिथि शिक्षकों से जुड़ी समस्याएं वर्षों से बनी हुई हैं। वहीं सरकार शिक्षा क्षेत्र में सुधार और संसाधनों के विस्तार के दावे करती रही है। ऐसे में समय पर मानदेय भुगतान जैसे बुनियादी मुद्दे प्रशासनिक व्यवस्था पर भी सवाल खड़े करते हैं।
जांच और भुगतान की मांग
अतिथि शिक्षक संघ अजयगढ़ के ब्लॉक अध्यक्ष संजय कुमार रैकवार सहित अतुल्य जैन, अश्विनी कुमार रैकवार, दीपक कुमार पाण्डेय, दिलीप यादव, दिनेश पाल एवं सुनील पाल ने संयुक्त रूप से प्रशासन से मांग की है कि फरवरी, मार्च एवं अप्रैल माह के बजट आवंटन और व्यय की निष्पक्ष जांच कराई जाए। साथ ही लंबित अप्रैल माह के मानदेय का शीघ्र भुगतान सुनिश्चित किया जाए, ताकि विकासखंड के अतिथि शिक्षकों को आर्थिक कठिनाइयों से राहत मिल सके। ज्ञापन में कहा गया है कि यदि जांच में किसी स्तर पर लापरवाही या अनियमितता सामने आती है तो संबंधित जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध नियमानुसार कार्रवाई भी की जानी चाहिए।
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निरीक्षण के दौरान रेलवे संरक्षा आयुक्त ने रेल पथ, पुल-पुलियाओं, सिग्नल एवं दूरसंचार प्रणाली, विद्युत अधोसंरचना तथा परिचालन व्यवस्थाओं का गहन परीक्षण किया। इसके बाद देवेन्द्रनगर से फुलवारी तक 12 डिब्बों वाली विशेष निरीक्षण ट्रेन को 120 किलोमीटर प्रति घंटे की गति से चलाकर ट्रैक की गुणवत्ता, मजबूती और सुरक्षा मानकों का परीक्षण किया गया, जो पूरी तरह सफल रहा। देवेन्द्रनगर स्टेशन पर उपलब्ध यात्री सुविधाओं और परिचालन व्यवस्थाओं का भी विस्तृत अवलोकन किया गया। यह उपलब्धि इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि कुछ समय पहले ही नागौद से फुलवारी रेल खंड पर सफल ट्रायल रन के साथ पहली बार ट्रेन पन्ना जिले की सीमा तक पहुंची थी। अब देवेन्द्रनगर तक रेल पहुंचने से परियोजना ने एक और महत्वपूर्ण मुकाम हासिल कर लिया है।
पन्ना जिले में रेल लाने की मांग नई नहीं है। क्षेत्र के प्रबुद्ध नागरिकों, व्यापारिक संगठनों, जनप्रतिनिधियों और आम लोगों ने कई दशकों तक रेल संपर्क के लिए लगातार आवाज उठाई। लंबे संघर्ष, जनआंदोलनों और लगातार किए गए प्रयासों के बाद ललितपुर-सिंगरौली नई रेल लाइन परियोजना को गति मिली। बुधवार को जब निरीक्षण विशेष ट्रेन देवेन्द्रनगर स्टेशन पहुंची तो क्षेत्र में खुशी और उत्साह का माहौल देखने को मिला। लोगों ने इसे पन्ना के विकास की दिशा में ऐतिहासिक उपलब्धि बताया। रेलवे अधिकारियों का मानना है कि फुलवारी-देवेन्द्रनगर रेल खंड शुरू होने से क्षेत्रीय रेल संपर्क और मजबूत होगा। इससे पन्ना तथा आसपास के क्षेत्रों के लोगों को सुरक्षित, सुगम और बेहतर परिवहन सुविधा उपलब्ध होगी। व्यापार, पर्यटन, शिक्षा और रोजगार के अवसरों को भी नई गति मिलने की उम्मीद है। विशेष रूप से हीरा नगरी पन्ना और आसपास के धार्मिक एवं पर्यटन स्थलों तक पहुंच आसान होने का मार्ग प्रशस्त होगा।


कलेक्टर को सौंपे गए आवेदन में यह भी उल्लेख किया गया है कि विधायक एवं उनके भाई द्वारा खरीदी गई भूमि तक पहुंच के लिए ग्राम पंचायत मड़ला द्वारा सड़क निर्माण कराया जा रहा है। आवेदनकर्ताओं का दावा है कि यदि मार्ग का निर्माण दूसरे विकल्प के अनुसार किया जाता तो सड़क की लंबाई, लागत और दूरी कम रहती तथा आसपास के ग्रामीणों को भी अधिक सुविधा मिलती। आवेदनकर्ताओं ने आरोप लगाया है कि पंचायत द्वारा तैयार किया जा रहा पहुंच मार्ग आम ग्रामीणों की सुविधा के बजाय कुछ विशेष भूमि स्वामियों को लाभ पहुंचाने वाला प्रतीत होता है। हालांकि इस संबंध में पंचायत अथवा संबंधित जनप्रतिनिधि का पक्ष समाचार लिखे जाने तक प्राप्त नहीं हो सका।
एम-स्ट्राइप्स प्रणाली के जरिए एकत्र होने वाला डेटा वन विभाग को वन्यजीवों की गतिविधियों का वास्तविक आकलन करने में मदद करेगा। इससे संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान, गश्त की प्रभावशीलता बढ़ाने और वन्यजीव संरक्षण संबंधी निर्णयों को अधिक सटीक बनाने में सहायता मिलेगी। पन्ना टाइगर रिजर्व की विशेषज्ञ टीम ने प्रशिक्षण के दौरान कर्मचारियों की तकनीकी जिज्ञासाओं का समाधान भी किया, जिससे उन्हें फील्ड में एप के प्रभावी उपयोग की व्यावहारिक समझ प्राप्त हुई। प्रशिक्षण कार्यक्रम के तहत 26 मई को उत्तर पन्ना वन मंडल तथा 28 मई को दक्षिण पन्ना एवं छतरपुर वन मंडल के अधिकारियों और कर्मचारियों को प्रशिक्षित किया गया। वन अधिकारियों के अनुसार टाइगर रिजर्व में सफल साबित हुई यह तकनीक अब सामान्य वन क्षेत्रों में भी वन्यजीव सुरक्षा का मजबूत आधार बनेगी। इससे बाघों और अन्य वन्यजीवों की गतिविधियों पर अधिक सटीक एवं रियल टाइम निगरानी संभव होगी, वहीं मानव-वन्यजीव संघर्ष की रोकथाम और संरक्षण प्रयासों को भी नई मजबूती मिलेगी।
बताया जा रहा है कि हादसे से कुछ मिनट पहले एक मजदूर पानी पीने के लिए कुएं से बाहर निकला था। उसी दौरान अचानक कुएं की दीवार और मिट्टी धंस गई। भीतर काम कर रहे पांच मजदूर मिट्टी में समा गए। बाहर मौजूद लोगों ने शोर मचाया तो पूरे गांव में हड़कंप मच गया। सूचना मिलते ही पुलिस, प्रशासनिक अधिकारी और पंचायत अमला मौके पर पहुंचा। जेसीबी मशीनों की मदद से बड़े स्तर पर रेस्क्यू ऑपरेशन शुरू किया गया। अब तक दो मजदूरों के शव बाहर निकाले जा चुके है, जबकि तीन अन्य मजदूरों के अब भी मिट्टी में दबे होने की आशंका जताई जा रही है।
घटना के बाद गांव के युवक राकेश यादव का बयान सामने आया है, जिसने हादसे को लेकर कई गंभीर खुलासे किए हैं। राकेश यादव ने आरोप लगाया कि कुएं का निर्माण कार्य ग्राम पंचायत के सरपंच द्वारा अघोषित रूप से ठेके पर कराया जा रहा था। राकेश ने बताया कि यह वही कुआं है जो पिछले साल भी धंस गया था, बावजूद इसके सुरक्षा इंतजाम किए बिना दोबारा काम शुरू करा दिया गया। उसने बताया कि मिट्टी के नीचे दबे सभी मजदूर एक ही परिवार के सदस्य हैं। राकेश ने भावुक होकर कहा कि आज उसकी जगह काम पर उसके पिता गए हुए थे और तभी यह भीषण हादसा हो गया। युवक के इस बयान के बाद ग्राम पंचायत और संबंधित अधिकारियों की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
घटनास्थल पर चारों ओर मिट्टी के बड़े-बड़े ढेर दिखाई दे रहे हैं। निर्माण स्थल बेहद गहरा और जोखिमपूर्ण बताया जा रहा है। ग्रामीणों के मुताबिक मजदूरों को बिना किसी तकनीकी सुरक्षा व्यवस्था और व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण के कुएं के अंदर उतारा गया था। बिना हेलमेट, पर्याप्त रस्सी, बिना सुरक्षा गियर्स कराया जा रहा था काम हादसे ने ग्राम पंचायत बिहरपुरवा और जनपद पंचायत अजयगढ़ की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। ग्रामीणों के अनुसार मजदूरों को कई फीट गहरे निर्माणाधीन कुएं में उतारकर खुदाई कराई जा रही थी, लेकिन सुरक्षा के नाम पर कोई इंतजाम मौजूद नहीं थे। न ही मिट्टी धंसने से बचाव के कोई तकनीकी उपाय किए गए थे। इतने जोखिमपूर्ण कार्य के बावजूद सुरक्षा मानकों की खुलेआम अनदेखी किए जाने को लेकर लोगों में भारी आक्रोश है। सवाल उठ रहे हैं कि आखिर पंचायत और जिम्मेदार अधिकारियों ने मजदूरों की जान को जोखिम में डालकर यह कार्य क्यों कराया।
मनरेगा जैसे सरकारी कार्यों में मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करना संबंधित पंचायत, तकनीकी अमले और जनपद प्रशासन की जिम्मेदारी मानी जाती है। लेकिन कड़रहा हादसे ने एक बार फिर सरकारी निर्माण कार्यों में सुरक्षा व्यवस्थाओं की पोल खोल दी है। ग्रामीणों का आरोप है कि यदि सुरक्षा इंतजाम जाते और मजदूरों को व्यक्तिगत सुरक्षा उपकरण दिए गए होते तो शायद यह हादसा इतना भयावह नहीं होता। फिलहाल पूरे गांव में मातम पसरा हुआ है और प्रशासनिक लापरवाही को लेकर लोगों में गुस्सा लगातार बढ़ता जा रहा है।
लगभग 800 करोड़ रुपये लागत वाली सिंघौरा-2 समूह जल प्रदाय योजना में ठेका कंपनी की पोकलेन मशीनों ने दिनदहाड़े नियम-कानूनों और अनुमति की शर्तों की धज्जियां उड़ाते हुए आधा सैकड़ा पेड़ उखाड़ डाले। पाइपलाइन बिछाने के लिए अनियंत्रित तरीके से गहरी नालियां खोदकर बेजुबान वन्यजीवों का रहवास उजाड़ दिया गया। यह सब वन चौकी के सामने होता रहा, लेकिन मैदानी वन अमला पूरी तरह मूकदर्शक बना रहा। हद तो तब हो गई जब मामला रेंजर से लेकर सहायक संचालक और उप संचालक के संज्ञान में आने के डेढ़ माह बाद भी संबंधितों के विरुद्ध नियमानुसार वन अपराध प्रकरण कायम नहीं किया गया और न ही ठेका कंपनी की पोकलेन मशीनें जब्त की गईं। संवेदनशील मामले में जिम्मेदार वन अधिकारियों की उदासीनता से उनकी भूमिका भी सवालों के घेरे में आ गई है।
जिला मुख्यालय पन्ना से लगभग 60 किलोमीटर दूर अजयगढ़ विकासखंड में पन्ना टाइगर रिजर्व (PTR) के वन परिक्षेत्र पन्ना बफर अंतर्गत जल जीवन मिशन के तहत सिंघौरा-2 प्रोजेक्ट की पाइपलाइन बिछाने का कार्य प्रगति पर है। 800 करोड़ रुपये की इस पेयजल परियोजना का निर्माण कार्य कल्पतरु प्रोजेक्ट इंटरनेशनल लिमिटेड (KPIL) को सौंपा गया है। वर्तमान में पन्ना बफर के पर्यटन क्षेत्र कैंप घुर्रहो के समीप तक अंडरग्राउंड पाइपलाइन डाली जा चुकी है। हालांकि इस कार्य के लिए जल निगम पन्ना ने पीटीआर से विधिवत अनुमति/अनापत्ति प्राप्त की है, लेकिन जिन कड़ी शर्तों के साथ जनहित से जुड़े इस विकास कार्य की अनुमति जारी की गई थी, उनका मौके पर पालन नहीं कराया जा रहा है।
टाइगर, तेंदुआ, भालू समेत अन्य वन्यजीवों के विचरण क्षेत्र वाले घने जंगल में ठेका कंपनी केपीआईएल द्वारा गंभीर लापरवाही बरतते हुए आधा सैकड़ा पेड़ों को उखाड़ डाला गया। पाइपलाइन बिछाने के लिए दो पोकलेन मशीनों से गहरी नालियों की खुदाई कराई गई और रास्ते में आने वाले या आसपास खड़े वर्षों पुराने हरे-भरे वृक्षों को उखाड़कर फेंक दिया गया। इस अनियंत्रित कार्य का सबसे बड़ा खामियाजा बेजुबान वन्यजीवों को भुगतना पड़ा। नालियों की खुदाई और मिट्टी की भराई के दौरान असंख्य वन्यजीवों के रहवास नष्ट हो गए। पन्ना बफर रेंज के बनहरी, घुर्रहो घाटी से लेकर छापर-दहलान चौकी तक के जंगलों में पाइपलाइन बिछाने के नाम पर बड़े पैमाने पर पेड़ उखाड़ने और वन्यजीवों के रहवास तबाह होने के साक्ष्य मौजूद हैं।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि घटना के डेढ़ माह बाद भी न तो वन अपराध प्रकरण दर्ज किया गया और न ही मौके पर उपयोग की गई मशीनों को जब्त किया गया। जबकि भारतीय वन अधिनियम 1927 की धारा 26 और 33 के तहत अवैध वृक्ष कटाई पर तत्काल कार्रवाई का प्रावधान है। वहीं वन्यजीव संरक्षण अधिनियम 1972 की धारा 29 के अनुसार संरक्षित क्षेत्र में वन्यजीवों के आवास को नुकसान पहुंचाने पर अपराध दर्ज कर संबंधित उपकरण जब्त किए जाने चाहिए। इन स्पष्ट प्रावधानों के बावजूद कार्रवाई का अभाव अधिकारियों की मंशा पर सवाल खड़े करता है। सूत्रों की मानें तो समूह जल प्रदाय योजना से जुड़े तकनीकी अधिकारियों और ठेकेदार पर दबाव बनाने की मंशा से पीटीआर प्रबंधन कई दिनों तक ‘लेटर-लेटर’ का खेल खेलता रहा। बाद में कथित तौर पर अंदरखाने मामला सेट होने के बाद अब इसे रफा-दफा करने की कागजी कार्रवाई की जा रही है।
वन क्षेत्र में होने वाले विकास एवं निर्माण कार्यों के लिए सर्वप्रथम क्रियान्वयन एजेंसी द्वारा परिवेश पोर्टल पर ऑनलाइन आवेदन कर अनुमति प्राप्त की जाती है। संबंधित वन मंडल आवेदन एवं सहपत्रों की जांच के बाद उन्हें वरिष्ठ कार्यालय को अग्रेषित करता है। संरक्षित अथवा आरक्षित वन क्षेत्र में कार्य के लिए भारत सरकार द्वारा कड़ी शर्तों के साथ अनुमति जारी की जाती है। यदि किसी कार्य में पेड़ों की कटाई प्रस्तावित हो तो संबंधित एजेंसी और वन अधिकारी संयुक्त रूप से स्थल पर पेड़ों को चिन्हित करते हैं। इसके बाद वन मंडल द्वारा विदोहन योजना तैयार की जाती है। प्रभावित वृक्षों की कटाई और परिवहन की राशि निर्माण एजेंसी से जमा कराने के बाद वन अमला अपनी उपस्थिति में वैज्ञानिक तरीके से वृक्षों की सावधानीपूर्वक कटाई कराता है, ताकि राजस्व की हानि न हो।
यहां यह उल्लेखनीय है कि समूह जल प्रदाय योजना की पाइपलाइन बिछाने के दौरान वन क्षेत्र में पेड़ों की कटाई की निर्धारित प्रक्रिया का मौके पर पालन नहीं कराया गया। ठेका फर्म कल्पतरु प्रोजेक्ट इंटरनेशनल लिमिटेड (KPIL) की पोकलेन मशीनों ने पन्ना टाइगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में मनमाने तरीके से आधा सैकड़ा पेड़ उखाड़ फेंके। इससे वृक्ष और उनकी शाखाएं कई जगह से क्षतिग्रस्त हो गईं। जानकारों का मानना है कि पोकलेन से उखाड़े गए वृक्षों की काष्ठ नीलामी में वन विभाग को राजस्व की हानि भी उठानी पड़ सकती है।


इसके अलावा कार्यपालन यंत्री द्वारा 9 ठेकेदारों को ब्लैकलिस्ट (Blacklist) करने की कार्रवाई भी शुरू कर दी गई है। जिन कार्यों के संबंध में मुख्य अभियंता लोक निर्माण विभाग परिक्षेत्र सागर को प्रस्ताव भेजे गए हैं उनमें अमानगंज-गुनौर मार्ग से तुन्ना-मेहंदवा मार्ग, ग्राम करिया से महोड़खुर्द मार्ग, मोहन्द्रा-गोल्ही-पलोही मार्ग, मोहन्द्रा-रैपुरा मार्ग, देवेंद्रनगर-सलेहा मार्ग, मकरंदगंज से बरबसपुर मार्ग, पवई-इटांय-मैहर मार्ग, खमरिया-अतरहाई से रीठी मार्ग तथा सिंहपुर-धरमपुर से मझपुरवा मार्ग शामिल हैं। इन कार्यों से जुड़े ठेकेदारों में मेसर्स रतन बिल्डर्स बांदा उत्तर प्रदेश, मेसर्स आर.के. ट्रेडर्स प्रोप्राइटर ऋषिकांत नगायच पवई जिला पन्ना, मेसर्स आरएसव्ही इंफ्रा कांट्रेक्टर, मेसर्स श्री बिल्डअप प्राइवेट लिमिटेड छतरपुर, कौशल प्रसाद पटेल रीवा, मेसर्स मारुति नंदन नागौद जिला सतना, मेसर्स दिग्विजय कंस्ट्रक्शन कंपनी शहडोल, मेसर्स राधा वल्लभ ट्रेडर्स शाहनगर जिला पन्ना तथा मेसर्स शारदा कंस्ट्रक्शन एंड सप्लायर्स इंद्रपुरी कॉलोनी पन्ना के नाम शामिल हैं। जानकारों का कहना है कि यदि किसी ठेकेदार अथवा फर्म का पंजीयन काली सूची में दर्ज हो जाता है तो उसे भविष्य में सरकारी कार्यों के ठेके मिलना लगभग असंभव हो जाता है। यही वजह है कि कार्यपालन यंत्री जे.पी. सोनकर की इन सख्त कार्यवाहियों के बाद लापरवाह ठेकेदारों में भारी बेचैनी देखी जा रही है। विभागीय हलकों में यह भी चर्चा है कि लंबे समय बाद पीडब्ल्यूडी में निर्माण कार्यों की गुणवत्ता और समयसीमा को लेकर इतनी सख्त कार्रवाई देखने को मिली है। माना जा रहा है कि ठेकेदार अब कार्य अनुबंध शर्तों एवं विभागीय निर्देशों को हल्के में लेने की गलती नहीं करेंगे।

कार्यक्रम में बी. आर. फूकन (रिसर्चर) द्वारा “वन क्षेत्रों में निर्मित जल संरचनाओं की जल गुणवत्ता का आकलन” विषय पर जानकारी दी गई। उन्होंने जल गुणवत्ता परीक्षण की विभिन्न विधियों जैसे सैंपल कलेक्शन, पीएच स्तर जांच आदि के बारे में विस्तार से बताया। साथ ही वन क्षेत्रों में निर्मित जल संरचनाओं एवं जलाशयों के प्रभावी प्रबंधन हेतु नियमित मॉनिटरिंग, वेस्ट मैनेजमेंट एवं कम्युनिटी अवेयरनेस प्रोग्राम संचालित करने की आवश्यकता पर भी चर्चा की गई।
कार्यक्रम में मुख्य वन संरक्षक छतरपुर वृत्त नरेश सिंह यादव, डीएफओ दक्षिण पन्ना अनुपम शर्मा, डीएफओ उत्तर पन्ना धीरेंद्र प्रताप सिंह, आईएफएस, उपवनमंडलाधिकारी विश्रामगंज अंशुल तिवारी, उपवनमंडलाधिकारी पन्ना कृष्णा मरावी, एसीएफ प्रशिक्षु प्रभांशु कमल मिश्रा, वन परिक्षेत्राधिकारी पन्ना अजय बाजपेयी, वन परिक्षेत्राधिकारी अजयगढ़ पंकज दुबे, वनपरिक्षेत्राधिकारी धरमपुर वैभव सिंह चंदेल, वनपरिक्षेत्राधिकारी विश्रामगंज नितिन राजौरिया, वनपरिक्षेत्राधिकारी देवेन्द्रनगर शुभम तिवारी सहित अन्य अधिकारी एवं कर्मचारी उपस्थित रहे।