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गुरूकुल की छात्रा ने अपनी उपलब्धि से रोशन किया जिले का नाम

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छात्रा प्रियंका सिंह लोधी

* मेडिकल प्रवेश परीक्षा नीट में पन्ना की प्रियंका हुई सफल

पन्ना। (www.radarnews.in) शहर की अग्रणी शैक्षणिक संस्था गुरूकुल पब्लिक स्कूल पन्ना की कक्षा 12 की छात्रा ने वर्ष 2019 की एमबीबीएस की प्रवेश परीक्षा नीट में उत्कृष्ट प्रर्दशन करते हुए सफलता प्राप्त की है।
गुरूकुल की छात्रा प्रियंका सिंह लोधी ने पहले ही प्रयास में ऑल इंडिया लेबिल की परीक्षा में देश की रैंक में 4026 वां स्थान पाया है। यह किसी उपलब्धि से कम नहीं है। प्रियंका ने इसी सत्र में गुरूकुल पब्लिक स्कूल में अध्ययन करते हुए 12वीं की परीक्षा में 90 प्रतिशत अंक अर्जित किये थे। प्रियंका के अलावा गुरूकुल के छात्र ऋशयांक पटेल 90 प्रतिशत, स्वालिहा खातून 90 प्रतिशत, मृदुल गुप्ता 87 प्रतिशत, सोनल कुमारी 83 प्रतिशत, आयुष्मान सिंह 83 प्रतिशत, सार्थक अवस्थी 82 प्रतिशत, संध्या बागरी 82 प्रतिशत, शुभम शाक्य 82 प्रतिशत, वैभव चैबे 82 प्रतिशत अंक अर्जित कर संस्था को गौरांवित किया था।
प्रियंका ने हायर सेकेण्डरी परीक्षा के साथ मेडिकल प्रवेश परीक्षा में भी हिस्सा लिया और यह उपलब्धि । हाँसिल की। प्रियंका के पिता शिव मोहन सिंह लोधी उत्कृष्ट विद्यालय पन्ना में वरिष्ठ अध्यापक हैं और मां रम्मू देवी गृहणी है। बेटी की सफलता से माता-पिता उत्साहित है। उन्हें विश्वास है कि इस उपलब्धि के बाद अब उनकी बेटी के डॉक्टर बनने का सपना जरूर साकार होगा। वहीं प्रियंका की इस उपलब्धि के लिए गुरूकुल पब्लिक स्कूल के शिक्षकों ने भी उसे बधाई दी है। संस्था की प्रभारी प्राचार्य लुबीना सिद्दीकी ने प्रियंका को बधाई देते हुए उसके उज्जवल भविष्य की कामना की है। उन्होंने बताया कि इस वर्ष प्रियंका सहित संस्था के कई बच्चों ने हायर सेकेण्डरी परीक्षा में उत्कृष्ट प्रर्दशन किया है।

जंगलराज : वन विभाग के रोपण में सूख कर मर गए हजारों पौधे, क्या खरपतवार और झाड़ियाँ उगाने खर्चे थे करोड़ों ?

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समुचित देखरेख के आभाव में सूख कर मर चुके पौधों से उजागर होती रोपण की जमीनी हकीकत।

* सीमेंट पोल धराशाई होने से गिर गई सुरक्षा जाली

* कई सालों से अधूरे पड़े सुरक्षा श्रमिकों के आवास

* सच्चाई जानने के बाद भी कार्यवाही करने से कतरा रहे डीएफओ

शादिक खान, पन्ना। (www.radarnews.in) मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में बिगड़े वनों के सुधार एवं विकास के नाम पर वन विभाग ने विगत वर्षों में पौधरोपण पर करोड़ों रुपए खर्च कर सामान्य व संरक्षित वन क्षेत्रों के अंतर्गत लाखों पौधे लगाए हैं, लेकिन इनकी समुचित देखभाल न होने से अधिकांश रोपणों में 90 फीसदी से अधिक पौधे सूख कर मर चुके हैं। कई रोपड़ों में तो पौधों की जगह चारा, खरपतवार, कटीली झाड़ियाँ उग आई हैं। गम्भीर अनियमितताओं और घोर लापरवाही की भेंट चढ़ चुके रोपणों में 1-2 वर्ष बाद भी जीवित पौधे (हरियाली) खोजना मुश्किल है। जिले के उत्तर वन मण्डल की पन्ना रेन्ज के वन खण्ड सकरिया बीट जनवार के अंतर्गत ग्राम छापर में हुए पौधरोपण इसका एक उदाहरण मात्र है। यहाँ वर्ष 2017-18 में कैम्पा मद से 40 हेक्टेयर क्षेत्र में सागौन के पौधरोपण में सागौन समेत अन्य प्रजातियों के तकरीबन 60 हजार एवं एफडीए शिल्पी पाश्चर रोपण मद से वर्ष 2018-19 में 30 हेक्टेयर क्षेत्र में सागौन तथा शीषम के 12 हजार पौधे रोपित कराए गए। बहुत सम्भव है कि कागजों में यह रोपण आबाद हो सकता है, लेकिन धरातल पर अपवाद स्वरूप गिनती के पौधों को छोड़ दें तो अधिकांश पौधे काफी पहले ही सूख कर पूरी तरह मर चुके हैं।
वनमंडलाधिकारी उत्तर वन मण्डल पन्ना के कार्यालय का फाइल फोटो।
रोपणों की बदहाली को देखते हुए इन पर खर्च हुए करोड़ों रुपए की उपयोगिता पर सवाल उठ रहे हैं। उधर, सच्चाई जानने के बाद भी जिम्मेदार अधिकारी किंकर्तव्यविमूढ़ बने बैठे हैं। इनके द्वारा अपने निकम्मेपन को छिपाने के और दोषियों को बचाने के लिए बड़ी ही बेशर्मी के साथ कुतर्क दिए जा रहे हैं। जिला मुख्यालय पन्ना से महज 7 किलोमीटर की दूरी पर सतना मार्ग पर एनएच- 39 किनारे स्थित जनवार बीट के ग्राम छापर के दोनों रोपड़ों की बदहाली वहाँ हुए भ्रष्टाचार की कहानी को स्वतः ही चींख-चींखकर को बयाँ कर रही है। लेकिन, वन विभाग में ऊपर से नीचे तक चलने वाली बंदरबाँट की व्यवस्था में यह नक्कारखाने की तूती बनकर रह गई है। करोड़ों रुपए की लागत के इन पौधरोपणों से क्षेत्र में हरियाली भले ही नहीं आई पर लगता है व्यवस्था से जुड़े लोगों तक इसकी हिस्सेदारी का फीलगुड सही तरीके से पहुँचा है। शायद इसीलिए मामला मीडिया में आने के बाद भी डीएफओ साहब के कानों जूँ तक नहीं रेंग रही है।

धराशाई हुए खम्भे गिर गई सुरक्षा जाली

जनवार बीट के सागौन कैम्पा रोपण के खम्भे टूटने से जगह-जगह गिरी पड़ी सुरक्षा जाली।
दोनों रोपण क्षेत्रों की बद से बद्तर स्थिति का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है जहाँ पर हजारों पौधे लगाए गए थे वहाँ पौधों की जगह चारा और खरपतवार उग आया है। हजारों पौधे पर्याप्त नमी एवं आवश्यक पोषक तत्वों (जैविक खाद,काली मिटटी आदि) के आभाव में सूखी टहनियों में तब्दील होकर पूरी तरह मर चुके हैं। इतना ही नहीं जगह-जगह सीमेंट पोल (खम्भे) धराशाई होने से रोपड़ की सुरक्षा जाली भी गिर चुकी है। इन हालात में वन्यजीव वहाँ आसानी घुसकर गिनती के बचे पौधों को भी उजाड़ सकते हैं। सूखे पत्तों की तरह बड़ी तादाद में सीमेंट पोल गिरने से इनकी गुणवत्ता और मापदण्डों पर सवाल उठना स्वाभाविक। साथ ही खम्भों को जमीन में गाड़ने के बाद सही तरीके से इनकी कॉन्क्रीटिंग नहीं करने की बातें भी सामने आ रहीं है। वर्तमान में दोनों रोपणों की जो हालत उसे देखकर प्रतीत होता है कि स्थल की समुचित सफाई के बगैर ही मनमाने तरीके से पौधे लगाए गए।
इन रोपणों के पूर्णतः असफल होने से वन विभाग को भले ही आर्थिक क्षति पहुँचीं हो लेकिन ये फॉरेस्ट के कतिपय अधिकारियों-कर्मचारियों की निहित स्वार्थपूर्ति के लिए ये बेहतरीन चारागाह साबित हुए है। पन्ना जिले के उत्तर वन मण्डल में व्याप्त भ्रष्टाचार और अराजकता का यह एक नमूना मात्र है। राजनैतिक संरक्षण और ऊँचीं पहुँच के चलते यहाँ वर्षों से जमे कतिपय अधिकारी-कर्मचारी वन विभाग को दीमक की तरह खोखला कर कथिततौर पर अनुपातहीन सम्पत्ति के मालिक बन चुके हैं। आमचर्चा यह भी है कि इनके द्वारा अपने रिश्तेदारों के नाम पर विभाग में निर्माण सामग्री की सप्लाई करने से लेकर माफियाओं के साथ हाथ मिलाकर वन क्षेत्र में अवैध पत्थर, हीरा खदानें संचालित की जा रहीं हैं और बड़े पैमाने पर सागौन की तस्करी कराई जा रही है। इस तरह कुछ लोग वन विभाग को दोतरफ़ा लूट रहे हैं।

मानसून की हरियाली में छिप जाएँगे गुनाह

उत्तर वन मण्डल की जनवार बीट अंतर्गत छापर गाँव में कैम्पा मद से सागौन के और एफडीए मद से हुए रोपणों में पौधों के मरने का अंदाजा इस बात से भी लगाया जा सकता है कि इनमें अधिकांशतः उन प्रजातियों के पौधे रोपित कराए हैं जिनमें गर्मी के मौसम में हरियाली आती है। लेकिन वहाँ उँगलियों पर गिने जा सकने वाले पौधों को छोड़ दें तो अधिकांश में कोंपलें तक नहीं फूटीं है। रिकार्ड के अनुसार इन रोपणों में सागौन, शीषम, आँवला, वेल, जामुन, सफेद सिरस के तकरीबन 70 हजार पौधे लगाए गए है। जानकारों के अनुसार इतनी बड़ी तादाद में लगे पौधों में यदि आधे पौधे भी जीवित होते तो काफी हरियाली दिखने लगती। लेकिन वहाँ तो जहां भी नजर दौड़ाओ वहाँ हर तरफ सूखा चारा और खरपतवार ही दिखाई देता है। कुछ-कुछ फासले पर मिट्टी के ढ़ेर में दबी बेजान सूखी टहनियाँ पौधों के मरने की गवाही दे रहीं हैं।
वन विभाग के नियम-कानूनों के मुताबिक रोपणों में पौधों के मरने की संख्या के आधार पर सम्बंधित बीटगार्ड से लेकर डीएफओ तक की जबाबदेही बनती है। उत्तर वन मण्डल अधिकारियों-कर्मचारियों के बीच साँठगाँठ को देखते हुए इस बात की पूरी सम्भावना है कि जनवार के रोपणों की यदि स्थानीय स्तर पर जाँच कराई गई तो इसका हश्र भी पूर्व के मामलों की ही तरह ही होगा। कुछ दिनों तक जाँच की औपचारिकता कर मामला शांत होने पर सम्बंधितों को क्लीनचिट दे दी जाएगी। सर्वविदित है कि आगामी दिनों में मानसून के सक्रिय होने से जंगल में हर तरफ प्राकृतिक तौर पर मौसमी हरियाली फैल जाएगी जिसमें इनके गुनाह कुछ समय के लिए छिप जाएँगे। इस स्थिति में रोपणों में पौधों के जीवित होने की निष्पक्ष जाँच बारिश के पूर्व ही सम्भव है।
रोपण में पौधों की जगह उगा चारा और खरपतवार।

अधूरे पड़े चौकीदारों के आवास

दो वर्ष से नींव स्तर पर पड़ा कैम्पा मद के सागौन रोपण में चौकीदार का आवास।
जनवार बीट अंतर्गत छापर गाँव में कैम्पा मद से सागौन के और एफडीए मद से हुए रोपणों में तैनात वन विभाग के सुरक्षा श्रमिकों के आवास आज भी अधूरे पड़े हैं। जबकि वहाँ पौधारोपण 1-2 वर्ष पूर्व हो चुके हैं। सुरक्षा श्रमिकों के आवास निर्माण को लेकर जिम्मेदारों की उदासीनता-लापरवाही को देखते हुए यह अंदाजा लगाना मुश्किल नहीं है कि रोपित पौधों की सुरक्षा को लेकर वे कितने सजग और ईमानदार हैं। आवास अधूरे होने के कारण सम्बंधित सुरक्षा श्रमिक रोपणों की सही तरीके से सुरक्षा नहीं कर पा रहे हैं। इस इलाके में बाघ की चहलकदमी के बाबजूद चौकीदारों की सुरक्षा के लिहाज से उनके अधूरे पड़े आवासों को पूर्ण कराने की तरफ किसी का ध्यान नहीं है। मालूम हो कि छापर में कुल तीन रोपण हैं। इनमें सबसे पुराने रोपण में ही चौकीदार का आवास निर्मित है इसलिए अन्य दोनों रोपणों के चौकीदार भी उसी में किसी तरह निवास कर रहे हैं।
एफडीए रोपण में निर्मित बिना गेट का अधूरा चौकीदार आवास।
जनवार के बीटगार्ड से सुरक्षा श्रमिकों के आवास अधूरे होने की वजह पूँछने पर उन्होंने पहले तो निर्माण कार्य शीघ्र पूर्ण कराने की बात कही और फिर बोले कि तीनों रोपण आसपास स्थित होने से पृथक-पृथक आवास की आवश्यकता नहीं है। एक ही आवास में सभी सुरक्षा श्रमिक अच्छी तरह रह रहे हैं। पर जब उनसे पूँछा गया कि अलग-अलग आवास की यदि आवश्यकता नहीं है तो फिर उनका आधा-अधूरा निर्माण भी क्यों कराया गया। इस सवाल का वे कोई जबाब नहीं दे सके। मजेदार बात यह है कि जनवार में सुरक्षा श्रमिकों से जिस तरह आवास शेयर कराए जा रहे हैं यदि इसी तर्ज पर एक ही परिसर में रहने वाले वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी आवास साझा कर रहने लगें तो वाकई पृथक-पृथक आवासों के निर्माण पर व्यय होने वाली राशि की कथित फिजूलखर्ची बंद हो जाएगी। उधर, इस मुद्दे पर जब उत्तर वन मण्डल के डीएफओ रामनरेश सिंह यादव से उनका पक्ष जानने के लिए मोबाइल पर सम्पर्क किया गया तो कई बार रिंग जाने के बाद भी उनका फोन रिसीव नहीं हुआ।
रोपण प्रोजेक्ट की लागत को छोड़ अन्य जानकारी बोर्ड पर प्रदर्शित की गई।

इनका कहना है –

“छापर के दोनों प्लान्टेशनों में रोपित पौधे मरे नहीं हैं वे जीवित हैं कुछ समय बाद वे हरे-भरे दिखने लगेंगे, रोपण कार्य पूर्णतः मापदण्डों के अनुसार कार्य गया इसमें सिर्फ मैनें ही नहीं बल्कि अन्य किसी ने भी किसी तरह का कोई भ्रष्टाचार नहीं किया है। घटिया कार्य और अनियमितताओं के आरोप पूर्णतः असत्य और निराधार हैं। इन रोपणों में पौधों की सिंचाई का प्रावधान नहीं है। जाँच होने पर आपके बेबुनियाद आरोपों की सच्चाई सामने आ जाएगी। आप इस सम्बंध में वरिष्ठ अधिकारियों से बात कर सकते हैं, इस सम्बंध मैं कुछ नहीं और कह सकता हूँ।”

प्रदीप गर्ग, बीटगार्ड जनवार

“गर्मी के मौसम में पौधों में पत्तियाँ भले न हों पर कोंपलें तो दिखने लगती हैं अगर ऐसा नहीं है तो मैं स्वयं शीघ्र ही मौके पर जाकर दोनों प्लान्टेशनों को देखूँगा। इसके बाद ही कुछ कह पाउँगा। सीमेंट पोल और सुरक्षा जाली गिरने की भी जाँच की जाएगी। प्लान्टेशनों के रखरखाव एवं सुरक्षा के लिए लगातार कई सालों तक राशि का प्रावधान रहता है। इस राशि का उपयोग कर मरे हुए पौधों के स्थान पर नए पौधे रोपित कराए जा सकते हैं और आवश्यकता अनुसार रोपण की मरम्मत कराई जा सकती है।”

के.एस. भदौरिया, प्रभारी मुख्य वन संरक्षक वृत्त छतरपुर।

पन्ना टाईगर रिजर्व की सुरक्षा में तस्करों ने फिर लगाई सेंध, पार्क को पहुँचाई बड़ी क्षति, संकट में आया बाघों का संसार !

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स्थल पर सागौन के पेड़ों अवैध कटाई की जाँच करने के लिए जाते एसटीएफ टीम भोपाल के अधिकारी।

* बफर क्षेत्र के जंगल में सागौन के 600 से अधिक पेड़ों की अवैध कटाई

* भोपाल से जांच करने आई एसटीएफ की टीम तो मचा हड़कम्प

* आनन-फानन में डिप्टी रेंजर और वनरक्षक को किया सस्पेंड

* मामले की जानकारी देने से दिन भर बचते रहे पार्क के अधिकारी

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्यप्रदेश का पन्ना टाईगर रिजर्व अपने कुप्रबंधन के कारण एक बार फिर सुर्खियों में है। पार्क की सुरक्षा व्यवस्था में बड़ी लापरवाही उजागर होने के मद्देनजर यहाँ पुनः आबाद हुआ बाघों का संसार गम्भीर संकट से घिरा हुआ नजर आ रहा है। पन्ना टाईगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में सागौन तस्करों ने बड़े पैमाने पर सागौन के पेड़ों का कत्लेआम किया है। इस घटना से पार्क में विचरण करने वाले बाघों, दूसरे वन्यजीवों और संरक्षित क्षेत्र के जंगल की चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था के दावों की पोल खुल गई है। बड़े पैमाने पर सागौन की अवैध कटाई के सनसनीखेज मामले का खुलासा गुरुवार को उस वक्त हुआ जब भोपाल से एसटीएफ की टीम मामले की जांच के सिलसिले में पन्ना स्थित टाईगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक के कार्यालय पहुचीं। एसटीएफ की टीम के आने से पन्ना टाईगर रिजर्व समेत जिले के वन विभाग में हड़कम्प मच गया। बमुश्किल तीन माह के अंदर यह दूसरी बड़ी घटना है जब बाहर की टीम को किसी मामले की जांच करने के लिये पन्ना आना पड़ा है। इसके पूर्व पन्ना के दक्षिण वन मंडल अंतर्गत रैपुरा रेंज में जंगली सुअर के शिकारी को रेंज कार्यालय से रूपये लेकर छोड़ने के बहुचर्चित प्रकारण की जांच करने टाईगर स्ट्राईक फोर्स सतना की टीम आई थी।

दो बीटों में हुई अवैध कटाई

सागौन की अवैध कटाई और मामले की जांच के संबध में पन्ना टाईगर रिजर्व के अधिकारी आज पूरे दिन पत्रकारों को जानकारी देने से बचते रहे। फिर भी इस सम्बध में जितनी जानकारी हांसिल हुई है उसके मुताबिक, पन्ना टाईगर रिजर्व की पन्ना बफर रेंज अंतर्गत तकरीबन 625 पेड़ों की अवैध कटाई की गई है। सागौन की अवैध कटाई बीट हरसा-बी और खजुरी अंतर्गत होना बताया जा रहा है। एसटीएफ की टीम के प्रमुख एस. के. जौहरी के साथ मौके पर पहुँचे पन्ना टाईगर रिजर्व के अधिकारी और मैदानी अमला आज दिन भर ठूंठों की गिनती और अवैध कटाईं से हुई आर्थिक क्षति का आंकलन करता रहा। उधर इस मामले के तूल पकड़ने के बाद सम्बधित रेंज के डिप्टी रेंजर गोविन्द दास सौर और बीटगार्ड अनिल कुमार प्रजापति को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया है।

3 करोड़ से अधिक की पहुँची क्षति

पन्ना टाईगर रिजर्व के बफर क्षेत्र में तस्करों द्वारा कटवाए गए सागौन के पेड़ का ठूँठ।
पन्ना टाईगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक व उप संचालक से जब अवैध कटाई से होने वाली क्षति की जानकारी चाही गई तो उन्होने आंकलन का कार्य जारी होने की बात कहते हुये फोन काट दिया। पता चला है कि सागौन की सामूहिक रूप से अवैध कटाई होने की गुप्त सूचना अथवा शिकायत किसी व्यक्ति द्वारा प्रधान मुख्य वन संरक्षक भोपाल को दी गई। फलस्वरूप इस चिंताजनक मामले को अत्यंत ही गम्भीरता से लेते हुए पीसीसीएफ ने जाँच हेतु भोपाल से एस.के. जौहरी के नेतृत्व में एसटीएफ की टीम को तत्काल पन्ना के लिए रवाना किया गया। उधर, इस मामले की भनक विभाग के शीर्ष अधिकारियों को लगने से पन्ना टाईगर रिजर्व प्रबंधन ने अपनी उदासीनता और नाकामी को छिपाने के लिए प्रथम दृष्टया छोटे कर्मचारियों पर कार्यवाही का चाबुक चलाना शुरू कर दिया है। एक अनुमान के मुताबकि बड़े पैमाने पर हुई सागौन की अवैध कटाई से वन विभाग को लगभग 3 करोड़ से अधिक की क्षति पहुँचीं है। बाजार मूल्य से यदि क्षति का आँकलन किया जाए तो यह लगभग 4 करोड़ से ज्यादा होती है।

न टाईगर बचेंगे न जंगल !

सांकेतिक फोटो।
पन्ना टाईगर रिजर्व की सुरक्षा व्यवस्था में बार-बार लग रही गम्भीर सेंध से इतना तो साफ हो चुका है कि यहाँ पर सबकुछ ठीक नहीं है। क्योंकि अभी ज्यादा समय नहीं हुआ जब लोकसभा चुनाव के समय पन्ना कोर रेंज के अंतर्गत आने वाले रमपुरा तालाब में कथित तौर पर अज्ञात शिकारियों के द्वारा बड़े पैमाने में वन्यप्रणियों का शिकार करने के उद्देश्य से तालाब के पानी में जहर घोल गया था। तालाब में बड़ी तादात मे मछलियां मरने के बाद इसकी भनक वहां तैनात मैदानी कर्मचारियों और अधिकारियों को लगी थी। इतना ही नहीं पानी में जहर घोलने के बाद कथित शिकारी बकायदा कट्टा लेकर अवैध तरीके से रमपुरा तालाब में पहुंच कर मरी हुई मछलियां एकत्र करते हुये पकडे़ गये थे। इसके अलावा लगभग डेढ़ वर्ष पूर्व पन्ना टाईगर रिजर्व की गहरीघाट रेंज अंतर्गत रेडियो कॉलर वाली एक युवा बाघिन के शिकार की हैरान करने वाली घटना सामने आई थी। इस बाघिन का शिकार पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर क्षेत्र में क्लिच वायर का फंदा लगा कर किया गया था।
पन्ना टाईगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक के कार्यालय से बाहर निकलते एसटीएफ टीम भोपाल के अधिकारी।
गौर करने वाली बात यह है कि रेडियो कॉलर वाले बाघ-बाघिनों की 24 घण्टे निगरानी होती है। वाहन में सवार एक टीम इनके पीछे बकायदा एक एन्टीना लेकर इनके सिग्नल चैक करते हुये चलती है। इस तरह रेड़ियो कॉलर वाले बाघ-बाघिनों के पल-पल के मूवमेंट पर पैनी नजर रखी जाती है। बाबजूद इसके कोर क्षेत्र में बाघिन का शिकार होना पार्क की सुरक्षा व्यवस्था और निगरानी तंत्र के पूर्णतः फेल होने प्रमाण है। पार्क की सुरक्षा व्यवस्था में इसी तरह बार-बार यदि आपराधिक लापरवाही उजागर होती रही तो इन हालत में पन्ना टाईगर रिजर्व एक बार फिर बाघ विहीन हो सकता है। पार्क की सुरक्षा व्यवस्था अत्यंत ही लचर होने और यहाँ अराजकतापूर्ण स्थिति निर्मित होने का बड़ा कारण मौजूदा जिम्मेदार अधिकारियों का कुप्रबंधन जिम्मेदार है। इनका फोकस वन्यजीवों एवं वनों पर न होकर निर्माण कार्यों तथा खरीदी से होने वाली निहित स्वार्थपूर्ति पर कहीं अधिक है।

एमपी में पहली बार 7 दिन में 4000 करोड़ के 6 प्रस्ताव को मंजूरी, 7500 लोगों को मिलेगा रोजगार

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मुख्यमंत्री कमलनाथ की अध्यक्षता में मंत्रालय में निवेश संबंधी मंत्रि-मंडल समिति की बैठक हुई।

* प्रदेश में निवेश को तेजी से लाने मुख्यमंत्री कमलनाथ की नई पहल

* मुख्यमंत्री की अध्यक्षता में निवेश प्रोत्साहन संबंधी मंत्रीमंडल समिति की बैठक

भोपाल। (www.radarnews.in) मध्यप्रदेश में पहली बार निवेश के इच्छुक सात निवेशकों के 6 प्रस्तावों को सात दिन में मंजूरी दी गई। चार हजार करोड़ के निवेश से प्रदेश के 7500 लोगों को रोजगार मिलेगा। मुख्यमंत्री कमलनाथ की अध्यक्षता में आज मंत्रालय में निवेश प्रोत्साहन संबंधी केबिनेट कमेटी में इन प्रस्तावों को मंजूरी दी गई। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने स्पष्ट किया है कि प्रदेश में रोजगार और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने वाले निवेश को प्रोत्साहित किया जाएगा। उन्हें बेहतर एवं आधुनिकतम सुविधाएँ उपलब्ध करवाई जायेंगी। मुख्यमंत्री श्री नाथ ने कहा कि निवेश नीति को उन क्षेत्रों पर केंद्रित करेंगे जहाँ रोजगार अधिक है और जहाँ आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा दिया जा सकता है। उन्होंने कहा कि आज कई ऐसे क्षेत्र जैसे टेक्सटाईल, फार्मास्युटिकल, आर्टिफिशियल इन्टेलीजेंस जिसमें निवेश और रोजगार की व्यापक संभावनाएँ हैं। उन्होंने कहा कि ऐसे क्षेत्रों में वे सारी सुविधाएँ निवेशकों को उपलब्ध करवानी, चाहिए जिससे वे प्रोत्साहित हों।

निवेशकों का विश्वास जीतना चुनौती

मुख्यमंत्री श्री नाथ ने कहा कि आज सबसे बड़ी चुनौती है कि मध्यप्रदेश में निवेशकों का विश्वास लौटाएं। उन्होंने कहा कि इसके लिए पूरी कार्य-संस्कृति को मित्रवत और सहयोगी बनाना होगा। मुख्यमंत्री ने प्रदेश में पूर्व से विद्यमान निवेश को भी विस्तार देने और प्रोत्साहित करने को कहा। उन्होंने कहा कि ऐसे क्षेत्रों की पहचान करें और उन्हें बढ़ावा दें। मुख्यमंत्री ने कहा कि पिछले 15 साल में निवेशकों का विश्वास घटा है। कई निवेशकों ने प्रारंभिक रूचि दिखाकर आगे कदम नहीं बढ़ाये। अब निवेशकों का विश्वास जीतना चुनौतीपूर्ण है।

स्वत: निवेश आकर्षित हो ऐसा वातावरण बनाए

मुख्यमंत्री श्री नाथ ने कहा कि औद्योगिक वातावरण और निवेश की संभावनाओं पर झूठे प्रचार से बचना जरूरी है। उन्होंने कहा कि प्रभावी प्रचार-प्रसार के अनुरूप उद्योगों को प्रदेश में अनुकूल स्थितियाँ उपलब्ध हों, यह भी सुनिश्चित करना होगा जिससे पूरे देश में उद्योग जगत और निवेश के क्षेत्र में बेहतर संदेश जाए। मुख्यमंत्री ने देश के उन राज्यों की बेस्ट प्रेक्टिसेज का अध्ययन कर उन्हें अपनाने को कहा जिसके कारण उन प्रदेशों में स्वत: ही निवेश आकर्षित होता है।

निवेश के 6 प्रस्ताव को मंजूरी

मुख्यमंत्री कमलनाथ की अध्यक्षता में हुई बैठक में प्रदेश में पहली बार निवेश के 6 प्रस्तावों को सात दिन के अंदर मंजूरी देने का निर्णय हुआ। रुपये 4025 करोड़ के इन प्रस्तावों से 7500 रोजगार सृजित होंगे। जिन प्रस्तावों को मंजूरी दी गई उनमें मेसर्स स्प्रिंगवे माइनिंग प्राइवेट लिमिटेड का 1400 करोड़, मेसर्स प्रोक्टर एंड गेम्बल होम प्रोडक्ट्स प्राइवेट लिमिटेड का 500 करोड़, मेसर्स आईनॉक्स एयर प्रोडक्ट प्राइवेट लिमिटेड का 125 करोड़, मेसर्स एच.ई.जी. लिमिटेड का 1200 करोड़, मेसर्स श्रीराम पिस्टन एंड रिंग्स लिमिटेड का 600 करोड़ और मेसर्स वंडर सीमेंट लिमिटेड का 200 करोड़ का निवेश प्रस्ताव शामिल है।

माह में एक बार होगी केबिनेट कमेटी की बैठक

मुख्यमंत्री ने बैठक में निवेश संबंधी प्रस्तावों पर माह में एक बार केबिनेट कमेटी में समीक्षा के निर्देश दिए। इनमें ऐसे प्रस्ताव जिनमें नीतिगत या व्यवस्थागत कोई समस्या होगी उसका त्वरित निराकरण कर निर्णय लिया जाएगा।

टेक्सटाइल कंपनी के उद्योगपतियों से बातचीत

बैठक में मुख्यमंत्री ने कहा कि टेक्सटाइल क्षेत्र में प्रदेश में पहले से ही बड़े पैमाने पर उत्पादन होता है। हमारे यहाँ से तैयार गारमेंट्स गुजरात एवं अन्य राज्यों में बिक्री के लिए जाते हैं। उन्होंने कहा कि बड़ी टेक्सटाइल कंपनियाँ अगर प्रदेश में निवेश करेंगी तो बड़े पैमाने पर लोगों को रोजगार मिलेगा। मुख्यमंत्री ने बैठक में ही टेक्सटाइल उद्योग से जुड़े बड़े उद्योगपतियों से चर्चा कर उन्हें प्रदेश में निवेश के लिए आमंत्रित किया। मंत्री-मंडल की बैठक में वित्तमंत्री तरुण भनोत, नगरीय विकास मंत्री जयवर्धन सिंह, मुख्य सचिव एस.आर. मोहंती, अपर मुख्य सचिव ऊर्जा आई.सी.पी. केसरी, अपर मुख्य सचिव वित्त अनुराग जैन, प्रमुख सचिव जनसंपर्क एवं उद्योग राजेश राजौरा, प्रबंध संचालक मध्यप्रदेश औद्योगिक विकास निगम विवेक पोरवाल एवं संबंधित वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित थे।

मनरेगा में मनमानी | कागजों पर मजदूरों को मिल रहा रोजगार, पंचायतों में ठेके पर चल रहे निर्माण कार्य

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कार्यस्थल पर पहुँचकर मनरेगा के पोर्टल पर दर्ज ऑनलाइन जानकारी का सत्यापन करते "देख-परख सैनिक"

* पोर्टल की जानकारी का फील्ड में सत्यापन करने से उजागर हुआ फर्जीवाड़ा

* जिस काम में 132 मजदूर पोर्टल पर दर्ज हैं, मौके पर एक भी नहीं मिला

* गाँव के प्रशिक्षित लोगों ने पकड़ी मनरेगा में बड़े पैमाने पर चल रही गड़बड़ी

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in)  जॉबकार्डधारी मजदूरों के पलायन को रोकने के लिए उन्हें गाँव में ही रोजगार उपलब्ध कराने की गारण्टी प्रदान करने वाली महात्मा गाँधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारण्टी योजना के क्रियान्वयन में मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में बड़े पैमाने पर फर्जीवाड़े का खेल चल रहा है। इसका भण्डाफोड़ मनरेगा के ऑनलाइन पोर्टल पर दर्ज निर्माण कार्यों तथा उनके लिए जारी मस्टर पर रोजगार प्राप्त कर रहे मजदूरों का फील्ड पर जाकर सत्यापन करने से उजागर हुआ है। मनरेगा के जिन कार्यों को ऑनलाइन पोर्टल पर चालू होना बताया जा रहा है और उनमें 100 से अधिक श्रमिकों को रोजगार प्राप्त होना दर्शाया जा रहा है, वे स्थल निरीक्षण में पूर्णतः बंद पाए गए। मौके पर उनमें एक भी श्रमिक कार्य करते हुए नहीं मिला। धरातल पर जाकर मनरेगा की सच्चाई को उजागर करने का यह काम गाँव के उन लोगों ने किया है जोकि हाल ही में डिजिटल साक्षरता का प्रशिक्षण प्राप्त कर ग्राम पंचायत के ऑंनलाइन डाटा का सत्यापन करने में सक्षम हुए हैं।

यहाँ पकड़ी गई गड़बड़ी

पोर्टल पर खखरी निर्माण कार्य चल रहा है जबकि मौके पर पूर्ण होने से बंद हो चुका है।
स्वयंसेवी संस्था समर्थन द्वारा पन्ना जिले के 40 ग्रामों के 50-60 पढ़े लिखे लोगों को डिजिटल साक्षरता का प्रशिक्षण देकर पंचायत दपर्ण एवं मनरेगा से हो रहे कार्यों की निगरानी के लिए तैयार किया गया। इन्हें “देख-परख सैनिक” नाम दिया गया है। आग उगलती इस गर्मी के बीच मंगलवार 11 जून को इन सैनिकों ने पन्ना जनपद पंचायत के कई गांवों में दस्तक देकर मनरेगा के पोर्टल पर प्रदर्शित मस्टर पर दर्ज जानकारियों का फील्ड में जब सत्यापन किया तो उसमें जमीन-आसमान का अंतर् सामने आया। जैसे कि- राजापुर ग्राम के दऊअनटोला में 14 लाख से अधिक की लागत से फसल सुरक्षा दीवार निर्माणाधीन होना बताया जा रहा है। पोर्टल पर इस काम में 132 मजदूरों को रोजगार मिल रहा है। जबकि धरातल की हकीकत ऑनलाइन जानकारी से मेल नहीं खाती। क्योंकि, उक्त कार्य के सत्यापन में मौके पर एक एक भी मजदूर काम करते हुए नहीं मिला। इसी तरह ग्राम पंचायत बिलखुरा में फसल सुरक्षा खखरी निर्माण के दो कार्यों में 112 श्रमिक मस्टर पर काम कर रहे हैं। लेकिन, सच्चाई इसके ठीक उलट है। सत्यापन में पाया गया कि उक्त दोनों कार्य 2-3 माह पूर्व ही पूर्ण हो चुके हैं। फलस्वरूप वहाँ एक भी मजदूर काम करते हुए नहीं मिला। पड़ताल करने पर यह बात सामने आई है कि फसल सुरक्षा दीवार समेत पंचायतों के अधिकांश कार्य ठेके पर कराये जा रहे हैं।
मनरेगा में ठेका प्रथा को मिला रहा बढ़ावा
मनरेगा के कार्यों का स्थल पर जाकर सत्यापन करने से यह बात सामने आई है कि रोजगारमूलक इस योजना का क्रियान्वयन रोजगार गारण्टी कानून के अनुसार न होने के कारण श्रमिकों का इससे मोहभंग हो चुका है। इस स्थिति का लाभ उठाकर पंचायतों के सरपंच-सचिव एवं रोजगार सहायक अपने करीबी व्यक्तियों अथवा निर्माण सामग्री सप्लायरों से ठेके पर पर कार्य कराकर जनपद और जिला पंचायतों में बैठे अधिकारियों की मेहरबानी से श्रमिकों को कागजों पर रोजगार देने का काम बखूबी रहे हैं। इनके द्वारा निर्माण कार्यों के मस्टर में काम न करने वाले अपने विश्वस्त व्यक्तियों के फर्जी नाम दर्ज कर मजदूरी की राशि का बंदरबांट किया जा रहा है। पोर्टल पर ऑनलाइन दर्ज मनरेगा के निर्माण कार्यों की जानकारी के अनुसार स्थल पर सत्यापन करने से जो तथ्य उजागर हुए वे पन्ना जिले में बड़े पैमाने धड़ल्ले से चल रहे इस फर्जीवाड़े की ओर इशारा करते हैं। कतिपय पंचायतों के सरपंच-सचिव ऑफ रिकार्ड चर्चा में खुद भी इस सच्चाई पर मुहर लगा रहे हैं। उनके मुताबिक मनरेगा में 176 रूपए मजदूरी होने और उसका भी समय पर भुगतान सुनिश्चित न हो पाने के कारण जाबकार्डधारी श्रमिक काम करने के लिए राजी नहीं होते इसलिए मजबूरी में ठेके पर काम कराना पड़ता है।
वन विभाग ठेकेदारों पर मेहरबान
जंगल के पत्थरों से निर्मित फसल सुरक्षा दीवार।
पन्ना जिले की विभिन्न पंचायतों में मनरेगा से फसल सुरक्षा दीवार के कार्यों के तहत आवारा पशुओं तथा वन्यजीवों से फसलों को सुरक्षा प्रदान करने के लिए पत्थर की खखरी का निर्माण कार्य कराया जा रहा है। उक्त कार्य वन क्षेत्रों के समीप स्थित ग्राम पंचायतों में स्वीकृत हुए है। मजेदार बात यह है कि जो वनकर्मी कल तक पंचायतों को जंगल में घुसने भी नहीं देते थे अथवा एक पत्ता भी नहीं उठाने देते थे उन्होंने आज पंचायतों में सक्रिय ठेकेदारों के लिए पूरे जंगल को ही खोल दिया है। अर्थात फसल सुरक्षा दीवार निर्माण में जो पत्थर लगाया जा रहा है वह समीपी वन क्षेत्रों से ही सेटिंग के तहत अवैध तरीके से आ रहा है। इस तरह कौड़ियों के दाम पर कार्यस्थल के नजदीक ही पत्थर उपलब्ध होने से खखरी निर्माण पंचयतों के नुमाइंदों और ठेकेदारों के लिए खासा लाभ का काम साबित हो रहा है। इनके निर्माण हेतु स्वीकृत कुल राशि का आधा भी खर्च न होने से जो राशि शेष बच रही है उसका बड़े मजे से बंदरबाँट हो रहा है। उधर, चंद रुपयों के लिए वन सम्पदा के विनाश में संलग्न मैदानी वनकर्मियों के कारनामों से विभाग आला अधिकारी पूरी तरह बेखबर हैं। मनरेगा में उजागर हुईं इन अनियमितताओं की रिपोर्ट स्वयंसेवी संस्था समर्थन ने पन्ना जिले के वरिष्ठ अधिकारियों को भेजी है। अब देखना यह है कि जिम्मेदार अफसर इस पर क्या एक्शन लेते हैं।

“मिढ़ासन नदी पुनर्जीवन परियोजना” बनी मजाक | सदानीरा बनाना था पर गर्मी के मौसम में सूख जाती है नदी

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इस साल जनवरी माह से पूरी तरह सूखी पड़ी मिढ़ासन नदी के पुनर्जीवन कार्य की हकीकत को बयां करता दृश्य।

* न सिंचाई क्षमता बढ़ी और न ही प्रवाह क्षेत्र में आई हरियाली

* अफसरों के लिए चारागाह साबित हुई महत्वकांक्षी योजना

* 20 करोड़ खर्च करने के बाद भी धरातल पर नहीं बदले हालात

शादिक खान, पन्ना। (www.radarnews.in) भारत देश में नदियों को माँ कहा जाता है और नियमित पूजा-अर्चना करने से लेकर इनके पानी में विशेष त्योहारों पर आस्था की डुबकी लगाई जाती है। नदी के अस्तित्व को हमने जीवित मनुष्य की तरह स्वीकार कर कई अधिकार दिए भी दिए हैं। इतना सबकुछ होने के बाद भी देश की अधिकांश नदियों की हालत बद से बद्तर क्यों होती जा रही है यह सवाल महत्पूर्ण है। जीवनदायिनी नदियों की सफाई, संरक्षण तथा इनके पुनर्जीवन की योजनाओं पर पिछले कई सालों से देश भर में सरकारी खजाने की राशि पानी की तरह बहाई जा रही है लेकिन धरातल आपेक्षित परिणाम कहीं नजर नहीं आ रहे हैं। मध्यप्रदेश के पन्ना जिले की मिढ़ासन नदी इसका एक नमूना मात्र है। मिढ़ासन नदी के पुनर्जीवन के नाम पर जिले के साथ क्रूर मजाक किया गया है। जलाभिषेक अभियान के तहत् इस नदी को सदानीरा बनाने वर्ष 2010 से लेकर अब तक 20 करोड़ रूपये खर्च किये जा चुके है, इसके बावजूद मिढ़ासन नदी गर्मी के मौसम में हर साल सूख जाती है। यह हाल उस नदी का है जिसके पुनर्जीवित कर सदानीरा बनाने का संकल्प खुद तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह ने लिया था। कारण चाहे जो भी हो पर जमीनी हकीकत यही है कि, इतनी बड़ी राशि के खर्च के बावजूद मिढ़ासन नदी पुनर्जीवित नहीं हो सकी। इससे परियोजना के क्रियान्वयन पर गम्भीर प्रश्न चिन्ह लगना स्वाभाविक है। क्योंकि इस महत्वकांक्षी योजना के क्रियान्वयन के समय जो लाभ गिनाये जा रहे थे वे भी यर्थाथ के धरातल पर कहीं नजर नहीं आ रहे है।
चिंताजनक पहलू यह है कि मिढ़ासन के मामले में प्रशासन और जनमानस में संवेदनाओं का सूखा व्याप्त है। पन्ना जिले में करीब 3 वर्ष पूर्व धरमसागर तालाब के गहरीकरण के समय प्राचीन जल स्त्रोत के संरक्षण-संर्वधन के पुनीत कार्य में सहभागिता को लेकर जन भावनाओं का जो ऐतिहासिक ज्वार देखने को मिला वह मिढ़ासन में सरकारी खजाने की बर्बादी की बात आने तक शायद भाटे में तब्दील हो गया है। इसलिए मिढ़ासन के मामले में सब खामोशी ओढ़े हुए है। सबसे ज्यादा हैरान उन जिम्मेदार लोगों की चुप्पी करती है जिन्हें इस मामले की पूरी जानकारी है। कितनी बिडम्बनापूर्ण बात है कि एक ओर धरमसागर तालाब के लिए करीब 3 माह तक जन सहयोग से रात-दिन राशि एकत्र की गई और वर्तमान में कई स्थानों पर राशि के आभाव में श्रमदान से तालाब गहरीकरण के कार्य चल रहे हैं लेकिन वहीं दूसरी तरफ मिढ़ासन में एक झटके में ही 20 करोड़ रूपये बहा दिये गये, फिर भी हम खामोश बैठे हैं ?

कागजों तक सिमटे परिणाम

सपत्नीक नर्मदा नदी की आरती करते पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान का फाइल फोटो।
मिढ़ासन नदी पुनर्जीवन कार्य का शुभारंभ करने के दौरान तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने बड़े जोर-शोर के साथ ऐलान करते हुए इस महत्वकांक्षी परियोजना के प्रत्यक्ष और परोक्ष लाभ गिनाये थे। बताया गया था कि मिढ़ासन नदी को उसका मूल स्वरूप लौटाने के लिए कराये जाने वाले कार्यों से नदी के प्रवाह क्षेत्र के किसानों की ढ़ाई हजार हैक्टेयर से अधिक कृषि भूमि अतिरिक्त सिचिंत होगी। वृक्षारोपण और चारागाह विकास होने से क्षेत्र में हरियाली आयेगी। इन बड़े-बड़े दावों की हकीकत यह है कि न तो सिंचाई क्षमता में कोई वृद्धि हुई और न ही प्रवाह क्षेत्र में हरियाली आई है। भू-जल स्तर दो से तीन मीटर तक बढ़ने के बजाय क्षेत्र में जमीन का पानी लगातार तेजी पाताल की ओर खिसक रहा है। भू-जल सर्वेक्षण के आंकड़े इस बात का प्रमाण है। इस परियोजना के तहत चारागाह विकास से अंचल के पशुओं के लिए चारे की सुलभ उपलब्धता का ढ़ोल पीटा गया था। इसकी वास्तविकता यह है कि मिढ़ासन के प्रवाह क्षेत्र के पशुओं को तो चारा मिला नहीं पर यह योजना प्रशासन और शासन में बैठे लोगों के लिए बेहतरीन चारागाह साबित हुई है। बारिश के महीनों को छोड़ दे तो मिढ़ासन के किनारे दूर-दूर तक हरियाली का नामो-निशान तक नहीं दिखता है।

गर्मी में नजर आती है हकीकत

मिढ़ासन नदी के हर साल सूखने से पुनर्जीवन के नाम पर कराये गये कार्यों की उपयोगिता पर उठ रहे हैं सवाल।
मिढ़ासन नदी पुनर्जीवन योजना के तहत् कराये गये कार्यों में व्यापक पैमाने पर अनियमित्तायें और फर्जीवाड़ा हुआ है। यही वजह है कि 26 करोड़ की योजना पर 20 करोड़ खर्च होने के बाद भी परिणाम शून्य है। इसकी हकीकत गर्मी के मौसम में मार्च के महीने में ही दिखने लगती है। गौरतलब है कि जबसे मिढ़ासन पुनर्जीवन का कार्य प्रारंभ हुआ तब से लेकर अब तक एक भी वर्ष ऐसा नहीं रहा कि जब मिढ़ासन नदी पूरी तरह सूखी न हो। किसी साल वर्षा यदि सामान्य होती है तो मिढ़ासन नदी अप्रैल-मई महीने में सूख जाती है यदि बारिश कम हुई तो जनवरी-फरवरी मेंं ही नदी की तलछट मैदान में तब्दील हो जाती है और उससे धूल उड़ने लगती है।

योजना से हुए प्रत्यक्ष-परोक्ष लाभ जो कहीं नजर नहीं आते

           प्रत्यक्ष लाभ

       परोक्ष लाभ

अतिरिक्त सिंचाई क्षमता वृद्धि – 25422 हैक्टेयर
भूजल संर्वधन से मिट्टी के नमी में बढ़ोत्तरी
वृक्षारोपण – 1505 हैक्टेयर
 पर्यावरण सुधार
चारागाह विकास – 129 हैक्टेयर
 पशुओं के लिये स्थायी पेयजल की उपलब्धता
जलाऊ लकड़ी की उपलब्धता में वृद्धि
10-15 क्विंटल प्रति हैक्टेयर खाद्यान्न उत्पादन में वृद्धि
कपिलधारा योजना से 50 हितग्राहियों को लाभ
प्रवाह क्षेत्र में अतिरिक्त सिंचाई क्षमता निर्मित होना
भू-जल स्तर में 2-3 मीटर जल स्तर में वृद्धि
भूमि कटाव का रूकना
निस्तार हेतु अतिरिक्त जल की उपलब्धता
बिगड़े वनों में सुधार
जॉब कार्डधारियों को रोजगार की उपलब्धता
प्रति व्यक्ति आय में वृद्धि
मेड़ बंधान से लगभग 450 हितग्राहियों को लाभ
फल सब्जियों के उत्पादन में वृद्धि

 

वारदात : बहिन के विवाह में व्यस्त था युवक…देर रात प्रेमिका ने फोन कर मिलने बुलाया, फिर हुआ कुछ ऐसा जिससे गाँव में पसरा मातम ?

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घटनास्थल पर मौजूद ग्रामीण एवं थाना पुलिस बल।

* पत्नी के प्रेमी की गोली मारकर हत्या करने का मामला

* मृतक के परिजनों का आरोप योजनाबद्ध तरीके से की गई हत्या

* पन्ना जिले के बृजपुर थाना के पहाड़ीखेरा चौकी क्षेत्र की घटना

* कुछ दिन पूर्व एक अधेड़ ने चरित्र संदेह पर पत्नी की कर दी थी हत्या

हरिशंकर पाण्डेय/रुपेश जैन, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में बृजपुर थाना के पहाड़ीखेरा चौकी क्षेत्र अंतर्गत रविवार-सोमवार की दरम्यानी रत एक नवयुवक की गोली मारकर नृशंस हत्या कर दी गई। सनसनीखेज वारदात के बाद से इलाके में तनाव और मातम का माहौल निर्मित है। मृतक की पहचान सुखेन्द्र गौंड़ पिता सुखदिन्ना गौंड़ 22 वर्ष निवासी ग्राम भसूड़ा गोंड़नटोला के रूप में हुई है। हत्या की जघन्य वारदात को कथित तौर प्रेम प्रसंग के चलते प्रेमिका के पति द्वारा अंजाम देने का आरोप मृतक के परिजनों ने लगाया है। हालाँकि पुलिस ने अब तक इसकी आधिकारिक पुष्टि नहीं की है। जिस समय सुखेन्द्र की हत्या की गई उस समय उसके घर पर बहिन की बारात आई थी और खुशी के माहौल में विवाह की रस्में चल रहीं थीं। इस बीच जब अचानक सुखेन्द्र की हत्या की दुखद खबर आई तो सब स्तब्ध रह गए। अँधे कत्ल की इस वारदात का खुलासा करने के लिए पुलिस संदिग्ध आरोपी की तालाश में जुटी है।

मातम में बदलीं विवाह की खुशियाँ

मृतक सुखेन्द्र आदिवासी का शव।
प्राप्त जानकारी के अनुसार सुखेन्द्र पिता सुखदिन्ना गौंड़ 22 वर्ष निवासी ग्राम भसूड़ा गोंड़नटोला का प्रेम प्रसंग समीपी गाँव मोहनपुरा निवासी एक नवविवाहिता के साथ लम्बे समय से चल रहा था। दोनों के परिवार वालों को इसकी जानकारी थी। कुछ समय पूर्व ही नवविवाहिता अपने मायके मोहनपुरा आई थी। रविवार 9 जून को सुखेन्द्र पिता सुखदिन्ना गौंड़ 22 वर्ष निवासी ग्राम भसूड़ा गोंड़नटोला के घर पर बहिन के विवाह का कार्यक्रम चल रहा था। इस दौरान सुखेन्द्र गौंड़ अपने बारातियों के स्वागत-सत्कार में व्यस्त था। तभी देर रात कथिततौर पर प्रेमिका ने उसे कॉल करके मिलने के लिए बुलाया। रात में सुखेन्द्र जब मोहनपुरा के लिए रवाना हुआ तो रास्ते में स्कूल के समीप किसी ने उसे गोली मार दी। सिर में गोली लगने से सुखेन्द्र गौंड़ की मौके पर ही दर्दनाक मौत हो गई। उधर, जवान बेटे की मौत का दुखद समाचार जब परिजनों को मिला तो आदिवासी परिवार में कोहराम मच गया। बेटी के विवाह की रस्मों के बीच आई इस स्तब्ध करने वाली खबर से विवाह की खुशियाँ एक पल में ही मातम में तब्दील हो गईं।
बहिन के वैवाहिक कार्यक्रम में सुखेन्द्र को जिन लोगों ने व्यस्त देखा था उन्हें कुछ देर तो इस खबर पर भरोसा ही नहीं हुआ। लेकिन जब परिजन, रिश्तेदार और ग्रामीण मौके पर पहुँचे तो मोहनपुरा के शासकीय स्कूल के सामने सड़क किनारे सुखेन्द्र गौंड का खून से लथपथ शव देखकर सबके होश उड़ गए। आनन-फानन में इस घटना की सूचना पुलिस को दी गई। मृतक के परिजनों का आरोप है कि सुखेन्द्र की प्रेमिका का पति घटना के समय गाँव में ही था। उसी ने योजनाबद्ध तरीके से सुखेन्द्र की गोली मारकर हत्या की है। हत्या की वारदात के बाद से संदिग्ध आरोपी फरार है। थाना पुलिस उसकी धरपकड़ के प्रयास में जुटी है।

पहले घर से भाग चुका है प्रेमी युगल

हत्या की वारदात के बाद शोकमग्न बैठीं गाँव की महिलायें।
अविवाहित नवयुवक सुखेन्द्र गौंड़ 22 वर्ष और उसकी स्वजातीय विववाहित प्रेमिका के सम्बंध में पता चला है कि दोनों कुछ माह पूर्व में अपने घर से भाग गए थे। इसके बाद दोनों परिवारों के बीच काफी विवाद हुआ था। लेकिन सामाजिक बदनामी के डर और बेटी के वैवाहिक जीवन के मद्देनजर मायके पक्ष ने इस घटना की रिपोर्ट नहीं की थी। चौतरफा दबाब बढ़ने पर युवती कुछ दिन बाद ही वापिस गाँव लौट आई थी। जबकि सुखेन्द्र बहिन के विवाह में शामिल होने के लिए महीने भर पूर्व ही गाँव आया था। प्रेम प्रसंग के चलते सुखेन्द्र हत्या की वारदात की खबर आने के बाद से इलाके में इसे लेकर तरह-तरह की चर्चाएँ व्याप्त है। उल्लेखनीय है कि गत दिनों पन्ना जिले में कुछ इसी तरह की एक अन्य हैरान करने वाली घटना सामने आई थी। यहाँ के शाहनगर थाना क्षेत्र अंतर्गत सुडौर में केत बाई आदिवासी 38 वर्ष को गाँव के ही एक युवक से बात करते हुए देखने पर पति रम्मू आदिवासी ने चरित्र संदेह के चलते कुल्हाड़ी से प्रहार कर निर्ममतापूर्वक हत्या कर दी थी। मृतिका केत बाई पाँच बच्चों की माँ थी। पत्नी की हत्या करने के बाद रम्मू आदिवासी ने थाना शाहनगर पहुंचकर खुद को पुलिस के हवाले कर दिया था।

नाबालिग बच्ची की हत्या के दोषियों को दिलवायेंगे कड़ी सजा : मंत्री श्री शर्मा

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पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, मंत्री पी.सी.शर्मा और आरिफ अकील नेहरू नगर स्थित मंडवा बस्ती की नाबालिग बच्ची की अंतिम यात्रा में शामिल हुए।

* पूर्व मुख्यमंत्री श्री सिंह एवं मंत्री श्री शर्मा, श्री अकील ने दी मासूम को अंतिम विदाई 

भोपाल।(www.radarnews.in) विधि-विधायी कार्य एवं जनसम्पर्क मंत्री पी.सी. शर्मा ने नेहरू नगर की मांडवा बस्ती की नाबालिग बच्ची के साथ दुष्कर्म और हत्या की कड़ी निंदा की है। उन्होंने कहा कि नाबालिग के विरूद्ध अपराध करने के दोषियों को किसी भी हालत में बख्शा नहीं जायेगा। उन्हें कड़ी से कड़ी सजा दिलवायेंगे। मंत्री श्री शर्मा ने पुलिस को सख्त निर्देश दिये हैं कि ऐसे मामले में तुरंत कठोर कार्रवाई करें। लापरवाही बरतने वाले पुलिसकर्मियों के खिलाफ तुरंत कड़ी कार्यवाही की जाए। दुष्कर्मियों को फास्ट ट्रैक कोर्ट से फाँसी की सजा दिलवाने के लिये तत्परतापूर्वक कार्यवाही की जाये, जिससे इस तरह के मामलों पर पूरी तरह अंकुश लगाया जा सके।
पूर्व मुख्यमंत्री दिग्विजय सिंह, जनसम्पर्क मंत्री शर्मा और अल्पसंख्यक कल्याण मंत्री आरिफ अकील दिवंगत नाबालिग बच्ची की अंतिम यात्रा में शामिल हुए और उसे कांधा देकर अंतिम विदाई दी। इस मौके पर पार्षद मोनू सक्सेना और गणमान्य नागरिक सहित बड़ी संख्या में स्थानीय रहवासी मौजूद रहे।

.. अब एसीएस किसी भी समय बिजली कम्पनी के अधिकारियों करेंगे कॉल, फोन रिसीव नहीं हुआ तो होगी अनुशासनात्मक कार्रवाई, 24 घंटे निर्बाध बिजली आपूर्ति सुनिश्चित करने एक्शन मोड में आई सरकार

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अपर मुख्य सचिव ऊर्जा आई.सी.पी. केशरी ने ड्राफट कामर्सियल मेन्युएल पर वर्कशाप को संबोधित किया।

* कामर्शियल मैन्युअल ड्राफ्टिंग कार्यशाला में एसीएस ऊर्जा ने दिए निर्देश

भोपाल।(www.radarnews.in) बेहाल करने वाली प्रचंड गर्मी के समय अघोषित विधुत कटौती और तकनीकी खराबी के कारण विधुत आपूर्ति बाधित होने की प्रदेश भर से लगातार खबरें आ रहीं हैं। इससे प्रभावित आम जनमानस की सख्त नाराजगी को देखते हुए प्रदेश सरकार एक्शन मोड में आ गई है। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कुछ दिन पूर्व ऊर्जा विभाग की समीक्षा करते प्रदेश में पर्याप्त बिजली उपलब्ध होने के बाबजूद बिजली कटौती किए जाने पर कड़ी आपत्ति जताई थी। उन्होंने विधुत कटौती पर अफसरों को कड़ी फटकार लगाते हुए 24 घंटे निर्बाध विद्युत आपूर्ति सुनिश्चित करने के कड़े निर्देश दिए थे। फलस्वरूप अब ऊर्जा विभाग के एसीएस आई.सी.पी.केशरी ने विधुत कम्पनी के अधिकारियों को विधुत व्यवस्था सुचारु रखने में किसी तरह की लापरवाही न बरतने की सख्त हिदायत दी है।
अपर मुख्य सचिव श्री केशरी ने सपष्ट शब्दों में कहा कि विद्युत वितरण की व्यवस्था तभी सुचारू और पुख्ता मानी जा सकती है जब हम विद्युत आपूर्ति को लेकर 24 घंटे सजग रहें। निर्बाध विद्युत आपूर्ति राज्य शासन की प्राथमिकता है और इसमें किसी भी प्रकार की कोताही बर्दाशत नहीं की जाएगी। उन्होंने प्रदेश के सभी कार्मिकों से कहा कि वे मुख्य महाप्रबंधक से लेकर जूनियर इंजीनियर तक किसी को भी उनके मोबाइल पर किसी भी वक्त अज्ञात नंबर से फोन कर सकते हैं। यदि फोन नहीं उठा तो संबंधित के विरूद्ध सख्त अनुशासनात्मक कार्यवाही की जाएगी। श्री केशरी ने उपभोक्ताओं के प्रति संवेदनशील बनने और उनसे अच्छे व्यवहार की बात कही। श्री केशरी आज मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी के पॉवर डिस्ट्रीब्यूशन ट्रेनिंग सेन्टर में ड्राफ्ट कामर्शियल मैन्युअल को अंतिम रूप देने की कार्यशाला में बोल रहे थे।
अपर मुख्य सचिव ऊर्जा आई.सी.पी.केशरी ने कहा कि विद्युत वितरण व्यवस्था में मीटरिंग, बिलिंग और कलेक्शन को नियमों के अनुसार ही प्रभावी ढंग से क्रियान्वित किया जाना चाहिए। हर उपभोक्ता के घर मीटर लगा हो, उसकी रीडिंग हो और देयक नियत तिथि से पहले पहुँचे। उन्होंने कहा कि बिलिंग चक्र की समीक्षा की जाये। श्री केशरी ने कहा कि जले, खराब मीटर अथवा उपभोक्ता परिसर में मीटर विद्युत लाइन के सर्किट में नहीं होने के आधार पर ही औसत बिलिंग हो और इस बीच संबंधित उपभोक्ता परिसर में मीटर बदलने की कार्यवाही सुनिश्चित होना चाहिए। औसत बिल तीन माह से अधिक का नहीं हो। । कार्यशाला में तीनों वितरण कंपनियों के प्रबंध संचालक ने कामर्शियल मैन्युअल को लेकर अपने विचार रखे। कार्यशाला में समूह संचार की प्रक्रिया के लिये प्रबंध संचालक की अध्यक्षता में चार समूह गठित किए गए। इन समूहों ने वाणिज्यिक गतिविधियों में आ रही व्यवहारिक दिक्कतों को ध्यान में रखते हुए प्रस्तुतिकरण दिया। सुझावों और प्रस्तुतीकरण की समीक्षा के बाद का कमर्शियल मैन्युअल को एक सप्ताह में अंतिम रूप दिया जाएगा।

बिन पानी सब सून | उद्गम से संगम तक सूखी पड़ी “मिढ़ासन”… नदी पुनर्जीवन के नाम पर खर्च हो गए 20 करोड़

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इस साल जनवरी माह से पूरी तरह सूखी पड़ी मिढ़ासन नदी के पुनर्जीवन कार्य की हकीकत को बयां करता दृश्य।

* शिवराज ने लिया था मिढ़ासन को सदानीरा बनाने का संकल्प

* बुन्देलखण्ड विशेष पैकेज और मनरेगा से कराया नदी पुनर्जीवन कार्य

* हर साल गर्मी के मौसम में पूरी तरह सूख जाती है मिढ़ासन नदी

शादिक खान, पन्ना।(www.radaranews.in) मध्यप्रदेश के बुन्देलखण्ड अंचल में सूखे की त्रासदी साल दर साल भयावह रूप ले रही है। इसका एक बड़ा कारण अति पिछड़े इस इलाके में प्राकृतिक जल स्रोतों तथा वर्षा जल संरक्षण-संर्वधन से जुड़े कार्यों का धरातल पर सही तरीके से क्रियान्वयन न होना है। पन्ना जिले की “मिढ़ासन नदी पुनर्जीवन” कार्यक्रम इसका एक उदाहरण मात्र है। इस नदी को पुनर्जीवित करने के नाम पर शिवराज सरकार में करीब 20 करोड़ रूपए विभिन्न कार्यों पर खर्च किए गए थे। जिसका नतीजा यह है कि पिछले पाँच माह से मिढ़ासन नदी अपने उद्गम से संगम तक पूरी तरह सूखी पड़ी है। कभी सदानीरा रहते हुये कल-कल कर प्रवाहित होने वाली मिढ़ासन नदी में वर्तमान में धूल उड़ रही है। वर्ष 2010 में पन्ना में जल अभिषेक अभियान अंतर्गत मिढ़ासन नदी पुनर्जीवन का तत्कालीन मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान ने एक भव्य कार्यक्रम में शुभारम्भ करते हुए तीन वर्ष में इस नदी को पूर्व की तरह उसका सदानीरा स्वरूप लौटने का संकल्प लिया था। लेकिन शासन-प्रशासन में इच्छाशक्ति के आभाव, कार्यक्रम के क्रियान्वयन में अनियमितताओं और घोर लापरवाही के चलते पूर्व मुख्यमंत्री का संकल्प आज भी न सिर्फ अधूरा पड़ा है बल्कि इसे लेकर उनका अक्सर काफी मजाक भी उड़ता रहता है। क्योंकि, नदी पुनर्जीवन का कार्य प्रारम्भ होने से लेकर अब तक करीब 9 वर्षों में हर साल मिढ़ासन नदी गर्मी के मौसम में पूरी तरह सूख जाती है। मिढ़ासन नदी पुनर्जीवन की जमीनी सच्चाई शिवराज के कार्यकाल में ही उजागर हो गई थी। मजेदार बात तो यह कि पूर्व सीएम शिवराज सिंह चौहान वर्ष 2010 के बाद पन्ना के दौरे पर कई बार आए लेकिन उन्होंने फिर कभी मिढ़ासन नदी और उससे जुड़े अपने संकल्प को पूरा करने की सुध नहीं ली।

राशि खर्च की उपयोगिता पर सवाल

मिढ़ासन नदी के प्रवाह क्षेत्र किनारे रहने वाले लोगों की मानें तो पिछले 9 वर्षों से यह नदी गर्मी के मौसम में हर साल सूख जाती है। फर्क सिर्फ इतना है कि यदि किसी साल बारिस अच्छी हुई तो नदी मार्च-अप्रैल में सूखती है, अगर बारिस कम हुई तो दिसम्बर-जनवरी महीने में ही मिढ़ासन की सतह मैदान में तब्दील हो जाती है। मिढ़ासन को उसका मूल स्वरूप लौटाकर प्रवाह क्षेत्र पर पुनः हरियाली की चादर ओढ़ाने के संकल्प के साथ विभिन्न कार्यों पर 20 करोड़ रूपये पानी की तरह बहाने के बाद भी नदी के पूरी तरह सूखने से पुनर्जीवन कार्यक्रम के क्रियान्वयन की उपयोगिता पर गंभीर प्रश्न चिन्ह लग रहे हैं। इसे मिढ़ासन नदी के पुनर्जीवन कार्यक्रम की असफलता माना जाये या फिर मृत प्राय नदी को जीवित करने का बीड़ा उठाते हुये प्राकृतिक जल स्त्रोतों के संरक्षण-संर्वधन की सराहनीय पहल की आड़ में महज निहित स्वार्थों की पूर्ति के लिये सरकारी धनराशि के सुनियोजित दुरूपयोग के उदाहरण के रूप में देखा जाये। मामला चाहे जो भी हो पर इतनी बड़ी धनराशि खर्च होने के बाद भी मिढ़ासन नदी के पुनर्जीवित न हो पाने से इस महत्वकांक्षी कार्यक्रम की उच्च स्तरीय निष्पक्ष जांच बेहद आवश्यक हो गई है। ताकि उन कारणों का खुलासा हो सके जो कि नदी पुनर्जीवन कार्यक्रम के फ्लॉप होने के लिये जिम्मेदार हैं। विडम्बना यह है कि जल संरक्षण-संवर्धन पर उपदेश देने वाले जिम्मेदार जन प्रतिनिधि, प्रशासनिक अधिकारी, मिढ़ासन के मामले में चुप्पी साधे हुये बैठे हैं। जिससे इनके दोहरे चरित्र का पता चलता है।

81 किलोमीटर है प्रवाह क्षेत्र

मिढ़ासन नदी मुख्य रूप से केन नदी की एक सहायक नदी है। यह केन गंगा कछार में आने वाली मुख्य नदियों में से एक है। मिढ़ासन नदी का उद्गम पन्ना जिले की पन्ना जनपद पंचायत के ग्राम मुटवाकलॉ से होता है। पहाड़ी नालों और जंगल से पतली धार के रूप में मुटवाकलॉ से प्रारंभ होकर मिढ़ासन नदी गुनौर विकासखण्ड अंतर्गत 81 किलोमीटर तक प्रवाहित होकर अमानगंज के समीप 7 नदियों के प्रसिद्ध संगम स्थल पण्डवन में केन नदी में समाहित हो जाती है।

अत्याधिक दोहन से बनी बरसाती नदी

मिढ़ासन की मौजूदा स्थिति को देखते हुये इसे बरसाती नालों की तरह बरसाती नदी कहना अतिश्योक्तिपूर्ण न होगा। कभी जीवनदायिनी रही मिढ़ासन नदी का अत्याधिक दोहन होने के कारण आज मृत प्राय अवस्था में पहुंच चुकी इस नदी को जीवन की दरकार है। विगत् दो दशक में मिढ़ासन नदी का तेजी से सतत् दोहन तो किया गया किन्तु इसके प्रवाह को वर्ष भर बनाये रखने की ओर जन समुदाय या शासन-प्रशासन द्वारा विशेष ध्यान नहीं दिया गया। फलस्वरूप इसका कछार भी तेजी से नष्ट होता चला गया। पिछले कुछ सालों में पन्ना जिले में साल दर साल गंभीर होते जल संकट के मद्देनजर मिढ़ासन नदी के प्रति जनमानस की घोर उपेक्षा अथवा उदासीनता हैरान करने वाली है। उधर, सूखी पड़ी मिढ़ासन नदी में जल प्रवाहित कर उसका मूल स्वरूप लौटाने के लिये शासन-प्रशासन स्तर पर अब तक जो भी कार्य कराये गये वे अनुपयोगी ही साबित हुये हैं। इन परिस्थितियों में इस नदी का पुनर्जीवन महज छलावा बनकर रह गया है।

पुनर्जीवन हेतु कराये गये कार्य

मिढ़ासन नदी पुनर्जीवन योजना के तहत् निर्मित संरचनाओं को दो भागों वन क्षेत्र एवं राजस्व तथा हितग्राही क्षेत्र में विभाजित किया गया है। इसमें भौगोलिक परिस्थितियों के अनुसार पृथक-पृथक रूप से गतिविधियां चिन्हित कर नदी के उपचार हेतु विभिन्न संरचनाओं का निर्माण कराया गया। वन क्षेत्र में कंटूर ट्रैंच, बोल्डर चेक, चेक डेम, स्टापडेम, नवीन तालाब, तालाब जीर्णोंद्धार, रिंग डेम, वृक्षारोपण, चारागाह विकास तथा राजस्व एवं हितग्राही क्षेत्र में मेड़ बंधान, कच्चा नाला बंधान, बोल्डर चेक, चेक डेम, नवीन तालाब, तालाब जीर्णोंद्धार वीयर व करोड़ों रूपये की लागत से स्टापडेम बनाये गये। निर्माण कार्यों की श्रृंखला खड़ी करने के बाद भी मिढ़ासन नदी के पुनर्जीवित न हो पाने से कराये गये कार्यों की उपयोगिता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। जिनका जवाब शासन-प्रशासन में शीर्ष पदों पर बैठे कथित जिम्मेदारों के पास नहीं है। इतने महत्वपूर्ण कार्यक्रम पर इतनी बड़ी राशि खर्च करने के बाद भी अपेक्षा अनुरूप परिणाम न मिलना बेहद चिन्ताजनक है।

अधूरा है पूर्व सीएम का संकल्प

पूर्व मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान।
उल्लेखनीय है कि जल अभिषेक अभियान 2010 के अंतर्गत मिढ़ासन नदी पुनर्जीवन कार्यक्रम का शुभारंभ तत्कालीन मुख्यमंत्री एवं प्रदेश के सर्वोच्च जल नायक शिवराज सिंह चौहान द्वारा किया गया था। प्राकृतिक जल स्त्रोत के संरक्षण से जुड़े इस महत्वकांक्षी कार्यक्रम के सूत्रधार और प्रेरणास्त्रोत स्वयं मुख्यमंत्री श्री चौहान रहे हैं। प्रदेश के मुखिया के नेतृत्व में नदी पुनर्जीवन के पुनीत कार्य का जोर-शोर से आगाज करने के दौरान यह संकल्प लिया गया था कि लगातार जल संरक्षण तथा मृदा संरक्षण के कार्य कराकर मिट्टी के क्षरण को रोका जायेगा और वर्षा जल को भूमि में समाहित कर इस 3 वर्षीय कार्ययोजना के पूर्ण होने के पश्चात मिढ़ासन नदी को उसका सदानीरा वाला पुनारा स्वरूप लौटाया जायेगा। लेकिन मिढ़ासन नदी के हर साल गर्मी के मौसम में सूखने के कारण इसके पुनर्जीवन का संकल्प धरातल पर आज भी अधूरा है। नर्मदा नदी की परिक्रमा करने वाले और नदियों के संरक्षण को लेकर बड़ी-बड़ी बातें करने वाले शिवराज सीएम रहते हुए अपने पूरे कार्यकाल में मिढ़ासन नदी पर चुप्पी साधे रहे। इसके पुनर्जीवन का का संकल्प लेकर उन्होंने वाहवाही तो खूब बटोरी थी लेकिन ईमानदारी से नदी को पुनर्जीवित कराने पर आवश्यक ध्यान नहीं दिया। जल संकट से मची त्राहि-त्राहि को देखते हुए प्राकृतिक जल का महत्वपूर्ण स्रोत कहलाने वाली नदियों को बचाने सूबे की नई सरकार क्या कदम उठाती है अब यह देखना महत्वपूर्ण होगा।
मिढ़ासन नदी के हर साल सूखने से पुनर्जीवन के नाम पर कराये गये कार्यों की उपयोगिता पर उठ रहे हैं सवाल।

 मिढ़ासन नदी पुनर्जीवन योजना एक नजर में

नदी की कुल लम्बाई
81 किलोमीटर
नदी का कुल केचमेंट क्षेत्र
970 वर्ग किलोमीटर
उद्गम स्थल
ग्राम पंचायत मुटवा जनपद पन्ना जिला पन्ना
उपचार हेतु चयनित लंबाई
24 किलोमीटर
उपचार हेतु चयनित क्षेत्र
214 वर्ग किलोमीटर
उपचार हेतु चयनित ग्राम पंचायतें
23
कार्यों पर व्यय की जाने वाली राशि
26 करोड़ 69 लाख 54 हजार
जून 2016 तक व्यय
 19 करोड़ 78 लाख रूपये
परियोजना की अवधि
3 वर्ष