वन विभाग में “जंगलराज”: ‘कोर्ट ने कहा- दंडित करो, विभाग ने दे दिया डबल प्रमोशन’

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फोटो-01 कैप्शन- कार्यालय वन संरक्षक वन वृत्त छतरपुर का भवन। (फाइल फोटो)

   16 साल पुराने आदेश पर अमल नहीं, दोषी बताए गए कर्मचारियों को मिली मनचाही पोस्टिंग

*      न्यायालय की टिप्पणी के बाद भी कार्रवाई शून्य, मुख्य लिपिक की भूमिका पर उठे सवाल

*      राज्यपाल, लोकायुक्त और मुख्य सचिव से शिकायत, छतरपुर से भोपाल तक हलचल

शादिक खान, पन्ना /छतरपुर।(www.radarnews.in) वन विभाग छतरपुर एक बार फिर गंभीर आरोपों के घेरे में है। विभाग पर न्यायालय के आदेशों की अनदेखी कर दोषी बताए गए कर्मचारियों को दंडित करने के बजाय पदोन्नति देने, संरक्षण प्रदान करने और वर्षों तक प्रकरण ठंडे बस्ते में डालकर रखने के आरोप लगे हैं। मामले को लेकर राज्यपाल, लोकायुक्त और प्रमुख सचिव वन विभाग से लिखित शिकायत की गई है, जिससे विभागीय गलियारों में हलचल तेज हो गई है।
मामला वन परिक्षेत्र बिजावर, वन मंडल छतरपुर के वन अपराध प्रकरण क्रमांक 168/7 दिनांक 04/07/2007 से जुड़ा है। आरोप है कि 3-4 जुलाई 2007 की दरम्यानी रात 118 सागौन वृक्षों की कटाई के मामले में तीन ग्रामीणों को नामजद कर न्यायालय में प्रस्तुत किया गया था। इसके बाद माननीय मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट, छतरपुर में दर्ज आपराधिक प्रकरण क्रमांक 1484/07, संस्थित दिनांक 03/08/2007 की सुनवाई हुई। सुनवाई के बाद मुख्य न्यायिक मजिस्ट्रेट छतरपुर ने दिनांक 25/03/2010 को निर्णय पारित करते हुए तीनों आरोपियों को दोषमुक्त करार दिया था। न्यायालय ने अपने आदेश में कहा था कि इतने बड़े पैमाने पर सागौन कटाई स्थानीय वन कर्मचारियों की मिलीभगत के बिना संभव नहीं प्रतीत होती। साथ ही संबंधित कर्मचारियों के विरुद्ध विभागीय जांच एवं कठोर दंडात्मक कार्रवाई किए जाने हेतु आदेश की प्रति प्रधान मुख्य वन संरक्षक भोपाल को भेजने के निर्देश दिए गए थे।
शिकायतकर्ता का आरोप है कि न्यायालय के स्पष्ट आदेश के बावजूद न तो दोषी कर्मचारियों पर कोई कार्रवाई की गई और न ही निर्णय के विरुद्ध विभाग ने अपील दायर की। उल्टा जिन कर्मचारियों पर सवाल उठे, उन्हें समय-समय पर पदोन्नति देकर कार्यवाहक डिप्टी रेंजर और कार्यवाहक रेंजर जैसे पदों पर बैठाया गया। इससे विभाग की कार्यप्रणाली और जवाबदेही पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग रहे हैं। मामले में वन वृत्त छतरपुर के मुख्य लिपिक राघवेंद्र प्रसाद द्विवेदी की भूमिका भी सवालों के घेरे में बताई जा रही है। शिकायत में आरोप लगाया गया है कि सेवा अभिलेख और पदोन्नति प्रक्रिया की जानकारी होने के बावजूद नियमों की अनदेखी कर संबंधित कर्मचारियों को लाभ पहुंचाया गया। शिकायतकर्ताओं ने इसकी निष्पक्ष जांच कर आपराधिक प्रकरण दर्ज करने की मांग की है। आरोप यह भी है कि जिन कर्मचारियों पर न्यायालय ने कार्रवाई योग्य टिप्पणी की, उन्हें मनचाही पोस्टिंग देकर उपकृत किया गया। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि यदि अदालत के आदेशों पर भी अमल नहीं होगा, तो आम नागरिक न्याय की उम्मीद किससे करे।
शिकायतकर्ता शिशुपाल अहिरवार ने पूरे मामले की उच्चस्तरीय जांच, जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका तय करने तथा दिनांक 25/03/2010 के न्यायालयीन आदेश का पालन सुनिश्चित करने की मांग की है। उनका कहना है कि यह केवल विभागीय अनियमितता नहीं, बल्कि प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायिक गरिमा से जुड़ा गंभीर मामला है। अब नजर इस बात पर है कि शासन स्तर पर इस शिकायत पर क्या संज्ञान लिया जाता है और वर्षों पुराने इस विवाद में जवाबदेही तय होती है या नहीं।