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बेकाबू हुए हालात : जंगल में करंट बिछाकर तेंदुए का शिकार, खाल और पंजे ले गए अज्ञात शिकारी, बेजुबान वन्यजीवों के शिकार की नहीं थम रहीं घटनाएं

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पन्ना के उत्तर वन मण्डल अंतर्गत कुछ समय पूर्व जंगल में करंट बिछाकर शिकार किये गए तेंदुए का शव।

* उत्तर वन मण्डल पन्ना अंतर्गत धरमपुर रेन्ज का मामला

* सोता रहा मैदानी वन अमला सप्ताह भर बाद लगी भनक

* पन्ना में अब महफूज़ नहीं वन्यजीव, वृक्ष और बहुमूल्य खनिज संपदा

* जिले जंगलों में सक्रिय है शिकारी, वन्यजीव तस्कर और खनन माफिया

* दो वर्ष में डेढ़ दर्जन तेन्दुओं, दो बाघों सहित अन्य वन्यजीवों का हुआ शिकार

शादिक खान, पन्ना। (www.radarnews.in) मध्य प्रदेश का पन्ना जिला बेजुबान वन्यजीवों के शिकार की बढ़ती घटनाओं एवं दूसरे वन अपराधों को लेकर लम्बे समय सुर्ख़ियों में बना है। जिले के जंगलों में शिकारी गिरोहों और वन्यजीव तस्करों के सक्रिय होने से यहाँ के उत्तर-दक्षिण वन मण्डल व टाईगर रिजर्व अंतर्गत शिकार की घटनाएं लगातार सामने आ रहीं हैं। निरीह वन्य प्राणियों के शिकार और वनों की विनाशलीला पर रोक लगाने में वन विभाग के अफसर अब तक नाकाम साबित हुए हैं। इनके प्रयासों में दृढ़ इच्छाशक्ति, रणनीति और आपसी समन्वय का आभाव साफ़ नजर आता है। फील्ड में वनों की सुरक्षा एवं निगरानी व्यवस्था लगभग ठप्प होने से हालात बेकाबू हो चुके हैं। परिणामस्वरूप शिकार की घटनाएं थमने का नाम नहीं ले रहीं।
ताजा मामला पन्ना जिले के उत्तर वन मण्डल की धरमपुर रेन्ज अंतर्गत सामने आया है। यहाँ की कुड़रा बीट के वन कक्ष क्रमाँक -53 में प्राचीन बीहर के समीप सप्ताह भर पुराना एक वन्यजीव का क्षत-विक्षत शव मिला है, मृत वन्यजीव तेंदुआ है या लकड़बग्घा अधिकारिक तौर यह स्पष्ट नहीं हो सका। लेकिन जानकार उसे तेंदुआ बता रहे हैं। घटनास्थल पर मिले साक्ष्यों से इतना तय है कि उक्त तेंदुए का शिकार किया गया है। शिकार की घटना को अंजाम देने के लिए जंगल में विधुत तार बिछाकर उसमें करंट प्रवाहित किया गया लेकिन इसकी भनक तक मैदानी अमले और वन विभाग के अफसरों को नहीं लगी।
घटनास्थल का मुआयना करतीं उत्तर वन मण्डल पन्ना की डीएफओ मीना मिश्रा व उप वनमण्डलाधिकारी नरेन्द्र सिंह।
शिकार की इस हैरान करने वाली घटना का खुलासा रविवार 23 फरवरी को तब हुआ जब दूरस्थ पहुँच विहीन ग्राम कुड़रा के जंगल में कुछ ग्रामीण लकड़ियां लेने गए। धरमपुर-कुड़रा के बीच जंगल में स्थित प्राचीन बीहर के समीप भीषण दुर्गन्ध आने पर ग्रामीणों ने जब समीप जाकर देखा तो मौके पर तेंदुए का कंकालनुमा क्षत-विक्षत शव पड़ा था। ग्रामीणों के द्वारा इसकी सूचना शाम के समय धरमपुर रेंजर बी.के. विश्वकर्मा को दी गई। रविवार देर शाम को धरमपुर रेंजर मैदानी अमले के साथ मौके पर पहुंचे लेकिन तब तक काफी अंधेरा हो चुका था। वन्यजीव के शव की सुरक्षा की दृष्टि से रात्रि में मैदानी अमले को तैनात किया गया।
अगले दिन सोमवार 24 फरवरी की सुबह धरमपुर रेंजर बी.के. विश्वकर्मा पुनः कुड़रा के जंगल पहुँचे। घटना की गंभीरता को देखते हुए उत्तर वन मण्डल पन्ना की डीएफओ मीना मिश्रा व उप वनमण्डलाधिकारी नरेन्द्र सिंह ने मौके पर पहुंचकर घटनास्थल का जायजा लिया। शिकार की सनसनीखेज घटना के खुलासे एवं अज्ञात शिकारियों का सुराग लगाने के लिए प्रशिक्षित डॉग की मदद ली गई। प्रशिक्षित डॉग मौके की गंध लेकर कुछ घरों तक गया जिसके आधार पर कुछ संदिग्धों की पहचान हुई है। संदिग्धों के घर पर न मिलने से सर्च वारंट जारी कर इनके घरों की तलाशी ली जा रही है।

क्लिच वायर के फंदा और चीतल के सींग मिले

एक संदिग्ध के घर के बाहरी हिस्से में वन अमले को तलाशी के दौरान कई आपत्तिजनक चीजें मिलीं हैं। जिनमें वन्यजीवों के शिकार में प्रयुक्त होने वाला क्लिच वायर का फंदा, चीतल के सींग और सेही के काँटे आदि शामिल हैं। उक्त सामग्री बरामद होने की पुष्टि उत्तर वन मण्डल पन्ना के उप वनमण्डलाधिकारी नरेन्द्र सिंह ने की है। उन्होंने जानकारी देते हुए बताया कि संदिग्ध व्यक्ति घर पर नहीं है, उसके घर पर ताला पड़ा है। घर के अंदर की तलाशी लेने के लिए सर्च वारंट जारी कर किया जा चुका है, उसकी पत्नी को वारंट तामील कराकर आज ही अंदर की तलाशी ली जाएगी। समाचार लिखे जाने तक इस मामले में एक भी आरोपी की गिरफ़्तारी नहीं हो सकी थी।

जंगल में गड़ी मिलीं खूंटियाँ

धरमपुर रेन्ज की कुड़रा बीट अंतर्गत जिस स्थान क्षत-विक्षत हालत में तेंदुए का शव मिला हैं, वहीं जमीन में कई खूंटियाँ गड़ी पाई गईं। जिससे यह संभावना जताई जा रही है कि इन्हीं खूँटियों के जरिए बीहर (जलस्रोत) के आसपास करंट का जाल बिछाया गया ताकि पानी पीने के लिए आने वाले वन्यजीवों को आसानी से निशाना बनाया जा सके। इस करंट की चपेट में आने से ही तेंदुए की मौत हुई है। अज्ञात शिकारी तेंदुए की खाल निकालकर उसके पंजे भी काट ले गए। इस घटना ने वन विभाग में व्याप्त अराजकता की पोल खोलकर रख दी है। मृत तेंदुए का शव जंगल में सप्ताह भर तक सड़ता रहा लेकिन इसकी भनक तक मैदानी वन अमले को नहीं लगी।
इससे पता चलता है कि फील्ड स्टॉफ वनों एवं वन्यजीवों की सुरक्षा को लेकर कितना सजग और ईमानदार है। अधिकाँश वनकर्मी जंगल में रहकर ड्यूटी करने के बजाए अपने घरों में आराम फरमाते हैं, जिससे जंगल की सुरक्षा व्यवस्था पूरी तरह चौपट हो चुकी है। मैदानी अमले की गतिविधियों की निगरानी करने वाले जिम्मेदार अधिकारी भी बेपरवाह बने है। इस लचर स्थिति का लाभ उठाते हुए शिकारी बैखोफ होकर शिकार की घटनाओं को अंजाम दे रहे हैं। अपुष्ट सूत्रों से पता चला है जिस स्थान पर तेंदुआ मृत मिला वहां आसपास बड़ी तादाद में वन्यजीवों के अवशेष बिखरे पड़े हैं। जिससे यह संभावना जताई जा रही है कि वहाँ नियमित रूप से शिकार होता है। कुड़रा का जंगल पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश की सीमा के नजदीक होने से वहाँ यूपी के शिकारियों के भी आने की चर्चाएं हैं।

बाघ और तेंदुए निशाने पर

सांकेतिक फोटो।
पन्ना के जंगलों में विचरण करने वाले बाघ और तेंदुए शिकारियों-तस्करों के निशाने पर हैं, विगत दो वर्षों में हुई शिकार की घटनाओं से यह बात साफ़ हो चुकी है। यहाँ के जंगलों में शिकारियों ने चप्पे-चप्पे पर अपना जाल बिछा रखा है। परिणामस्वरूप कड़ी सुरक्षा वाले पन्ना टाईगर रिजर्व के कोर जोन तक में बाघ और दूसरे वन्यजीव सुरक्षित नहीं हैं। शिकारियों की बढ़ती सक्रियता के मद्देनजर पन्ना में पुनः आबाद हुए बाघों के संसार पर संकट के बादल मंडरा रहे हैं। सर्वविदित है कि कई बाघ पन्ना टाईगर रिजर्व से निकलकर उत्तर एवं दक्षिण वन मण्डल के जंगलों में विचरण कर रहे हैं। सामान्य वन मण्डलों में सुरक्षा व्यवस्था की स्थित अत्यंत ही लचर होने से बाघों पर गंभीर खतरा मंडरा रहा है। यदि शीघ्र ही सुरक्षा व्यवस्था मजबूत नहीं की गई तो जिले के सामान्य वन क्षेत्रों से बाघ और तेन्दुओं का नामो-निशान मिट सकता है।

घटना पर पर्दा डालने का प्रयास

शिकार की घटनाओं तथा दूसरे वन अपराधों की रोकथाम में नाकाम साबित हो रहे वन विभाग के कतिपय अधिकारी अब अपनी विफलताओं को छिपाने के लिए तरह-तरह के शर्मनाक प्रयास कर रहे हैं। शिकार आदि की घटना को पहले तो इनके द्वारा झुठलाने की कोशिश की जाती है या फिर जानकारी के बाद भी अनभिज्ञ होने की नौटंकी करते हैं। इसके बाद भी यदि कोई मामला उजागर होता है तो वन विभाग के कतिपय अधिकारी मीडियाकर्मियों को जानकारी देने से बचने के लिए फोन रिसीव तक नहीं करते। शाहनगर, पवई एवं धरमपुर रेन्ज अंतर्गत पूर्व में प्रकाश में आईं शिकार की घटनाओं की जानकारी जुटाने में पत्रकारों को वन विभाग के अफसरों के असहयोग से का सामना करना पड़ा। कुड़रा की घटना के संबंध में भी रविवार शाम से ही धरमपुर रेन्जर से संपर्क करने का प्रयास किया गया लेकिन रविवार और सोमवार को कई बार कॉल करने के बाद भी उनका मोबाइल फोन रिसीव नहीं हुआ।
इसी तरह उत्तर वन मण्डल पन्ना की डीएफओ के मोबाइल पर रिंग जाने के बाद भी उनका फोन रिसीव नहीं हुआ। अफसरों के इस रवैये से उनकी स्वेक्षाचारिता पूर्ण कार्यशैली परिलक्षित होती है। इससे पता चलता है कि वे कितने जबाबदेह और संवेदनशील हैं। विभाग में चर्चा है कि अफसरों ने कुड़रा की घटना को दबाने के लिए मौके पर गए वन अमले के मोबाइल फोन बंद करा दिए थे। किसी से भी बात करने और मृत तेंदुए के फोटो लेने की वनकर्मियों को सख्त मनाही थी। इतना ही नहीं अजयगढ़ के एक मीडियाकर्मी को भी घटनास्थल का वीडियो बनाने से रोका गया। विदित होकि इसके पूर्व धरमपुर वन परिक्षेत्र अंतर्गत जब फंदे में तेंदुआ फंसा था तो रेंजर पहले घटना को ही झुठलाया फिर बाद में संदेह पैदा करने के लिए लकड़बग्घा के फँसे होने की संभावना व्यक्त कर मामले को जाँच के नाम पर रफा-दफा कर दिया गया।

अधिकारियों पर नहीं होती कार्रवाई

मध्य प्रदेश के पन्ना जिले के वन विभाग में विगत दो वर्षों बेहद अराजकता पूर्ण स्थिति निर्मित होने से यहाँ न तो जंगल सुरक्षित हैं और न जानवर। वन्यजीवों के शिकार और वनों के विनाश से जुड़ी घटनाओं का चिंताजनक तेजी बढ़ता ग्राफ हालात के बेकाबू होने की खबर दे रहा है। लेकिन दुर्भाग्य यह है, इस गंभीर संकट की आहट को राजधानी भोपाल में बैठे वन विभाग के जिम्मेदार अनसुना करने के साथ-साथ पन्ना के नाकारा अफसरों की कारगुजारियों जानबूझकर नजरअंदाज भी कर रहे हैं। यह स्थिति बताती है सत्ता परिवर्तन होने का मतलब व्यवस्था में परिवर्तन होना नहीं है।
पन्ना जिले के उत्तर व दक्षिण सामान्य वन मण्डल तथा टाईगर रिजर्व अंतर्गत विगत दो वर्षों में करीब डेढ़ दर्जन तेन्दुओं, दो बाघों, एक भालू, एक मोर सहित दर्जनों की संख्या में शाकाहारी वन्यजीवों का शिकार होने, एक युवा हाथी की संदिग्ध मौत और शिकार के लिए जंगल में बिछाए गए विधुत तार के सम्पर्क में आने से एक व्यक्ति के असमय काल-कवलित होने सरीके हैरान करने वाले मामले सामने आए हैं। इन घटनाओं पर दिखावे के लिए डिप्टी रेंजर से लेकर नीचे के मैदानी अमले पर तो कार्रवाई की गई लेकिन अफसरों का बाल भी बाँका नहीं हुआ। वरिष्ठ अधिकारियों के स्तर पर जबाबदेही का आभाव होने का ही यह दुष्परिणाम है कि जिले में बेजुबान वन्यजीवों के शिकार की घटनाएं और दीगर वन अपराध लगातार बढ़ रहे हैं।

इनका कहना है –

“मृत वन्यजीव का शव क्षत-विक्षत होने से उसकी पहचान काफी मुश्किल हो रही है, शव तेंदुए का भी हो सकता है। लेकिन मुँह देखकर लगता है कि लकड़बग्घा है। मृत वन्यप्राणी की पहचान डीएनए जाँच के जरिए होगी। इसके लिए वन्यप्राणी के सैम्पल लेकर उन्हें जाँच के लिए भेजा जा रहा है, जाँच रिपोर्ट आने पर ही अधिकारिक तौर पहचान स्पष्ट हो पाएगी। शिकार की यह घटना मैदानी अमले की लापरवाही के कारण हुई है।”

–  नरेन्द्र सिंह, उप वनमण्डलाधिकारी उत्तर वन मण्डल पन्ना।

विशेष लेख : प्रकृति के सफाईकर्मी कहलाने वाले गिद्धों के संरक्षण के जारी हैं कारगर प्रयास, मध्य प्रदेश में पाई जाती हैं इनकी सात प्रजातियाँ

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सांकेतिक फोटो।

* मृत जानवरों को खाकर पर्यावरण को बनाते हैं स्वच्छ

* पहाड़ की कंदराओं अथवा ऊँचे पेड़ों पर करते हैं बसेरा

पारिस्थितिकीय संतुलन में गिद्ध की महत्वपूर्ण भूमिका है। जानवरों का सड़ा, बदबूदार माँस और गंदगी मिनटों में चट कर ये पर्यावरण को स्वच्छ और सम्पूर्ण पृथ्वी को महामारी से बचाते हैं। भारत सहित विश्व में गिद्धों की चिंतनीय ढंग से कम हुई संख्या को देखते हुए मध्यप्रदेश में गिद्धों के संरक्षण के कारगर प्रयास किये जा रहे हैं। गिद्धों को विलुप्तप्राय बनाने में सबसे बड़ा कारण डायक्लोफिनेक नामक दवा की मृत पशु अवशेषों में मौजूदगी है।
मध्यप्रदेश में 7 प्रजाति के, भारत में 9 और विश्व में 22 प्रकार के गिद्ध पाये जाते हैं। प्रदेश में सफेद गिद्ध, चमर गिद्ध, देशी गिद्ध, पतल चोंच गिद्ध, राज गिद्ध, हिमालयी गिद्ध, यूरेशियाई गिद्ध और काला गिद्ध की मौजूदगी मिली है।

सफेद गिद्ध

सफेद गिद्ध (Egyptian Vulture) मध्यप्रदेश के अलावा गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान और उत्तराखण्ड में भी दिखाई पड़ता है।
वर्णन – छोटे गिद्ध, जिनमें लम्बे नुकीले पंख, छोटा नुकीला सिर तथा फनाकार पूँछ। वयस्क मुख्यत: मटमैले-श्वेत, जिनका मुँह पंख-रहित पीताभ तथा उड़ान-पंख काले। तरुण काले-भूरे, जिनका मुँह पंख-रहित धूसर। वयस्कता के साथ-साथ पूँछ, शरीर तथा पर पंखनी सफेद तथा मुँह पीताभ होते चले जाते हैं। मानव आवासीय स्थलों के समीप खुले स्थानों में व्याप्त। हिमालय में 2500 मी. की ऊँचाई तक दिखाई देते हैं। सम्भवत: अब यह क्षेत्र (फील्ड) का सबसे आम गिद्ध है। भोजन की तलाश में व्यापक क्षेत्रों का भ्रमण करता है। घोसला चट्टानों, पेड़ों तथा पुराने भवनों में बनाता है।
पंख सफेद होते हैं, जो किनारों पर काले होते हैं। चेहरा छोटा, रोएंदार एवं पीले रंग का होता है। चोंच पतली तथा पीले या ग्रे रंग की होती है। लिंग एक समान दिखते हैं। आकार में चील से मिलता-जुलता है। बच्चा काले रंग का होता है।

चमर गिद्ध

चमर गिद्ध (White-rumped Vulture) मध्यप्रदेश के अलावा गुजरात, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, जम्मू-कश्मीर, पंजाब, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, उत्तराखण्ड आदि में पाया जाता है।
वर्णन – जिप्स गिद्धों में सबसे छोटे। वयस्क मुख्यत: काले, जिनमें पुट्ठा तथा पृष्ठ सफेद तथा निचले पर पंखनी सफेद होते हैं। तरुणावस्था के मुख्य लक्षण : गहरा भूरा रंग, धारीदार अधरभाग तथा ऊपरी पर-पंखनी, गहरे पुट्ठा तथा पृष्ठ भाग, सफेद सिर और गला तथा पूर्णत: गहरी चोंच। उड़ान के समय अधर भाग तथा चिले पर पंखनी देसी गिद्ध तथा पतलचोंच गिद्ध के समान भागों के रंगों से विशिष्ट रूप से गहरे। तरुणावस्था में रंग हिमालयी गिद्ध के तरुण के समान परंतु अत्यधिक छोटा तथा अल्पाकार, पंख पतले तथा दुम छोटी। इसके अधरभाग पर भी अल्प धारियाँ तथा अग्रपीठ तथा कंधे पर स्पष्ट धारियों की अनुपस्थिति। बस्तियों के समीप स्थानों में व्याप्त समतल तथा पहाड़ियों पर 2500 मी. की ऊँचाई तक दिखाई देते हैं। इनका ज्यादातर समय उड़ते हुए बीतता है। बहुत मिलनसार होते हैं। रात्रि निवास ऊँचे वृक्षों के अलावा, ऐतिहासिक इमारतों, पहाड़ों की कंदराओं में करते हैं। इनका घोंसला ऊँचे पेड़ों पर, चट्टानों पर तथा पुराने भवनों पर पाया जाता है।
इनकी विशेषता पंख विहीन सर तथा गला पतला होता है। पीठ पर एक बड़ा सफेद चिन्ह रहता है, जो उड़ते समय दिखाई देता है।

देशी गिद्ध

देशी गिद्ध (Indian Vulture) मध्यप्रदेश के अतिरिक्त गुजरात, हरियाणा, राजस्थान आदि में दिखाई पड़ता है।
वर्णन – वयस्क देसी गिद्ध में शरीर तथा ऊपरी पर-पंखनी का रंग रेतीला-भूरा, सिर तथा गर्दन काली, पश्च-ग्रीवा पर हलके पंख, सफेद रोम कण्ठ-वेष्ठन, पीताभ चोंच तथा सिर तथा अधर भाग में धुंधली धारियों की कमी, उड़ान के समय पहाड़ी गिद्ध की तरह मध्य निचले पर पंखनी पर चौड़ी सफेद पट्टी की अनुपस्थिति तथा पुट्ठा और पृष्ठ श्वेत। हिमालयी गिद्ध की अपेक्षा छोटा तथा कम भारी शरीर, जिसमें अधिक गहरे सिर तथा ग्रीवा, सफेद कण्ठ-वेष्ठन तथा गहरे पैर तथा पंजे। तरुणावस्था में कण्ठ-वेष्ठन कोमल पाण्डुरंग युक्त, चोंच तथा सेयर गहरे, जिस पर धुंधला कलमेन तथा सफेद रोमाच्छादित सिर तथा गर्दन। तरुण को तरुण चमर गिद्ध से अलग करने में सहायक लक्षण : धुंधले तथा अल्प स्पष्ट धारियों युक्त अधरभाग, धुंधले ऊपरी तथा निचले पर पंखनी तथा सफेद पुट्ठा तथा पृष्ठ की उपस्थिति। बस्तियों तथा खुले वनों में व्याप्त। ये ज्यादातर लम्बी उड़ान भरते हैं। जमीन पर धीरे-धीरे बतख की तरह चलते हैं और झुक कर बैठते हैं। इनका घोंसला ऐतिहासिक इमारतों पर अथवा पहाड़ों की कंदराओं में मिलता है।
पैरों के ऊपरी भाग पर सफेद तथा नर्म पंख इनकी विशेषता है। पर रहित गर्दन के निचले हिस्से पर नर्म हल्के भूरे, श्वेत पंखों की कालर-सी होती है।

राज गिद्ध

राज गिद्ध (Red-headed Vulture) मध्यप्रदेश के साथ-साथ उत्तर भारत के कई प्रदेशों में दिखायी पड़ता है।
वर्णन – अपेक्षाकृत पतले नुकीले पंख। वयस्क में नग्न लाल सिर तथा सेयर, गर्दन के आधार तथा ऊपरी जंघा पर सफेद धब्बे तथा लाल पैर तथा पंजी, उड़ान के समय द्वितीयक-पंखों के आधार पर सिलेटी-श्वेत रंग। तरुणावस्था में सिर पर सफेद रोम, सिर तथा गर्दन का गुलाबी रंग, ऊपरी जंघा पर सफेद धब्बे तथा सफेद निचली दुम पंखनी। बस्तियों के समीप खुले स्थानों में तथा अच्छी वृक्षदार पहाड़ियों में व्याप्त। हिमालच में 2500 मी. की ऊँचाई तक मिलते हैं।
ये दूसरे प्रकार के गिद्धों की तुलना में सहिष्णु होते हैं। मृत जानवर भी यह बाकी गिद्धों के जाने के बाद खाते हैं और मनुष्य के आने से पहले उड़ जाते हैं। इनका घोंसला ऊँचे पेड़ों पर पाया जाता है। इसका सिर, टांग, गर्दन एवं सीना रक्त वर्ण के होते हैं। लाल और काले पंखों के बीच सफेद परों की पट्टी होती है, शेष देह काली होती है। राज गिद्धों की सम्पूर्ण संरचना अलंकृत-सी दिखाई देती है, जिसके कारण राज गिद्ध अन्य गिद्धों से अलग पहचाना जाता है।

हिमालयी गिद्ध

हिमालयी गिद्ध (Himalayan Griffon) प्राय: उत्तरी भारत के कुछ प्रदेशों में पाया जाता है। यह मध्यप्रदेश में भी दिखाई पड़ता है।
वर्णन – यूरेशियाई गिद्ध से बड़ा, अधिक चौड़े शरीर तथा कुछ अधिक लम्बी पूँछ युक्त। धुंधले पाण्डु-श्वेत पर-पंखनी तथा शरीर, गहरे उड़ान-पंख तथा पूँछ से स्पष्ट विभेद करते हैं तथा पाण्डुरंग का झालरदार गुलुबंद। अधरभाग में स्पष्ट धारियों की कमी। गहरे नख युक्त गुलाबी पैर तथा पंजे एवं पीत चोंच तथा सेयर। तरुणावस्था में भूरे रोमयुक्त गुलुबंद, चोंच तथा सेयर प्रारंभिक तौर पर काली, गहरा भूरा शरीर तथा सुस्पष्ट पाण्डु धारियों युक्त ऊपरी पंख-पंखनी (पर-पंखनी का रंग लगभग उड़ान-पिच्छों से मेल खाता हुआ) एवं पृष्ठ भाग तथा पुट्ठा भी गहरे भूरे। तरुणावस्था में उपस्थित धारीदार पृष्ठभाग तथा अधर भाग तथा निचले पंख-पिच्छों पर स्पष्ट सफेद पट्टिका इसे काला गिद्ध से अलग करने में महत्वपूर्ण लक्षण; इसके तरुण के पक्षति तरुण चमर गिद्ध के पूरा समापन परंतु शरीर अधिक बड़ा तथा अधिक भार वाला, जिसमें अधिक चौड़े पंख तथा लम्बी पूँछ, अधरभाग अधिक घनी धारियों से युक्त तथा अग्रपीठ एवं कंधे पर भी धारियाँ। पहाड़ियों में स्थित खुले स्थानों में व्याप्त। 600 मी. से अधिक ऊँचाई पर मिलते हैं, 5000 मी. से ऊपर तक भोजन की तलाश में घूमते हुए मिल जाते हैं, शीतकाल में समतल मैदानों पर आ जाते हैं।
ये अधिकतर पहाड़ों के ऊपर छोटे समूहों में या अकेले रहते हैं। भोजन की तलाश में लम्बी दूरियाँ तय करते हैं। समूह में पहाड़ों पर रात्रि निवास करते हैं। ये समूह में ऊँची चट्टानों की सुरक्षित कंदराओं में घोंसला बनाते हैं। इसके भूरे काले पंखों के मध्य सीने पर लाल रंग का मांसल स्थल दिखता है। पर-रहित गर्दन के निचले हिस्से पर नर्म भूरे श्वेत पंखों की कालर-सी होती है। चोंच पीली-सी तथा पैर गुलाबी होते हैं।

युरेशियाई गिद्ध

यूरेशियाई गिद्ध (Eurasian Griffion) मध्यप्रदेश के साथ-साथ उत्तर भारत के कई प्रदेशों में दिखायी पड़ता है।
वर्णन – देसी गिद्ध से अधिक बड़े तथा पुष्ट चोंच युक्त। वयस्क के मुख्य लक्षण पीली चोंच, जिस पर काली सेयर, सफेद सिर तथा गर्दन ऊनी सफेद गुलुबंद, आरक्ती आभा युक्त पाण्डु पृष्ठभाग, आरक्ती-भूरे अधरभाग तथा जांघ, जिस पर स्पष्ट पाण्डु धारियाँ तथा गहरे सिलेटी पैर तथा पंजे। आरक्ती-भूरे निचले पर पंखनी, जिस पर सामान्यत: स्पष्ट सफेद पट्टिका, विशेषकर मध्य-पिच्छों के ऊपर। अवयस्क में वयस्क की अपेक्षा पृष्ठभाग तथा ऊपरी पर-पंखनी पर अधिक आरक्ती भूरा रंग (जिन पर स्पष्ट पाण्डु धारियाँ); अवयस्क में आरक्ती-भूरा रोम युक्त गुलुबंद, सिलेटी सिर तथा गर्दन पर अधिक सफेद रोम, चोंच काली तथा गहरी परितारिका (जो वयस्क में पीत-भूरी होती है)। खुले स्थानों में, मुख्यत: : 910 मी. के नीचे ग्रीष्म में 3000 मी. की ऊँचाई तक मिलते हैं।
यह पहाड़ों पर रहता है तथा सर्दियों में सूखे मैदानों में घूमता है। अधिकांशत: जोड़े अथवा छोटे समूहों में रहते हैं। ज्यादातर भोजन की तलाश में उड़ते रहते हैं। ये चट्टानों की कंदराओं में घोंसला बनाते हैं। हिमालयी गिद्ध से छोटा तथा गहरे भूरे रंग का होता है। सिर तथा गर्दन सफेद और चोंच पीलीहोती है ।

काला गिद्ध

काला गिद्ध (Cinereous Vulture) मध्यप्रदेश के साथ-साथ उत्तर भारत के कई प्रदेशों में दिखाई पड़ता है।
वर्णन – अत्यधिक बड़े गिद्ध, जिनमें चौड़े समानान्तर किनारे वाले पंख होते हैं। विड्यन करते समय पंख समतल (सामान्यत: जिप्स प्रजातियों में परों को हलके ‘V’ आकृति में रखा जाता है) सिर तथा चोंच के धुंधले भाग के अतिरिक्त दूर से सम्पूर्ण एक समान गहरे रंग का दिखाई देता है। वयस्क काला-भूरा, जिसमें हलका भूरा गुलुबंद, वृहद निचले पर पंखनी पर धुंधली पट्टी भी दिखाई दे सकती है परंतु निचले पंख भाग जिप्स की अपेक्षा अधिक गहरे तथा एकरूपता लिये हुए। तरुणावस्था में वयस्क से अधिक एकरूपता लिये हुए। खुले स्थानों में 3000 मी. से नीचे व्याप्त।
यह मैदानी क्षेत्रों में अकेले ही भोजन ढूँढता दिखता है, अधिकांशत: नदियों के समीप दिखाई पड़ता है। इनका घोंसला पहाड़ों की कंदराओं में अथवा पहाड़ों पर उगे छोटे वृक्षों पर पाया जाता है। सिर का आकार कोणीय, आँखें गहरी, कालर भूरा, पंख चौड़े तथा पूँछ छोटी होती है। उड़ते समय पंखों को फड़फड़ाता है। इससे यह चीलों में आसानी से पहचाना जाता है।

पतल चोंच गिद्ध

पतल चोंच गिद्ध (Slender-billed Vulture) उत्तरी भारत के कई प्रदेशों में पाया जाने वाला यह गिद्ध यदा-कदा उत्तरी मध्यप्रदेश में दिखाई पड़ता है।
वर्णन – देसी गिद्ध की अपेक्षा चोंच, सिर तथा ग्रीवा अधिक पतले तथा कोणीय चोटी (एवं सुस्पष्ट कर्ण नाल)। देसी की अपेक्षा शरीर का रंग गहरा तथा भूरा एवं शरीर पतला, जिसके जंघा पर सफेद धब्बे (जो उड़ते समय सुस्पष्ट)। उड़ते समय, ‘परों’ के पिछले किनारे गोलाई युक्त तथा शरीर से चिपके हुए तथा बाहरी प्राथमिक-पिच्छों की लम्बाई अन्त: प्राथमिक-पिच्छों से अधिक। उड़ान-पिच्छों के आन्तर भाग एकरूप लिये हुए गहरे (जो देसी गिद्ध में गहरे सिरे युक्त धुंधले होते हैं)। निचली दुम पंखनी भी गहरी (देसी में हलके) तथा उड़ते समय पंजे पूँछ के सिरे तक पहुँचते हैं। (जो देसी में पूँछ सिरे तक नहीं पहुँचते)। वयस्क में गहरी चोंच तथा सेयर, जिसमें धुंधला कालमेन, सिर तथा गर्दन रोम रहित छोटे तथा रुक्ष गंदले सफेद कण्ठ-वेष्ठन तथा गहरे नख (देसी में पीत) तरुणावस्था में मुख्यत: गहरी चोंच सफेद रोमयुक्त सिर तथा गर्दन एवं अधरभाग पर धुंधली धारियाँ। खुले वनों में व्याप्त। 1500 मी. की ऊँचाई तक दिखाई देते हैं।
ये मरे जानवरों को खाते हैं। प्रजनन गाँवों से दूर एकांत में करते हैं। इनका घोंसला ऊँचे पेड़ों पर मिलता है। साँप की तरह पतली गर्दन, पतली लम्बी चोंच। आँखों के घेरे गहरे होते हैं तथा चेहरे से अलग दिखते हैं। सिर तथा गर्दन की खाल बाल रहित तथा सिकुड़ी होती है।
पहाड़ की कंदराओं में स्थित गिद्धों का घोंसला। फाइल फोटो
गिद्ध प्राय: सुरक्षित स्थान यथा ऊँचे स्थलों अथवा वृक्षों पर विश्राम करते हैं। पुरानी इमारतों एवं पहाड़ी कंदराओं में इन्हें देखा जा सकता है। कई बार ये खेतों में या फिर जलाशय के किनारे भी विश्राम करते पाये जाते हैं। सुरक्षा की दृष्टि से गिद्ध प्राय: ऊँचे स्थलों अथवा वृक्षों पर अपना घोंसला बनाते हैं। मैदानी क्षेत्रों के जंगलों में ऐसे वृक्ष सागौन, शीशम, हल्दू, सेमल, पीपल आदि होते हैं। ऊँचे वृक्षों के अभाव में जंगल के बाहर कम ऊँचाई के वृक्ष भी घोंसला बनाने के लिये उपयुक्त पाये गये हैं। ऐसे वृक्ष आम, बबूल, नारियल आदि हैं।

बिगड़े वनों को हरा-भरा बनाना सबसे बड़ी चुनौती – मुख्यमंत्री कमलनाथ

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* प्रशासन अकादमी में आयोजित वानिकी सम्मलेन में बोले मुख्यमंत्री

* वनांचल संदेश, कैम्पिंग डेस्टिनेशन और वाईल्डलाईफ डेस्टिनेशन पुस्तकों का विमोचन

भोपाल।(www.radarnews.in) मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा है कि वन सम्पदा, मध्यप्रदेश की सबसे बड़ी सम्पदा है। मध्यप्रदेश को अपनी वन सम्पदा पर गर्व है। इसे संरक्षित और सुरक्षित रखने की जिम्मेदारी वनों से जुड़े लोगों और वन विभाग के प्रत्येक सदस्य की है। उन्होंने कहा कि वन से जुड़े लोगों और राज्य के हित के बीच तनाव और टकराहट से बचते हुए वन संरक्षण को आगे जारी रखना होगा। मुख्यमंत्री आरसीवीपी नरोन्हा प्रशासन अकादमी में वानिकी सम्मेलन को संबोधित कर रहे थे।
मुख्यमंत्री ने कहा कि बिगड़े वनों को हरा-भरा बनाना,आज सबसे बड़ी चुनौती है। उन्होंने कहा कि वनों का भारतीय संस्कृति से गहरा जुड़ाव है। वनों से सभी प्राणियों का भविष्य जुड़ा है। इसलिये वनों को संरक्षित और सुरक्षित रखते हुए इनका बेहतर उपयोग सुनिश्चित करने की आवश्यकता है।

वन संरक्षण के उद्देश्यों को आत्मसात करें 

मुख्यमंत्री ने कहा कि वन अधिकारियों और मैदानी अधिकारियों के सक्रिय सहयोग से ही वन संरक्षण संभव है। उन्होंने कहा कि वन विभाग के अधिकारी-कर्मचारी वन संरक्षण अधिनियम के उद्देश्यों को आत्मसात करें। मुख्यमंत्री ने कहा कि जब 1980 में वन संरक्षण अधिनियम बना था, तब की परिस्थितियों और वर्तमान परिस्थितियों में जमीन-आसमान का अंतर है। उन्होंने कहा कि तब लोगों की अपेक्षाएं और आशाएं कम थीं। राष्ट्रीय उद्यान बनाना आसान था।

मध्यप्रदेश की जैव विविधता अत्यंत समृद्ध

मुख्यमंत्री कमल नाथ ने कहा‍ कि अब प्राथमिकताएं बदल रही हैं। उन्होंने बांस और छोटे अनाज का उदाहरण देते हुए बताया कि अब ये आर्थिक महत्व की फसल बन रही है। इसके लिये वन विभाग को सहयोगी की भूमिका निभानी होगी। बिगड़े वन क्षेत्रों में सुधार लाने के सभी उपाय अपनाने होंगे। उन्होंने कहा कि मध्यप्रदेश की जैव विविधता अत्यंत समृद्ध है। इस पर कई अनुसंधान भी हो रहे हैं। अब दुनिया तेजी से रसायन आधारित फार्मास्युटिकल दवाओं से रसायन-मुक्त फार्मास्युटिकल दवा निर्माण की तरफ बढ़ रही है। उन्होंने कहा कि वनोपज भविष्य के लिए महत्वपूर्ण सम्पदा है। वन विभाग को इन सब आधारों पर अपनी सोच-समझ बढ़ाते हुए आगे बढ़ना होगा। श्री नाथ ने कहा कि वन विभाग को अब एक दिशा में काम न करते हुए समान उद्देश्य के लिए बहुआयामी रणनीति अपनाना चाहिये।
मुख्यमंत्री कमलनाथ को वानिकी सम्मेलन में रूद्राक्ष का पौधा भेंट कर स्वागत किया गया। मुख्यमंत्री कमलनाथ ने वनांचल संदेश, कैम्पिंग डेस्टिनेशन और वाईल्डलाईफ डेस्टिनेशन पुस्तकों का विमोचन किया। वन मंत्री उमंग सिंघार ने मुख्यमंत्री को स्मृति-चिन्ह भेंट किया।
वन मंत्री उमंग सिंघार ने संयुक्त वन प्रबंधन समितियों की भूमिका और वन संरक्षण की दिशा में किए जा रहे कार्यों की चर्चा की। इस अवसर पर प्रधान मुख्य वन संरक्षक डॉ. यू. प्रकाशम ने वानिकी सम्मेलन के उद्देश्यों और प्रदेश में वनों की स्थिति की जानकारी दी। इस मौके पर अपर मुख्य सचिव वन ए.पी. श्रीवास्तव और वरिष्ठ वन अधिकारी उपस्थित थे।

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मृदा स्वास्थ्य कार्ड के आधार संतुलित उर्वरक उपयोग की दी गई जानकारी

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* विशेषज्ञों ने किसानों को बताया मृदा स्वास्थ्य कार्ड का महत्व

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) भारत सरकार द्वारा चलाये जा रहे मृदा स्वास्थ्य परीक्षण कार्यक्रम के अंतर्गत कृषि विज्ञान केन्द्र पन्ना द्वारा ग्राम नचने विकासखण्ड गुनौर में कृषक प्रशिक्षण का आयोजन किया गया। केन्द्र के प्रभारी डाॅ. आशीष कुमार त्रिपाठी द्वारा मृदा परीक्षण के महत्व उसकी विधि तथा मृदा स्वास्थ्य पत्रक के आधार पर संतुलित उर्वरक उपयोग की जानकारी दी गई। उन्होंने बताया कि जिले की मिट्टी में नत्रजन कम से मध्यम, फास्फोरस मध्यम है ऐसी स्थिति में गोबर की खाद के पर्याप्त उपयोग के साथ साथ जैव उर्वरकों का उपयोग अत्यंत आवश्यक है साथ ही किसान भाई पोटाश खाद का उपयोग भी करें ताकि संतुलित उर्वरक उपयोग से मृदा के भौतिक एवं रासायनिक गुणों में फसल उत्पादन लेने से गिरावट न आये।

जैविक खाद बनाने की बताई विधि

कृषि विभाग के श्रीराम रिछारिया ने विभागीय योजनाओं तथा मिट्टी परीक्षण हेतु नमूने लेने की विधि के बारे में बताया। ग्रामीण आजीविका मिशन के जिला कृषि समन्वयक सुशील शर्मा जी ने जैविक कृषि पद्धति, केंचुआ खाद उपयोग एवं जैविक कीटनाशी बनाने की विधि व उपयोग की जानकारी दी। कार्यक्रम में 60-70 कृषक एवं कृषक महिलाओं ने भाग लिया।

चिकित्सक और चिकित्साकर्मी अपनी सोच और रवैये में परिवर्तन लाएं : मुख्यमंत्री कमलनाथ

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मुख्यमंत्री कमलनाथ ने छिंदवाड़ा जिला चिकित्सालय परिसर में लोकार्पण एवं भूमि-पूजन कार्यक्रम को संबोधित किया।

* छिंदवाड़ा में 42 करोड़ के 80 चिकित्सकीय निर्माण कार्यों का भूमि-पूजन और लोकार्पण

भोपाल।(www.radarnews.in) मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा है कि चिकित्सक और चिकित्सा सेवा से जुड़े कर्मचारी अपनी सोच और रवैये में परिवर्तन लायें, जिससे चिकित्सा की नई तकनीकों और संसाधनों का मानव हित में बेहतर उपयोग किया जा सके। उन्होंने कहा कि चिकित्सा सेवा को व्यवसाय नहीं बल्कि समाज सेवा की भावना से किया जाना चाहिए। मुख्यमंत्री कमलनाथ छिन्दवाड़ा में जिला चिकित्सालय परिसर में 42 करोड़ 36 लाख रूपये लागत के विभिन्न स्वास्थ्य केन्द्रों और अस्पतालों के स्टॉफ क्वाटर्स के 80 निर्माण कार्यों का भूमि-पूजन और लोकार्पण कर चिकित्साकर्मियों को संबोधित कर रहे थे।
मुख्यमंत्री कमलनाथ ने कहा कि छिन्दवाड़ा जिला यहाँ मेडिकल कॉलेज की स्थापना के बाद मेडिकल हब बन चुका है। इसका सीधा लाभ अब छिन्दवाड़ा नहीं बल्कि सिवनी, बालाघाट, बैतूल और नरसिंहपुर जिले के नागरिकों को भी मिल रहा है। उन्होंने बताया कि अब इन जिलों के नागरिकों को स्वास्थ्य सेवाओं के लिये अन्य महानगरों की ओर नहीं जाना पड़ता।
सांसद नकुल नाथ ने इस अवसर पर कहा कि मुख्यमंत्री ने आज छिन्दवाड़ा जिले में विकासखण्ड एवं ग्रामीण स्तर पर स्वास्थ्य सेवाओं का विस्तार किया है। इससे जरूरतमंदों को बेहतर स्वास्थ्य सुविधाएँ मिल सकेंगी, छोटी-मोटी स्वास्थ्य संबंधी समस्याओं के लिये जिला मुख्यालय और महानगर की ओर नहीं जाना पड़ेगा।
लोक स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्री तुलसीराम सिलावट ने कहा कि छिन्दवाड़ा मॉडल की तर्ज पर सम्पूर्ण मध्यप्रदेश विकास की दिशा में आगे बढ़ रहा है। स्वास्थ्य एवं अन्य आवश्यक जन-सुविधाओं का ग्रामीण अंचल तक विस्तार किया जा रहा है। इससे निश्चित ही आम आदमी को राहत मिलेगी। उन्होंने बताया कि स्वास्थ्य विभाग में चिकित्सकों और मेडिकल स्टॉफ की कमी को दूर किया जा रहा है।
इस अवसर पर जिले के प्रभारी लोक स्वास्थ्य यांत्रिकी मंत्री सुखदेव पांसे, पूर्व मंत्री दीपक सक्सेना, मध्यप्रदेश बार एसोसिएशन के पूर्व अध्यक्ष गंगाप्रसाद तिवारी, राज्य कृषि सलाहकार परिषद के सदस्य विश्वनाथ ओकटे और प्रमुख सचिव स्वास्थ्य पल्ल्वी जैन गोविल उपस्थित थे।

पातालेश्वर धाम में पूजा-अर्चना

मुख्यमंत्री कमलनाथ महा शिवरात्रि के पावन अवसर पर छिन्दवाड़ा में पातालेश्वर धाम पहुँचे और पूजा-अर्चना कर प्रदेश की सुख-समृद्धि की कामना की। सांसद नकुल नाथ, जिले के प्रभारी मंत्री सुखदेव पांसे आदि मुख्यमंत्री के साथ रहे।

हमें समस्याओं के उत्पन्न होने के कारण को मिटाना होगा- आयुक्त श्री शर्मा

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* आयुक्त सागर संभाग ने की स्वास्थ्य एवं महिला बाल विकास विभाग की समीक्षा

पन्ना। (www.radarnews.in) आयुक्त सागर संभाग आनन्द कुमार शर्मा द्वारा स्वास्थ्य विभाग एवं महिला बाल विकास विभाग में संचालित जनकल्याणकारी योजनाओं की समीक्षा की गयी। समीक्षा के दौरान उन्होंने कहा कि हमें समस्याओं के उत्पन्न होने के कारणों को मिटाना होगा। जिससे समस्याएं पैदा ही न हों। उन्होंने कहा कि दोनों विभाग के अधिकारी-कर्मचारी आपसी समन्वय बनाकर कार्य करें। पलायन पंजी में जाने और आने वाले माताओं का नाम अनिवार्य रूप से दर्ज किया जाए। उन्होंने जिले में बच्चों का कुपोषण मिटाने के लिए चलाए जा रहे संजीवनी अभियान की सराहना की। उन्होंने कहा कि पन्ना कलेक्टर द्वारा पहले से ही विभिन्न विभागोें के अधिकारियों/कर्मचारियों के बीच समन्वय बनाने की योजना के तहत अभ्युदय योजना प्रारंभ की गयी। इससे दोनों विभाग को कार्य करने में सुविधा उपलब्ध हो रही है। अब आगे आपसी तालमेल बनाकर दोनों विभाग कार्य करें जिससे आंकड़ों में अन्तर नहीं आए।

बीमारी वाले क्षेत्रों को करें चिन्हित

आयुक्त सागर संभाग श्री शर्मा ने विभिन्न योजनाओं की समीक्षा के दौरान निर्देश दिए कि विभिन्न योजनाओं में शासन से जो राशि भुगतान की जाती है वह संबंधित हितग्राही को समय पर उपलब्ध हो जाना चाहिए। उन्होंने कहा कि दोनों विभाग की योजनाओं में चिन्हित हितग्राही के बैंक खाते, आधार कार्ड आदि की जानकारी चिन्हांकन के समय ही प्राप्त कर ली जाए। जिससे भुगतान में किसी तरह की देरी न हो। उन्होंने मलेरिया, फाइलेरिया, क्षय रोग की अधिकता वाले क्षेत्रों को चिन्हित कर उन क्षेत्रों में बीमारी की रोकथाम के लिए प्रभावी कदम उठाए जाने के निर्देश दिए।
आयुक्त सागर संभाग आनन्द कुमार शर्मा ने शिशु एवं मातृ मृत्युदर को रोकने एवं कुपोषण को मिटाने के लिए कहा कि दोनों विभागों को किशोरी बालिकाओं एवं माताओं के स्वास्थ्य पर ध्यान देना चाहिए। उन्होंने कहा कि जिन किशोरियों एवं माताओं में रक्त की कमी अथवा अन्य किसी तरह का कुपोषण है उनकी जांच कराकर आवश्यक उपचार उपलब्ध कराना चाहिए। उन्होंने कहा कि शिशु एवं गर्भवती माताओं को शत प्रतिशत टीकाकरण कराया जाना आवश्यक है। श्री शर्मा ने कहा कि समाज में लड़का-लड़की के अन्तर को मिटाने के लिए जागरूकता लाने की जिम्मेदारी हम सभी की है। उन्होंने कहा कि गर्भवती महिलाओं पर दोनों विभाग के मैदानी कर्मचारी को सतत निगरानी रखनी चाहिए कि गर्भवती का प्रसव कब होने वाला है प्रसव से तीन दिन पहले ही प्रसव के लिए निर्धारित संस्था, परिवहन की व्यवस्था आदि कर लेनी चाहिए। जिससे शिशु एवं मातृ मृत्युदर में कमी आ सके।

कुपोषण से मुक्ति दिला रहा संजीवनी अभियान

कलेक्टर कर्मवीर शर्मा ने जिले में चलाए जा रहे पोषण संजीवनी अभियान के संबंध में विस्तारपूर्वक जानकारी देते हुए बताया कि इस अभियान के तहत 2800 बच्चों को चिन्हित किया गया था जो अतिकुपोषित थे। इन अतिकुपोषित बच्चों को जनप्रतिनिधियों, समाज सेवियों एवं अन्य लोगों के माध्यम से गोद दिलाकर कुपोषण मुक्ति का कार्य किया गया। कुपोषित बच्चे के परिवार को आर्थिक रूप से स्वाबलम्बी बनाने के लिए विभिन्न विभागोें की कल्याणकारी योजनाओं से लाभान्वित कराया गया। उन्होंने बताया कि जिले में 50 प्रतिशत से अधिक बच्चे अतिकुपोषण से बाहर होकर मध्यम श्रेणी में आ गए है। वही 880 बच्चे सामान्य श्रेणी में पहुंच चुके हैं। जिले में इस अभियान का द्वितीय चरण प्रारंभ कर दिया गया है। गोद लेने वाले संजीवनी अभिभावकों में निरंतर उत्साह बना रहे इसके लिए ग्राम स्तर से लेकर जिला स्तर तक संजीवनी अभिभावक सम्मेलन आयोजित किए गए। जिले में किशोरी बालिकाओं और गर्भवती माताओं के स्वास्थ्य पर परीक्षण एवं उपचार उपलब्ध कराने का भी कार्यक्रम जारी है। उन्होंने कहा कि जिले में शत-प्रतिशत बच्चों के टीकाकरण का लक्ष्य रखा गया है। इस कार्य में जिले को मिशन इन्द्रधनुष के तहत टीकाकरण में सफलता मिली है।

इनकी रही उपस्थिति

इस अवसर पर संयुक्त संचालक महिला एवं बाल विकास श्रीमती शशिश्याम उइके ने बैठक में उपस्थितों को सम्बोधित करते हुए शिशु एवं मातृ मृत्युदर कम करने, कुपोषण मिटाने आदि विषयों पर विस्तारपूर्वक प्रकाश डाला। उन्होंने स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों से अपेक्षा करते हुए कहा कि दोनों विभागों मैदानी कर्मचारी आपसी समन्वय बनाकर काम करें। जिससे अधिक से अधिक लोगों को लाभान्वित किया जा सके एवं दोनों विभागों के आंकड़ों में अन्तर न आए। सम्पन्न हुई बैठक में मुख्य कार्यपालन अधिकारी जिला पंचायत बालागुरू के., मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी डाॅ. एल.के. तिवारी, कार्यक्रम अधिकारी महिला एवं बाल विकास उदल सिंह, समस्त एसडीएम, दोनों विभागों के जिला, खण्ड एवं ग्रामीण स्तरीय अधिकारी-कर्मचारी उपस्थित रहे।

ट्रैप कार्रवाई : स्वच्छ भारत मिशन की ब्लॉक कोऑर्डिनेटर को रिश्वत लेते लोकायुक्त पुलिस ने रंगे हाथ पकड़ा

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जनपद पंचायत कार्यालय छतरपुर में ट्रैप कार्रवाई को अंजाम देती लोकायुक्त पुलिस सागर की टीम।

* शौंचालय निर्माण के फोटो प्रामाणित करने एवज में जीआरएस से ली थी रिश्वत

* जनपद पंचायत कार्यालय छतरपुर में लोकायुक्त पुलिस की कार्रवाई से मचा हड़कंप

छतरपुर। (www.radarnews.in) लोकायुक्त पुलिस संगठन सागर की टीम ने मंगलवार 18 फरवरी को छतरपुर जनपद पंचायत कार्यालय में बड़ी कार्रवाई करते हुए स्वच्छ भारत मिशन की ब्लॉक कोऑर्डिनेटर नीलम तिवारी को 5,500 रुपए की रिश्वत लेते हुए रंगे हाथ गिरफ्तार किया है। ग्राम पंचायत थौरी में निर्मित शौंचालयों के फोटो प्रमाणित करने के एवज में ब्लॉक कोऑर्डिनेटर नीलम तिवारी ने ग्राम रोजगार सहायक से रिश्वत के रूप में जैसे ही 5500 रुपए लिए तभी लोकायुक्त पुलिस की टीम ने दबिश देकर उन्हें पकड़ लिया। दोपहर के समय हुई लोकायुक्त पुलिस की ट्रैप कार्रवाई की खबर आते ही जनपद कार्यालय समेत जिले के प्रशासनिक हलकों में हड़कंप मच गया। इस कार्रवाई ने घूसखोर अधिकारियों-कर्मचारियों की धड़कनें बढ़ा दी हैं, उन्हें भी किसी दिन इसी तरह पकड़े जाने का भय सता रहा है।

स्वच्छ भारत मिशन छतरपुर की ब्लॉक कोऑर्डिनेटर नीलम तिवारी।

ग्राम पंचायत थौरी के रोजगार सहायक जीतेन्द्र सिंह ने अपनी पंचायत में 13 व्यक्तिगत शौंचालयों का निर्माण कार्य पूर्ण होने पर राशि भुगतान हेतु इनके फोटो स्वच्छ भारत मिशन छतरपुर की ब्लॉक कोऑर्डिनेटर नीलम तिवारी के कार्यालय में प्रस्तुत किए थे। उसके कई बार आग्रह करने के बाद भी फोटो प्रमाणित नहीं किए। इस बीच नीलम तिवारी द्वारा रोजगार सहायक से फोटो प्रमाणित करने के एवज में प्रति शौंचालय 1000 एक हजार रुपए की मांग की गई। चर्चा के दौरान इतनी राशि देने में असमर्थता व्यक्त करने पर सौदा 500 रुपए प्रति शौंचालय तय हुआ। लेकिन, ग्राम रोजगार सहायक जीतेन्द्र सिंह रिश्वत देना नहीं चाहता था। इसलिए उसने परेशान होकर लोकायुक्त पुलिस अधीक्षक सागर से शिकायत की।
इस शिकायत की तस्दीक करने के दौरान उसने स्वच्छ भारत मिशन की ब्लॉक कोऑर्डिनेटर को रिश्वत की पहली किश्त के रूप में 1000 हजार रुपए दिए। पूर्व निर्धारित योजना के अनुसार मंगलवार 18 फरवरी को जीतेन्द्र ने छतरपुर जनपद कार्यालय पहुँचकर ब्लॉक कोऑर्डिनेटर नीलम तिवारी को शेष 5500 रुपए की रिश्वत दी गई। अगले ही पल लोकायुक्त पुलिस टीम ने दबिश देकर नीलम तिवारी को रंगे हाथ गिरफ्तार कर लिया। इस मामले में लोकायुक्त पुलिस संगठन ने स्वच्छ भारत मिशन छतरपुर की ब्लॉक कोऑर्डिनेटर नीलम तिवारी के विरुद्ध भ्रष्टाचार निवारण अधिनियम के तहत प्रकरण पंजीबद्ध किया है। ट्रैप कार्रवाई लोकायुक्त पुलिस सागर के डीएसपी राजेश खेड़े के नेतृत्व में की गई।