* बाघ की मौत ने पार्क की गश्त और निगरानी व्यवस्था की खोली पोल
* मुख्य मार्ग से 100 मीटर दूर जंगल में 10 दिन तक सड़ता रहा शव, सोता रहा पार्क प्रबंधन
शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) टाइगर स्टेट मध्य प्रदेश के पन्ना टाइगर रिजर्व में आज सुबह एक नर बाघ का शव मिला है। शव कंकाल की स्थिति में मिलने से बाघ की मौत लगभग 10 दिन पूर्व होने का अनुमान लगाया जा रहा है। प्रथम दृष्ट्या बाघ की मौत संदिग्ध परिस्थतियों में होना प्रतीत होता है। घटना पन्ना टाइगर रिजर्व के गंगऊ अभ्यारण अंतर्गत आने वाली कटरिया बीट के वन कक्ष क्रमांक पी-278 की है। रेंजर गंगऊ अभ्यारण सागर शुक्ला सुबह से ही वन अमले के साथ मौके पर मौजूद हैं। क्षेत्र संचालक बृजेन्द्र श्रीवास्तव एवं उप संचालक बीरेन्द्र कुमार पटेल को घटना की जानकारी दी जा चुकी है, लेकिन सुबह 10 बजे तक दोनों ही वरिष्ठ अधिकारी मौके पर नहीं पहुंचे थे। एक स्थानीय व्यक्ति ने जानकारी देते हुए बताया कि, बाघ की मौत मनौर-मझगवां (हिनौता) मुख्य मार्ग से महज 100 मीटर की दूरी पर जंगल में हुई है। मृत बाघ पूर्ण वयस्क बताया जा रहा है, जिसकी आयु लगभग 5-6 वर्ष हो सकती है।
इस घटना का सबसे चिंताजनक और विचारणीय पहलू यह है, पन्ना पार्क क्षेत्र में वन एवं वन्यजीवों की चाक-चौबंद सुरक्षा व्यवस्था और सतत सघन निगरानी का दावा करने वाले पीटीआर प्रबंधन को मेल टाइगर (नर बाघ) की संदिग्ध मौत की कई दिनों तक भनक तक नहीं लगी। मुख्य मार्ग किनारे चंद कदम की दूरी पर स्थित जंगल में प्रचंड गर्मी में लगभग 10 दिन तक बाघ का शव सड़ता रहा लेकिन संबंधित बीट गार्ड, सर्किल प्रभारी और रेंजर से लेकर वरिष्ठ अधिकारियों को इसका पता नहीं चल सका। बाघ का शव कंकाल की हालत में मिलना पार्क प्रबंधन के निगरानी व्यवस्था से जुड़े दावों को खोखला साबित करता है। बता दें कि, पार्क के हिनौता स्थित प्रवेश द्वारा तक जाने वाले इस मार्ग से होकर पीटीआर के अधिकारी और मैदानी अमला प्रतिदिन कई बार गुजरता है लेकिन किसी को भी बाघ के सड़ते शव की दुर्गन्ध महसूस नहीं हुई।

सूत्र बताते हैं कि महुआ संग्रहण करने वाले एक ग्रामीण के द्वारा वन अमले को जंगल में टाइगर का शव मिलने की सूचना दी गई। कुछ देर बाद जैसे ही यह खबर फैली तो पन्ना टाइगर रिजर्व के घोर लापरवाह, नाकार और भ्रष्ट प्रबंधन में आंतरिक खलबली मच गई। समाचार लिखे जाने तक इस घटना की आधिकारिक तौर पर पुष्टि, बाघ की पहचान और उसके शरीर के विभिन्न महत्वपूर्ण अंगों की जानकारी के संबंध उप संचालक बीरेन्द्र कुमार पटेल से संपर्क करने का प्रयास किया गया। लेकिन कई बार रिंग बजने के बाद भी उनका फोन रिसीव नहीं हुआ।
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सबसे बड़ा प्रश्न यही है कि क्या सफाई के नाम पर जेसीबी से खुदाई और बड़े पैमाने पर वनस्पतियों को उखाड़ना नियमों के अनुरूप माना जा सकता है, और क्या बिना अनुमति वन क्षेत्र में इस तरह का बदलाव वैध है? श्री पटेल ने स्पष्ट तौर पर स्वीकार किया कि उत्तर वन मण्डल से आवश्यक अनुमति/अनापत्ति लिए बगैर उक्त कार्य कराया जा रहा था, लेकिन अब पत्र लिखकर अनुमति प्राप्त करने की कही जा रही है।







आंदोलन के दौरान जिन प्रमुख मांगों पर सहमति जताई गई है, वे सीधे तौर पर नीतिगत निर्णयों से जुड़ी हैं। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि भू-अर्जन, मुआवजा, पुर्नव्यवस्थापन और पुनर्वास पैकेज पहले से दिए जाने के बावजूद क्या वास्तव में विशेष पैकेज के रूप में मुआवजा बढ़ाया जाएगा। इसी तरह पन्ना और छतरपुर जिलों में अलग-अलग निर्धारित कटऑफ तिथियों को एक समान 1 अप्रैल 2026 करने का निर्णय लिया जाएगा या नहीं, और यदि लिया भी जाता है तो क्या यह सिर्फ केन-बेतवा लिंक परियोजना तक सीमित रहेगा या मझंगाय, रूंज और नैगुवां जैसी अन्य परियोजनाओं के विस्थापितों पर भी लागू होगा- यह स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। वहीं पुनर्वास पैकेज दिए जाने के बाद “गांव के बदले गांव” की मांग को स्वीकार किया जाएगा या नहीं, इस पर भी संशय बना हुआ है। इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या महज 10 दिनों की समयसीमा में इन व्यापक और जटिल मुद्दों पर कोई ठोस निर्णय संभव हो पाएगा, जबकि पूर्व में मिले आश्वासनों पर अमल न होने के कारण ही विस्थापितों को बार-बार आंदोलन का सहारा लेना पड़ा है। अब सबकी नजरें इस बात टिकी हैं कि 10 दिन बाद आंदोलनकारी क्या निर्णय लेते हैं।

केवल एमपी टॉपर ही नहीं, बल्कि जिले के 14 कुल विद्यार्थियों ने मेरिट सूची में स्थान बनाकर यह साबित कर दिया कि हीरों की धरती पन्ना प्रतिभाओं से भरा हुआ है। इन विद्यार्थियों की सफलता ने यह संदेश दिया है कि छोटे जिलों के छात्र भी बड़े लक्ष्य हासिल करने में सक्षम हैं। इस शानदार परिणाम के बाद जिले में खुशी का माहौल है। प्रदेश की मेरिट सूची में प्रतिभा सिंह सोलंकी, पिता भारतेंदु सिंह सोलंकी, सरस्वती ज्ञान मंदिर हाई स्कूल, गुनौर 499 प्रथम स्थान, अर्जुन सिंह राजपूत, पिता मंगल सिंह राजपूत सरस्वती जान मंदिर हाई स्कूल, गुनौर 497 तृतीय स्थान, प्रियंका यादव, पिता नन्द किशोर यादव, शासकीय कन्या उच्चतर माध्यमिक विद्यालय अजयगढ़ 496 चतुर्थ स्थान, उदय मित्रा, पिता राजेश मिश्रा, सरस्वती ज्ञान मंदिर हाई स्कूल गुनौर 496 चतुर्थ स्थान, हर्ष त्रिपाठी पिता रामफल त्रिपाठी सरस्वती ज्ञान मंदिर हाई स्कूल गुनौर 494 छठवां स्थान, विधान त्रिपाठी पिता रामेश्वर प्रसाद त्रिपाठी, सरस्वती ज्ञान मंदिर हाई स्कूल गुनौर 494 छठवां स्थान, आयुष तिवारी पिता रामराज तिवारी शा. हाई स्कूल गुखौर 493 सातवां स्थान, नमन मिश्रा पिता प्रमोद मिश्रा सरस्वती ज्ञान मंदिर हाई स्कूल गुनौर 492 आठवां स्थान आदित्य सोनी पिता राजेश सोनी शा. उमावि पहाड़ीखेरा 492 आठवां स्थान, नमन शुक्ला पिता देवेंद्र कुमार शुक्ला, शा. हाई स्कूल बड़ागांव 491 नौवां स्थान, नेहा प्रजापति पिता विधाधर प्रजापति सरस्वती ज्ञान मंदिर हाई स्कूल गुनौर 491 नौवां स्थान, प्रिंस सिंह राजपूत पिता हरिचरण सिंह राजपूत सरस्वती जान मंदिर हाई स्कूल गुनौर 490, अमर सिंह लोधी पिता राम स्वरूप सिंह लोधी नेशनल पब्लिक स्कूल पन्ना 490 दसवां स्थान, अवध बिहारी चौहान पिता राम दयाल लुनिया शासकीय हाई स्कूल गुखौर ने 490 अंकों के साथ दसवां स्थान अर्जित किया है। इस शानदार उपलब्धि पर पूरे जिले में जश्न ख़ुशी माहौल है। अभिभावकों, शिक्षकों, जनप्रतिनिधियों और प्रशासनिक अधिकारियों ने सभी सफल विद्यार्थियों को बधाई देते हुए उनके उज्ज्वल भविष्य की कामना की है।


निर्माणाधीन ढोड़न बांध स्थल पर चल रहे विस्थापितों के आंदोलन के तेज होने के साथ ही इसे दबाने के लिए सरकारी मशीनरी सक्रिय हो चुकी है। छतरपुर जिला मजिस्ट्रेट की ओर से क्षेत्र में धारा 163 लागू कर सख्ती बढ़ा दी गई है। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर के विरुद्ध पन्ना टाइगर रिजर्व द्वारा वन अपराध दर्ज कर लिया गया है। आंदोलन स्थल पर भीड़ को पहुंचने से रोकने के लिए पन्ना टाइगर रिजर्व के भुसौर गेट की नाकेबंदी कर बाहर से आने वालों के प्रवेश पर रोक लगा दी है। आंदोलन स्थल तक राशन-पानी व चिकित्सा सुविधा पहुंचने में बाधाओं के आरोपों के बीच यह संघर्ष अब मानवीय संकट का रूप लेता जा रहा है।
केन नदी का यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक विचलित कर देता है। नदी के बीचों-बीच सजी चिताओं पर लेटे ग्रामीण मानो अपने ही अस्तित्व के अंत की प्रतीक्षा कर रहे हों। महिलाएं अपने दुधमुंहे बच्चों को सीने से लगाए, झुलसा देने वाली धूप-गर्मी और भूख-प्यास के बीच डटी हैं। चारों ओर गूंजते नारे- “न्याय दो या मौत दो” इस आंदोलन को सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि एक भावनात्मक पुकार बना देते हैं। यह दृश्य साफ कर देता है कि यह लड़ाई अब जमीन से आगे बढ़कर अस्मिता और अस्तित्व की हो चुकी है। उल्लेखनीय है कि देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना अंतर्गत केन बेतवा लिंक राष्ट्रीय परियोजना के तहत पन्ना टाइगर रिजर्व के अंदर केन नदी पर ढोड़न बांध का निर्माण किया जा रहा है। छतरपुर जिले की बिजावर तहसील के अंतर्गत आने वाले इस विशाल बांध में छतरपुर के 8 गांव डूब में आ रहे हैं। वहीं परियोजना के तहत डूब से प्रभावित वन भूमि के बदले पन्ना जिले के 10 ग्रामों में भू-अर्जन कर ग्रामीणों को विस्थापित किया जा रहा है।
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर प्रशासन पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि पन्ना और छतरपुर जिले में भूमि अधिग्रहण की कानूनी प्रक्रियाओं का सही तरीके से पालन नहीं किया गया और ग्राम सभाओं के दस्तावेजों में भी पारदर्शिता नहीं है। केन बेतवा लिंक राष्ट्रीय परियोजना अंतर्गत बांध निर्माण के लिए और प्रभावित वन भूमि के बदले भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 सही तरीके से लागू नहीं किया गया। दोनों जिलों में 18 वर्ष की आयु पूर्ण करने वाले प्रभावित परिवारों के सदस्यों को साढे़ 12 लाख रूपए का पुनर्वास पैकेज प्रदान करने के लिए अलग-अलग समय-सीमा निर्धारित की गई। इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के चलते विस्थापित हो रहे सैंकड़ों पात्र व्यक्ति व्यक्ति पुनर्वास पैकेज से वंचित हो जाएंगे। अमित का आरोप है प्रशासन विस्थापितों की समस्याओं और मांगों का निराकरण करने के बजाए कोरे आश्वासन दे रहा है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि उन्हें उचित पुनर्वास के बजाय सिर्फ अधूरा मुआवजा देकर हटाने की कोशिश की जा रही है। वे स्पष्ट रूप से गांव के बदले गांव की मांग पर अड़े हुए हैं, ताकि उनकी सामाजिक संरचना और जीवनशैली सुरक्षित रह सके। भूख हड़ताल को वे अपनी मजबूरी बताते हैं। उनका कहना है कि जब तक न्याय नहीं मिलेगा, यह संघर्ष और तेज होता जाएगा।
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर उस बहस को जिंदा कर दिया है, जिसमें विकास और विस्थापन आमने-सामने खड़े नजर आते हैं। सरकार जहां केन-बेतवा लिंक परियोजना को बुंदेलखंड के जल संकट के समाधान के रूप में पेश कर रही है, वहीं स्थानीय आदिवासी-किसान इसे अपने जल, जंगल और जमीन पर हमला मान रहे हैं। छतरपुर कलेक्टर पार्थ जैसवाल का दावा है कि अधिकांश प्रभावितों को मुआवजा दिया जा चुका है और कानून-व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है। इसी के तहत धारा 163 लागू कर दी गई है और किसी भी तरह की भीड़ या विरोध पर रोक लगाई गई है। लेकिन दूसरी ओर, आंदोलनकारी इसे दमनात्मक कार्रवाई मानते हुए आरोप लगा रहे हैं कि उनकी आवाज को दबाने के लिए सख्ती की जा रही है। केन नदी की लहरों पर लेटी ये प्रतीकात्मक ‘चिताएं’ आज सिर्फ एक आंदोलन का हिस्सा नहीं, बल्कि उस पीड़ा का प्रतीक बन चुकी हैं, जिसे हजारों लोग अपने भीतर लिए बैठे हैं। एक ओर विकास की बड़ी तस्वीर है, तो दूसरी ओर उजड़ते घरों की हकीकत। ऐसे में सवाल यही उठता है- ‘क्या इन लोगों को उनका हक और सम्मानजनक पुनर्वास मिलेगा, या केन की धार में उनकी यह पुकार यूं ही गूंजती रह जाएगी’?




विभागीय सूत्रों से मिली जानकारी अनुसार वन परिक्षेत्र अजयगढ़ की बीट बरकोला में 20 हेक्टेयर, बीट सिमरा 50 हेक्टेयर और वन परिक्षेत्र धरमपुर की बीट कुड़रा में 40 हेक्टेयर वन भूमि पर कैम्पा मद से वृक्षरोपण कराने के लिए पिछले माह ट्रैक्टर लगवाकर ठेके पर हजारों गड्ढे खुदवाए गए। सूत्रों ने बताया कि ट्रैक्टर से प्रत्येक गड्ढे की खुदाई का ठेका साइज के हिसाब से 3 से 4 रुपए में दिया गया। जबकि मजदूरों (श्रमिकों) के नाम पर बनाए गए फर्जी प्रमाणकों में प्रत्येक गड्ढे की खुदाई की मजदूरी न्यूनतम 12-13 रुपए से लेकर अधिकतम 25 रुपए तक दर्ज की गई। ठेके पर मशीनों से काम करवाने के बाद कार्य प्रभारी बीटगार्ड, संबंधित सर्किल प्रभारी और रेंजरों सुनियोजित तरीके से अपने विश्वासपात्र तथा करीबी लोगों के नाम बिल-बाउचर (प्रमाणक) में मजदूरी करने वाले श्रमिकों के रूप दर्ज कर दिए। ताकि उनके खातों में होने वाले मजदूरी भुगतान की राशि आसानी से उन तक पहुंच सके।


