किसानों की आय हुई दोगुनी, जीवन स्तर में भी सकारात्मक बदलाव दिखने लगे हैं
पन्ना। रडार न्यूज कपिलधारा कूप योजना ने पन्ना जिले के पिछड़ा वर्ग बाहुल्य ग्राम महाराजगंज की तकदीर बदल दी है। पन्ना जिले की जनपद पंचायत शाहनगर अन्तर्गत आने वाले पिछड़ा वर्ग बाहुल्य ग्राम महाराजगंज में कुल 452 परिवार निवासरत है। यहां के लोगों की आय का मुख्य स्त्रोत कृषि या मजदूरी है। यहां का किसान खेती के मामले में ज्यादातार वर्षा जल पर ही आश्रित है। इस कारण से ज्यादातर केवल धान की फसल ही ले पाते है। इस ग्राम पंचायत में मनरेगा योजनान्तर्गत छोटे किसानों को कपिलधारा उपयोजना के अन्तर्गत सिंचाई कूप की सुविधा उपलब्ध कराई गई है। जिसके अन्तर्गत 35 कपिलधारा कूप इस ग्राम पंचायत में पूर्ण हो चुके है। सभी कूपों में पर्याप्त पानी है। कल तक जो किसान मुश्किल से केवल एक फसल ले पाते थे, कपिलधारा कूप की मदद सेे दो फसलें ले रहे है। जो किसान पहले सिर्फ धान की फसल लेते थे, वह अब चना, मसूर, गेहूं आदि की फसल भी लेने लगे है। जिससे इन किसानों को कृषि से प्राप्त होने वाली आय लगभग दोगुनी हो गई है। वर्तमान समय में कपिलधारा कूप के माध्यम से लगभग 80 हेक्टेयर भूमि की सिंचाई हो रही है। जिसमें कुछ किसान दो फसलों के अतिरिक्त सब्जी आदि का भी उत्पादन करके अपनी आमदनी में वृद्धि कर रहे है। निश्चित् रूप से कपिलधारा कूप योजना का लाभ जिन किसानों को मिला है, उनकी आर्थिक उन्नति तो हुई ही है, साथ ही उनका रहन सहन में भी सुधार आया है। वर्तमान समय में महाराजगंज में 2.2 लाख रूपये की लागत से 10 नये स्वीकृत हितैषी कपिलधारा कूप का कार्य स्वयं हितग्राहियों द्वारा किया जा रहा है। सभी कूपों में 8.10 फिट पानी उपलब्ध है एवं कूपों में बंधाई का कार्य तेजी से चल रहा है। वर्तमान समय में हितग्राही पहलवान आदिवासी, लोकेश कुमार, बाई लोधी, मानिक लाल, श्यामले लोधी, बेनी प्रसाद, हक्के, कुसुम बाई, सोना बाई एवं राजाराम लोधी के कूपों में काम चल रहा है। कूप पूर्ण होने पर निश्चित् ही इन किसानों को भी अपनी खेती में पर्याप्त लाभ प्राप्त होगा। गत दिवस दिनांक 11 मई 2018 को ग्राम पंचायत महाराजगंज में मुख्य कार्यपालन अधिकारी, जिला पंचायत पन्ना डाॅ. गिरीश कुमार मिश्रा द्वारा भी हितैषी कपिलधारा कूपों का निरीक्षण किया गया। जिसमें उन्होंने पाया कि हितैषी कपिलधारा कूपों का कार्य हितग्राहियों द्वारा पूरी लगन के साथ किया जा रहा है और शीघ्र ही ये कूप पूर्ण हो जायेंगे। उन्होने ग्राम पंचायत में निर्मित कपिलधारा कूपों के पर्याप्त जल स्तर एवं उससे किसानों को होने वाले लाभ को देखकर प्रसन्नता व्यक्त की है। यह कहना अतिश्योक्ति नहीं है कि कपिलधारा कूप योजना मकरंदगंज के कृषकों के लिए वरदान साबित हुई है जिसने गांव की तस्वीर ही बदल दी है।
बोर्ड परीक्षाओं का रिजल्ट घोषित होने के पूर्व कलेक्टर ने की अपील
पन्ना। रडार न्यूज आगामी दिवसों में माध्यमिक शिक्षा मंडल भोपाल द्वारा कक्षा 10 वीं एवं 12वीं बोर्ड परीक्षाओं के परिणाम जारी किए जाने हैं। पन्ना जिले के 29 हजार से भी ज्यादा विद्यार्थियों ने परीक्षा दी है। इस संबंध में जानकारी देते हुए कलेक्टर मनोज खत्री ने जिले के सभी परीक्षार्थियों से कहा है कि आप सभी बच्चों ने अपनी क्षमता के अनुरूप इन बोर्ड परीक्षाओं में बेहतर करने का प्रयास किया होगा। निश्चि ही सभी को अपनी मेहनत के अनुरूप परीक्षा परिणाम भी मिलेंगे। उन्होंने बेहतर परीक्षा परिणाम के लिए सभी को शुभकामनाएं देते हुए कहा है कि यदि किन्हीं कारणों से किसी बच्चे का परीक्षा परिणाम उम्मीद के मुताबिक नहीं आता है अथवा वे परीक्षा में असफल हो जाते हैं तो भी उन्हें घबराने या निराश होने की आवश्यकता नहीं है। जीवन में परीक्षा परिणाम ही सब कुछ नहीं होते। अच्छे केरियर बनाने के और भी बेहतर विकल्प मौजूद हैं। आपका जीवन और खुशी आपके एवं आपके परिवार के लिए सबसे महत्वपूर्ण हैं। परीक्षा परिणाम को सुधारने के लिए दूसरा अवसर मिलता है। अंकों की पुनर्गणना के लिए भी आवेदन किया जा सकता है। लेकिन जीवन को बचाने के लिए कोई दूसरा अवसर नहीं मिलता। इसीलिए हताशा और निराशा की स्थिति में भी अपने जीवन से किसी तरह का खिलवाड़ न करेें। साथ ही कलेक्टर श्री खत्री ने विद्यार्थियों के अभिभावकों से कहा कि आपका बच्चा अपने आप में विशिष्ट है। परीक्षा पिरणाम को लेकर उसकी किसी से तुलना न करें। उन्होने अभिभावकों से बच्चों का परीक्षा परिणाम चाहे जैसा आए, उसे स्वीकारने और हर स्थिति में बच्चों का साथ देने की अपील की है।
एडीजी नारकोटिक्स वरूण कपूर ने सायबर अपराधों का दिया प्रशिक्षण
सायबर सुरक्षा पर आयोजित कार्यशाला में बोले – ‘‘सायबर अपराधों के प्रति जागरूकता ही है बचाव‘‘
पन्ना। रडार न्यूज संचार क्रांति के फलस्वरूप सूचना एवं संचार प्रौद्योगिकी का दायरा लगातार जिस तेजी से बढ़ रहा है उसी गति से सायबर क्राईम में भी वृद्धि हो रही है। सायबर अपराधों के प्रति नई पीढ़ी को जागरूक करने के उद्देश्य से पन्ना के छत्रशाल शासकीय स्नातकोत्तर महाविद्यालय में शनिवार को ‘‘सायबर सुरक्षा‘‘ विषय पर एक दिवसीय कार्यशाला आयोजित हुई। जिसमें अतिरिक्त पुलिस महानिदेशक नारकोटिक्स विभाग एवं पुलिस महानिदेशक पुलिस रेडियो प्रशिक्षण शाला इन्दौर वरूण कपूर मुख्य वक्ता के रूप में शामिल हुए। इस महत्वपूर्ण कार्यशाला में महाविद्यालय के छात्र-छात्राओं, फेकल्टीज एवं पुलिस के अधिकारी-कर्मचारियों ने भाग लिया व सायबर सुरक्षा के मूलमंत्रों की जानकारी प्राप्त की। इस अवसर पर एडीजी वरूण कुमार ने कहा कि वर्चुअल वल्र्ड में डाटा ही सबसे महत्वपूर्ण शक्ति है, इसलिए अपना डाटा सुरक्षित रखने के लिए हर संभव उपाय करें। सूचना प्रौद्योगिकी के उपयोग को लेकर छात्र-छात्राओं को विशेष सतर्कता बरतने की सलाह देते हुए आपने कहा कि वर्चुअल वर्ल्ड में कुछ भी शेयर या लाईक आदि अच्छी तरह सोच समझकर ही करें। सायबर अपराध बढ़ने के कारण बताते हुये उन्होंने कहा कि सायबर स्पेस में जो दिखता है वह होता नहीं है। लोग सुरक्षा के उपाय नहीं करते है साथ ही इससे संबंधित कानून की जानकारी भी नहीं रखते है, इसलिए सायबर अपराध का शिकार होते है। आज जहाँ पूरा विश्व मोबाईल, इंटरनेट के माध्यम से आपस में जुड़ गया है, दैनिक कार्यों में इंटरनेट का उपयोग अब सामान्य बात है, लेकिन हमें यह भी ध्यान रखना चाहिए कि वर्तमान समय में सबसे तीव्र गति से बढ़ने वाला अपराध सायबर अपराध है। आज आपके और आपकी डिवाईस के बीच अपराध होने की संभावना बढ़ गई है। इसी प्रकार डिजिटल फुटप्रिंट, आईडेंटीटी थेप्ट, एटीएम फ्राॅड, काल स्पूफिंग, फिसिंग, आर्थिक धोखाधड़ी, एटीएम फ्राॅड, सायबर स्टाकिंग एवं सायबर से जुड़े अपराध है जिनके बारे में जानकारी होना आवश्यक है। श्री कपूर ने कहा कि आधुनिक टेक्नालाॅजी का इस्तेमाल सुरक्षित ढंग से अपने लाभ के लिये करें न कि दूसरों को नुकसान पहुंचाने में। अब समय आ गया है जब छात्र-छात्राऐं सायबर सुरक्षा के क्षेत्र में अपना कैरियर बना सकते है। यह रोजगार का एक अत्यंत विस्तृत क्षेत्र बनकर उभरा है। छात्र-छात्राएं सायबर लाॅ के क्षेत्र में, अनुसंधान के क्षेत्र में प्रशिक्षण लेकर अपने लिये सुरक्षित रोजगार तो प्राप्त कर ही सकते हैं साथ ही देशसेवा का कार्य भी कर सकते है। कार्यशाला में एडीजी वरूण कपूर ने आईटी एक्ट एवं इसकी विभिन्न धाराओं की भी जानकारी दी गई ।
इन बातों का रखें ध्यान-
युवा सोच-समझकर ही फेसबुक पर दोस्त बनायें।
इलेक्ट्रानिक्स डिवाईस का उपयोग करते समय हमेशा सुरक्षा से जुड़े पहलुओं को ध्यान में रखें।
सायबर दुनिया के मायाजाल में काल्पनिक चीजों के पीछे भागने की अपेक्षा मेहनत कर अपनी मंजिल प्राप्त करें।
मोबाईल-इंटरनेट का उपयोग करते समय प्रलोभन वाले मैसेज से बचें, क्योंकि बगैर किसी कार्य के आपको कोई भी कुछ भी निःशुल्क नहीं देगा।
सायबर अपराधों को नियंत्रित करने व इसके दुष्प्रभावों से बचने का सबसे सशक्त माध्यम इसकी जानकारी होना-जागरूक होना है।
छात्र-छात्राओं को किया सम्मानित-
कार्यशाला में उत्कृष्ट प्रदर्शन करने वाले दो सक्रिय छात्र-छात्राओं को श्री कपूर ने प्रमाण-पत्र व गोल्डन बैज प्रदान कर सम्मानित किया। श्री कपूर को कार्यशाला समापन पर प्राचार्य द्वारा स्मृति चिन्ह एवं प्रमाण पत्र प्रदान किया। इस अवसर पर महाविद्यालय की प्राचार्या श्रीमति किरण खरे, पुलिस अधीक्षक पन्ना रियाज इकबाल, अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक पन्ना बीके सिंह परिहार, एसडीओपी पन्ना उमराव सिंह, सहित महाविद्यालय के प्राध्यापक एवं बड़ी संख्या में छात्र-छात्रायें एवं पुलिस के अधिकारी-कर्मचारी मौजूद रहे।
मोहन्द्रा – रडार न्यूज़ नगर के चौरसिया समाज के लोगों ने मानवता की मिशाल कायम करते हुए एक गरीब परिवार के एकमात्र कमाने वाले सदस्य की बीमारी से मौत होने पर उसके आश्रितो को तत्परता से आर्थिक सहायता प्रदान की है। चौरसिया समाज के नवयुवकों ने दुःखी परिवार की मदद के लिए हाँथ आगे बढ़ाते हुए मृतक राजेंद्र चौरसिया की बेबा को आर्थिक सहायता के तौर पर 9300 रुपये दिए हैं। स्वप्रेरणा से युवाओं द्वारा की गई पीड़ित मानवता की सेवा से जुड़ी इस नेक पहल की सर्वत्र सराहना हो रही है। उल्लेखनीय है कि राजेंद्र चौरसिया का 38 वर्ष की आयु में ब्लड कैंसर की बजह से भोपाल में उपचार के दौरान दुखद निधन हो गया था। पान की खेती करके जीवनयापन करने वाला राजेंद्र अपने परिवार का एकमात्र कामांने वाला सदस्य था। उसकी मौत के बाद दो छोटे बच्चों और पत्नी की जिम्मेदारी वृद्ध पिता के कंधों पर आगई है।
अजयगढ़ – रडार न्यूज़ पूर्व कैबिनेट मंत्री कमलनाथ को मध्यप्रदेश कांग्रेस कमेटी का अध्यक्ष बनाये जाने पर अजयगढ़ के कांग्रेसजनों ने सद्गुरू नेत्र चिकित्सालय जानकी कुंड चित्रकूट के तत्वाधान में एवं दिवंगत कांग्रेस नेता स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. देवीदयाल पाठक स्मारक संस्थान के विशेष सहयोग से निःशुल्क नेत्र परीक्षण शिविर का आयोजन किया गया। शिविर में नेत्र रोगियों के नेत्रों का परीक्षण नेत्र सहायक विकास त्रिपाठी ने किया। मोतियाबिन्द से पीड़ित रोगियों को निःशुल्क वाहन द्वारा निःशुल्क आॅपरेशन के लिये जानकी कुण्ड नेत्र चिकित्सालय चित्रकूट भेजा गया। नेत्र रोगियों को स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. देवीदयाल स्मारक संस्थान के अध्यक्ष श्रीराम पाठक ने स्वल्पाहार करा कर रवाना किया। उन्होंने बताया कि पूर्व केन्द्रीय मंत्री कमलनाथ को प्रदेश कांग्रेस अध्यक्ष बनाये जाने से पूरे प्रदेश के कांग्रेसजनों में उत्साह एवं हर्ष का संचार हुआ है। इस अवसर पर ब्लाॅक कांग्रेस अध्यक्ष राकेश गर्ग, रामेश्वर प्रसाद खरे, मोहम्मद महमूद, आशीष जड़िया, बंटी गोस्वामी, विक्की शिवहरे, देशराज पटेल सहित कई गणमान्य व्यक्ति मौजूद रहे।
मासूम के ऊपर पत्थर पटक हत्या की वारदात को दिया अंजाम
मां-बाप के विवाद की बली चढ़ी निर्दोष मासूम
पन्ना। बुन्देलखण्ड अंचल के पन्ना जिले के पवई थाना अंतर्गत एक3 माह की मासूम बच्ची की उसके ही पिता ने पत्थर पटककर बेरहमी से हत्या कर दी। इस स्तब्ध कर देने वाली वारदात के खुलासे से यह सवाल उठ रहा है कि परिस्थितिया चाहे जैसी भी हो पर कोई पिता इतना भी बेरहम कैसे हो सकता है कि अपनी ही औलाद को कत्ल कर दे। पुलिस के अनुसार आरोपी रामनारायण लोधी निवासी ग्राम सथनिया और उसकी पत्नी के बीच लम्बे समय से जारी विवाद के चलते पत्नी और मासूम बच्ची से पीछा छुड़ाने के लिये निर्दयता की सारी हदें पार करते हुये पत्थर पटकर कर अपनी ही बेटी को मार डाला। पुलिस ने आरोपी पिता रामनारायण लोधी को गिरफ्तार करते हुये न्यायालय के आदेश पर उसे जेल भेज दिया है। मासूम बच्ची के बेरहमी से हत्या करने की यह वारदात 7 मई की है। प्राप्त जानकारी के अनुसार रामनारायण लोधी घटना दिनांक को ग्राम मुड़वारी निवासी अपने मामा गुलजारी लोधी के घर पर आया था। कुछ समय बाद उसकी पत्नी भूरी बाई अपनी मां को लेकर मुड़वारी पहुंच गई, जहां दोनों पति-पत्नी के बीच विवाद हो गया। भूरी बाई इस सबसे इतनी नाराज हुई कि अपनी तीन माह की दुधमुंही बच्ची को पति के पास छोड़कर वापिस घर लौट गई। इस घटनाक्रम के बाद रामनारायण लोधी की मनोदशा ऐसी हो गई कि वह अपनी बेटी और पत्नी से हमेशा के लिए पीछा छुड़ाने के लिए बेटी को मुड़वारी के पहाड़ ले गया। जहां उसने पत्थर पटक कर मासूम को मौत के घाट उतार दिया। अपने इस जघन्य अपराध को छिपाने के लिए रामनारायण ने झूंठी कहानी गढ़ते हुये बताया कि पहाड़ की चढ़ाई के दौरान पैर फिसलने से बच्ची उसके हांथ से छिटक कर पत्थर से टकराई जिससे उसकी मौत हो गई। रामनारायण की बातों पर संदेह होने के आधार पर पुलिस ने जब उसे हिरासत में लेकर सख्ती से पूंछतांछ की तो उसने अपना गुनाह कबूल कर लिया। पुलिस ने आरोपी के खिलाफ हत्या का मामला पंजीबद्ध किया है।
पुलिस ने 3 स्थानों पर छापामार कार्यवाई कर चार सटोरिया पकड़ाये
पन्ना। जिला मुख्यालय पन्ना में चरम पर चल रहे आईपीएल क्रिकेट सट्टा के खिलाफ पुलिस में तीन अलग-अलग स्थानों पर छापेमारी करते हुये चार सटोरियों को गिरफ्तार करने का दावा किया है। पकड़े गये आरोपियों से पुलिस ने 43500 रूपये, 8 नग मोबाईल फोन, 3 कलर टीव्ही आदि सामग्री बरामद की है। पकड़े गये सटोरियों में फिरोज खान पिता याकूब खान निवासी रानीबाग टगरा, आमिर खान पिता मुस्तफा निवासी रानीगंज मोहल्ला, फिरोज मंसूरी पिता नब्बी मंसूरी निवासी मठ्या तालाब के पास और नामी सटोरिया मुकेश मोदी पिता पुरूषोत्तम लाल मोदी शामिल हैं। पुलिस की छापामार कार्यवाही को लेकर नगर में आम चर्चा है कि यह सिर्फ खानापूर्ति के लिए की गई है। बड़े स्तर पर हाईटेक आईपीएल सट्टा खिला रहे प्रभावशाली सट्टोरियों के खिलाफ कोई कार्यवाही न होने से कोतवाली पुलिस की कार्यप्रणाली पर सवाल उठ रहे हैं। मजेदार बात यह है कि छापामार कार्यवाही में पकड़े गये नामी सटोरिया मुकेश मोदी के जैन मंदिर के पीछे रानीगंज मोहल्ला स्थित घर से नोट गिनने की मशीन तो मिली पर नगदी सिर्फ 27500 रूपये ही जप्त हुये हैं। इसके अलावा एक एलसीडी टीव्ही, डीटूएच सेटअप बॉक्स , 30 नग सट्टा पर्ची, एक मोबाईल फोन भी जप्त हुआ है। वहीं पन्ना के समीपी ग्राम टगरा में अपने घर से आईपीएल सट्टा खिलवा रहे फिरोज खान पिता याकूब खान से पुलिस ने 8400रूपये नगद, 3 मोबाईल फोन, एक कलर टीव्ही, सेटअप बॉक्स और एक कॉपी जप्त की है, जिसमें क्रिकेट मैच की पारियों का हिसाब दर्ज होना बताया गया है। रानीगंज मोहल्ला में स्थित एक महिला के रिहायसी घर से आईपीएल क्रिकेट सट्टा खिला रहे आमिर पिता मुस्तफा खान एवं फिरोज मंसूरी के कब्जे से पुलिस ने तीन मोबाईल फोन, एक टीव्ही मय सेटअप बॉक्स , 3600 रूपये नगद एवं दो रजिस्टर जप्त किये हैं जिनमें आईपीएल मैचों के सट्टे का हिसाब-किताब दर्ज है।
इन स्थानों से चल रहा सट्टा
हाईटेक आईपीएल सट्टा से जुड़े सूत्रों की मानें तो पन्ना शहर में करीब आधा दर्जन से अधिक स्थानों से बड़े पैमाने पर सट्टा खिलवाया जा रहा है। जिनमें गल्ला मंडी, किशोरगंज मोहल्ला चित्रगुप्त मंदिर के पास, आगरा मोहल्ला पुराना सुरेन्द्र सिंह चैराहा के पास, गुल्लायंची मोहल्ला में संचालित गद्दी मुख्य हैं। आईपीएल के प्रत्येक मैच में करीब से 10-15 लाख तक के दांव लग रहे हैं। क्रिकेट सट्टा खेलने वाले एडवांस राशि जमा करते हैं जिसके बाद वे गुप्त मोबाईल नंबर पर कॉल करके अपने दांव लगाते हैं।
आधी-अधूरी कार्यवाही
आईपीएल क्रिकेट के चालू सीजन में पुलिस ने पन्ना से पूर्व देवेन्द्रनगर में हाईटेक सट्टा के खिलाफ कार्यवाई को अंजाम देते हुये मुकेश जैन नामक सटोरिया को गिरफ्तार किया था। ऑनलाइन क्रिकेट सट्टा खिलाने वाले इस आरोपी के कब्जे से पुलिस ने एक60 पेज का एक रजिस्टर बरामद होने की जानकारी दी थी। जिसमें सट्टा खेलने वालों को ब्यौरा दर्ज होना बताया गया था। लेकिन देवेन्द्रनगर पुलिस ने आज तक सट्टा लगाने वालों के नाम सार्वजनिक नहीं किये हैं। यह भी नहीं बताया गया कि सटोरिया मुकेश जैन और पन्ना से पकड़े गये सट्टा खिलाने वालों के तार ऊपर किससे जुड़े हैं। इस गेम का बॉक्स कौन है। देवेन्द्रगनर और पन्ना की कार्यवाही में एक बात काॅमन है कि सटोरियों के मोबाईल में एक विशेष एप्लीकेशन डॉऊनलोड थी जिसमें सट्टा की बुकिंग की रिकार्डिंग और सट्टा का भाव पता चलता था। पन्ना पुलिस की मंशा यदि वाकई आईपीएल सट्टा पर प्रभावी अंकुश लगाने की है तो उसे सटोरियों से जप्त मोबाईल फोन, रजिस्टर आदि के ब्यौरों और आरोपियों से पूंछतांछ के आधार पर सट्टा लगाने वालों और इस गेम को संचालित करने वालों के नाम भी उजागर करने चाहिये
अनुसूचित जनजाति की समस्याएं और उनके समाधान की बात करने से पहले यह जानना जरूरी है कि ये हैं कौन? क्या कारण है कि इन्हें मुख्य समाज से अलग करके देखा जाता है?
– जयराम शुक्ल
कभी-कभी दूसरे के हिस्से का श्रेय और सुख अनायास ही मिल जाता है. अवधेशप्रताप सिंह विश्वविद्यालय रीवा के अनुसूचित जाति अध्ययन केंद्र के राष्ट्रीय सेमीनार में मुख्य वक्ता के रूप में यशस्वी व विद्वान, प्रशासक शरदचंद्र बेहार साहब को बोलना था. इस गर्मी और लगन की भीड़-भड़क्का में रायपुर से उनकी टिकट कन्फर्म नहीं हो पाई. आयोजकों ने 12 घंटे पहले रिक्त स्थान की पूर्ति के लिए मेरा नाम तय कर लिया. एक पत्रकार के नाते जल-जंगल-जमीन और जन पर लिखना-पढ़ना मुझे हमेशा से भाता रहा है. बेहार साहब तो खैर बेहार साहब ही हैं. नौकरशाही के सर्वोच्च शिखर पर बैठकर कोई इतना भी संजीदा हो सकता है बेहार साहब इसके उदाहरण हैं, ईश्वर उन्हें शतायु दे. चीफ सेक्रेटरी रहते हुए भी वे कई सामाजिक आंदोलनों के प्रेरक रहे हैं. इस क्षेत्र में काम करने वाले बहुत से नौजवानों के वे आज भी ऊर्जा के श्रोता और मार्गदर्शक हैं. निश्चित ही जनजातियों की समस्याओं और उसके समाधान के रास्ते पर उनका वक्तव्य प्रभावपूर्ण होता. बहरहाल उनकी जगह मुझे खड़ा होना था सो मेरे लिए यह अलग अनुभूति और दायित्वबोध का विषय था.
वनवासियों पर मेरी समझ किताबों के जरिए नहीं बन पाई. इस समाज को आंखों से जितना देखा और उनके बीच जाकर जो जाना, बस उतना ही ज्ञान है, उससे ज्यादा कुछ नहीं. अलबत्ता अल्विन बारियर और वाल्टर जी ग्रिफिथ्स को पढ़ा है. दोनों ने ही मध्यभारत की जनजातियों पर विषद् और वैज्ञानिक अध्ययन किया है. स्वाभाविक तौर पर इन महापुरूषों के अध्ययन का आधार वैदिक काल की वह अरण्य संस्कृति नहीं रही, जिसमें यह समाज पला-बढ़ा और आज यहां तक पहुंचा, पढ़कर यही एक खोट महसूस हुआ. वारियर और ग्रिफिथ्स मेरे लिए महज एक विद्वान व अकादमिक सूचना संसाधन मात्र हैं. जो भी समझ बनी वह उनके बीच जाकर उनके हाल देखकर ही बनी. जाहिर है कि जनजातियों के मसले समझने का मेरा नजरिया एक पत्रकार का है और इस हिसाब से आप मुझे इस विषय के बारे सतही जानकार घोषित करने के लिए स्वतंत्र हैं. वक्तव्य से पहले मैंने छात्रों और शोधार्थियों को यही कैफियत दी.
अनुसूचित जनजाति की समस्याएं और उनके समाधान की बात करने से पहले यह जानना जरूरी है कि ये हैं कौन? क्या कारण है कि इन्हें मुख्य समाज से अलग करके देखा जाता है? इतिहासकारों ने इन्हें आदिवासी कहकर संबोधित किया. जैसा कि अर्थ से ही स्पष्ट है यहां के आदि निवासी. इससे यह स्वमेव ध्वनित होता है कि इनके अलावा जो भी हैं वे इस देश के आदि.. वासी नहीं हैं अन्यत्रवासी थे. इतिहासकारों की इसी स्थापना की पीठ पर आर्यों और अनार्यों की थ्योरी गढ़ी गई. यह एक बड़ी साजिश का हिस्सा थी, वो इसलिए कि जिससे विशाल भारतीय समाज में इसे आधार बनाकर आगे विभेद पैदा किया जा सके. विभेद की ये कोशिशें हो भी रही हैं.. कभी महिषासुर महोत्सव के जरिए, कभी यह बताकर कि ये भारतीय सनातन समाज का हिस्सा ही हैं, इनका धर्म व इनकी मान्यताएं अलग हैं. राजनीतिक तुष्टीकरण इस मसले को और भी गंभीर बना देता है. मेरा मानना है कि इसे वनवासी समाज कहना ही सही और न्यायोचित होगा. इतिहास से आदिवासी शब्द सदा के लिए विलोपित कर दिया जाना चाहिए, क्योंकि अंग्रेज और उनके वैचारिक वंशधरों ने आदिवासी शब्द ही सोची-समझी और दूरगामी परिणाम देने वाली साजिश के चलते गढ़ा था.
अब विचार करने की जरूरत है कि ये वनवासी ही क्यों रहे आए, जबकि अरण्य संस्कृति का विस्तार ग्राम्य और नागर संस्कृति तक हुआ. वनों से दूर एक नया समाज बना और वह आज उत्तरोत्तर आधुनिकता दौड़ में इतना आगे पहुंच गया कि इस धरती से भी दूर नए ग्रहों में बसने की सोचने लगा है. मेरा ऐसा मानना है कि आदिमयुग के बाद जब सभ्यताओं के विकास का क्रम शुरू हुआ.. मेधा का विकास द्रुतगति से होने लगा तो उस समाज में दो समानांतर वर्ग पनपे. उसका आधार और कुछ नहीं अपितु प्रवृत्ति और मनोवृत्ति थी. एक वर्ग में असुरक्षा बोध, भविष्य की चिंता और संग्रह की वृत्ति जन्मी. यह अन्वेषक और नवाचारी वर्ग था जो वन-प्रांतरों से अलग एक दूसरी दुनिया के बारे में सोचने लगा. दूसरा वर्ग यथास्थिति से ही संतुष्ट रहा. वह प्रकृति को ही आदि से अंत तक अपना पालक और आराध्य मानता रहा. इन दोनों वर्गों में क्रमशः दूरियां बढ़ती गईं. वनों से दूर मैदानी हिस्से में नदियों के किनारे सभ्यताएं फलने लगीं. संग्रह वृत्ति के साथ पूंजीवाद शुरू हुआ और जंगल के बाहर का यह समाज नए डगर पर चल पड़ा. उसकी बुद्धि और बाहुबल ने प्रकृति को ही अपनी पूंजी का संसाधन मान लिया. जो वनों में रह गए उन्होंने अपना भविष्य प्रकृति के ही हवाले छोड़ दिया. इस दृष्टि से देखें तो जो आज वनों में रह रहे हैं वो, और जो गांव व शहरों में बस्ते हैं वो, दोनों ही मूलत रूप से एक हैं. यह थोपी हुई थ्योरी है कि वे आदिवासी हैं और जो शेष हैं वे बाहर से आए हुए आक्रांता. वेद हमारी अरण्य संस्कृति की अमूल्य निधि हैं. इन्हें रचने में वनवासी समाज का भी उतना ही योगदान है.
वनवासियों के देवी-देवताओं और मान्यताओं पर भी विमर्श चलते रहते हैं. यह बात तो इतिहासकार भी मानते हैं कि शिव परिवार और हनुमानजी मूलतः अनार्यों के देवता हैं. वेदों में प्रकृति को ही देवता माना गया है. वैदिक देवता व्यक्त और व्यापक हैं. वे साक्षात हैं. वेदों में पंचभूतों को देवता माना गया है. वृक्ष, नदियां, पर्वत, पशुपक्षी सभी के प्रति दैवीय भाव है. वनवासियों के प्रायः सभी देवी-देवता प्रकृति का प्रतिनिधित्व करते हैं. वनवासियों के मंत्रोच्चार जोकि प्रायः आपदा-विपदा के समय या झाड़-फूंक के लिए प्रयोग में लाए जाते हैं उनमें से प्रायः सभी में हनुमान जी या शंकर जी की दुहाई दी जाती है. शिव परिवार तो एक तरह से जैव विविधता और सह अस्तित्व का जीवंत प्रदर्श है, जिसे वनवासी समाज आज भी जीता है. शिव वनवासियों के आदिदेव हैं.
ग्राम्य व नागर संस्कृति के जनों ने तो काफी बाद में इनके अस्तित्व व महत्व को स्वीकार किया. डॉ. राममनोहर लोहिया वानरों को बंदर नहीं मानते, अपितु इन्हें मनुष्य ही मानते हैं जो वन में रहते थे. वानर से ऐसा शब्दबोध भी होता है, वन-नर= वानर. रामायण कथा वनवासियों के पराक्रम और अतुल्य सामर्थ्य की कथा है, जिसमें उन्होंने राम के नेतृत्व में पूंजीवाद, आतंकवाद के पोषक साम्राज्यवादी रावण को पराजित कर सोने की लंका को धूलधूसरित कर दिया. रामकथा यथार्थ में वनवासियों के मुक्ति संघर्ष और विजय की अमरकथा है. इस कथा के नायक ने स्वयं वनवासी बनना स्वीकारा और तमाम वनवासियों को अपने बराबरी में खड़ा करके समाज को समत्व की नई परिभाषा दी. सो इसलिए ये वनवासी सनातन से चले आ रहे भारतीय कुल परिवार के अभिन्न और अविभाज्य जन हैं. यदि कोई विभेद है तो वह है जीवन और विचार शैली का, परंपरा परिवेश और पर्यावास का. वो प्रकृति के साथ गूंथे हैं और ये प्रकृति को भी वस्तु संपदा की दृष्टि से देखते हैं. यह विभेद भी महत्व का है, क्योंकि यहीं से इनकी समस्याओं का समाधान सूझेगा.
औद्योगिकीकरण ने प्रकृति को संपदा का संसाधन मान लिया. वनवासियों की मुसीबत की शुरुआत यहीं से होती है. प्रकृति की नेमतें भी कभी-कभी उसकी दुश्मन बन जाती हैं. कस्तूरी मृगों के नाश का कारण बन गई और मणि उन सर्पों की, जिनके फन में यह शोभित होता. जंगल-वन प्रांतरों का रत्नगर्भा होना उसके नाश का कारण है. वनवासियों के समक्ष अपने अस्तित्व को बचाए रखने का संघर्ष है. पूरे देशभर के वनों से वनवासी जिन प्रमुख वजहों से बेदखल किए जा रहे हैं उनमें से पहली बड़ी वजह है खदानें. युगों से तने घने वनों की भूमि के गर्भ में जो खनिज संचित हैं, वह औद्योगिकीकरण के लिए चाहिए. उड़ीसा, झारखंड, बस्तर और मध्यप्रदेश के सिंगरौली इलाके में बड़ी संख्या में वनवासियों की बेदखली हुई और अभी भी बेदखली की योजना है, जहां आज दुनिया के विकसित देश अपने वन-पर्वत नदी झरने बचाने में लगे हैं, वहीं हमारी खुदगर्ज व्यवस्था इनके सत्यानाश पर आमादा है. वैज्ञानिकों ने इंडोनेशिया की मृत्यु की घोषणा कर दी है. वहां अत्याधिक खनन से धरती का भूगोल ही बदल गया है. प्राकृतिक विपदाओं के लिए आज वह सबसे सुभेद्य देशों में से एक है. भारत के नीति नियंताओं ने नेहरू युग से जो रफ्तार पकड़ी उसका एक्सीलेटर दबाए जा रहे हैं.
उड़ीसा में मेदांता को जिन वन पर्वतों को खदानों के लिए दिया गया था वे वनवासियों की पहचान और अस्तित्व के साथ जुड़े थे. लंबा संघर्ष चला. कई वनवासियों को अपने प्राणों की आहुति देनी ड़ी तब कहीं जाकर सुप्रीम कोर्ट के दखल से वे वन-पर्वत बच पाए. अपने सिंगरौली के साथ ऐसा नहीं हो सका. सिंगरौली में कोयला खदानों की श्रृंखला है. जैवविविधता से संपन्न वनों को खदानों के लिए बड़े औद्योगिक घरानों को दे दिया गया. उद्योगपतियों ने मुआवजे के मोहजाल में फंसाकर वनवासियों को नर्क में धकेलने का काम किया है. सिंगरौली विस्थापन का क्रूर व कुटिल मंडल है. इसी तर्ज में देश के अन्य हिस्सों में हो रहा है. संस्कृति और पहचान की बात करें तो जो खैरवार वनवासी कभी समूचे सिंगरौली में राज करते थे वे आज या तो भिखारी हैं या फिर महानगरों के स्लम में रहने वाले मजदूर. वनवासियों को बेदखल करने और कंगाल बनाने की कथा हर सौ कोस में मिल जाएगी. कहीं बड़े बाँधों के लिए बेदखल किया जा रहा है तो कहीं
नेशनल पार्क और अभयारण्यों के लिए. जंगल में जानवर की हिफाजत की चिंता है, मनुष्य की नहीं. वह मनुष्य जो युगों से जानवरों और प्रकृति के साथ सह अस्तित्व जीवन जी रहा था उसे आज जानवरों का दुश्मन करार कर दिया गया. जो राजे-रजवाड़ों ने बाघों व अन्य जानवरों का शिकार करके लाट साहबों की पद्वियां पाईं, आज उन्हीं के नुमाइंदे इस नीति के नियंता बने हुए हैं. जो वनवासियों को विकास का बाधक मानते हैं. समस्याओं का ओर-छोर नहीं, न ही कोई पारावार. योजनाएं वनवासियों के लिए बनती हैं पर कभी यह जानने की कोशिश नहीं होती कि वे खुद कैसा विकास चाहते हैं. थोपा हुआ विकास उन्हें विनाश की मझधार में ले जाकर छोड़ रहा है.
वनवासियों की जीवनशैली परिवेश और उनकी दृष्टि को जाने बिना हम सही दिशा में नहीं बढ़ सकते. प्रकृति को लेकर जो उनका दृष्टिकोण है वही इस दुनिया को बचा सकता है. प्रकृति से हम उतना ही लें जितना फूल से भवरा, जितना गाय से बछड़ा. प्रकृति का वध करके विकास की सोचेंगे तो हमें इस सृष्टि में कहीं सहारा ढ़ूढे नहीं मिलेगा. इस शताब्दी के महान वैज्ञानिक स्टीफन हॉकिंस यह चेतावनी दे चुके हैं- हमारा हर कदम विनाश की ओर बढ़ रहा है. हमें आत्महंता प्रवृत्ति छोड़नी होगी या फिर किसी दूसरे ग्रह को खोजना होगा, जहां हम अपना डेरा जमा सकें, क्योंकि विकास की आत्मघाती रफ्तार तेज और तेज होती जा रही है. वनवासियों से हम जीने की जीवनदृष्टि ले सकते हैं पर अभी तो फिलहाल उन्हीं के अस्तित्व के सत्यानाश में लगे हुए हैं.
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार और टिप्पणीकार हैं)
(डिस्क्लेमर : इस आलेख में व्यक्त किए गए विचार लेखक के निजी विचार हैं)
नई दिल्ली। राडार न्यूज़ 2016 के आधार कानून की संवैधानिक वैधता को चुनौती देने वाली याचिकाओं पर गुरुवार को सुनवाई पूरी कर ली। पांच जजों की बेंच इन याचिकाओं पर अदालत फैसला बाद में सुनायेगी। प्रधान न्यायाधीश दीपक मिश्रा की अध्यक्षता वाली पांच सदस्यीय संविधान पीठ ने करीब चार महीने के दौरान 38 दिन इन याचिकाओं पर सुनवाई की। गुरुवार को सभी संबंधित पक्षकारों को इस मामले में तत्काल अपनी लिखित दलीलें पेश करने का निर्देश दिया है। संविधान पीठ के अन्य सदस्यों में न्यायमूर्ति एके सिकरी, न्यायमूर्ति एएम खानविलकर, न्यायमूर्ति धनंजय वाई चंद्रचूड़ और न्यायमूर्ति अशोक भूषण शामिल हैं। इन याचिकाओं पर सुनवाई के दौरान केंद्र की ओर से अटार्नी जनरल केके वेणुगोपाल और विभिन्न पक्षकारों की ओर से कपिल सिब्बल, पी चिदंबरम, राकेश द्विवेदी, श्याम दीवान और अरविंद दातार सरीखे वरिष्ठ अधिवक्ताओं ने अपनी अपनी दलीलें पेश कीं। सुनवाई के दौरान केन्द्र सरकार ने आधार नंबरों के साथ मोबाइल फोन जोड़ने के निर्णय का बचाव करते हुए कहा कि यदि मोबाइल उपभोक्ताओं का सत्यापन नहीं किया जाता, तो उसे शीर्ष अदालत अवमानना के लिये जिम्मेदार ठहराती। हालांकि, न्यायालय ने कहा था कि सरकार ने उसके आदेश की गलत व्याख्या की और उसने मोबाइल उपभोक्ताओं के लिए आधार को अनिवार्य बनाने के लिए इसे एक हथियार के रूप में इस्तेमाल किया। कर्नाटक हाईकोर्ट के पूर्व न्यायाधीश केएस पुत्तास्वामी और अन्य याचिकाकर्ताओं ने आधार की संवैधानिक वैधता को चुनौती दे रखी है। शीर्ष अदालत सरकार की इस दलील से सहमत नहीं थी कि लोकसभा अध्यक्ष ने आधार विधेयक को सही मायने में धन विधेयक बताया था, क्योंकि यह समेकित कोष से मिलने वाले कोष से दी जा रही सब्सिडी से संबंधित है।
नई दिल्ली। राडार न्यूज़ हिंदी माध्यम के छात्रों के लिए अच्छी खबर है, इंजीनियरिंग की पढाई अब अंग्रेजी के साथ साथ हिंदी माध्यम से भी हो सकेगी। तकनीकी संस्थानों को इससे जुड़े कोर्सो को अब हिंदी माध्यम में पढ़ाने की भी स्वतंत्रता मिलेगी। सरकार ने इसे लेकर तकनीक संस्थानों को सहूलियत दी है। साथ ही इसे प्रोत्साहित करने के लिए इंजीनियरिंग से जुड़ी किताबों को हिंदी में तैयार करने की पहल भी की है। सरकार का मानना है कि इससे छात्रों में इंजीनियरिंग को लेकर रुझान और बढ़ेगा, क्योंकि अभी भाषाई दिक्कत के चलते बड़ी संख्या में छात्र इंजीनियरिंग की पढ़ाई से कतराते है।
एआईसीटीई से जुड़े किसी भी कोर्स को हिन्दी में पढ़ाने पर अब कोई प्रतिबंध नहीं है। कोई भी संस्थान हिंदी माध्यम में इसकी पढ़ाई करा सकते है; प्रो. अनिल सहत्रबुद्धे, अध्यक्ष, एआईसीटीई।
संस्थानों को मिलेगीअनुमति
इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिंदी माध्यम में कराने की यह पहल अखिल भारतीय तकनीकी शिक्षा परिषद (एआईसीटीई) ने की है। हाल ही में सरकार ने भी इसे मंजूरी दी है। हालांकि संस्थानों पर इसे जबरन नहीं थोपा जाएगा, बल्कि वह अपनी मर्जी से अपने संस्थान में इंजीनियरिंग की पढ़ाई हिंदी और अंग्रेजी में से किसी भी माध्यम में कराने के लिए स्वतंत्र रहेंगे। एआईसीटीई का मानना है कि यह पहल काफी पहले होनी चाहिए थी, लेकिन इसकी राह में सबसे बड़ी बाधा पाठ्य पुस्तकों की कमी थी। जिसे अब दूर करने की कोशिश की जा रही है। इंजीनियरिंग से जुड़ी किताबों को हिंदी में तैयार करने वाले लेखकों को प्रोत्साहित किया जा रहा है। पिछले दिनों केंद्रीय मंत्री सत्यपाल सिंह ने इसी कड़ी में इंजीनियरिंग पाठ्यक्रम से जुड़ी किताबों को तैयार करने वाले लेखकों को पुरस्कृत भी किया है
इंजीनियरिंग का बढ़ेगा क्रेज़
माना जा रहा है कि सरकार की इस पहल से इंजीनियरिंग संस्थानों को उबारने में भी मदद मिलेगी, क्योंकि मौजूदा समय में देश में इंजीनियरिंग संस्थान बड़ी संख्या में सीटों के खाली रहने से बंद हो रहे है। गौरतलब है कि तकनीकी शिक्षा से जुड़े आईआईटी और इंजीनियरिंग कालेजों का संचालन एआईसीटीई के नियमों के तहत होता है। इन्हें अपने यहां संचालित होने वाले प्रत्येक कोर्स को एआईसीटीई से अनुमति लेनी जरूरी है।