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ठेका कर्मचारियों के खून-पसीने की कमाई के हर महीने डकारे जा रहे लाखों रुपए
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‘स्काई बुल’ कंपनी पर मनमाने वेतन भुगतान और धांधली के गंभीर आरोप
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स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों और ठेका कंपनी की मिलीभगत से 10 साल से जारी है भ्रष्टाचार
शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्य प्रदेश की डबल इंजन सरकार में भ्रष्टाचार, पिछले सभी रिकार्ड तोड़ते हुए कई गुना बढ़ गया है। भ्रष्टाचार के खिलाफ ‘जीरो टॉलरेंस’ और ‘न खाऊंगा-ना खाने दूंगा’ जैसे सत्तासीनों के वादे जुमले साबित हो रहे हैं। प्रदेश में ‘शिवराज’ की तरह मौजूदा मोहन सरकार में भी सिस्टम को खोखला करने वाले भ्रष्टाचारी दीमकों को पूर्ण संरक्षण प्राप्त है। पन्ना जिले के स्वास्थ्य विभाग में सेवाएं देने वाले आउटसोर्स कर्मचारियों के आर्थिक शोषण का मामला इसका एक उदाहरण मात्र है। जिले की विभिन्न स्वास्थ्य संस्थाओं में कार्यरत लगभग 300 से अधिक आउटसोर्स कर्मचारियों का आर्थिक शोषण थमने का नाम नहीं ले रहा है। लंबे समय से व्यवस्था की मार झेल रहे इन कर्मचारियों को शासन द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी और वैधानिक लाभों से वंचित रखा जा रहा है। इनकी खून-पसीने की कमाई रूपी मासिक पारिश्रमिक (वेतन) के लाखों रुपए ठेका कंपनी ‘स्काई बुल सिक्योरिटी प्राइवेट लिमिटेड, इंदौर’ और विभागीय अधिकारियों की कथित मिलीभगत के कारण हर महीने डकारे जा रहे हैं।
ठेका कर्मचारियों के आर्थिक शोषण का खेल विगत 10 वर्षों से लगातार जारी है। इस दौरान ठेका एजेंसी से लेकर स्वास्थ्य विभाग में अधिकारी बदले, अगर कुछ नहीं बदला तो वह ठेका श्रमिकों के हालात हैं। जरा सोचिए! इन दस सालों में न्यूनतम मजदूरी का अपना हक पाने के लिए ठेका कर्मचारियों ने दर्जनों बार कामबंद हड़ताल की, सैकड़ों ज्ञापन और आवेदन पत्र सौंपे, लेकिन इस बेरहम व्यवस्था से इन्हें इंसाफ नहीं मिल सका। कभी न पूरे होने वाले कोरे आश्वासन देकर या फिर नौकरी से निकालकर इन्हें हमेशा चुप कराया जाता रहा है।
न्यूनतम मजदूरी अधिनियम का खुला उल्लंघन

मुख्य चिकित्सा एवं स्वास्थ्य अधिकारी (CMHO) कार्यालय, जिला चिकित्सालय पन्ना (DH) समेत आंचलिक सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों (CHC), प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों (PHC) और उप स्वास्थ्य केंद्रों (SHC) में कंप्यूटर ऑपरेटर, सिक्योरिटी गार्ड, सफाईकर्मी, मल्टीपरपज वर्कर और रसोइया के पद पर कार्यरत आउटसोर्स कर्मचारियों को स्वास्थ्य विभाग की निविदा, अनुबंध शर्तों एवं श्रम कानूनों के अनुसार ठेका एजेंसी द्वारा शासन द्वारा निर्धारित दैनिक न्यूनतम मजदूरी दर के आधार पर समय पर पारिश्रमिक देना कानूनी रूप से अनिवार्य है। इसके साथ ही प्रत्येक कर्मचारी के लिए ईपीएफ (EPF) और ईएसआईसी (ESIC) का लाभ देना भी अनिवार्य शर्तों में शामिल है। लेकिन धरातल पर स्थिति इसके बिल्कुल विपरीत है। स्काई बुल कंपनी द्वारा कर्मचारियों को प्रचलित दर के अनुसार न्यूनतम मजदूरी देने के बजाय मनमाने तरीके से मात्र 6,800/-, 7,000/-, 7,500/- और 8,500/- रुपए ही थमाए जा रहे हैं। कर्मचारियों का आरोप है कि विरोध करने पर उन्हें शेष राशि की ईपीएफ कटौती किए जाने का रटा-रटाया झूठा जवाब दिया जाता है, जबकि स्काई बुल ठेका कंपनी ने अपने दो साल के कार्यकाल में आज तक किसी भी कर्मचारी को उसके ईपीएफ खाते की कोई जानकारी नहीं दी है। ईएसआईसी से भी कर्मचारी पूरी तरह से अनभिज्ञ हैं।
शासन द्वारा निर्धारित न्यूनतम मजदूरी दरें:
01 अप्रैल 2026 से 30 सितंबर 2026 तक की दरें-
अकुशल श्रमिक: 12,125 रुपए मासिक (466 रुपए प्रतिदिन)
अर्द्धकुशल श्रमिक: 13,121 रुपए मासिक (505 रुपए प्रतिदिन)
कुशल श्रमिक: 14,844 रुपए मासिक (571 रुपए प्रतिदिन)
वर्तमान (01 अक्टूबर 2026 से 31 मार्च 2027) की निर्धारित दरें:
अकुशल श्रमिक: 12,575 रुपए मासिक (484 रुपए प्रतिदिन)
अर्द्धकुशल श्रमिक: 13,571 रुपए मासिक (522 रुपए प्रतिदिन)
कुशल श्रमिक: 15,224 रुपए मासिक (588 रुपए प्रतिदिन)
समय पर वेतन न मिलने से बढ़ी आर्थिक बदहाली

नियमों के तहत ठेका कर्मचारियों को प्रचलित न्यूनतम मजदूरी दर के अनुसार पारिश्रमिक (वेतन) का भुगतान हर महीने की 01 से 05 तारीख के बीच सुनिश्चित किया जाना चाहिए, परंतु स्काई बुल कंपनी द्वारा इस प्रावधान की भी धज्जियां उड़ाई जा रही हैं। ठेका कंपनी और स्वास्थ्य विभाग के मध्य निष्पादित अनुबंध में यह शर्त शामिल है। शर्तों का पालन न करने पर कंपनी का ठेका निरस्त कर उसकी धरोहर राशि को जब्त करने तथा कंपनी के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई करने की बात कही गई है। इसके बाद भी जिले भर में तैनात कर्मचारियों को न तो न्यूनतम मजदूरी दर के अनुसार वेतन मिल रहा है और ना ही तय समयावधि में वेतन का भुगतान किया जाता है। कुछ संस्थाओं में कर्मचारियों को महीने की 20-25 तारीख को वेतन भुगतान किया जाता है, जबकि अधिकांश जगहों पर 2-3 महीने तक वेतन का इंतजार करना पड़ता है। समय से वेतन न मिलने के कारण अल्प वेतनभोगी इन कर्मचारियों को गंभीर आर्थिक तंगी से जूझना पड़ता है।

ठेका कंपनी द्वारा नियम-शर्तों का पालन न कर खुली मनमानी करने की जानकारी के बाद भी सीएमएचओ, सिविल सर्जन तथा अन्य स्वास्थ्य संस्था प्रभारी ठेकेदार से मिलने वाले कमीशन के चक्कर में तमाशबीन बनकर भ्रष्टाचार और शोषण को संरक्षण प्रदान कर रहे हैं। उल्लेखनीय है कि पन्ना जिले के इस विशाल स्वास्थ्य नेटवर्क-जिसमें 01 जिला अस्पताल, 06 सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र, 17 प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र और लगभग 160 उप स्वास्थ्य केंद्र शामिल हैं- वहां तैनात यह मैदानी अमला खून-पसीना एक करने के बावजूद भुखमरी की कगार पर है। विभागीय सूत्रों की मानें तो स्काई बुल कंपनी से पहले ‘मेसर्स कामथीन सिक्योरिटी सर्विस’ नामक एजेंसी भी इसी परिवार से जुड़ी थी, जो जिले के युवाओं के करोड़ों रुपए डकार चुकी है।
प्रशासनिक आश्वासन के बाद भी नहीं सुधरे हालात

वित्तीय अनियमितताओं और शोषण से त्रस्त होकर कुछ समय पूर्व अजयगढ़ सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र के ठेका कर्मचारियों ने 19 एवं 20 मई 2026 को कामबंद हड़ताल की थी। इस दौरान 21 मई 2026 को एसडीएम संजय कुमार नागवंशी, तहसीलदार सुरेंद्र कुमार अहिरवार और सीबीएमओ डॉ. शोभाराम शर्मा ने कंपनी के प्रतिनिधि को बुलाकर लिखित आश्वासन के साथ हड़ताल समाप्त कराई थी। हालांकि, चार महीने बीत जाने के बाद भी स्थिति जस की तस बनी हुई है और कंपनी की वादाखिलाफी से कर्मचारी खुद को ठगा हुआ महसूस कर रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि लिखित आश्वासन पर हस्ताक्षर करने वाले राजस्व अधिकारियों ने उस पर अमल कराने की अब तक कोई सुध नहीं ली।
लंबित वेतन मांगने पर गंवानी पड़ी नौकरी

स्वास्थ्य विभाग के ठेका कर्मचारियों के हालात बंधुआ मजदूरों से भी बदतर हैं। आर्थिक शोषण का शिकार इन कर्मचारियों को अपना हक मांगने पर न सिर्फ प्रताड़ना सहन करनी पड़ती है, बल्कि कई बार अपनी नौकरी भी गंवानी पड़ती है। अजयगढ़ सीएचसी अंतर्गत आने वाले शानगुरैया उप स्वास्थ्य केंद्र में तैनात रहे रनमत अहिरवार (मल्टी स्किल्ड ग्रुप-डी वर्कर) ठेकेदार की मनमानी और तानाशाही का ताजा शिकार हैं। सफाईकर्मी के पद पर पदस्थ किए गए रनमत के अनुसार, माह फरवरी 2026 से माह सितंबर 2026 तक सात महीने के लंबित वेतन की मांग करने पर उन्हें सीबीएमओ डॉ. शोभाराम शर्मा के इशारे पर ठेकेदार ने नौकरी से ही निकाल दिया। पीड़ित ने पन्ना आकर कलेक्टर की जनसुनवाई में आवेदन दिया तथा क्षेत्रीय विधायक एवं पूर्व श्रम मंत्री बृजेंद्र प्रताप सिंह से गुहार लगाई, लेकिन अब तक न्याय नहीं मिला।

दलित रनमत अहिरवार अकेले नहीं हैं, उनके जैसे सैकड़ों ठेका कर्मचारी मौजूद हैं जिनसे पूर्व में कामथीन सिक्योरिटी सर्विस ने कई महीनों तक बिना पगार के काम कराने के बाद नौकरी से निकाल दिया। बीते दो साल से स्काई बुल कंपनी भी इसी तर्ज पर तरह-तरह के हथकंडे अपनाकर अपने कर्मचारियों की वेतन और ईपीएफ आदि की राशि डकार रही है। वहीं, सीएचसी अजयगढ़ में ही कुक के रूप में सेवाएं दे रहीं सुदामा बाई कुशवाहा और संजय विश्वास को पगार के रूप में महज 5,500/- रुपए ही मिल रहे हैं। विगत दिनों इन महिलाओं ने पत्रकारों के समक्ष अपनी पीड़ा बताते हुए न्यूनतम मजदूरी दिलाए जाने की मांग उठाई थी। उन्होंने बताया था कि पिछले दो महीनों का उनका वेतन भी लंबित है।
श्रम विभाग की टीम करेगी गहन जांच
इस पूरे मामले पर कड़ा रुख अपनाते हुए नए श्रम पदाधिकारी राजेश कुमार गुप्ता ने स्पष्ट किया है कि यदि स्वास्थ्य विभाग के ठेका कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी का भुगतान नहीं किया जा रहा है, तो ठेकेदार के विरुद्ध श्रम कानूनों के तहत प्रकरण पंजीबद्ध कर श्रम न्यायालय में पेश किया जाएगा। श्रम पदाधिकारी ने जानकारी दी कि दशहरा अवकाश के तुरंत बाद सीएमएचओ कार्यालय और जिला अस्पताल का निरीक्षण किया जाएगा तथा स्वास्थ्य संस्थाओं में जाकर मैदानी कर्मचारियों के बयान दर्ज किए जाएंगे। वेतन भुगतान संबंधी प्रमाणित साक्ष्यों की गहन जांच की जाएगी।

उन्होंने स्पष्ट किया कि प्रत्येक श्रमिक को उसका हक और न्यूनतम मजदूरी दिलाना उनका पदीय दायित्व है, और यदि स्काई बुल कंपनी पर कम भुगतान के आरोप प्रमाणित होते हैं, तो प्रभावित कर्मचारियों को बकाया राशि का भुगतान एरियर्स (एरियर) के रूप में दिलवाया जाएगा। अब देखना यह होगा कि श्रम विभाग की इस आगामी कार्रवाई से भ्रष्ट ठेका प्रथा पर लगाम लगती है या फिर कर्मचारियों का शोषण यूं ही बदस्तूर जारी रहता है। ठेका श्रमिकों के शोषण में पिछले दस साल से संलिप्त स्वास्थ्य विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों के विरुद्ध भी क्या कोई ठोस वैधानिक कार्रवाई होगी या फिर हर बार की तरह भ्रष्टाचार के खेल में बड़े मगरमच्छ बच निकलेंगे?
इनका कहना है-
“ठेकेदार द्वारा सभी आउटसोर्स कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी दर अनुसार वेतन देने तथा ईपीएफ आदि का कटौती करने का शपथ पत्र देने के बाद ही बिलों का भुगतान किया जाता है। सभी संस्था प्रमुख भी इसका प्रमाणीकरण करते हैं, फिर भी यदि किसी से कम वेतन मिलने की शिकयत प्राप्त होती है तो उस पर नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।”
-डॉ. राजेश प्रसाद तिवारी, सीएमएचओ, जिला पन्ना।
“पूरे जिले में कर्मचारियों को न्यूनतम मजदूरी दर अनुसार वेतन दिया जा रहा है। यह बात सही है कि इस दावे के प्रमाण के तौर पर वेतन संबंधित के बैंक खाते में अंतरित की जानी चाहिए लेकिन हम अधिकांश जगह नकद या फिर सुविधानुसार खाते में ट्रांसफर करते हैं। कर्मचारियों को समय पर वेतन भुगतान सुनिश्चित नहीं हो पा रहा है, हम इसमें सुधार के प्रयास कर रहे हैं।”






