* कचरा पृथक्करण व निस्तारण प्रक्रिया की ली जानकारी
पन्ना। कलेक्टर ऊषा परमार ने बुधवार को बायपास रोड स्थित गौशाला के निकट नगर पालिका परिषद पन्ना के कचरा प्रसंस्करण केन्द्र (Waste Processing Center) का लोकार्पण किया। इस अवसर पर प्रसंस्करण केन्द्र में कचरा पृथक्करण व निस्तारण प्रक्रिया की जानकारी लेकर इसे पर्यावरण सुरक्षा (Environmental Protection) व कचरा प्रबंधन (Waste Management) की दिशा में कारगर कदम बताया। साथ ही कहा कि यह प्रयास नगर की स्वच्छता के लिए भी महत्वपूर्ण है। जिला कलेक्टर ने मटेरियल रिकवरी फैसिलिटी (Material Recovery Facility) की अवधारणा पर केन्द्रित कचरा प्रसंस्करण केन्द्र परिसर का अवलोकन भी किया। इस अवसर पर नगर पालिका अध्यक्ष मीना पाण्डेय, नपा उपाध्यक्ष आशा गुप्ता, पार्षदगण, जिला पंचायत सीईओ उमराव सिंह मरावी, सीएमओ उमाशंकर मिश्रा सहित एसबीआई फाउंडेशन टीम तथा एनजीओ प्रतिनिधि भी उपस्थित रहे।
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जिला पंचायत सीईओ उमराव सिंह मरावी ने कहा कि एसओपी का पालन कर छोटी-छोटी समस्याओं से बचाव संभव है। तीन दिवसीय प्रशिक्षण की सराहना कर सीईओ द्वारा आगामी कार्ययोजना के बारे में जानकारी ली गई। संयुक्त कलेक्टर कुशल सिंह गौतम ने प्रशिक्षण की रूपरेखा और जागरूकता गतिविधियों के बारे में जानकारी प्रदान की। गृह विभाग के आपदा प्रबंधन संस्थान भोपाल के तकनीकी विशेषज्ञों तथा होमगार्ड पन्ना के अधिकारियों द्वारा भी प्रशिक्षणार्थियों का मार्गदर्शन किया गया। समापन अवसर पर प्रतिभागियों को प्रमाण पत्र वितरित किए गए।`


कॉन्क्लेव में मध्य प्रदेश वन विभाग के शीर्ष अधिकारियों ने भाग लिया। इसमें प्रमुख सचिव वन संदीप यादव, प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख तथा मुख्य वन्यजीव अभिरक्षक शुभ रंजन सेन, एपीसीएफ (वन्यजीव) एल. कृष्णमूर्ति, एपीसीएफ (भूमि प्रबंधन) एच. एस. मोहंता और एपीसीएफ एवं चीता प्रोजेक्ट के क्षेत्र संचालक उत्तम शर्मा सहित कई वरिष्ठ अधिकारी मौजूद रहे। इसके अलावा राज्य के सभी टाइगर रिजर्व के क्षेत्र संचालक, वन विहार राष्ट्रीय उद्यान, मुकुंदपुर चिड़ियाघर और गांधीसागर वन्यजीव अभयारण्य के निदेशक भी कार्यक्रम में शामिल हुए।
कॉन्क्लेव में सार्वजनिक और निजी क्षेत्र की कई प्रमुख कंपनियों के वरिष्ठ अधिकारियों ने भाग लिया। इनमें ऊर्जा, खनन, इंफ्रास्ट्रक्चर, विनिर्माण और वित्तीय संस्थानों के प्रतिनिधि शामिल रहे। इन कंपनियों में प्रमुख रूप से कोल इंडिया, साउथ ईस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (SECL), वेस्टर्न कोलफील्ड्स लिमिटेड (WCL), हिंदुस्तान कॉपर लिमिटेड, ग्रीनको, जियोमिन आयरन मैन्युफैक्चरिंग लिमिटेड, टाटा पावर, एलएंडटी, सुजलॉन, नागार्जुन कंस्ट्रक्शन कंपनी (NCC), जेके सीमेंट, अल्ट्राटेक सीमेंट, बजरंग पावर एंड इस्पात लिमिटेड, ईकेआई (EKI) एनर्जी सर्विसेज लिमिटेड और आईसीआईसीआई (ICICI) फाउंडेशन जैसी संस्थाओं के प्रतिनिधि शामिल हुए। कॉर्पोरेट जगत के प्रतिनिधियों ने भारत की प्राकृतिक विरासत के संरक्षण के प्रति अपनी गहरी प्रतिबद्धता व्यक्त की और विभाग को भविष्य में ऐसे सहयोग का आश्वासन दिया जो सीधे तौर पर जैव विविधता और वन्यजीव आवासों की सुरक्षा में योगदान देंगे।
कॉन्क्लेव के समापन पर वन विभाग और कॉर्पोरेट प्रतिनिधियों ने इस बात पर सहमति जताई कि आर्थिक विकास और पर्यावरण संरक्षण एक साथ आगे बढ़ने चाहिए। वन विभाग के अधिकारियों का कहना है कि वैज्ञानिक संरक्षण रणनीतियों और कॉर्पोरेट सामाजिक जिम्मेदारी के सहयोग से मध्य प्रदेश वन्यजीव संरक्षण के क्षेत्र में सार्वजनिक-निजी भागीदारी का एक मजबूत मॉडल स्थापित कर सकता है। कॉन्क्लेव का समापन एक साझा संकल्प के साथ हुआ “देश की आर्थिक समृद्धि, इसके वन्य क्षेत्रों की पारिस्थितिक सुरक्षा के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चलनी चाहिए।”

आंदोलन को विभिन्न सामाजिक और राजनीतिक संगठनों का समर्थन भी मिला। आम आदमी पार्टी की नेता अंजली यादव, जय आदिवासी संगठन के जिलाध्यक्ष मुकेश गौंड़ और कांग्रेस नेता भरत मिलन पाण्डेय ने आंदोलन स्थल पहुंचकर समर्थन जताया। कांग्रेस नेता भरत मिलन पांडे ने कहा कि केन-बेतवा लिंक परियोजना पन्ना और बुंदेलखंड के लिए अभिशाप साबित होगी। उन्होंने सिंचाई परियोजना प्रभावित परिवारों को मुआवजा वितरण, विस्थापन-पुनर्वास जैसे संवेदनशील मुद्दों पर प्रशासन के रवैये की कड़ी आलोचना की। श्री पाण्डेय ने ऐलान किया कि, प्रभावितों को उनका हक दिलाने की कानूनी लड़ाई को वे अपने खर्च पर हाईकोर्ट ले जाएंगे। वहीं जय आदिवासी संगठन के जिलाध्यक्ष मुकेश गौंड़ ने कहा कि आदिवासियों के साथ किसी भी प्रकार का अन्याय बर्दाश्त नहीं किया जाएगा, आवश्यकता पड़ने पर पूरे प्रदेश के कार्यकर्ता इस आंदोलन में शामिल होंगे। पन्ना जिले के इतिहास में संभवतः यह पहला अवसर है जब इतनी बड़ी संख्या में किसान और आदिवासी कलेक्ट्रेट परिसर में रात तक डटे रहे। अब क्षेत्र की नजर प्रशासन की अगली कार्रवाई पर टिकी हुई है।




वन परिक्षेत्र धरमपुर की बीट कुड़रा अंतर्गत वन कक्ष क्रमांक-पी 53 में वर्ष 2023-24 में कार्य आयोजना क्रियान्वयन अंतर्गत आरडीएफ वृक्षारोपण 30 हेक्टेयर क्षेत्र में कराया गया था। स्वीकृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट अनुसार यह वृक्षारोपण वर्तमान में सुरक्षा के साथ रखरखाव की अवधि में है। विगत दिवस कुड़रा के भ्रमण पर पहुंचे पत्रकारों ने पाया कि वृक्षारोपण की सुरक्षा जाली कई जगह से क्षतिग्रस्त थी और कुछ जगह जाली के नीचे गड्ढा बनने से छोटे साइज के मवेशी आसानी से अंदर प्रवेश कर जाते हैं। यहां रोपित पौधों के गड्ढों के आसपास नियमित रूप से निंदाई-गुड़ाई न होने से खरपतवार उग आए हैं।
वृक्षारोपण में कई जगह मवेशी चरते हुए नजर आए। फलस्वरूप अधिकांश रोपित पौधे या तो मवेशी चटकर चुके है या फिर उनके अवशेष रुपी सूखे डंठल रोपण की सुरक्षा का सूरत-ए-हाल बयां कर रहे हैं। रोपण में निर्मित मार्ग मरम्मत के आभाव में झाड़ियों और खरपतवार में गुम हो चुके हैं। सुरक्षा जाली फेंसिंग को मजबूती प्रदान करने के लिए तीन कटीले तार लगाने का प्रावधान किया जाता है। लेकिन मौके पर सिर्फ दो कटीले तार नीचे-ऊपर लगे मिले। बीच का तार लगाया ही नहीं गया।
बीट कुड़रा के कक्ष क्रमांक-पी- 53 में कैम्पा मद अंतर्गत आरडीएफ वृक्षारोपण वर्ष 2022-23 में 54 हेक्टेयर रकबा में कराया गया था। कुड़रा पहुंच मार्ग के किनारे स्थित इस रोपण की सुरक्षा जाली फेंसिंग के कई सीमेंट पोल टूट चुके हैं। सपोर्ट पोल भी टूटे पड़े हैं। कुछ जगह पोल के स्थान पर बांस बल्ली को लगाया गया। रोपण के पोल टूटने तथा सुरक्षा जाली क्षतिग्रस्त होने के कारण स्थानीय ग्रामीणों के मवेशी बड़े आराम से अंदर घुसकर चरते रहते हैं।
पत्रकारों को रोपण के अंदर दो दर्जन से अधिक भैंसें दिनदहाड़े चरते हुए मिलीं। चूंकि भैंसे रोपण के बड़े क्षेत्र में फैली थी और खरपतवार तथा पुराने वृक्षों की आड़ के कारण उन सबको एक फोटो में दिखा पाना संभव नहीं था। फिर भी कुछ भैंस को एक फोटो क्लिक करने की कोशिश की गई, ताकि करोड़ों रुपए खर्च करके कराए गए सुरक्षा की जमीनी सच्चाई को दिखाया जा सके।
फेंसिंग की मजबूती के लिए तीन कतार में लगाई जाने वाली कटीली तार की मौके पर सिर्फ दो कतार ही नजर नहीं आ रही है। 2-3 मीटर के अंतराल में लगाए जाने वाले सीमेंट पोल्स भी सभी जगह एक जैसे नजर नहीं आ रहे हैं। इस रोपण में भी अधिकांश पौधों को मवेशी चट कर चुके हैं। जो शेष बचे हैं उनके सूखे डंठल रुपी अवशेष नजर आ रहे हैं। गड्ढों के आसपास खरपतवार की भरमार से प्रतीत होता है कि पौधरोपण के बाद से निंदाई-गुड़ाई का कार्य कागजों तक ही सीमित है।
कुड़रा ग्राम के बाहरी क्षेत्र में कराए गए वृक्षारोपण में मौके पर न तो सूचना बोर्ड लगाया गया और ना ही दीवार लेखन के माध्यम से रोपण की जानकारी प्रदर्शित की गई है। मजेदार बात यह है कि, धरमपुर रेंजर वैभव सिंह चंदेल से जब इस रोपण की बुनियादी जानकारी प्राप्त करने के लिए दो-तीन बार संपर्क करने पर उनके द्वारा अति आवश्यक शासकीय कार्य में व्यस्त होने का हवाला देकर जानकारी देने में आनकानी की गई। वन परिक्षेत्र धरमपुर अंतर्गत वन सुरक्षा की अत्यंत ही लचर स्थिति, विभागीय कार्यों में भारी भ्रष्टाचार के मद्देनजर मीडिया को जानकारी देने से बचने रेंजर साहब द्वारा की जाने वाली बहानेबाजी को समझा जा सकता है।
उक्त रोपण के संबंध में विभागीय सूत्रों से मिली अपुष्ट जानकारी के अनुसार मैहावा बीट अंतर्गत 40 हेक्टेयर रकबे में मिश्रित रोपण 2 वर्ष पूर्व कराया गया था। स्थानीय नाले और पहाड़ी के किनारे स्थित इस रोपण में दूर-दूर तक फैले तकरीबन आधा सैंकड़ा मवेशी खुलेआम चरते हुए मिले। पत्रकार रोपण की बदहाली, मवेशियों की अवैध चराई को जब अपने कैमरों कैद कर रहे थे तो वहीं नजदीक खड़े वन विभाग के 3-4 सुरक्षा श्रमिक मवेशियों को रोपण से बाहर निकालने के बजाए तमाशबीन की तरह खड़े थे।
इस रोपण की सुरक्षा के लिए बनाई गई पत्थरों की खखरी (सुरक्षा दीवार) जगह-जगह ढह चुकी है। महज तीन फिट ऊंची सुरक्षा दीवार मवेशियों को अंदर घुसने से रोक नहीं पा रही है। मौके पर बनाई गई पत्थर की दीवार मानक आकार में नहीं पाई गई। प्लांटेशन के अधिकांश पौधे मवेशी हजम कर चुके, जो कुछ शेष बचे हैं वे सूखे डंठल में तब्दील होकर उजड़े हुए चमन की गवाही दे रहे हैं।



