* तेंदूपत्ता शाखकर्तन कार्य का संयुक्त प्रशिक्षण संपन्न
* 15 से 25 मार्च के मध्य किया जाएगा शाखकर्तन कार्य
* शाखकर्तन कार्य के लिए 62 रुपए प्रति मानक बोरा दर निर्धारित
शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) जिले के उत्तर सामान्य वन मण्डल एवं दक्षिण सामान्य वन मण्डल के संयुक्त तत्वावधान में तेंदूपत्ता शाखकर्तन कार्य का प्रशिक्षण का आयोजन गत दिवस स्मृति वन परिसर पन्ना में किया गया। प्रशिक्षण कार्यक्रम में उत्तर पन्ना वनमण्डल अधिकारी धीरेन्द्र प्रताप सिंह, दक्षिण पन्ना वनमण्डल अधिकारी अनुपम शर्मा, प्रशिक्षु भारतीय वन सेवा अधिकारी अक्षत जैन एवं अंशुल तिवारी, उपवनमण्डल अधिकारी नितिन निगम, प्रशिक्षु राज्य वन सेवा अधिकारी अंकुर गुप्ता सहित दोनों वनमण्डलों के परिक्षेत्र अधिकारी, वनकर्मी, प्राथमिक लघुवनोपज सहकारी समितियों के प्रबंधक, प्रभारी विक्रम सिंह बुंदेला तथा तेंदूपत्ता क्रेता उपस्थित रहे। प्रशिक्षण के दौरान प्रतिभागियों को तेंदू पौधों की वैज्ञानिक कटाई एवं शाखकर्तन की विधि का व्यवहारिक प्रदर्शन कराया गया। आगामी तेंदूपत्ता शाखकर्तन कार्य 15 से 25 मार्च के मध्य पन्ना जिले के वन क्षेत्रों में निर्धारित रूप से किया जाएगा।

प्रशिक्षण में बताया गया कि तेंदूपत्ता शाखकर्तन वन प्रबंधन की एक महत्वपूर्ण वैज्ञानिक प्रक्रिया है, जिसके अंतर्गत तेंदूपत्ता के छोटे (20 सेंटीमीटर से कम गोलाई के) पौधों की नियंत्रित कटाई की जाती है। इससे पौधों में नई कोपलों का विकास तेजी से होता है तथा समान आकार, कोमल एवं उच्च गुणवत्ता वाले पत्तों की प्राप्ति सुनिश्चित होती है। शाखकर्तन के बाद विकसित होने वाले पत्ते संग्रहण के लिए अधिक उपयुक्त होते हैं, जिससे उत्पादन बढ़ता है। सही समय एवं तकनीक से किया गया शाखकर्तन तेंदूपत्ता उत्पादन की गुणवत्ता और मात्रा दोनों को बेहतर बनाता है। शासन ने इस वर्ष तेंदूपत्ता शाखकर्तन कार्य के लिए 62 रुपए प्रति मानक बोरा दर निर्धारित की है।
तेंदूपत्ता संग्रहण प्रदेश के वनाश्रित एवं आदिवासी परिवारों की आजीविका का एक महत्वपूर्ण आधार है। संग्रहण सीजन के दौरान ग्रामीणों को स्थानीय स्तर पर रोजगार उपलब्ध होता है तथा सहकारी समितियों के माध्यम से उन्हें प्रत्यक्ष आर्थिक लाभ प्राप्त होता है। इससे ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलती है और वन संरक्षण में समुदाय की सहभागिता भी बढ़ती है। तेंदूपत्ता से होने वाली आय अनेक परिवारों के लिए अतिरिक्त आर्थिक सहारा प्रदान करती है।
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पिछड़ा वर्ग से आने वाले बीजेपी के एक बड़े नेता ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर जिला कार्यकारिणी में सामाजिक असंतुलन पर असंतोष जताया है। उन्होंने तार्किक सवाल उठाते हुए कहा, पन्ना जिलाध्यक्ष व क्षेत्रीय सांसद वीडी शर्मा ब्राह्मण हैं और पन्ना विधायक क्षत्रिय समाज से आते हैं, इसके बाद भी 21 पदाधिकारियों वाली कार्यकारिणी में 10 पदों पर इन्हीं दोनों जातियों के नेताओं को नियुक्त करना क्या उचित है? इनका मानना है अन्य छूटी हुई जातियों के सक्रिय व कर्मठ युवाओं को अगर पदाधिकारी बनाया जाता तो कार्यकर्ताओं में अच्छा संदेश जाता। सामाजिक न्याय की मांग जब हर क्षेत्र में पुरजोर तरीके से उठाई जा रही उस समय इस तरह के मामले सामने आना निश्चित ही बेहद चिंताजनक है। भाजपा नेता ने एक सवाल के जवाब में बताया कि उनकी नजर में नई टीम की एक प्रमुख विशेषता यह है कि संगठन ने लंबे समय से सक्रिय, वैचारिक रूप से प्रतिबद्ध कार्यकर्ताओं को प्राथमिकता दी है। बता दें कि, विधानसभा एवं लोकसभा चुनावों के दौरान दलबदल कर भाजपा में आने वाले चेहरों को सूची में स्थान नहीं मिला। इसे संगठन के ‘मूल भाजपाइयों’ पर भरोसे के रूप में देखा जा रहा है।






वन अपराध की दृष्टि से अत्यंत ही संवेदनशील कुड़रा के जंगल में अवैध कटाई सहित अन्य गतिविधियों के प्रमाण मिलने से वन विभाग की नियमित गश्त और कड़ी निगरानी के दावे पर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। मसलन, कुड़रा ग्राम में जहां दो वन रक्षकों के आवास स्थित हैं और लगभग दर्जनभर श्रमिक जंगल की सुरक्षा के नाम पर तैनात हैं वहां वृक्षों की कटाई बिना जानकारी के कैसे संभव हो रही है? क्या विभाग को वाकई इसकी भनक नहीं लगी या फिर जानबूझकर अवैध कटाई की अनदेखी की जा रही है? जानकारों का मानना है, कुड़रा-मैहवा बीट के जंगल की जटिल भौगोलिक स्थिति, कुड़रा एवं धरमपुर में वन अमले की पर्याप्त संख्या में मौजूदगी के मद्देनजर इनकी सहमति अथवा संलिप्तता के बगैर किसी तरह की अवैध गतिविधि संभव ही नहीं है।
वन परिक्षेत्र धरमपुर अंतर्गत विभगीय कार्यों की जमीनी हकीकत जानने पहुंचे पत्रकारों को वन अमले के असहयोग का सामना करना पड़ा। पहले तो वन अमले ने मौके तक ले जाने में अनिच्छा दिखाई गई। पत्रकारों ने जब स्थानीय ग्रामीण बब्बू लोध की मदद ली तो उसे सुरक्षा श्रमिकों के द्वारा चेतावनी दी गई। वृद्ध बब्बू को धमकाते हुए एक सुरक्षा श्रमिक बोला यदि वह पत्रकारों को जंगल के भीतर लेकर गया या विभागीय कार्यों से जुड़ी खबरें कवर करवाईं, तो परिणाम अच्छे नहीं होंगे। सुरक्षा श्रमिकों का यह रवैया कई संदेह खड़े करता है। सवाल यह है कि, यदि सब कुछ पारदर्शी है, तो पत्रकारों को रोकने और स्थानीय व्यक्ति पर दबाव बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या यह सब व्यक्तिगत स्तर पर हुआ या फिर किसी वरिष्ठ अधिकारी के निर्देश पर पत्रकारों के भ्रमण को बाधित करने की कोशिश की गई। इसका जबाव तो सुरक्षा श्रमिक, संबंधित सर्किल प्रभारी और परिक्षेत्राधिकारी धरमपुर ही दे सकते हैं। लेकिन इस घटनाक्रम से एक बात पूरी तरह से स्पष्ट है, मैदानी वन अमला अगर निष्ठापूर्वक और ईमानदारी से अपने दायित्वों का निर्वाहन कर रहा होता तो उन्हें पत्रकारों के भ्रमण को रोकने के लिए घटिया हथकंडे आजमाने की जरुरत न पड़ती।
उल्लेखनीय है कि चार दिन पूर्व पत्रकार जब पहली बार कुड़रा जंगल के भ्रमण पहुंचे थे तो धरमपुर रेंजर वैभव सिंह चंदेल ने मैहावा बीट में टाइगर और तेंदुए के मूवमेंट का हवाला देकर पत्रकारों को वहां जाने से रोका था। उन्होंने सुझाव दिया था कि, खतरे को देखते हुए आपको वन अमले को साथ लेकर जाना चाहिए। लेकिन अभी कोई साथ नहीं जा सकता, आप लोग अगली बार जब आएं तो किसी को बोल दूंगा। शनिवार को पुनः कुड़रा पहुंचने से पूर्व रेंजर श्री चंदेल को सूचित किया तो उन्होंने स्टॉफ के गिद्ध गणना में व्यस्त होने का हवाला देकर हाथ खड़े कर दिए। वन अमले की असहजता-असहयोग से उपजीं तमाम शंकाओं के बीच पत्रकारों को भ्रमण के दौरान उसी क्षेत्र में कई चरवाहे भैंस चराते मिले। चरवाहों ने जंगल में टाइगर या लेपर्ड के विचरण को कोरी अफवाह बताया। चरवाहों ने बताया बाहरी लोगों को जंगल में आने से रोकने के लिए टाइगर-तेंदुए की मौजूदगी का भय फैलाया जाता है। यदि विभाग का दावा सही भी माना जाए, तो यह और गंभीर प्रश्न खड़ा करता है,जिस जंगल में टाइगर और तेंदुआ जैसे वन्यजीव मौजूद हों, वहां दिनदहाड़े सागौन की अवैध कटाई कैसे हो रही है? नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर ग्रामीणों ने बताया कि कुड़रा जंगल में अवैध कटाई के साथ अवैध खनन और बेजुबान वन्यजीवों का शिकार भी जारी है। यदि यह सही है, तो यह वन संपदा और वन्यजीवों दोनों के लिए गंभीर खतरा है।
खनिज ठेकेदार पप्पू दीक्षित को बचाने के लिए वेबा आदिवासी महिला को कथित तौर पर धमकाने और समझौता करने का दबाव डालने के आरोप में पुलिस ने शनिवार को प्राथमिक कृषि साख सहकारी समिति रैय्यासांटा के प्रबंधक सतीश श्रीवास्तव को गिरफ्तार न्यायालय में पेश किया। जहां से उसे न्यायिक अभिरक्षा में जिला जेल पन्ना भेज दिया गया। इस घटनाक्रम के बाद से सतीश की पप्पू से करीबी चर्चा में आ गई है। दमोह जिले के गैसाबाद निवासी सतीश श्रीवास्तव की ससुराल पन्ना पुराना आरपी स्कूल के पास है। ससुराल पक्ष की बेशकीमती जमीन विटनरी हॉस्पिटल के पास स्थित है। इस जमीन से जुड़े विवादों को सुलाझने में कथित तौर पर सतीश और उसके साले प्रमोद खरे ने पप्पू की मदद ली थी। जिसके बाद उक्त भूमि की प्लाटिंग कर आवासीय भूखंड बेचे गए। अपुष्ट चर्चा है, उक्त प्लाटिंग में सतीश व उसके साले प्रमोद ने मदद के एवज में पप्पू को 30 फीसदी की हिस्सेदारी दी है। पुलिस सूत्रों के अनुसार, सतीश अपने साझीदार को आपराधिक मामले से बचाने के लिए आदिवासी वृद्धा पर दबाव बना रहा था कि, कैमरे के सामने बोल दो कि दोनों बेटियां तुम्हारी नहीं हैं।

वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि, विभागीय पौधारोपण कार्यों में आमतौर पौधों की प्रजाति के अनुसार वर्ग की आकृति में चार साइज के गड्ढों की खुदाई की जाती है, जिसका उल्लेख वर्किंग प्लान में है। सबसे छोटी साइज का गड्ढा 30x30x30 सेंटीमीटर का होता है अर्थात फिट में देखें तो इसकी लम्बाई, चौड़ाई और गहराई 1 फिट रहती है। इस साइज के गड्ढों में आमतौर पर सागौन (टीक) का रोपण किया जाता है। इन गड्ढों के बीच की दूरी 2 मीटर होती है। दूसरी साइज का गड्ढा 30x30x45 का होता है। इसकी लंबाई, चौड़ाई एक फिट लेकिन गहराई डेढ़ फिट रहती है। इन गड्ढों में रोपित किए जाने वाले पौधों की आपस की दूरी 2.5 या 3 मीटर हो सकती है। तीसरा साइज 45x45x45 सेंटीमीटर का है, यह मध्यम आकार का गड्ढा होता है जिसकी लंबाई, चौड़ाई और गहराई डेढ़ फिट होती है। इनमें छोटे झाड़ वाले पौधे लगाए जाते हैं। मध्यम आकार वाले गड्ढों का आपस में डिस्टेंस 3 मीटर होता है। चौथा गड्ढा सबसे बड़े साइज का 60x60x60 सेंटीमीटर का रहता है। अर्थात इनकी लम्बाई, चौड़ाई और गहराई सब एक सामान 2 फिट की रहती है। बड़े साइज के गड्ढों में बड़े झाड़ वाले पौधे लगाए जाते हैं। इन गड्ढों के बीच की दूरी 4 मीटर हो सकती है। साइज के हिसाब से अगर गड्ढों की खुदाई की राशि को देखें तो प्रत्येक गड्ढे की खुदाई सहित अन्य कार्य के लिए वर्तमान में प्रचलित दरों के अनुसार 13 रुपए लेकर 25 रुपए तक मजदूरी भुगतान करने का प्रावधान है।
पौधारोपण के लिए वन परिक्षेत्र अजयगढ़ अंतर्गत ट्रैक्टर लगाकर ठेके पर कराए गए गोलाकार गड्ढों का कुछ स्थानों पर मजदूर लगाकर सुधार कराया जा रहा है। रुपए बचाने के चक्कर में मशीनों से कराई गई गड्ढों की खुदाई पर पर्दा डालने के लिए अब मजदूर लगाकर उन्हें निर्धारित आकार-साइज देने काम शुरू हो गया है। मीडियाकर्मियों को निरीक्षण के दौरान कुछ स्थानों पर मजदूर गोलाकार गड्ढों को सही आकार देने के साथ मशीन से कराए गए कार्य के साक्ष्यों को मिटाते हुए नजर आए। वन विभाग के जानकारों की मानें तो पौधारोपण गड्ढा खुदाई के दोहरे कार्य के बावजूद प्रत्येक गड्ढे की मजदूरी राशि का अधिकतम 50 फीसदी ही खर्च आएगा। इस तरह गड्ढों की मजदूरी की शेष 50 फीसदी राशि का कार्य प्रभारी वनरक्षक से लेकर भुगतान कर्ता अधिकारी के बीच बंदरबांट हो जाएगा। और गड्ढों में सुधार करते मजदूरों के फोटोग्राफ्स निकालकर कागजों में साबित कर दिया जाएगा कि काम मशीनों ने नहीं बल्कि मजदूरों/श्रमिकों ने ही किया है। दरअसल, जहां पूरा तंत्र ही भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबा हो वहां सब संभव है। मशीनों से लाखों-करोड़ों गड्ढों की खुदाई पर विभागीय अधिकारियों द्वारा सख्ती से रोक न लगाना फर्जीवाड़े में उनकी संलिप्तता का स्पष्ट संकेत है।





पूरे घटनाक्रम का प्रतिवेदन परिक्षेत्र अधिकारी पन्ना बफर द्वारा तैयार कर सहायक संचालक मड़ला के माध्यम से 10 फरवरी 2026 को क्षेत्र संचालक कार्यालय भेजा गया। प्रतिवेदन के परीक्षण के बाद प्रथम दृष्टया दोषी पाए जाने पर वनरक्षक संतोष प्रजापति को तत्काल प्रभाव से निलंबित करते हुए उसके विरुद्ध अनुशासनात्मक कार्रवाई के आदेश जारी किए गए। पन्ना टाइगर रिजर्व (पीटीआर) के उप संचालक वीरेन्द्र कुमार पटेल ने प्रेस विज्ञप्ति जारी कर इस कार्रवाई की पुष्टि करते हुए कहा है कि वन क्षेत्र में अवैध गतिविधियों में संलिप्त किसी भी व्यक्ति को बख्शा नहीं जाएगा, चाहे वह विभाग का कर्मचारी ही क्यों न हो। उन्होंने स्पष्ट किया कि जंगल की सुरक्षा से जुड़े पदों पर बैठे लोगों से और अधिक जवाबदेही अपेक्षित है।


