अंधेरगर्दी : रेंजर के वायरल पत्र से वन विभाग में मची खलबली, काष्ठागार डिपो में पदस्थ 42 में से 33 वनकर्मी लम्बे समय से हैं गायब…!

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फाइल फोटो।

* काष्ठागार डिपो में तैनाती कराकर जिला मुख्यालय में वर्षों से जमे हैं कामचोर

* जंगल की ड्यूटी से बचने अफसरों की चाकरी और ऑफिस में बाबूगिरी कर रहे वनकर्मी

* पन्ना जिले में दक्षिण वन मण्डल में वनों और वन्य जीवों की सुरक्षा से हो रहा समझौता

* वर्षों से कई बीटें पड़ीं है खाली लेकिन जिम्मेदारों को नहीं जंगल की परवाह

* दक्षिण वन मण्डल अंतर्गत पिछले दो सालों में पांच तेंदुओं और भालू का हो चुका है शिकार

शादिक खान, पन्ना। (www.radarnews.in) मध्यप्रदेश के पन्ना जिले के वन विभाग में अराजकतापूर्ण स्थिति निर्मित है। यहां के संरक्षित एवं सामान्य वन मंडलों में तैनात शीर्ष अधिकारियों को वनों, वन्य जीवों एवं बहुमूल्य वन सम्पदा की जरा भी परवाह नहीं है। वे सिर्फ अपने एक सूत्रीय एजेण्डे के तहत निहित स्वार्थपूर्ति में जुटे है। विभाग प्रमुख अफसरों की अकर्मण्यता, उदासीनता और लचर प्रबंधन के कारण जंगल विभाग अब जंगल राज में तब्दील हो चुका है। दिनों-दिन बद से बद्तर होते हालात के चलते पन्ना जिले के उत्तर-दक्षिण सामान्य वन मंडलों एवं पन्ना टाइगर रिजर्व क्षेत्र अंतर्गत अवैध कटाई, हीरा-पत्थर के अवैध खनन, वन्यजीवों के शिकार एवं उनके अंगों की तस्करी सरीकी बेहद चिंताजनक घटनाओं का ग्राफ तेजी से बढ़ा है। इन परिस्थितियों के मद्देनजर पन्ना में पुनः आबाद हुए बाघों के संसार का भविष्य सुरक्षित प्रतीत नहीं होता। मीडिया और जानकार लगातार इस संबंध में आगाह कर रहे हैं लेकिन भ्रष्ट व्यवस्था में इनकी आवाज नक्कारखाने की तूती बनकर रह गई है।
अपने कार्यालय में शासकीय कार्य करते हुए उप वनमंडलाधिकारी कल्दा, हेमंत यादव।
पन्ना के वन विभाग में अंधेरगर्दी किस कदर हावी है, यहां के दक्षिण वन मंडल के अंतर्गत आने वाले काष्ठागार डिपो के नवागत प्रभारी अधिकारी राम सिंह पटेल द्वारा डीएफओ को लिखा गया पत्र इसका एक उदाहरण मात्र है। सोशल मीडिया पर तेजी से वायरल हो रहे इस पत्र में काष्ठागार अधिकारी ने बताया है कि उनके कार्यालय में 42 कर्मचारी कार्यरत है। डिपो का आकर बेहद छोटा होने बाबजूद 42 कर्मचारियों का वेतन/पारिश्रमिक का आहरण नियमित रूप से काष्ठागार पन्ना से किया जा रहा है। मजेदार बात तो यह है कि, नवागत काष्ठागार अधिकारी अब तक जितनी बार भी पन्ना आए हैं उन्हें काष्ठागार में काम करते हुए सिर्फ 9 कर्मचारी ही मिले है। अन्य 33 कर्मचारी कर्तव्य पर कभी उपस्थित ही नहीं मिले। अनुपस्थित कर्मचारियों के संबंध में पूँछने पर उन्हें बताया गया कि वे आए थे पर चले गए।

42 कर्मचारियों की नहीं आवश्यकता

काष्ठागार अधिकारी पन्ना द्वारा डीएफओ को प्रेषित पत्र।
मालूम हो कि दक्षिण वन मंडल के वन परिक्षेत्र सलेहा के रेंजर राम सिंह पटेल के पास वर्तमान में काष्ठगार डिपो पन्ना का अतिरिक्त प्रभार है। उन्होंने डीएफओ को 15 नवंबर को लिखे गए अपने पत्र में बड़ी ही स्पष्टता के साथ काष्ठागार डिपो कार्यालय की हकीकत और तथ्यों को उजागर करते हुए बताया है कि अनुपस्थित रहने वाले कर्मचारी मनमाने ढंग से कार्य करने के आदी हो चुके। उन्होंने इस बात का विशेष तौर उल्लेख किया है कि पन्ना के काष्ठागार का आकार छोटा है और काष्ठ (लकड़ी) की आमद कम होने के साथ कार्यालय का कार्य भी अत्यंत ही सीमित है। ऐसे में काष्ठागार डिपो में 42 कर्मचारियों की आवश्यकता प्रतीत नहीं होती है। कर्मचारियों की इतनी संख्या क्षेत्रीय रेन्ज (वन परिक्षेत्र) में पदस्थ कर्मचारियों से भी ज्यादा है। काष्ठागार अधिकारी ने अनुपस्थित रहने वाले सभी 33 अतिरिक्त कर्मचारियों की आवश्यकता न होने का पत्र जिक्र करते हुए इन्हें अन्यंत्र पदस्थ करने की शिफारिश की है।

वनकर्मियों में पनप रहा असंतोष

फाइल फोटो।
प्रभारी काष्ठागार अधिकारी के पत्र से पन्ना के दक्षिण वन मंडल में हड़कंप मचा है। पत्र के सोशल मीडिया पर वायरल होने से पन्ना में जहां कई वर्षों से जमे कामचोर मैदानी वनकर्मियों की धड़कनें तेज हो गई हैं वहीं विभाग के अधिकारियों की कार्यप्रणाली को लेकर सवाल उठ रहे हैं। दरअसल इससे जंगल की कठिन ड्यूटी से कथित तौर पर चहेतों को राहत देने के आरोप अफसरों पर लग रहे है। काष्ठागार डिपो पन्ना में मनमाने तरीके से मैदानी अमले को पदस्थ कर विभागीय अफसर उनसे अपने घरों में चाकरी-अर्दली और कार्यालयों में बाबूगिरी करा रहे है। कतिपय मैदानी वनकर्मियों को जंगल ड्यूटी से मिली इस विशेष छूट को लेकर दूसरे वनकर्मियों में तीव्र असंतोष व्याप्त है।

सिर्फ 9 कर्मचारी दे रहे सेवायें

पन्ना स्थित काष्ठागार कार्यालय में कहने को तो 42 कर्मचारी/श्रमिक पदस्थ हैं जिनमें 2 वनपाल, 11 वनरक्षक, 24 स्थाई कर्मी, 1 ड्रायवर और 4 पार्ट टाइम श्रमिक हैं लेकिन यहां पर नियमित रूप से वहां सिर्फ 9 कर्मचारी ही सेवाएं दे रहे हैं। जिनमें राजेन्द्र पाल सिंह वनपाल, राजेश कुमार सोनी, विवेक कुमार चनपुरिया वनरक्षक, संतोष तिवारी स्थाई कर्मी और सुरक्षा श्रमिक हरि गौंड़, नत्थू गौंड़, सुरेश सोनी, छोटेलाल यादव शामिल है। महिला वनरक्षक सुनीता प्रजापति न्यायालय में बतौर मोहर्रर अपनी सेवाएं दे रहीं है। सिर्फ एकमात्र हॉल में लगने वाले इस कार्यालय में इतनी जगह भी नहीं है कि वहां 42 कर्मचारी बैठकर कार्य कर सकें। लेकिन फील्ड स्टॉफ की यहां तैनाती के बहाने वन विभाग के अफसर उनसे अपनी मनमर्जी और सुविधानुसार बंगलों तथा ऑफिस कार्य करा रहे है। जानकारों के अनुसार पहले तो बड़ी तादाद में मैदानी वनकर्मियों को बगैर किसी आवश्यकता के डिपो में पदस्थ करना और फिर उन्हें अटैच कर वन मंडल कार्यालय, उप वनमंडलाधिकारी कार्यालय तथा बंगलों में काम कराना पूर्णतः अनुचित है। वैसे भी फील्ड स्टॉफ से कार्यालय में काम कराने की वन विभाग में सख्त मनाही है।

शिकार की घटनाओं से नहीं लिया सबक

दक्षिण वन मंडल के शाहनगर वन परिक्षेत्र अंतर्गत हाल ही में शिकार हुए तेंदुए का झाड़ियों के बीच पड़ा शव। (फाइल फोटो)
दक्षिण वन मंडल अंतर्गत काष्ठागार डिपो में तैनाती की आड़ में मैदानी वनकर्मियों से बंगलों में चाकरी-अर्दली और ऑफिस में बाबूगिरी ऐसे समय पर कराई जा रही है जबकि वन्य जीवों के शिकार, पत्थर के अवैध खनन एवं कटाई की हैरान करने वाली घटनाएं तेजी से बढ़ रहीं है। और दक्षिण वन मंडल के सभी छः वन परिक्षेत्रों में कई बीटें तथा सर्किल कर्मचारियों की कमी के कारण खाली पड़े है। परिणामस्वरूप कई वनकर्मियों को एक से अधिक बीटों का प्रभार संभालना पड़ रहा है। मैदानी अमले की कमी के कारण कार्य की अधिकता के दबाब में वनों की सुरक्षा और निगरानी की व्यवस्था धरातल पर दम तोड़ चुकी है। जिसका दुष्परिणाम यह है कि दक्षिण वन मंडल अंतर्गत पिछले दो वर्षों में पाँच तेंदुओं, एक भालू और एक मोर का शिकार हो चुका है। यहाँ के वन क्षेत्रों में कुछ समय से जहां शिकारी गिरोहों, वन्यजीवों के अंगों के तस्करों की सक्रियता तेजी से बढ़ी है वहीं पत्थर खनन माफिया और अतिक्रमणकारी भी बड़े पैमाने पर जंगल को लगातार क्षति पहुंचा रहे है। इसके बाबजूद दक्षिण वन मंडल के बड़े अधिकारी जंगल और वन्य प्राणियों की सुरक्षा की घोर अनदेखी करते हुए मैदानी अमले को मुख्यालय में तैनात कर उनसे दीगर कार्य करा रहे है।

कैसे आबाद रह पाएंगे बाघ ?

सांकेतिक फोटो।
सर्व विदित है कि पन्ना टाइगर रिजर्व में बाघों का संसार पुनः आबाद होने व इनकी तादाद वर्तमान में 50 से अधिक होने के चलते कई बाघ अपने लिए सुरक्षित ठिकाने और भोजन की तलाश में दक्षिण वन मंडल के जंगलों में डेरा डाले हुए हैं। यहां जंगल में कदम-कदम पर बिछे शिकारियों के जाल और वनों एवं वन्यजीवों की सुरक्षा तथा निगरानी व्यवस्था के पूरी तरह चौपट होने के मद्देनजर विचरण करने वाले बाघ संकट में है। लेकिन वन विभाग में शीर्ष स्तर पर जबाबदेही का घोर आभाव होने से दक्षिण वन मंडल के अफसरों को फील्ड की चुनौतियों का बेहतर तरीके से सामना करने एवं उपलब्ध मानव संसाधन का सही तरीके से उपयोग कर वन अपराधों की प्रभावी रोकथाम करते हुए जंगल की सुरक्षा एवं निगरानी व्यवस्था को पुख्ता करने से कोई सरोकार नहीं है। अफसरों की यह बेपरवाही और मनमानी शायद इसलिए भी है, क्योंकि सत्तासीनों से उन्हें अघोषित तौर यह आश्वासन प्राप्त है कि यदि वे समय-समय पर अपना रीचार्ज कराते रहे तो चाहे जो भी हो जाए उन पर किसी तरह की आँच नहीं आएगी।

इनका कहना है –

“काष्ठागार में पदस्थ कर्मचारी कहीं गायब नहीं है उनसे बंगलों की सुरक्षा, वन मंडल कार्यालय एवं मेरे कार्यालय में लिपकीय कार्य कराया जा रहा है। ऐसा आज से नहीं है कई वर्षों से चल रहा है, विभाग में कर्मचारियों की कमी होने के कारण व्यवस्था बनाने के उद्देश्य से यह किया गया है। शिकार की जो घटनाएं हुई है वे दुर्भाग्यपूर्ण है लेकिन मैदानी कर्मचारियों से दूसरे कार्य कराने का यह मतलब नहीं है कि हमें वनों और वन्यजीवों की सुरक्षा की परवाह नहीं है। यह तो हमारी सर्वोच्च प्राथमिकता है।”

हेमंत यादव, उप वनमंडलाधिकारी कल्दा।