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चिता पर जिंदा लेटने को मजबूर महिलाएं, पुरुषों ने लगाई प्रतीकात्मक फांसी
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मुआवजा-पुनर्वास की मांग पर अमित भटनागर ने खोला मोर्चा
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बांध प्रभावित परिवारों के धरना-प्रदर्शन को कांग्रेस पार्टी ने दिया समर्थन
शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना के डैम में पहली बार जलभराव शुरू होने के बाद डूब क्षेत्र की तस्वीर अब चिंताजनक होती जा रही है। जलस्तर बढ़ने से आसपास की कई बस्तियां चारों ओर पानी से घिरकर टापू में तब्दील हो गई हैं, जबकि कई घरों में भी पानी पहुंच गया है। इसी बीच उचित मुआवजा, विस्थापन और पुनर्वास की मांग को लेकर प्रभावित ग्रामीणों का आक्रोश एक बार फिर फूट पड़ा है। कुंवरपुर के नजदीक जय किसान संगठन के नेतृत्व में चिता आंदोलन शुरू किया गया है। महिलाओं ने पानी के बीच प्रतीकात्मक चिता पर लेटकर विरोध जताया, जबकि पुरुषों ने गले में फांसी का फंदा डालकर अपना आक्रोश प्रदर्शित किया।
आंदोलन का नेतृत्व सामाजिक कार्यकर्ता और जय किसान संगठन के प्रमुख अमित भटनागर कर रहे हैं। आंदोलनकारियों का कहना है कि बांध में पहली बार पानी भरने के बाद अब उन्हें केवल मुआवजे का इंतजार नहीं, बल्कि अपने घरों और परिवारों की सुरक्षा की चिंता भी सताने लगी है। उनका आरोप है कि जलस्तर बढ़ने के साथ डूब क्षेत्र की वास्तविक स्थिति सामने आने लगी है, लेकिन कई प्रभावित परिवारों की मुआवजा और पुनर्वास संबंधी समस्याओं का समाधान अभी बाकी है।
पानी में चिता, गले में फंदा और ‘न्याय दो या मार दो’ के नारे

मझगांय बांध के आसपास चल रहे प्रदर्शन में विरोध का तरीका बेहद प्रतीकात्मक और भावनात्मक रहा। पानी से घिरे क्षेत्र में प्रभावित महिलाओं ने चिता सजाकर उस पर लेटकर प्रदर्शन किया। वहीं पुरुषों ने पानी के बीच खड़े होकर गले में फांसी का सांकेतिक फंदा डालकर विरोध जताया। प्रदर्शन स्थल पर प्रभावित परिवारों की ओर से न्याय की मांग को लेकर नारेबाजी की गई। आंदोलनकारियों ने कहा कि जब उनके घर और जमीन परियोजना के लिए जा रहे हैं तो उन्हें ऐसा पुनर्वास मिलना चाहिए जिससे वे सम्मान के साथ अपने परिवार को सुरक्षित स्थान पर ले जा सकें। अमित भटनागर ने कहा कि विकास परियोजनाओं का विरोध नहीं है, लेकिन विकास की कीमत उन परिवारों से नहीं वसूली जानी चाहिए जिनके घर, खेत और जीवन परियोजना के डूब क्षेत्र में आ रहे हैं। उन्होंने मझगांय परियोजना में मुआवजा और पुनर्वास से जुड़े मामलों में पारदर्शिता की मांग दोहराई।
कटऑफ डेट 2018 से बढ़ाकर 2026 करने की मांग



विस्थापितों के आंदोलन को कांग्रेस ने भी समर्थन दिया। पूर्व विधानसभा प्रत्याशी शिवजीत सिंह, जिला कांग्रेस उपाध्यक्ष राकेश गर्ग, अजयगढ़ ब्लॉक अध्यक्ष जगदीश यादव, कुंवरपुर मंडल अध्यक्ष बाल करण यादव, पिसता मंडल अध्यक्ष कामता अहिरवार, मझगांय सेक्टर अध्यक्ष चंद्रपाल सिंह, युवा कांग्रेस नेता कमलेश गुप्ता और वरिष्ठ कांग्रेसी मैकू नन्ना अहिरवार सहित कांग्रेस पदाधिकारी और कार्यकर्ता प्रदर्शन स्थल पहुंचे। कांग्रेस नेताओं ने प्रभावित ग्रामीणों के साथ खड़े रहने और उनकी मांगों को उठाने की बात कही। आंदोलन में मझगांय के अलावा रूंझ और अन्य सिंचाई परियोजनाओं से प्रभावित परिवारों की भी सहभागिता रही।
एसडीएम ने कहा कि भू-अर्जन और पुनर्वास की प्रक्रिया में प्रशासन ने पूरी सतर्कता और पारदर्शिता बरती है। प्रत्येक परिवार के दस्तावेजों की जांच की गई और सघन भौतिक सत्यापन कराया गया, ताकि वास्तविक रूप से पात्र एक भी व्यक्ति लाभ से वंचित न रहे। उन्होंने कहा कि प्रशासन लगातार प्रभावितों से यह कह रहा है कि यदि कोई व्यक्ति पात्रता के बावजूद भू-अर्जन अथवा पुनर्वास पैकेज से वंचित रह गया है तो वह अपने दस्तावेजों के साथ सामने आए। वर्ष 2018 की स्थिति से संबंधित भौतिक सत्यापन के साक्ष्य उपलब्ध कराने पर उसके दावे का परीक्षण किया जाएगा। एसडीएम के मुताबिक अभी तक प्रशासन के समक्ष ऐसा कोई पात्र व्यक्ति सामने नहीं आया है जो पात्र होने के बावजूद सूची से छूट गया हो। उन्होंने बताया कि वर्ष 2018 की स्थिति के आधार पर भू-अर्जन मुआवजा वितरण और पुनर्वास पैकेज के पात्र परिवारों की सूची संबंधित गांवों में उपलब्ध कराई गई है।
मझगांय बांध में पहली बार जलभराव और उसके बाद बस्तियों के टापू में बदलने तथा घरों में पानी पहुंचने की स्थिति ने विस्थापन के सवाल को एक नया मानवीय आयाम दे दिया है। एक ओर प्रशासन का दावा है कि पात्र परिवारों को भू-अर्जन और पुनर्वास पैकेज दिया जा चुका है तथा अतिरिक्त पैकेज का भुगतान भी जारी है। दूसरी ओर प्रभावित ग्रामीण कटऑफ डेट बढ़ाने और अन्य मांगों को लेकर आंदोलन कर रहे हैं। ऐसे में अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि मझगांय बांध के बढ़ते जलस्तर के बीच जिन परिवारों के घर पानी की जद में आ रहे हैं, उनकी तत्काल सुरक्षा, पुनर्वास और लंबित दावों का समाधान किस तरह और कितनी जल्दी होगा। चिता आंदोलन के दोबारा शुरू होने से मझगांय मध्यम सिंचाई परियोजना के प्रभावितों का मुद्दा एक बार फिर पन्ना की राजनीति और प्रशासनिक व्यवस्था के केंद्र में आ गया है।


