हैरानी इस बात को लेकर भी है कि इन सर्वे टीमों को गठित करने का निर्णय लेने वाले अधिकारियों ने टीम के सदस्यों की सुरक्षा के सम्बंध में एक बार भी नहीं सोचा। जबकि कोरोना संक्रमण के गंभीर खतरे को दृष्टिगत रखते हुए घर-घर जाकर बीमार व्यक्तियों की जानकारी जुटाने वाली टीम के प्रत्येक सदस्य को खुद के बचाव के लिए मास्क और ग्लब्स तो बेहद जरूरी हैं। देश और प्रदेश में कोरोना वायरस संक्रमण की चिंताजनक स्थिति को देखते हुए इस बात का अंदाजा लगाया जा सकता है कि पन्ना जिले में बीमार व्यक्ति की जानकारी जुटाने और घर पर ही उन्हें दवा मुहैया कराने के काम में जुटीं टीमों के सदस्य आवश्यक सुरक्षा सामग्री के बगैर कितने सुरक्षित हैं।
पन्ना जिले में कोरोना वायरस संक्रमण की प्रभावी रोकथाम करने के लिए हेतु जिला प्रशासन, स्वास्थ्य विभाग और पुलिस की टीमें युद्ध स्तर पर कार्य कर रही हैं। इसमें आमजन का आपेक्षित सहयोग भी प्रशासन को मिल रहा है। कुछ दिन पूर्व पन्ना कलेक्टर कर्मवीर शर्मा ने सोशल मीडिया के माध्यम से जानकारी दी थी कि जिले की प्रत्येक पंचायत और नगरीय निकायों के प्रत्येक वार्ड में एक-एक टीम गठित की गई हैं, ये टीमें घर-घर जाकर सर्दी-खांसी, बुखार या सांस लेने में तकलीफ के लक्षणों वाले मरीजों की जानकारी एकत्र कर रहीं है। पूरे जिले में 450 टीमें इस काम में जुटीं हैं। इसके अलावा डॉक्टरों की 30 टीमें भी भ्रमण कर रहीं हैं।
बीमार व्यक्तियों की जानकारी जुटाने के काम में लगीं टीमों को उन सभी व्यक्तियों की वांछित जानकारी हांसिल करनी है जो कि पहले से ही जिले में हैं या फिर कुछ समय पूर्व बाहर से वापस पन्ना आए हैं। बीमार व्यक्ति के मिलने पर इन्हें उसकी तकलीफ से लेकर यात्रा से सम्बंधित और अन्य जानकारी प्राप्त करनी पड़ती है। अर्थात बीमार व्यक्ति से टीम के सदस्यों को बात करने में करीब 10-15 मिनिट लगते हैं। अभी तक बीमार व्यक्तियों की जो संख्या सामने आई है, उसके मद्देनजर बीमार व्यक्ति को साधारण सर्दी-जुकाम, बुखार हो सकता और वह कोरोना संदिग्ध भी हो सकता है। जरा सोचिए, जरूरी सुरक्षा सामान के बगैर ऐसे लोगों से रूबरू होना कितना जोखिम भरा काम है। सर्वे टीमों में शामिल मैदानी शासकीय कर्मचारियों को इसका अहसास है। और शायद यही वजह है कि सुरक्षा सामान के बगैर सर्वे का काम कर रहीं टीमों के अधिकाँश सदस्य मानसिक परेशानी महसूस कर रहे हैं। निजी बातचीत में वे अपने स्वास्थ्य और जीवन सुरक्षा से जुड़ी चिंता को खुलकर व्यक्त करते हैं लेकिन सार्वजानिक तौर पर कुछ भी कहने से डरते हैं।