ग्राउंड रिपोर्ट: वन विभाग की बड़ी लापरवाही! बदइंतजामी की भेंट चढ़े 1.5 लाख से अधिक सागौन के पौधे, पत्ते झड़ने से डंठल में हो रहे तब्दील

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*     उत्तर वन मंडल पन्ना के अजयगढ़ और धरमपुर वन परिक्षेत्र का मामला

*     बड़े अफसरों पर मामला दबाने के प्रयास का आरोप, लापरवाही पर उठ रहे गंभीर सवाल

  “एक पेड़ मां के नाम” अभियान चलाने वाली सरकार क्या जिम्मेदारों के खिलाफ लेगी एक्शन

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में वन विभाग का पौधारोपण अभियान एक बार फिर सवालों के घेरे में है। उत्तर सामान्य वन मंडल के अजयगढ़ और धरमपुर वन परिक्षेत्र में मानसून के इंतजार में रखे गए डेढ़ लाख से अधिक सागौन के पौधे बदइंतजामी और लापरवाही के कारण तेजी से सूखते नजर आ रहे हैं। अधिकांश पौधों के पत्ते पीले पड़कर झड़ चुके हैं और वे डंठल में तब्दील होते दिखाई दे रहे हैं। हैरानी की बात यह है कि इस स्थिति की जानकारी एसडीओ से लेकर डीएफओ तथा मुख्य वन संरक्षक, छतरपुर तक को होने के बावजूद पौधों को बचाने के लिए प्रभावी कदम उठाने के बजाय मामला दबाने के आरोप लग रहे हैं। विभाग के वरिष्ठ अधिकारी इस गंभीर स्थिति पर पूरी बेशर्मी से मूकदर्शक बने हुए हैं। विडंबना यह है कि यह सब उस समय हो रहा है, जब प्रदेश सरकार पूरे प्रदेश में ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान को व्यापक स्तर पर चला रही है।
उत्तर वन मंडल पन्ना के तीनों वन परिक्षेत्रों में यदि पौधारोपण कार्यों की स्थिति का तुलनात्मक आकलन किया जाए तो सबसे अधिक अव्यवस्था अजयगढ़ और धरमपुर रेंज में दिखाई देती है। धरमपुर वन परिक्षेत्र के नरदहा सर्किल में गत वर्ष किए गए पौधारोपण के हजारों पौधों को मवेशियों द्वारा चर लिए जाने का बहुचर्चित मामला अभी जांच के दायरे में ही है। इसी बीच नए पौधारोपण की तैयारियों से जुड़ी जो तस्वीरें सामने आई हैं, उन्होंने विभागीय कार्यप्रणाली पर नए सवाल खड़े कर दिए हैं।
जानकारी के अनुसार अजयगढ़ और धरमपुर वन परिक्षेत्र के दर्जनभर से अधिक वन कक्षों में आगामी दिनों में रोपित किए जाने के लिए लगभग डेढ़ लाख से अधिक सागौन पौधे पहले ही संबंधित स्थलों तक पहुंचा दिए गए हैं। मानसून में विलंब के कारण ये पौधे कई दिनों से खुले आसमान अथवा अपर्याप्त छाया में रखे हुए हैं। भीषण गर्मी, तेज धूप और उमस के बीच पर्याप्त संरक्षण एवं नियमित देखभाल के अभाव में बड़ी संख्या में पौधों के पत्ते पीले पड़कर सूख रहे हैं तथा लगातार झड़ते जा रहे हैं। कई पौधे लगभग डंठल के रूप में दिखाई देने लगे हैं।
स्थिति यह है कि पौधों की बदहाली की जानकारी वन विभाग के एसडीओ से लेकर डीएफओ और मुख्य वन संरक्षक तक को है। इसके बावजूद पौधों को बचाने के लिए तत्काल प्रभावी कदम उठाने के बजाय विभाग के जिम्मेदार अधिकारियों पर मामले को दबाने के प्रयास के आरोप लग रहे हैं। स्थानीय स्तर पर यह चर्चा भी है कि मैदानी अमले द्वारा किए जा रहे कार्यों में कथित अनियमितताओं और वित्तीय गड़बड़ियों पर पर्दा डालने की कोशिश की जा रही है। यही कारण है कि लगातार शिकायतें सामने आने के बावजूद अधिकांश स्थानों पर हालात जस के तस बने हुए हैं। सबसे गंभीर बात यह है कि पौधों की सुरक्षा के लिए आवश्यक व्यवस्थाएं- ग्रीन नेट, नियमित सिंचाई, अस्थायी छाया, पानी के परिवहन और निगरानी- इन सभी मदों के लिए परियोजना में पर्याप्त बजट उपलब्ध होने के बावजूद अनेक स्थलों पर इनके प्रभावी इंतजाम दिखाई नहीं देते। नतीजतन, करोड़ों रुपये की लागत से तैयार किया गया पौधारोपण अभियान शुरुआती चरण में ही संकट का सामना कर रहा है।
विडंबना यह भी है कि प्रदेश सरकार पर्यावरण संरक्षण के उद्देश्य से ‘एक पेड़ मां के नाम’ जैसे महत्वाकांक्षी अभियान को जन-आंदोलन का स्वरूप देने का प्रयास कर रही है, जबकि दूसरी ओर उसी सरकार के अधीन वन विभाग के कुछ क्षेत्रों में पौधों की सुरक्षा और संरक्षण को लेकर गंभीर लापरवाही सामने आ रही है। यदि समय रहते हालात नहीं सुधरे तो मानसून शुरू होने से पहले ही बड़ी संख्या में पौधों की वृद्धि प्रभावित होने की आशंका से इनकार नहीं किया जा सकता।

करोड़ों खर्च, फिर भी सवालों के घेरे में पौधारोपण की तैयारियां

उत्तर वन मंडल पन्ना के अन्य वन परिक्षेत्रों की तरह अजयगढ़ और धरमपुर रेंज में भी वर्ष 2025-26 के पौधारोपण कार्यक्रम के लिए कई हेक्टेयर वन भूमि पर क्षेत्र तैयारी कार्य कराए गए। इन कार्यों में स्थल की साफ-सफाई, गड्ढों की खुदाई, सुरक्षा जाली, निरीक्षण पथ (आंतरिक मार्ग), भूजल संरक्षण संबंधी संरचनाएं तथा अन्य तैयारियों पर करोड़ों रुपये खर्च किए गए हैं। स्थानीय स्तर पर आरोप हैं कि इन कार्यों में बड़े पैमाने पर वित्तीय अनियमितताएं हुई हैं। आरोप यह भी हैं कि कई स्थानों पर विभागीय नियमों की अनदेखी करते हुए मशीनों से कार्य कराए गए और कुल स्वीकृत राशि का बड़ा हिस्सा कथित रूप से बंदरबांट की भेंट चढ़ गया। इन आरोपों में बीटगार्ड से लेकर रेंजर, एसडीओ और डीएफओ स्तर तक की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। रिपोर्ट तैयार करने के दौरान कई ऐसे दस्तावेज और स्थानीय स्तर पर प्राप्त जानकारियां भी सामने आई हैं, जिनके आधार पर इन आरोपों की निष्पक्ष जांच की मांग तेज हो गई है। विचारणीय प्रश्न यह है कि जिस विभाग का दायित्व प्रदेश की वन संपदा का संरक्षण और संवर्धन करना है, वहीं यदि पौधारोपण जैसे पर्यावरणीय कार्यों में अनियमितताओं और लापरवाही के आरोप लगातार सामने आएं तो इससे सरकारी योजनाओं की विश्वसनीयता पर भी प्रश्नचिह्न लगना स्वाभाविक है।

रोपण के इंतजार में खुले आसमान के नीचे पड़े पौधे

उल्लेखनीय है कि वन परिक्षेत्र अजयगढ़ और धरमपुर में इस वर्ष प्रस्तावित पौधारोपण के लिए लगभग पखवाड़े भर पहले क्रमशः करीब 50 हजार तथा एक लाख से अधिक सागौन के पौधे संबंधित बीटों में पहुंचा दिए गए थे। मानसून की दस्तक में देरी होने के कारण ये पौधे कई दिनों से रोपण का इंतजार कर रहे हैं। इस दौरान तेज धूप, भीषण गर्मी और उमस ने उनकी स्थिति लगातार खराब कर दी है। अधिकांश स्थानों पर पौधों के पत्ते पीले पड़कर सूख रहे हैं और तेजी से झड़ रहे हैं। अपवादस्वरूप एक-दो स्थानों को छोड़ दें तो अधिकांश बीटों में नाजुक पौधों को मौसम की मार से बचाने के लिए न तो पर्याप्त छाया की व्यवस्था की गई और न ही मानक अनुरूप संरक्षण के इंतजाम दिखाई दिए।
पौधों की सुरक्षा को लेकर मैदानी वन अमले की उदासीनता उनकी ग्रोथ पर भारी पड़ती नजर आ रही है। संबंधित वन परिक्षेत्राधिकारियों की ओर से भी मौके पर प्रभावी निगरानी नहीं दिखी। स्थानीय स्तर पर चर्चा है कि क्षेत्र तैयारी कार्यों से जुड़े अधिकांश भुगतान पहले ही हो चुके हैं, ऐसे में पौधों की नियमित देखभाल अपेक्षित प्राथमिकता नहीं बन पाई। परिणामस्वरूप डेढ़ लाख से अधिक सागौन के पौधे भगवान भरोसे नजर आ रहे हैं। बताया जाता है कि उत्तर सामान्य वन मंडल पन्ना के डीएफओ धीरेन्द्र प्रताप सिंह द्वारा लगातार निर्देश दिए जा रहे हैं कि पौधों को ग्रीन नेट (हरी जाली) की छाया में रखा जाए, नियमित सिंचाई कराई जाए तथा उनकी सतत निगरानी सुनिश्चित की जाए। पौधारोपण परियोजना में इन व्यवस्थाओं के लिए अलग से बजट का भी प्रावधान है। इसके बावजूद कई स्थानों पर इन निर्देशों का पालन होता दिखाई नहीं दिया। मैदानी अमले द्वारा वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों की कथित अनदेखी का खामियाजा अब सीधे पौधों की स्थिति पर दिखाई दे रहा है। इसी क्रम में रडार न्यूज़ की टीम ने अजयगढ़ और धरमपुर वन परिक्षेत्र के विभिन्न पौधारोपण स्थलों का मौके पर पहुंचकर निरीक्षण किया। इस दौरान अनेक बीटों में पौधों की सुरक्षा और रखरखाव से जुड़ी गंभीर लापरवाहियां सामने आईं।

श्रमिकों के भरोसे चल रही संवेदनशील बीट

वन परिक्षेत्र धरमपुर की नरदहा बीट अंतर्गत ग्राम छनिहापुरवा में सिंचाई जलाशय के समीप रोपण के इंतजार में हजारों सागौन पौधे वृक्षों की छाया में रखे मिले। निरीक्षण के दौरान यहां पौधों की नियमित सिंचाई की कोई समुचित व्यवस्था दिखाई नहीं दी। मौके पर मौजूद एक सुरक्षा श्रमिक ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि पौधों के लिए पानी तालाब से लाना पड़ता है। ऐसे में प्रतिदिन सुबह-शाम दोनों समय सिंचाई कर पाना संभव नहीं हो पाता। उन्होंने कहा कि उनकी कोशिश रहती है कि कम-से-कम दो दिन में एक बार पौधों को पानी अवश्य मिल जाए। जब उनसे पीले पड़कर सूख रहे पौधों के संबंध में पूछा गया तो उन्होंने बिना किसी लागलपेट के स्वीकार किया कि प्रतिकूल मौसम और पानी परिवहन की समुचित व्यवस्था नहीं होने से पौधों पर प्रतिकूल असर पड़ रहा है। इसी दौरान सुरक्षा श्रमिक ने एक और महत्वपूर्ण जानकारी दी। उसके अनुसार संबंधित बीटगार्ड अर्पित रूसिया लगभग 80 किलोमीटर दूर पन्ना में निवास करते हैं। विशेष कार्य होने पर वे कुछ घंटों के लिए बीट में आते हैं, मोबाइल से निरीक्षण संबंधी कुछ तस्वीरें लेते हैं, आवश्यक निर्देश देकर शाम तक वापस लौट जाते हैं। यदि यह स्थिति सही है तो अंतर्राज्जीय सीमावर्ती इलाके में स्थित संवेदनशील बीट नरदहा की नियमित निगरानी को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े होते हैं।

कुड़रा बीट में पानी की व्यवस्था बनी चुनौती

धरमपुर रेंज की कुड़रा बीट में पौधों को प्रचंड गर्मी से बचाने के लिए उन्हें अस्थायी झोपड़ी की छाया में रखा गया था। यह व्यवस्था अन्य कई बीटों की तुलना में बेहतर दिखाई दी, लेकिन चंबल के बीहड़ों जैसी दुर्गम भौगोलिक परिस्थितियों के कारण यहां भी नियमित सिंचाई सबसे बड़ी चुनौती बनी हुई है। पानी की स्थायी व्यवस्था नहीं होने से बड़ी संख्या में पौधे सूखते नजर आए। हालांकि इस बीट में एक सकारात्मक पहलू भी सामने आया। स्थानीय लोगों के अनुसार बीटगार्ड राजेंद्र शाक्य स्वयं तथा उनके साथ कार्यरत सुरक्षा श्रमिक उपलब्ध संसाधनों में पौधों को बचाने के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं। इसके बावजूद प्राकृतिक परिस्थितियां और संसाधनों की कमी उनकी मेहनत पर भारी पड़ती दिखाई दे रही है।

स्थानीय दबंग को सौंप दी बीट की जिम्मेदारी!

धरमपुर रेंज की भैरहा बीट के संबंध में जांच के दौरान एक बेहद गंभीर मामला सामने आया। स्थानीय लोगों ने आरोप लगाया कि संबंधित बीटगार्ड उमंग खरे ने बीट के अधिकांश कार्य ग्राम कल्याणपुर के एक स्थानीय प्रभावशाली व्यक्ति को अनौपचारिक रूप से सौंप रखे हैं। यदि यह आरोप सही हैं तो यह विभागीय व्यवस्था और जवाबदेही दोनों पर गंभीर प्रश्न खड़े करता है। भैरहा बीट के वन कक्ष पी-33, पी-37 पार्ट-1 एवं पार्ट-2 के निरीक्षण के दौरान कंटीली झाड़ियों से घिरे सुरक्षा घेरे के भीतर रोपण के लिए रखे हजारों पौधों में बड़ी संख्या में पौधे सूखे हुए मिले। कई पौधों के पत्ते पूरी तरह झड़ चुके थे और उनकी स्थिति देखकर ऐसा प्रतीत हो रहा था मानो कई दिनों से उन्हें पर्याप्त पानी नहीं मिला हो। आसपास रखे मिट्टी के घड़े भी खाली और सूखे पड़े थे।
इसी दौरान मौके पर मौजूद एक व्यक्ति ने स्वयं को सुरक्षा श्रमिक बताते हुए दावा किया कि पौधों को प्रतिदिन पानी दिया जाता है। हालांकि पौधों की वास्तविक स्थिति इस दावे से मेल नहीं खा रही थी। बातचीत के दौरान उस व्यक्ति के मोबाइल पर एक स्थानीय व्यक्ति का फोन आया। कुछ देर बातचीत के बाद उसने पत्रकारों से कहा कि “दाऊ साहब कह रहे हैं कि जाली बंद करनी है, आप लोग बाहर आ जाइए।” बाद में स्थानीय स्तर पर मिली जानकारी के अनुसार पौधारोपण क्षेत्र तैयारी से जुड़े अधिकांश कार्य उसी प्रभावशाली व्यक्ति की देखरेख में कराए गए थे। गड्ढों की खुदाई, परकोलेशन पिट और परकोलेशन टैंक निर्माण में भी उसी की मशीनरी लगाए जाने की बात सामने आई। इन तथ्यों की स्वतंत्र विभागीय जांच आवश्यक प्रतीत होती है।

स्प्रिंकलर सिंचाई, लेकिन छाया के अभाव में मुरझा रहे पौधे

धरमपुर रेंज की भसूड़ा बीट में रोपण के लिए रखे पौधों की सिंचाई व्यवस्था अन्य बीटों की तुलना में अपेक्षाकृत बेहतर दिखाई दी। गांव के पहुंच मार्ग के किनारे, रोपण क्षेत्र के प्रवेश द्वार के समीप एक गड्ढे में रखे हजारों सागौन पौधों को स्प्रिंकलर सिंचाई पद्धति से सुबह-शाम पानी दिया जा रहा था। दूर से देखने पर यह व्यवस्था कृत्रिम वर्षा जैसी प्रतीत हो रही थी और प्रथम दृष्टया संतोषजनक भी लगी। इसके बावजूद बड़ी संख्या में पौधों के पत्ते पीले पड़ चुके थे तथा लगातार सूखकर झड़ रहे थे। निरीक्षण के दौरान स्पष्ट हुआ कि नियमित सिंचाई के बावजूद पौधों को तेज धूप और भीषण गर्मी से बचाने के लिए ग्रीन नेट अथवा अन्य किसी प्रकार की पर्याप्त छाया की व्यवस्था नहीं की गई थी। परिणामस्वरूप पानी मिलने के बावजूद गर्म हवाओं और प्रचंड तापमान का प्रतिकूल प्रभाव पौधों पर साफ दिखाई दे रहा था।बीटगार्ड ऋषि कपूर यादव ने बताया कि रुंज नदी के किनारे स्थित लगभग 50 हेक्टेयर वन भूमि को अतिक्रमण मुक्त कराकर पौधारोपण के लिए क्षेत्र तैयारी से जुड़े सभी कार्य पूरे करा लिए गए हैं। हालांकि उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि सुरक्षा जाली के भीतर अभी भी तीन परिवार निवासरत हैं और उनके पालतू मवेशी भी उसी क्षेत्र में रहते हैं। ऐसी स्थिति में स्वाभाविक रूप से सवाल उठता है कि लाखों रुपये खर्च कर प्रस्तावित पौधारोपण के बाद इन पौधों को मवेशियों से कैसे सुरक्षित रखा जाएगा? इस संबंध में मौके पर ऐसा कोई ठोस प्रबंधन दिखाई नहीं दिया, जिससे भविष्य में पौधों की सुरक्षा सुनिश्चित होती नजर आए।

पानी, छाया और सुरक्षा- तीनों मोर्चे पर सवाल

उत्तर सामान्य वन मंडल की अजयगढ़ रेंज भी अव्यवस्था और कथित अनियमितताओं के आरोपों से अछूती नहीं है। स्थानीय लोगों का आरोप है कि निवर्तमान रेंजर पंकज दुबे के कार्यकाल में विभिन्न वानिकी कार्यों, विशेषकर अटल भूजल तालाबों और क्षेत्र तैयारी कार्यों में बड़े पैमाने पर अनियमितताएं हुईं। यही नहीं, उनके कार्यकाल के दौरान अवैध खनन और वन संपदा के दोहन को लेकर भी लगातार शिकायतें सामने आती रहीं। इन मामलों की अलग से पड़ताल की जा रही है। यदि वर्तमान पौधारोपण तैयारियों की बात करें तो बरकोला बीट के वन कक्ष क्रमांक पी-188 में कैम्पा मद से प्रस्तावित 20 हेक्टेयर पौधारोपण के लिए हजारों सागौन पौधे पहले से भंडारित मिले। निरीक्षण के दौरान न तो पौधों को तेज धूप से बचाने के लिए ग्रीन नेट जैसी व्यवस्था दिखाई दी और न ही जंगली अथवा पालतू मवेशियों से सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नजर आए। बीटगार्ड रामलखन शाक्य ने दावा किया कि पौधों की प्रतिदिन सुबह-शाम टैंकर से सिंचाई कराई जा रही है। हालांकि मौके पर पौधों की स्थिति देखकर इस दावे की पुष्टि सहज रूप से नहीं हो सकी। बड़ी संख्या में पौधों के पत्ते सूख चुके थे और कई पौधे तेजी से डंठल में तब्दील होते दिखाई दे रहे थे।जब उनसे पूछा गया कि पौधों को झुलसाने वाली धूप से बचाने के लिए क्या व्यवस्था की गई है, तो उन्होंने स्वीकार किया कि इस संबंध में कोई विशेष इंतजाम नहीं किए गए हैं।

पुराने रोपण में चरते मिले मवेशी, नए की सुरक्षा पर सवाल

बरकोला बीट के प्रस्तावित नवीन पौधारोपण क्षेत्र के ठीक सामने मुख्य सड़क के दूसरी ओर तीन-चार वर्ष पुराने पौधारोपण क्षेत्र के भीतर दिनदहाड़े आधा दर्जन भैंसें चरती हुई मिलीं। वहां मौजूद किसी भी कर्मचारी द्वारा उन्हें बाहर निकालने का प्रयास नहीं किया जा रहा था। यह दृश्य कई सवाल खड़े करता है। यदि वर्षों पुराने पौधारोपण क्षेत्र में भी मवेशियों की बेरोकटोक आवाजाही जारी है, तो आगामी दिनों में लगाए जाने वाले नए पौधों की सुरक्षा कैसे सुनिश्चित होगी? स्थानीय लोगों का कहना है कि यदि यही स्थिति बनी रही तो लाखों रुपये खर्च कर किए जाने वाले नए पौधारोपण का भी वही हश्र हो सकता है, जैसा पहले के कई रोपणों का हुआ। ऐसे में विभागीय दावों और जमीनी हकीकत के बीच स्पष्ट अंतर दिखाई देता है।

धवारी और दमचुआ में भी नहीं थम रही पौधों की बदहाली

अजयगढ़ रेंज की दमचुआ तथा धवारी बीट के वन कक्ष क्रमांक पी-195 में भी रोपण के लिए रखे हजारों पौधों की स्थिति चिंताजनक मिली। दोनों स्थानों पर सिंचाई की व्यवस्था होने का दावा किया गया, लेकिन इसके बावजूद बड़ी संख्या में पौधों के पत्ते सूखकर झड़ चुके थे। धवारी बीट में पौधों को केवल पेड़ों की प्राकृतिक छाया के नीचे रखा गया था। भीषण गर्मी और लू जैसे हालात में यह व्यवस्था अपर्याप्त साबित होती दिखाई दी। पौधों को सुरक्षित रखने के लिए ग्रीन नेट या अन्य वैज्ञानिक उपाय मौके पर नहीं मिले। इसके विपरीत दमचुआ बीट में पौधों को ग्रीन नेट की छाया में रखकर नियमित सिंचाई की जा रही थी। यहां व्यवस्था अपेक्षाकृत बेहतर होने के बावजूद कई पौधों के पत्ते सूख चुके थे और वे डंठल में तब्दील होते दिखाई दे रहे थे। इससे यह स्पष्ट संकेत मिलता है कि अत्यधिक तापमान और मानसून में हो रही देरी का असर यहां भी पड़ रहा है।

टौरिया बीट में सिंचाई जारी, छांव का आभाव

टौरिया बीट के वन कक्ष क्रमांक पी-176 एवं पी-177 में रोपण के लिए रखे पौधों की टैंकर से सिंचाई की जा रही थी। निरीक्षण के दौरान बीटगार्ड प्रतीक तिवारी तथा सुरक्षा श्रमिक मौके पर मौजूद मिले। बीटगार्ड ने बताया कि जब तक क्षेत्र में पर्याप्त वर्षा नहीं हो जाती, तब तक पौधारोपण शुरू नहीं किया जाएगा। उनका कहना था कि फिलहाल सभी पौधे एक स्थान पर रखे होने से उनकी देखभाल अपेक्षाकृत आसान है, लेकिन रोपण के बाद इनकी सुरक्षा कहीं अधिक चुनौतीपूर्ण होगी। हालांकि निरीक्षण के दौरान यहां भी यह स्पष्ट दिखाई दिया कि पौधों को तेज धूप से बचाने के लिए पर्याप्त छायादार व्यवस्था नहीं थी। परिणामस्वरूप बड़ी संख्या में पौधों के पत्ते पीले पड़ चुके थे और सूखने की प्रक्रिया लगातार जारी थी।
कुल मिलाकर अजयगढ़ और धरमपुर वन परिक्षेत्र की अधिकांश बीटों में एक जैसी तस्वीर सामने आई। कहीं सिंचाई की व्यवस्था कमजोर मिली, कहीं छाया का अभाव दिखाई दिया तो कहीं सुरक्षा के पर्याप्त इंतजाम नहीं थे। कुछ स्थानों पर प्रयास जरूर नजर आए, लेकिन अधिकांश जगह पौधों की मौजूदा स्थिति यह संकेत देती है कि यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए तो करोड़ों रुपये की लागत से तैयार पौधारोपण अभियान की सफलता पर गंभीर प्रश्नचिह्न लग सकते हैं।

निरीक्षण में उजागर हुई अनियमितताएं, बीटगार्ड निलंबित

उत्तर सामान्य वन मंडल पन्ना के डीएफओ धीरेन्द्र प्रताप सिंह ने हाल ही में वन परिक्षेत्र अजयगढ़ का भ्रमण कर पौधारोपण क्षेत्र तैयारी से जुड़े कार्यों का सघन निरीक्षण किया था। निरीक्षण के दौरान दमचुआ बीट में एक स्थान पर बड़ी संख्या में सागौन के सूखे पौधे भंडारित पाए गए। इसके अलावा निर्धारित मानकों के विपरीत प्रतिबंधित करंज प्रजाति के पौधों का रोपण किया जाना भी सामने आया। निरीक्षण में यह भी पाया गया कि कई स्थानों पर रोपण कार्य निर्धारित तकनीकी मानकों के अनुरूप नहीं कराया गया था। गड्ढों में नीम खली का उपयोग नहीं किया गया था तथा अन्य आवश्यक मानकों की भी अनदेखी की गई थी। इन कमियों को गंभीर लापरवाही मानते हुए डीएफओ ने मौके पर ही संबंधित बीटगार्ड रामनरेश राजपूत तथा रेंजर अभिषेक दुबे की कार्यप्रणाली पर खुलकर नाराजगी व्यक्त की। विभागीय सूत्रों के अनुसार निरीक्षण में सामने आई गंभीर अनियमितताओं के बाद बीटगार्ड रामनरेश राजपूत को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया गया। हालांकि रेंजर की कार्यप्रणाली पर भी डीएफओ ने असंतोष जताया था, उनके विरुद्ध क्या विभागीय कार्रवाई की गई, इसकी जानकारी अब तक सार्वजनिक नहीं हो सकी है। इसे लेकर विभागीय गलियारों में तरह-तरह की चर्चाएं हैं।

तीखी नोकझोंक भी बनी चर्चा का विषय

इस पूरे घटनाक्रम को लेकर विभागीय कर्मचारियों के बीच एक और चर्चा भी जोर पकड़ रही है। बताया जाता है कि निरीक्षण के दौरान कथित गंभीर अनियमितताओं को देखकर डीएफओ काफी नाराज हो गए थे। इसी दौरान उनकी और संबंधित बीटगार्ड के बीच तीखी बहस भी हुई। सूत्रों के मुताबिक, बातचीत के दौरान डीएफओ द्वारा की गई कथित अपमानजनक टिप्पणी पर बीटगार्ड ने तत्काल आपत्ति दर्ज कराई और यहां तक कह दिया कि “कोई भी आपके साथ काम नहीं करना चाहता, इसलिए एक के बाद एक तीन-तीन रेंजर तबादला कराकर जा रहे हैं।” हालांकि इस कथित घटनाक्रम की विभाग की ओर से आधिकारिक पुष्टि नहीं हुई है, लेकिन विभागीय कर्मचारियों के बीच यह चर्चा लंबे समय तक होती रही। इसके कुछ समय बाद बीटगार्ड के विरुद्ध निलंबन की कार्रवाई भी हो गई।

सवाल- क्या अन्य बीटों में भी होगी कार्रवाई?

रडार न्यूज़ की टीम द्वारा अजयगढ़ और धरमपुर वन परिक्षेत्र की अनेक बीटों का स्थलीय निरीक्षण करने पर पौधों की सुरक्षा, सिंचाई, छाया की व्यवस्था तथा विभागीय निगरानी से जुड़ी कमियां सामने आईं। कई स्थानों पर पौधे तेजी से सूखते मिले तो कहीं सुरक्षा के इंतजाम बेहद कमजोर पाए गए। कुछ बीटों में कर्मचारियों द्वारा सीमित संसाधनों के बावजूद पौधों को बचाने के प्रयास भी दिखाई दिए, लेकिन अधिकांश स्थानों पर स्थिति संतोषजनक नहीं कही जा सकती। ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि दमचुआ बीट में अनियमितताओं पर तत्काल निलंबन की कार्रवाई हो सकती है, तो अजयगढ़ और धरमपुर की अन्य बीटों में सामने आई कथित गंभीर लापरवाही, वरिष्ठ अधिकारियों के निर्देशों की अवहेलना तथा पौधों की सुरक्षा में बरती गई उदासीनता के मामलों में भी क्या इसी प्रकार निष्पक्ष कार्रवाई होगी?
या फिर डेढ़ लाख से अधिक सागौन पौधों की बदहाली का यह मामला भी पूर्व की कई शिकायतों की तरह फाइलों में दबकर रह जाएगा? यह प्रश्न केवल विभागीय जवाबदेही का नहीं, बल्कि करोड़ों रुपये के सरकारी व्यय, पर्यावरण संरक्षण और प्रदेश सरकार के महत्वाकांक्षी ‘एक पेड़ मां के नाम’ अभियान की विश्वसनीयता से भी जुड़ा हुआ है। यदि समय रहते प्रभावी कदम नहीं उठाए गए, तो पौधों की ग्रोथ प्रभावित होने के साथ-साथ आगामी पौधारोपण अभियान की सफलता भी संदेह के घेरे में आ सकती है। ऐसे में जरूरत केवल पौधारोपण के लक्ष्य पूरे करने की नहीं, बल्कि उन पौधों को सुरक्षित और जीवित रखने की भी है, जिन पर करोड़ों रुपये खर्च किए जा चुके हैं।
इनका कहना है-
“वन परिक्षेत्र अजयगढ़ में लगभग 50 हजार पौधों का परिवहन कराया जा चुका है। पिछले 10-15 दिनों से ये पौधे निर्धारित स्थलों पर रखे हैं और उनकी नियमित सिंचाई कराई जा रही है। गर्मी के कारण कुछ पौधे सूखे जरूर हैं, लेकिन वे मरे नहीं हैं। मानसून सक्रिय होने के बाद रोपण होने पर सूखे हुए पौधों में दोबारा पत्तियां निकल आएंगी।”

पंकज दुबे, रेंजर, वन परिक्षेत्र अजयगढ़

“वन परिक्षेत्र धरमपुर में एक लाख से अधिक सागौन पौधे नर्सरी से लाकर संबंधित स्थलों पर रखे गए हैं। सागौन ऐसी प्रजाति है जो विषम परिस्थितियों में भी जीवित रहती है। इसलिए केवल पत्ते सूखने या पौधे के डंठल जैसे दिखने से यह नहीं माना जा सकता कि पौधा मर गया है। हां, इतना जरूर है कि इस स्थिति से पौधों की प्रारंभिक ग्रोथ प्रभावित हो सकती है।”

वैभव सिंह चंदेल, रेंजर, वन परिक्षेत्र धरमपुर

“पौधों को धूप और गर्मी से बचाने के लिए ग्रीन नेट लगाने, नियमित सिंचाई कराने तथा समुचित देखभाल के निर्देश लगातार दिए जा रहे हैं। इन व्यवस्थाओं के लिए परियोजना में पर्याप्त बजट का प्रावधान है। किसी भी कर्मचारी को यह खर्च अपनी जेब से नहीं करना है। दमचुआ बीट के निरीक्षण के दौरान प्रतिबंधित करंज प्रजाति के पौधों का रोपण, मानक के विपरीत कार्य तथा गड्ढों में नीम खली नहीं डाले जाने जैसी गंभीर अनियमितताएं मिली थीं। इसलिए संबंधित बीटगार्ड को निलंबित किया गया। यदि गंभीर लापरवाही पर भी कार्रवाई नहीं होगी तो विभाग में अराजकता फैल जाएगी। आप अन्य बीटों के भी फोटो और तथ्य उपलब्ध कराइए। यदि कहीं इसी प्रकार की गंभीर लापरवाही पाई जाती है तो संबंधित अधिकारियों एवं कर्मचारियों के विरुद्ध भी नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।”

धीरेन्द्र प्रताप सिंह, डीएफओ, उत्तर सामान्य वन मंडल पन्ना