युवाओं के आक्रोश को समय रहते समझिए!
ज्वलंत/जयराम शुक्ल (वरिष्ठ पत्रकार एवं स्तम्भकार) संपर्कः 8225812813
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इंदौर के भँवर कुआँ इलाके में इन दिनों भुतहा सन्नाटा तो नहीं पर वह चहल-पहल भी गायब है जो सालभर पहले रहा करती थी। यह चहल-पहल उन मेधावी छात्रों की होती थी जो यूपीएससी, पीएससी में अपना भविष्य तजबीजते थे। दो साल से कोई नौकरी ही नहीं निकल रही और फिलहाल कोरोना एक मकम्मिल बहाना तो है ही। कोई एक लाख से ज्यादा बच्चे यहां विभिन्न कोचिंग संस्थानों मे पढ़ा करते हैं व विषय विशेषज्ञों से मार्गदर्शन लेते हैं। इंदौर की इकानामी में इन बच्चों का वैसा ही योगदान रहता था जैसा कि राजस्थान के कोटा में। ऐसे करियरिस्ट छात्रों के चलते इंदौर मध्यभारत का सबसे बड़ा शैक्षणिक केंद्र बनकर उभरा है। यहां वे मध्यवर्गीय, निम्न मध्यवर्गीय छात्र आते हैं जिनकी हैसियत दिल्ली के मुखर्जी नगर में रहकर बाजीराम जैसे बड़े संस्थानों में पढ़ने की नहीं रहती।
इंदौर के भँवरकुआँ क्षेत्र में सबसे बड़ी हिस्सेदारी हमारे विंध्यक्षेत्र के बच्चों की होती है। पिछले साल तक रेवांचल एक्सप्रेस में ऐसे प्रायः कई बच्चे मिल जाते थे जिनके पिट्ठूबैग में किताबें और सिर पर सीधा-पिसान की बोरियां लदी रहती थीं। वह दृश्य मुझे भूला नहीं जिसमें एक बच्ची सिरपर पचीस किलो की बोरी और पीठपर किताबों से भरा बैग लिए हबीबगंज स्टेशन की सीढ़ियां चढ़ते हुए डगमगा गई थी। मैंने उसका बोझ हल्का करने में सहारा दिया था। उसका पता और नंबर अभी भी मेरे पास है..फिलहाल वह बिटिया एक शहर में दबंग वाणिज्य कर अधिकारी है। ऐसे बच्चे ही भँवरकुँआ में भविष्य के भँवर से पार पाने का संघर्ष करते हैं।
अब प्रायः सभी अपना अपना डेरा-डकूला समेटकर घर लौट चुके हैं। इन दो सालों में उनके अभिभावकों ने पाँच से दस लाख खर्च किए। कइयों ने जमीन गिरवी की, तो कई एजुकेशन लोन लेकर बैठे हैं। नौकरियां हैं कि दूर-दूर तक नजर नहीं आतीं। कोरोना ने प्रायवेट सेक्टर की आधे से ज्यादा नौकरियाँ लील लीं। जो हैं वे तीस से पचास परसेंट की पगार पर वर्कफ्राम होम कर रहे हैं।
युवाओं और छात्रों को लेकर हर सरकारें एक सी दगाबाज हैं। उनके चुनावी वायदों में नौकरियों की बरसात रहती है पर सत्ता में आने के बाद युवा फिर उसी रेगिस्तान के बियावान टीले पर खड़ा मिलता है। 2018 में कमलनाथ की सरकार आई तो लगा कि युवाओं को लेकर यह गंभीर होगी.. क्योंकि कि भाजपा के सत्ता पलट में युवाओं की बड़ी भागीदारी थी।.लेकिन कमलनाथ सरकार और उसके ज्यादातर मंत्री गजनवी अंदाज में कूटने और तबादलों के एवज में उगाही करने में लग गए। पीएससी की जो जगह थीं भी उसे भी टालते गए। और अंततः पिछड़ों के सत्ताइस परसेंट आरक्षण का वह सियासी पैतरा भाँजा कि सभी नौकरियां वहीं फँस गईं। कमलनाथ को यह मालूम था कि यह आरक्षण संविधान सम्मत नहीं है और कोर्ट से स्थगन मिल जाएगा।
कमलनाथ सरकार को युवाओं की हाय लगी और वह कोरोना काल में ही भस्ममीभूत हो गई। अब आई शिवराज सरकार, तो उपचुनाव के चक्कर में वह भी हाईकोर्ट में तारीख पर तारीख लेते हुए चल रही है। इस 9 दिसम्बर को सुनवाई है..देखे फैसला का पथप्रशस्त होता है कि फिर कोई नई तारीख मिलती है। नवंबर 2018 में जब से भाजपा सरकार गई तब से आज तक एक भी नौकरी नहीं निकली। प्रायवेट सेक्टर में कोरोना इफेक्ट और सरकारी सेक्टर में रिजर्वेशन का पेंच। जो नौकरी में हैं वे बिना प्रमोशन के रिटायर्ड हो रहे हैं। और बच्चे इन्हीं दो पहलुओं में फँसकर अवसाद की स्थिति में पहुंच रहे हैं। मैं हूँ न..कहने वाले विरोधियों पर बुल्डोजर चढ़ाने में फँदे हैं।
वास्तव इन युवाओं का कोई घनी-घोरी नहीं जो इनकी चिंता करे। मध्यप्रदेश में आखिरी बार पटवारियों की भर्ती हुई थी तब से भरतीतंत्र ठहरा हुआ है। वह पटवारी की नौकरी ही इतने महत्व की थी कि तब यूपीएससी, पीएससी की तैयारी करवाने वाले कोचिंग संस्थान, पटवारी कोचिंग में बदल गए थे। नौ हजार पदों के लिए 13 लाख अर्जियां पड़ी थीं। उस भर्ती में नब्बे फीसद वही बच्चे थे जो कलेक्टर, डिप्टी कलेक्टर का ख्वाब पाले मेहनत कर रहे थे। अब वे बच्चे पछता रहे हैं जो कलेक्टरी के फेर में पटवारी परीक्षा को नहीं चुना।
पीएससी, पुलिस व कुछ नौकरियों को अलग कर दें तो पिछले सत्रह साल से यहां संविदा कर्मी संस्कृति चल रही है। यानी कि सबसे बडे़ नियोक्ता शिक्षा विभाग समेत सेवा प्रदाता व प्रशासन के क्षेत्र में कोई पाँच लाख के आसपास ऐसी संख्या है जो रोजनदारी, संविदा और टोकन मानदेय पर चल रही है। सरकारी क्षेत्र की उच्चशिक्षा तो लगभग पूरी तरह अतिथि विद्वानों पर निर्भर है। बड़ी संख्या में ऐसे महाविद्यालय हैं जिनके विभागाध्यक्ष संविदा कर्मी या अतिथि विद्वान हैं। विश्विविद्यालयों की स्थिति तो ऐसी है कि जितने विभाग उतने नियमित प्राध्यापक और वे भी मूलविभाग का काम छोड़कर पैसा कमाने और अधकचरे स्किल के बेरोजगार तैयार करने वाले विभाग संचालित कर रहे हैं। स्वास्थ्य, पंचायत और भी कई ऐसे सेवा प्रदाता विभाग हैं जिन्हें दिहाड़ी के नौकर चला रहे हैं और जो नियमित हैं वे उनकी नौकरी खा जाने का भय दिखाकर हुक्म चला रहे हैं।
दिहाड़ी, संविदा कर्मी, अतिथि विद्वान या जो अन्यनाम वाले अनियमित पद हैं जो काम करते हैं व उसकी एवज में जो नियमित हैं उनकी वेतन का फासला 15 बनाम 100 का है। जो अतिथि विद्वान कालेज में 15 हजार रुपये महीने में पढ़ाता है वही काम करने वाले नियमित प्राध्यापक को लगभग 1लाख रुपए महीने और फोकट की कई और सुविधाएं मिल जाती हैं। कई ऐसे हैं जो दिहाड़ी करते हुए ओवरएज हो गए, कहीं लायक नहीं बचे।अब तो इनकी शादी में भी मुश्किल होने लगी है। जबकि इनमें नब्बे प्रतिशत ऐसे हैं जो पीएचडी या एमफिल तो किए ही है। यही फ्रस्टेट पीढ़ी कालेज के बच्चों को पढा रही है।
सरकार नियमित भर्तियां इसलिए नहीं करती कि जब 15 हजार के गुलामों से काम चलता है तो 1 लाख वाले क्यों भरें। स्कूली शिक्षा में नधे हुए लड़कों को तो स्किल्ड लेबर जितना भी मेहनताना नहीं मिलता। हम सरकार पर भरोसा करते हैं कि वह अन्याय रोकेगी। यहां तो उल्टा वही दमन और शोषण कर रही है। कमाल की बात ये कि कोई इन अभागे लोगों के बारे में बोलने को तैय्यार भी नहीं। मीडिया भी इन्हें हाशिये पर रखता है। यह हाल उन युवाओं का है जो पढ़लिखकर कैसे भी नौकरी पाए हुएं हैं। जो बेरोजगार हैं उनकी संख्या इनसे दसबीस गुना ज्यादा ही होगी।
जब सरकार ही शोषण में जुटी है तो निजी क्षेत्र में कितना भीषण शोषण चल रहा है मत पूछिये। पटवारी पद के लिए अर्जी देने वालों में एनआईटी से निकले इंजीनियर व एमबीए के लड़के भी हैं। कभी इन्होंने उत्साह से पैकज पकड़ा था। पैकेज वाली कंपनियां छंटनी कर रही हैं व कम वेतन पर काम करने को मजबूर कर रही हैं। जो काम कर रहे हैं उनकी जवानी और प्रतिभा ऐसे निचुड़ रही है जैसे चरखी में गन्ना टटेर बनके निकलता है। जहाँ तक याद है 2008 से प्रदेश में ग्लोबल इनवेस्टर्स मीट हर अँतरे साल हो रही हैं। मुझे लगता है कि पूँजीपतियों को लुभाने में अब तक जितने अरब खर्च हुए उतने का पूँजीनिवेश नहीं आया। सरकार से पूछा जाना चाहिए कि कितने युवाओं को पूँजीनिवेश से खड़े उद्योगों में रोजगार मिला।
सरकार ने युवाओं के शोषण का एक और रास्ता खोल दिया है। यह आउटसोर्सिंग का मकड़जाल. है। सेवा क्षेत्र में यह अमरबेल की तरह फैल रहा है। एक दिन एक चैनल की डिबेट में आपातकालीन. स्वास्थ्य सेवा डायल 108 के ड्रायवरों का मुद्दा आया। मैं भी था उस बहस में। ड्रायवरों का प्रतिनिधि अपनी बात रखते हुए रो पड़ा। बारह घंटे की नौकरी, तनख्वाह 8 हजार महीना, वह भी हर महीने नहीं। न पीएफ न अन्य सुविधाएं। नौकरी से निकालने की धमकी। कहाँ चले जाएं बीबी बच्चों के साथ प्राणांत करने। कोई सुनने वाला नहीं। मध्यप्रदेश में डायल 108 जो कंपनी चलाती है वह इतनी अमीर है कि विदेशी बैंकों में बड़ा धन जमा कर रखा है। पैराडाइज लीक्स में इसका नाम है और यह भी सन्दर्भित है कि इस कंपनी में बड़े नेता की भागीदारी है। जितनी भी आउटसोर्सिंग की एजेंसियां हैं आप पता लगा लीजिए उसके पीछे कोई न कोई नेता या नौकरशाह खड़ा मिलेगा। ये अकूत धन कमाके विदेशों में गाड़ रहे हैं पर जिनको काम पर रखा है उनका खून पीने और माँस भूनकर खाने के अलावा जितना शोषित कर सकते हैं कर रहे हैं।
श्रम विभाग को नखदंत विहीन कर दिया गया है। और ये गरीब उच्च न्यायालयों में जाने का सामर्थ्य नहीं रखते इसलिए पिस रहे हैं। निजी सुरक्षा एजेंंसियों का गोरखधंधा और भीषण है। 6 हजार महीने की पगार पर बारह घंटे की ड्यूटी। जिन सरकारी गैर सरकारी विभागों से अनुबंध होता है उससे 15 से 20 हजार महीने में तय होता है लेकिन सुरक्षा गार्ड के हिस्से आता है महज छः हजार। बाँकी मिलबँट के हजम।
गैरबराबरी, शोषण के चक्रव्यूह में हमारी युवाशक्ति फँसी है। राजनीतिक दलों के पास इन्हें छोड़कर दुनिया भर के मुद्दे हैं। मैं इस मामले में ..कबिरा हाय गरीब की..पर विश्वास नहीं करता। मरने के पहले जीते जी विप्लव की उम्मीद करता हूँ। एक तूफान उठना चाहिए युवाओं की ओर से। यह काम नेता मथानियों की जयजयकार करने वाले नहीं कर सकते। ये चिंगारी युवाशक्ति के घर्षण से उठनी चाहिए। बिना रोये बच्चे को भी दूध नहीं मिलता ये तो हमारे हिस्से का छीन और छान के पी रहे हैं। मैं उम्मीद करता हूँ कि मेरी बात भले ही चंद युवाओं तक पहुंचे लेकिन इसे बड़े दायरे तक फैलाना होगा। एक समझ बने तो सामूहिकता भी आएगी, संगठन भी होगा और प्रतिरोध का उद्घोष भी। मैं अपनी उम्मीद पर कायम हूँ। आगे आओं मेरे प्यारो।
एक बार फिर दुष्यंतजी को याद करते हैं-
इन अंधी सुरंगों में बैठे हैं तो लगता है,
बाहर भी अँधेरों की बदशक्ल नकल होगी।
सियाही से इरादों की तस्वीर बनाते हो.
गर खूँ से लिखोगे तो तस्वीर असल होगी।।






गिद्धों की रेडियो टैगिंग के कार्य के लिए पन्ना टाइगर रिजर्व को ही आखिर क्यों चुना गया ? इस सवाल के जवाब में क्षेत्र संचालक उत्तम कुमार शर्मा बताते हैं कि पन्ना में टाइगर रिजर्व में गिद्धों की जितनी प्रजातियां पाई जाती हैं, किसी और टाइगर रिजर्व में उतनी प्रजातियां नहीं मिलती हैं। इसलिए पन्ना का चयन इस प्रयोग के लिए किया गया है। निश्चित ही यह हमारे लिए गौरव और हर्ष विषय है।

ज्ञापन सौपने में प्रमुख रूप से कृष्णपाल सिंह यादव अध्यक्ष संयुक्त मोर्चा, मुरारीलाल थापक संरक्षक मध्य प्रदेश तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ, विनोद मिश्रा महामंत्री भारतीय मजदूर संघ, संतोष मिश्रा अध्यक्ष कर्मचारी कांग्रेस, कमलेश त्रिपाठी महामंत्री शिक्षक कांग्रेस, आर.डी. चौरसिया अध्यक्ष लिपिक वर्गीय संघ, डॉ. आर.के. सोनी, शिव कुमार मिश्रा, राम प्यारे प्रजापति अध्यक्ष अजाक्स, राज किशोर शर्मा, दिनेश मिश्रा, राजेश मिश्रा, महमूद अहमद कुरैशी, मैकूलाल अहिरवार, संतोष प्रजापति, राजेन्द्र सिंह, सूर्य प्रकाश खरे वनरक्षक, नजीम खाॅन, अखिलेश सिंह चौहान, संजय पटेल, बृजेन्द्र पटेल, प्रदीप कुमार गर्ग वनरक्षक, अजय गुप्ता, लखन लाल धूरिया स्थाईकर्मी, भरत लुहरहा, कृष्ण विष्वकर्मा, राकेश बागरी, अजीत खरे, प्रदीप मिश्रा, दिनेश पाण्डेय, गणेश सोनी, सौरभ दुबे, प्रबल प्रताप सिंह, बैकुण्ठराम गर्ग, संतोष तिवारी, हेमराज अग्निहोत्री, धनेष रैकवार, उदय शंकर श्रीवास्तव, राहुल चनपुरिया, सुशील सिंह, हेमेन्द्र शुक्ला, संजय साहू आदि कर्मचारी-अधिकारी शामिल रहे।
कार्यक्रम के दौरान समाज के पिछड़ेपन, नशामुक्ति, दहेजप्रथा और शिक्षा पर जोर देने जैसे विषयों पर चिंतन हुआ।कार्यक्रम में प्रमुख रुप से सीताराम नामदेव, दिनेश नामदेव, पप्पू नामदेव, राजकुमार नामदेव, नत्थू नामदेव, छोटेलाल नामदेव, दीपक नामदेव, अशोक नामदेव, भजन नामदेव, पंकज नामदेव, गणेश नामदेव, राजेंद्र नामदेव, देवप्रकाश नामदेव, जागेश्वर नामदेव, छकोड़ी नामदेव, भगवतदीन नामदेव, अवध नामदेव, राजू नामदेव, सिया नामदेव, क्रोधी नामदेव, इमरतलाल नामदेव, विजय, अमित, आशुतोष, बड्डे, बिरजू नामदेवस बड़ी संख्या में नामदेव समाज के लोग शामिल हुए। कार्यक्रम का सफल मंचसंचालन सियाराम नामदेव ने किया।
टीयूसी अध्यक्ष कॉमरेड टीपी पाण्डेय ने इस अवसर पर जानकारी देते हुए बताया कि 26 नवंबर की आम हड़ताल देश की आजादी के बाद की सबसे महत्वपूर्ण हड़ताल है क्योंकि इस हड़ताल में देश की गरीब जनता, किसानों, बेरोजगारों, महिलाओं, मजदूर व कर्मचारियों की मांगें शामिल है। टीयूसी महासचिव कॉमरेड संजय सिंह तोमर के अनुसार आज का मशाल जुलूस देश के करोड़ों-करोड़ जनमानस की पीड़ा को लेकर है, सरकारों को ये संदेश है, जुल्मी जितना जुल्म करेगा सत्ता के गलियारों से -चप्पा चप्पा गूंज उठेगा इंकलाब के नारों से। इसलिए अभी भी समय है कि देश की बहुतायत जनता के हितों को बचाया जाय, यही चेतावनी है आज का मशाल जुलूस।
टीयूसी के वरिष्ट उपाध्यक्ष एवं बीएसएनएल से कॉमरेड योगेश शर्मा ने जानकारी देते हुए बताया कि 26 नवम्बर की आम हड़ताल के दिन सभी यूनियने सुबह से अपने-अपने कार्यालयों में विरोध प्रदर्शन करेंगीं इसके उपरान्त टीयूसी के नेतृत्व में दोपहर 12 बजे से पुष्करणी पार्क मे एक विशाल जंगी सभा का आयोजन होगा जिसको सभी ट्रेड यूनियनों के पदाधिकारीगण सभा को संबोधित करेंगे।
मंगलवार शाम को निकाले गए मशाल जुलूस में प्रमुख रूप से पेंसनर्स समाज एवं टीयूसी के संरक्षक कॉमरेड हरी प्रकाश गोस्वामी, इंटक प्रादेशिक उपाध्यक्ष शंकर सिंह तिवारी, मनोज कुमार पांडेय, संतोष पांडे, सतना डिवीजन इंश्योरेंस एम्प्लाइज एशोसिएशन सतना के अध्यक्ष कॉम धर्मेंद्र सिंह बघेल, मध्यप्रदेश बैंक एम्पलाइज एसोसिएशन के कॉम राजीव उपाध्याय कॉम मनोज निगम, सीटू के कॉम तेज प्रताप दुबे, प्रिज्म एकता यूनियन अध्यक्ष कॉम गोविंद सिंह, कार्यकारी अध्यक्ष कॉमरेड अनिल द्विवेदी, महासचिव कॉमरेड राजेन्द्र तिवारी, केजेएस एकता यूनियन मैहर अध्यक्ष कॉम मनीष शुक्ला, टीयूसीसी जिला सचिव कॉमरेड सुनील सिंह, एमपीएमएसआरयू सतना यूनिट के सचिव आनंद पांडे, परिवेश खरे, जितेंद्र मिश्रा, आनंद सिंह, रणवीर सिंह, प्रशांत केसरवानी, एटक के कॉम रामसरोज कुशवाहा, अखिल भारतीय पोस्टल संघ के कॉम वीके शुक्ला, मध्यप्रदेश तृतीय वर्ग कर्मचारी संघ के कॉम प्रमेन्द्र गौतम, कॉमरेड भानु प्रताप सिंह, कॉमरेड आरडी द्विवेदी, कॉमरेड विकल्प गौतम एवं कॉमरेड केके शुक्ला शामिल थे।
समर्पित संस्था के प्रमुख अनुराग शर्मा ने रडार न्यूज़ को बताया कि कुछ दिन पूर्व शाम के समय जब मैं किशोर जी मंदिर के सामने से गुजरा तो वहाँ मंदिर के बाहर बैठे गरीब और विकलांग वृद्ध बर्फीली सर्द हवाओं के चलते ठण्ड से ठिठुर रहे थे। ठण्ड से स्वयं का बचाव करने के लिए उनके पास गर्म कपड़े नहीं थे। इनकी गरीबी, वेबशी और मजबूरी देखकर हृदय द्रवित हो उठा। तत्परता से उन्हें राहत प्रदान करने के लिए उपलब्ध गर्म कपड़े मुहैया कराए गए। श्री शर्मा ने बताया कि इसके बाद संस्था के अन्य पदाधिकारियों चर्चा कर ठण्ड में ठिठुरने को विवश अन्य गरीबों की मदद करने के लिए योजना तैयार की गई। उन्होंने बताया कि अब तक नगर के सभी मंदिरों के बाहर बैठने वाले गरीब व्यक्तियों, मानसिक रुप से बीमार लोगों के साथ-साथ आदिवासी बाहुल्य ग्राम मनकी के 174 लोगों को गर्म कोट, कम्बल आदि कपड़े उपलब्ध कराए जा चुके हैं।
इस कार्य में संस्था से जुड़े आदित्य दीक्षित, विकास मिश्रा, रेशू मिश्रा, ऋतिक शुक्ला भोपाली, लव शर्मा, कुश शर्मा, अरुण जड़िया, रेशू खरे, शिवम् शुक्ला पटवारी, पत्रकार सचिन खरे का सराहनीय योगदान रहा। समर्पित संस्था के प्रमुख अनुराग शर्मा ने बताया कि हमारा संकल्प अपने कार्य क्षेत्र के अधिक से अधिक जरुरतमंदों को इस बेरहम ठण्ड से बचाव के लिए गर्म कपड़े वितरित करना है। उन्होंने मानव सेवा के इस कार्य के लिए इच्छुक लोगों से संस्था को सुविधानुसार आर्थिक सहयोग अथवा गर्म कपड़े प्रदान करने के लिए मोबाइल नंबर- 



पन्ना के बस स्टैण्ड परिसर में होटल चलाने वाले संजय समारी ने बताया कि सीसी सड़क के निर्माण कार्य में धांधली होने के कारण सड़क बनने के साथ ही उखड़ने लगी थी। लोकार्पण के पूर्व ही जगह-जगह गिट्टी उखड़ने से सड़क में गड्ढे हो गए थे। नवनिर्मित सड़क के घटिया कार्य के लोकार्पण कार्यक्रम के दौरान सड़क की बदहाली का मामला जिम्मेदार अधिकारियों व जनप्रतिनिधियों के संज्ञान में लाया गया लेकिन उन्होंने इसे नजरअंदाज कर दिया। स्थानीय मीडिया में मामले के तूल पकड़ने के बाद सीसी सड़क की गड़बड़ी को छिपाने के लिए उसके ऊपर रातोंरात डामरीकरण करा दिया गया। संजय कहते हैं, नवनिर्मित सीसी सड़क की गिट्टी अभी तो सिर्फ लोगों की चहलकदमी से ही जगह-जगह उखड़ने लगी थी, कुछ दिन बाद बस स्टैण्ड में जब पुनः यात्री बसों की आवाजाही शुरू होगी तो इस सड़क का क्या हाल होगा इसका सहज अनुमान लगाया जा सकता है। उनके अनुसार सड़क के ऊपर बिछाई गई डामर की पतली परत ज्यादा दिन टिकने वाली नहीं है।
अपने इस कृत्य से मंत्री की छवि को धूमिल करने वाले अफसरों को सीसी सड़क के ऊपर डामरीकरण करने में कुछ भी गलत या आपत्तिजनक नजर नहीं आता। इनका कहना है कि नवनिर्मित सीसी सड़क की पांच साल की गारण्टी है। इस अवधि में सड़क में यदि कोई समस्या आती है तो उसके सुधार या मरम्मत के लिए ठेकेदार कानूनी रूप से जिम्मेदार है। गौरतलब है कि निर्माण कार्य के अनुबंध की शर्तों में शामिल पांच साल की गारण्टी के प्रावधान की जिम्मेदार अधिकारी जिस तरह से बेफिक्र अंदाज में व्याख्या कर रहे हैं वह घटिया निर्माण कार्य को संरक्षण देने जैसा है। तकनीकी जानकार मानते हैं कि निर्माण कार्य की गारण्टी का मतलब यह कदापि नहीं है कि नवनिर्मित सीसी सड़क के लोकार्पण के अगले ही दिन उसके ऊपर डामरीकरण कराना पड़े। गारण्टी का प्रावधान करके क्या ऐसी सड़कों के निर्माण को छूट दे दी गई है जिनकी पूरे समय सिर्फ मरम्मत ही होती रहे। अगर ऐसा हुआ तो वाहनों को चलने के अच्छी सड़क कब और कैसे मिल पाएगी यह प्रश्न विचारणीय है ?
