
* 12 दिन के सत्याग्रह के बाद विस्थापितों ने सर्वसम्मति से लिया निर्णय
* जल सत्याग्रह से चिता आंदोलन तक विरोध, अब प्रशासन के वादों का इम्तिहान
शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) केन-बेतवा लिंक राष्ट्रीय परियोजना सहित बुंदेलखंड अंचल की अन्य सिंचाई परियोजनाओं से प्रभावित आदिवासी-किसानों का 12 दिन से जारी सत्याग्रह आंदोलन प्रशासन के साथ लंबी चर्चा और आश्वासनों के बाद गुरुवार को 10 दिनों के लिए स्थगित कर दिया गया है। हालांकि आंदोलन थमने के साथ ही यह सवाल भी प्रमुखता से उभरकर सामने आया है कि विस्थापितों द्वारा उठाई गई अहम मांगों पर वास्तव में अमल हो पाएगा या नहीं। पन्ना टाइगर रिजर्व के अंदर केन नदी के तट पर ढोड़न बांध निर्माण स्थल पर चले इस आंदोलन में हजारों ग्रामीणों की भागीदारी और लगातार दबाव के चलते प्रशासन को वार्ता के लिए आगे आना पड़ा। आंदोलन के दौरान धारा 163 (पूर्व में धारा 144) लागू रहने के बावजूद लोग डटे रहे और जल सत्याग्रह, मिट्टी सत्याग्रह, चिता आंदोलन, चूल्हा बंद और सांकेतिक फांसी जैसे तरीकों से प्रभावी विरोध दर्ज कराते हुए देश भर का ध्यान अपनी ओर खींचने में सफल रहा।
इन मांगों पर बनी सहमति

सिंचाई परियोजनाओं से प्रभावित आदिवासी-किसानों एवं ग्रामीणों का आंदोलन जय किसान संगठन के बैनर तले चला। गुरुवार 16 अप्रैल की शाम संगठन के मीडिया सेल द्वारा प्रेस विज्ञप्ति जारी कर जानकारी दी गई कि, पन्ना एवं छतरपुर जिले के प्रशासनिक अधिकारियों के साथ लंबी चली बातचीत में कई बिंदुओं पर सहमति बनी है। जिनमें मुख्य रूप से–
डिप्टी कलेक्टर/तहसीलदार स्तर के अधिकारियों द्वारा 7 दिन में पारदर्शी सर्वे पूरा करने का आश्वासन।
गांव के बदले गांव, विशेष पैकेज मुआवजा और कटऑफ डेट जैसे मुद्दों पर सहमति, जिन पर पर चर्चा होगी।
जिला प्रशासन ने पारदर्शी सर्वे सहित स्थानीय स्तर की अन्य मांगों पर तत्काल कार्रवाई शुरू कर दी गई है, जबकि नीतिगत और बड़े फैसलों से जुड़े मुद्दों पर राज्य और केंद्र सरकार के जिम्मेदार अधिकारियों के साथ किसानों के प्रतिनिधिमंडल की बातचीत कराई जाएगी।
प्रशासन को अंतिम अवसर

पूर्व में कई बार आश्वासन देकर प्रशासन के मुकरने के कारण आंदोलनकारियों में अविश्वास बना रहा, इसके बाद तय हुआ कि अगले दिन बैठकर प्रशासन के प्रस्ताव पर सभी से चर्चा की जाएगी। गुरुवार को आंदोलन स्थल पर बड़ी संख्या में सिंचाई परियोजनाओं से विस्थापित हो रहे परिवार एकत्र हुए और सामूहिक चर्चा के बाद यह निर्णय लिया गया कि मांगों के निराकरण पर कार्रवाई करने प्रशासन को अंतिम अवसर दिया जाए। इसलिए सर्वसम्मति से आंदोलन को 10 दिनों के लिए स्थगित कर दिया गया। बता दें कि इस आंदोलन में केन-बेतवा लिंक परियोजना, नैगुवां परियोजना, मझगांय और रुन्ज मध्यम सिंचाई परियोजना प्रभावित परिवारों की सक्रिय भागीदारी रही।
वादे पूरे नहीं हुए तो फिर होगा आंदोलन



आंदोलन के दौरान जिन प्रमुख मांगों पर सहमति जताई गई है, वे सीधे तौर पर नीतिगत निर्णयों से जुड़ी हैं। ऐसे में यह स्पष्ट नहीं है कि भू-अर्जन, मुआवजा, पुर्नव्यवस्थापन और पुनर्वास पैकेज पहले से दिए जाने के बावजूद क्या वास्तव में विशेष पैकेज के रूप में मुआवजा बढ़ाया जाएगा। इसी तरह पन्ना और छतरपुर जिलों में अलग-अलग निर्धारित कटऑफ तिथियों को एक समान 1 अप्रैल 2026 करने का निर्णय लिया जाएगा या नहीं, और यदि लिया भी जाता है तो क्या यह सिर्फ केन-बेतवा लिंक परियोजना तक सीमित रहेगा या मझंगाय, रूंज और नैगुवां जैसी अन्य परियोजनाओं के विस्थापितों पर भी लागू होगा- यह स्थिति अभी स्पष्ट नहीं है। वहीं पुनर्वास पैकेज दिए जाने के बाद “गांव के बदले गांव” की मांग को स्वीकार किया जाएगा या नहीं, इस पर भी संशय बना हुआ है। इन सबके बीच सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या महज 10 दिनों की समयसीमा में इन व्यापक और जटिल मुद्दों पर कोई ठोस निर्णय संभव हो पाएगा, जबकि पूर्व में मिले आश्वासनों पर अमल न होने के कारण ही विस्थापितों को बार-बार आंदोलन का सहारा लेना पड़ा है। अब सबकी नजरें इस बात टिकी हैं कि 10 दिन बाद आंदोलनकारी क्या निर्णय लेते हैं।


