सुप्रीम कोर्ट पहुंची चुनाव से पहले सस्ती बिजली देने और बिल माफ करने की योजना

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सुप्रीम कोर्ट का फोटो।

नियमित बिजली बिल भरने वाले उपभोक्ताओं पर पड़ेगा भार

शिवराज पर आरोप, वोट बैंक को साधने के शुरू की गई सरल बिजली योजना

भोपाल। रडार न्यूज  मध्यप्रदेश में विधानसभा चुनाव से कुछ माह पूर्व राज्य सरकार द्वार 1 जुलाई से लागू की गई सरल बिजली और बिल माफी की बहुप्रचारित योजना विवादों के घेरे में आ गई है। उपभोक्ताओं के हितों के संरक्षण के लिए काम करने वाले कार्यकर्तों का आरोप है कि शिवराज सरकार की इस योजना से बिजली कंपनियों का घाटा बढ़ेगा जिसकी भरपाई नियमित रूप से बिजली बिल भरने वालों को करनी होगी। इससे साफ है कि सरल बिजली योजना से आम लोगों की जेब पर बोझ बढ़ेगा। इन्हीं तथ्यों के आधार पर इस योजना के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका लगाई गई है।

सरल बिजली योजना का पोस्टर।

उल्लेखनीय है कि प्रदेश में आसन्न विधानसभा चुनाव से ठीक पहले गरीबों और असंगठित क्षेत्र के मजदूरों को सिर्फ 200 रुपये महीने पर सस्ती बिजली और पुराने बकाया बिजली बिलों की माफी का तोहफा देने वाली प्रदेश सरकार की यह योजना अब सुप्रीम कोर्ट पहुंच गई है। पूर्व में इस योजना के खिलाफ नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के डॉ. पीजी नाजपाडें द्वारा मध्यप्रदेश हाईकोर्ट में दायर की गई याचिका को खारिज कर दिया गया था। इस संबंध में हाईकोर्ट का कहना था कि यह प्रदेश सरकार और बिजली कंपनियों के बीच का मामला है। इसमें अगर बिजली कंपनी को कोई आपत्ति हो तो वे सामने आयें। नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के डॉ. पीजी नाजपाडें और डॉ. एमए खान ने बताया कि हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में विशेष अनुमति याचिका दायर की गई है। इस पर एक सप्ताह के अंदर सुनवाई होने की संभावना है। इस मामले की पैरवी अधिवक्ता अक्षत श्रीवास्तव करेंगे।

नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच का आरोप है कि आने वाले विधानसभा चुनावों से ठीक पहले शिवराज सरकार ने चुनावी लाभ के उद्देश्य से कमजोर तबकों के वोट बैंक को साधने के लिए यह योजना शुरू की है। इनके अनुसार बकाया बिजली बिलों की माफी का सरकार का निर्णय मनमाना है। जिससे नियमित रूप से बिजली बिल भरने आम उपभोक्ताओं पर प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से आर्थिक बोझ बढ़ेगा।

5 हजार करोड़ रूपए जमा करने के बाद लागू करें योजना

सांकेतिक फोटो।

प्रदेश में सरल बिजली योजना का अब तक करीब 43 लाख हितग्राहियों को लाभ मिलना शुरू हो गया है। इस योजना के तहत पंजीकृत श्रमिकों को 200 रुपये प्रतिमाह फ्लैट रेट पर बिजली दी जा रही है। इनके बकाया बिजली बिलों को भी माफ़ किया जा रहा है। विधानसभा को देखते हुए लाई गई इस योजना को लेकर यह अंदेशा जताया जा रहा है कि बिजली वितरण कंपनियों के बजट पर प्रभाव पड़ेगा। इसका खामियाजा आम उपभोक्ताओं को भुगतना पड़ेगा, बिजली की दरों में वृद्धि होगी और लोगों का बिजली बिल बढ़ जायेगा। नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच के डॉ. पीजी नाजपाडें और डॉ. एमए खान ने बताया कि सुप्रीम कोर्ट में दाखिल की गई याचिका में यह तर्क दिया गया है कि वर्ष 2003 में भी इसी तरह मुफ्त बिजली देने के खिलाफ हाईकोर्ट की शरण ली गई थी। तब कोर्ट ने तत्कालीन सरकार को 100 करोड़ रुपये चुकाने का आदेश दिया था।

इस फैसले के अनुसार शिवराज सरकार को वर्तमान में बिजली कंपनियों को 5179 करोड़ रूपए जमा करने के बाद ही इस योजना को लागू करना चाहिए। लेकिन हाईकोर्ट ने पिछले दिनों इस संबंध में दायर उनकी याचिका खारिज कर दी। राज्य सरकार के इस फैसले के पीछे चुनावी लाभ लेने की मंशा स्पष्ट है। लिहाजा, हाईकोर्ट को सरकार से इस योजना लागू करने के लिए अग्रिम राशि जमा करानी चाहिए थी। हाईकोर्ट द्वारा याचिका को खारिज करने के बाद नागरिक उपभोक्ता मार्गदर्शक मंच की उम्मीदें सुप्रीम कोर्ट पर टिकीं हैं। इन्हें भरोसा है कि उनकी याचिका दी गई दलीलों से सहमत होते हुए देश की सर्वोच्च अदालत उक्त आदेश को पलटेगी।