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रूंज-बाघिन नदियों से अवैध रेत उत्खनन और ओवरलोड परिवहन खुलेआम जारी
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खनिज विभाग, पुलिस के साथ राजस्व की निगरानी पर भी सवाल, खनिज निरीक्षक का मैदानी स्तर पर अता-पता नहीं
शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) सरकारी धन और विदेशी वित्तीय संस्थाओं की सहायता से ग्रामीणों को बारहमासी आवागमन की सुविधा देने के लिए बनाई गई सीमावर्ती गांवों की संपर्क सड़कें अब रेत के अवैध कारोबार की कीमत चुका रही हैं। रूंज और बाघिन नदियों से रेत के उत्खनन और परिवहन में लगे भारी वाहन इन सड़कों को लगातार तबाह कर रहे हैं। देवलपुर से मौकछ चौकी और कालिंजर रोड से देवलपुर तक के मार्गों पर डामर उखड़ चुका है और जगह-जगह गहरे गड्ढे बन गए हैं। ग्रामीणों का आरोप है कि यह सब संबंधित विभागों की कथित मूक सहमति और प्रभावी कार्रवाई के अभाव में खुलेआम जारी है। विडंबना यह है कि एक ओर शासन की लाखों रुपये की सार्वजनिक संपत्ति नष्ट हो रही है, दूसरी ओर रेत चोरी से सरकारी राजस्व को भी प्रतिदिन नुकसान पहुंच रहा है। जीवनदायिनी नदियों के अस्तित्व पर मंडराता खतरा इस पूरे मामले को और गंभीर बनाता है।
तेजी से गड्ढों में तब्दील हो रहीं सड़कें

मध्य प्रदेश ग्रामीण संपर्कता कार्यक्रम के तहत विश्व बैंक और एआईबी (एशियन इन्फ्रास्ट्रक्चर इन्वेस्टमेंट बैंक) की सहायता से इन दोनों संपर्क मार्गों का निर्माण कराया गया था। कालिंजर रोड से देवलपुर तक तीन किलोमीटर सड़क पर 65.71 लाख रुपये और देवलपुर से मौकछ चौकी तक लगभग तीन किलोमीटर सड़क पर 67.84 लाख रुपये खर्च किए गए। दोनों सड़कों का निर्माण 20 जनवरी 2020 को शुरू होकर 19 जनवरी 2021 को पूरा हुआ था।
इन मार्गों का निर्माण मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत ग्रेवल सड़कों के डामरीकरण के रूप में कराया गया था। करीब 1.33 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इन सड़कों ने सीमावर्ती गांवों के ग्रामीणों को आवागमन की बड़ी सुविधा दी थी। लेकिन निर्माण के कुछ वर्षों बाद ही इनकी हालत बदतर हो गई। ग्रामीणों का कहना है कि रेत से लदे ट्रक, डंपर और हाइवा लगातार इन मार्गों से गुजरते हैं। क्षमता से अधिक भार वाले वाहनों के दबाव ने सड़कों की संरचना को नुकसान पहुंचाया है। अब सवाल है कि सार्वजनिक धन से निर्मित इन सड़कों की सुरक्षा के प्रति जिम्मेदार विभागों ने समय रहते कदम क्यों नहीं उठाए?
रेत की लूट के आरोप, तीन विभागों की निगरानी व्यवस्था कठघरे में

पन्ना जिले के अंतिम छोर पर स्थित देवलपुर और मौकछ चौकी उत्तर प्रदेश के बांदा जिले की सीमा से लगे हुए हैं। यह क्षेत्र नरदहा पुलिस चौकी और धरमपुर थाना क्षेत्र के अंतर्गत आता है। ग्रामीणों के अनुसार, रूंज और बाघिन नदियों से लंबे समय से बड़े पैमाने पर रेत का उत्खनन और परिवहन हो रहा है। आरोप है कि बिना वैध ईटीपी (पिटपास) और क्षमता से अधिक भार लेकर वाहन बेधड़क सड़कों पर दौड़ रहे हैं।
इस पूरे मामले में खनिज विभाग की भूमिका सबसे महत्वपूर्ण है, क्योंकि अवैध खनन और खनिज परिवहन पर निगरानी तथा नियमानुसार कार्रवाई की प्राथमिक जिम्मेदारी उसी की है। इसके बावजूद क्षेत्र में खनिज विभाग के मैदानी अमले, विशेषकर खनिज निरीक्षक की सक्रियता दिखाई नहीं देने की शिकायतें सामने आ रही हैं। यदि नदियों से अवैध उत्खनन और बिना वैध दस्तावेजों के परिवहन लंबे समय से चल रहा है तो विभागीय निगरानी व्यवस्था आखिर कहां है? क्या नियमित निरीक्षण हो रहे हैं? कितने वाहन पकड़े गए और कितने प्रकरण दर्ज किए गए? इन सवालों का जवाब विभाग को देना चाहिए।
पुलिस की जिम्मेदारी भी केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं है। अवैध परिवहन में लगे वाहनों की आवाजाही पर प्रभावी निगरानी और संबंधित विभागों के साथ समन्वय जरूरी है। वहीं राजस्व अमले की जिम्मेदारी क्षेत्र में भूमि और उत्खनन संबंधी गतिविधियों की निगरानी से जुड़ी है। ग्रामीणों का आरोप है कि पुलिस, राजस्व और खनिज विभाग के जिम्मेदारों की कथित मूक सहमति के चलते रेत का कारोबार बेरोकटोक चल रहा है। कुछ ग्रामीणों ने स्थानीय अमले पर रेत कारोबारियों से नियमित आर्थिक लाभ लेने के गंभीर आरोप भी लगाए हैं। हालांकि, इन आरोपों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है।
शासन को दोहरी चोट, नदियों के पर्यावरण पर भी संकट
अवैध रेत कारोबार का नुकसान केवल सड़कों की बर्बादी तक सीमित नहीं है। इसका पहला नुकसान सरकारी खजाने को हो रहा है। बिना वैध रॉयल्टी और ईटीपी के रेत निकासी से शासन को मिलने वाले राजस्व की हानि होती है। दूसरा नुकसान उन सड़कों के रूप में सामने आ रहा है, जिनके निर्माण पर सार्वजनिक धन और विदेशी वित्तीय संस्थाओं से प्राप्त सहायता खर्च हुई। इनकी मरम्मत के लिए भविष्य में फिर सरकारी धन लगाना पड़ेगा। तीसरा और अधिक दूरगामी नुकसान रूंज और बाघिन जैसी क्षेत्र की नदियों के पारिस्थितिकी तंत्र को हो सकता है। अनियंत्रित और अवैध रेत उत्खनन से नदी तल, जल प्रवाह, भूजल पुनर्भरण और जलीय जीवों के प्राकृतिक आवास प्रभावित होने की आशंका रहती है। इसका असर खेती, पेयजल और स्थानीय ग्रामीणों की आजीविका पर भी पड़ सकता है। इस लिहाज से यह केवल खनिज चोरी का मामला नहीं, बल्कि प्राकृतिक संसाधनों और सार्वजनिक संपत्ति की सुरक्षा से जुड़ा गंभीर प्रश्न है।
एसडीएम बोले- जानकारी में नहीं था मामला, जांच कराएंगे
इस संबंध में एसडीएम अजयगढ़ आलोक मार्को का कहना है, “सीमावर्ती गांवों में अवैध रेत खनन तथा परिवहन का मामला मेरी जानकारी में नहीं था। आप फोटो और वीडियो भेजिए, हम जांच कराएंगे। मैदानी अमला क्या कर रहा है, इस पर मैं अभी कुछ नहीं कह सकता। जांच के उपरांत ही बता पाऊंगा।” एसडीएम के इस कथन से भी स्थानीय स्तर पर निगरानी और सूचना तंत्र की स्थिति पर सवाल खड़े होते हैं। जब ग्रामीण लंबे समय से भारी वाहनों की आवाजाही और सड़कों की बर्बादी की शिकायत कर रहे हैं, तब प्रशासन तक इसकी जानकारी नहीं पहुंचना अपने आप में जांच का विषय है।
अब कार्रवाई और जवाबदेही तय करने की जरूरत



इन मार्गों का निर्माण मुख्यमंत्री ग्राम सड़क योजना के तहत ग्रेवल सड़कों के डामरीकरण के रूप में कराया गया था। करीब 1.33 करोड़ रुपये की लागत से तैयार इन सड़कों ने सीमावर्ती गांवों के ग्रामीणों को आवागमन की बड़ी सुविधा दी थी। लेकिन निर्माण के कुछ वर्षों बाद ही इनकी हालत बदतर हो गई। ग्रामीणों का कहना है कि रेत से लदे ट्रक, डंपर और हाइवा लगातार इन मार्गों से गुजरते हैं। क्षमता से अधिक भार वाले वाहनों के दबाव ने सड़कों की संरचना को नुकसान पहुंचाया है। अब सवाल है कि सार्वजनिक धन से निर्मित इन सड़कों की सुरक्षा के प्रति जिम्मेदार विभागों ने समय रहते कदम क्यों नहीं उठाए?


