केन-बेतवा लिंक परियोजना प्रभावित आदिवासी और ग्रामीणों का ढोड़न बांध स्थल पर केन नदी में अपनी चिता पर लेटकर आंदोलन-प्रदर्शन आठवें दिन भी जारी रहा।
* केन-बेतवा लिंक परियोजना विस्थापितों के “चिता आंदोलन” 8वां दिन
* भूख हड़ताल से उग्र हुआ आंदोलन, हजारों घरों में नहीं जला चूल्हा
* धारा 163 की सख्ती के बीच नदी में उतरे ग्रामीण, महिलाएं-बच्चे भी मोर्चे पर
शादिक खान, पन्ना/छतरपुर।(www.radarnews.in) बुंदेलखंड अंचल की जीवनदायनी केन नदी इन दिनों एक ऐसे ऐतिहासिक सत्याग्रह की साक्षी बन गई है, जिसने मानवीय संवेदनाओं को झकझोर कर रख दिया है। केन-बेतवा लिंक परियोजना से विस्थापित हो रहे पन्ना और छतरपुर जिले के 18 गांवों के हजारों आदिवासी और ग्रामीण नदी की लहरों के बीच लकड़ियों से बनी प्रतीकात्मक चिताओं पर लेटकर जलसमाधि लेने के संकल्प के साथ आंदोलन कर रहे हैं। उनकी आवाज साफ है- “हमें न्याय दो या फिर मौत दो।” आंदोलन के आठवें दिन रविववार को यह संघर्ष अपने चरम पर पहुंच गया, जब हजारों परिवारों ने सामूहिक भूख हड़ताल करते हुए अपने घरों में चूल्हा तक नहीं जलाया। बच्चों से लेकर बुजुर्गों तक ने अन्न त्यागकर यह संदेश देने की कोशिश की कि वे सिर्फ मुआवजा नहीं, बल्कि सम्मानजनक पुनर्वास के तहत गांव के बदले गांव चाहते हैं।
निर्माणाधीन ढोड़न बांध स्थल पर चल रहे विस्थापितों के आंदोलन के तेज होने के साथ ही इसे दबाने के लिए सरकारी मशीनरी सक्रिय हो चुकी है। छतरपुर जिला मजिस्ट्रेट की ओर से क्षेत्र में धारा 163 लागू कर सख्ती बढ़ा दी गई है। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर के विरुद्ध पन्ना टाइगर रिजर्व द्वारा वन अपराध दर्ज कर लिया गया है। आंदोलन स्थल पर भीड़ को पहुंचने से रोकने के लिए पन्ना टाइगर रिजर्व के भुसौर गेट की नाकेबंदी कर बाहर से आने वालों के प्रवेश को रोक लगा दी है। आंदोलन स्थल तक राशन-पानी व चिकित्सा सुविधा पहुंचने में बाधाओं के आरोपों के बीच यह संघर्ष अब मानवीय संकट का रूप लेता जा रहा है।
दर्द और विरोध का चरम
केन नदी का यह दृश्य किसी भी संवेदनशील व्यक्ति को भीतर तक विचलित कर देता है। नदी के बीचों-बीच सजी चिताओं पर लेटे ग्रामीण मानो अपने ही अस्तित्व के अंत की प्रतीक्षा कर रहे हों। महिलाएं अपने दुधमुंहे बच्चों को सीने से लगाए, झुलसा देने वाली धूप-गर्मी और भूख-प्यास के बीच डटी हैं। चारों ओर गूंजते नारे- “न्याय दो या मौत दो” इस आंदोलन को सिर्फ विरोध नहीं, बल्कि एक भावनात्मक पुकार बना देते हैं। यह दृश्य साफ कर देता है कि यह लड़ाई अब जमीन से आगे बढ़कर अस्मिता और अस्तित्व की हो चुकी है। उल्लेखनीय है कि देश की पहली नदी जोड़ो परियोजना अंतर्गत केन बेतवा लिंक राष्ट्रीय परियोजना के तहत पन्ना टाइगर रिजर्व के अंदर केन नदी पर ढोड़न बांध का निर्माण किया जा रहा है। छतरपुर जिले की बिजावर तहसील के अंतर्गत आने वाले इस विशाल बांध में छतरपुर के 8 गांव डूब में आ रहे हैं। वहीं परियोजना के तहत डूब से प्रभावित वन भूमि के बदले पन्ना जिले के 10 ग्रामों में भू-अर्जन कर ग्रामीणों को विस्थापित किया जा रहा है।
“हक नहीं, सिर्फ कोरे आश्वासन मिले”
आंदोलन का नेतृत्व कर रहे अमित भटनागर प्रशासन पर लगातार सवाल उठा रहे हैं। उनका कहना है कि पन्ना और छतरपुर जिले में भूमि अधिग्रहण की कानूनी प्रक्रियाओं का सही तरीके से पालन नहीं किया गया और ग्राम सभाओं के दस्तावेजों में भी पारदर्शिता नहीं है। केन बेतवा लिंक राष्ट्रीय परियोजना अंतर्गत बांध निर्माण के लिए और प्रभावित वन भूमि के बदले भूमि अर्जन, पुनर्वासन और पुनर्व्यवस्थापन में उचित प्रतिकर और पारदर्शिता का अधिकार अधिनियम 2013 सही तरीके से लागू नहीं किया गया। दोनों जिलों में 18 वर्ष की आयु पूर्ण करने वाले प्रभावित परिवारों के सदस्यों को साढे़ 12 लाख रूपए का पुनर्वास पैकेज प्रदान करने के लिए अलग-अलग समय-सीमा निर्धारित की गई। इस अन्यायपूर्ण व्यवस्था के चलते विस्थापित हो रहे सैंकड़ों पात्र व्यक्ति व्यक्ति पुनर्वास पैकेज से वंचित हो जाएंगे। अमित का आरोप है प्रशासन विस्थापितों की समस्याओं और मांगों का निराकरण करने के बजाए कोरे आश्वासन दे रहा है। आंदोलनकारियों का आरोप है कि उन्हें उचित पुनर्वास के बजाय सिर्फ अधूरा मुआवजा देकर हटाने की कोशिश की जा रही है। वे स्पष्ट रूप से गांव के बदले गांव की मांग पर अड़े हुए हैं, ताकि उनकी सामाजिक संरचना और जीवनशैली सुरक्षित रह सके। भूख हड़ताल को वे अपनी मजबूरी बताते हैं। उनका कहना है कि जब तक न्याय नहीं मिलेगा, यह संघर्ष और तेज होता जाएगा।
विकास बनाम अस्तित्व की जंग
इस पूरे घटनाक्रम ने एक बार फिर उस बहस को जिंदा कर दिया है, जिसमें विकास और विस्थापन आमने-सामने खड़े नजर आते हैं। सरकार जहां केन-बेतवा लिंक परियोजना को बुंदेलखंड के जल संकट के समाधान के रूप में पेश कर रही है, वहीं स्थानीय आदिवासी-किसान इसे अपने जल, जंगल और जमीन पर हमला मान रहे हैं। प्रशासन का दावा है कि अधिकांश प्रभावितों को मुआवजा दिया जा चुका है और कानून-व्यवस्था बनाए रखना जरूरी है। इसी के तहत धारा 163 लागू कर दी गई है और किसी भी तरह की भीड़ या विरोध पर रोक लगाई गई है। लेकिन दूसरी ओर, आंदोलनकारी इसे दमनात्मक कार्रवाई मानते हुए आरोप लगा रहे हैं कि उनकी आवाज को दबाने के लिए सख्ती की जा रही है। केन नदी की लहरों पर लेटी ये प्रतीकात्मक ‘चिताएं’ आज सिर्फ एक आंदोलन का हिस्सा नहीं, बल्कि उस पीड़ा का प्रतीक बन चुकी हैं, जिसे हजारों लोग अपने भीतर लिए बैठे हैं। एक ओर विकास की बड़ी तस्वीर है, तो दूसरी ओर उजड़ते घरों की हकीकत। ऐसे में सवाल यही उठता है- ‘क्या इन लोगों को उनका हक और सम्मानजनक पुनर्वास मिलेगा, या केन की धार में उनकी यह पुकार यूं ही गूंजती रह जाएगी’?
बेनतीजा रही बातचीत, जारी रहेगा आंदोलन
जय किसान संगठन के बैनर तले चल रहे केन-बेतवा लिंक परियोजना प्रभावितों के आंदोलन ने प्रशासन की नींद उड़ा दी है। सप्ताह भर से जारी ‘चिता आंदोलन’ के बीच आज हजारों परिवारों के घरों में चूल्हा न जलने की खबर के बाद दोपहर में पन्ना से एसडीएम संजय कुमार नागवंशी, अजयगढ़ एसडीएम आलोक मार्को और जल संसाधन विभाग के अधिकारियों ने भारी पुलिस बल के साथ आंदोलन स्थल ढोड़न बांध पहुंचकर आंदोलनकारियों से चर्चा की। पन्ना एसडीएम ने चिताओं पर लेटी महिलाओं से आंदोलन खत्म करने और भूख हड़ताल तोड़ने की अपील की। उन्होंने आश्वासन दिया कि शासन-प्रशासन उनकी समस्याओं को सुनने और निराकरण करने लिए तैयार है। आंदोलन का नेतृत्व कर रहे सामाजिक कार्यकर्ता अमित भटनागर ने अधिकारियों के सामने ग्रामीणों का पक्ष रखते हुए सीधा सवाल किया कि धारा 11, 15, 18 और 19 के तहत विस्थापन की जो वैधानिक प्रक्रिया होनी चाहिए थी, उसे दरकिनार क्यों किया गया? उन्होंने मांग की कि अगर कोई ग्राम सभा हुई है, तो उसके दस्तावेज सार्वजनिक किए जाएं। वहीं ग्रामीणों ने अधिकारियों से कहा कि वे पिछले कई वर्षों से केवल ‘झूठे आश्वासन’ सुन रहे हैं। जब तक जमीन पर ठोस कार्यवाही और पूर्ण न्याय नहीं दिखता, वे बांध स्थल पर ही अपनी जान दे देंगे लेकिन वहां से नहीं हटेंगे। देर शाम तक अधिकारियों और आंदोलनकारियों के बीच बातचीत का कोई ठोस नतीजा नहीं निकल सका। गतिरोध बरकरार रहने से अधिकारी वापस लौट गए।
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