जंगलराज: “एक पेड़ मां के नाम…और हजारों पौधे मवेशियों के नाम!”

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पन्ना जिले के अजयगढ़ कस्बा में स्थित वन परिक्षेत्र अधिकारी अजयगढ़ एवं धरमपुर का कार्यालय भवन। (फाइल फोटो)

*    मवेशियों का चारागाह बने करोड़ों की लागत वाले वन विभाग के प्लांटेशन

*    उत्तर वन मण्डल पन्ना की धरमपुर रेन्ज अंतर्गत बीट कुड़रा एवं मैहावा का मामला

  बड़े पैमाने पर भ्रष्टाचार, सुरक्षा में घोर लापरवाही के कारण बदहाली की भेंट चढ़े वृक्षारोपण

शादिक खान, पन्ना। (www.radarnews.in)  मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में जंगल विभाग जंगलराज का पर्याय बना हुआ है। उत्तर सामान्य वन मण्डल पन्ना अंतर्गत वन तथा वन्यजीवों की सुरक्षा का भार पूरी तरह भगवान भरोसे छोड़कर मैदानी अमले से लेकर बड़े अफसर बजट बंदरबांट के एक सूत्रीय अभियान में जुटे हैं। ज्यादा से ज्यादा नोट छापकर अकूत संपत्ति अर्जित करने की हवश में विभागीय कार्य बेइंतहां भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ रहे हैं। विभाग द्वारा पूर्व में कराए गए तथा वर्तमान में चल रहे वृक्षारोपण कार्य सरकारी धन को ठिकाने लगाने की परियोजना बन चुके हैं। एक ओर जहां केन्द्र की मोदी तथा राज्य की मोहन यादव सरकार “एक पेड़ मां के नाम” अभियान के जरिए लोगों को पर्यावरण की रक्षा के साथ मां के प्रति सम्मान व्यक्त करने के लिए प्रेरित कर रही है, वहीं दूसरी ओर वन विभाग के जिम्मेदार अधिकारी और मैदानी अमला करोड़ों रुपए खर्च कर लगाए गए हजारों पौधों को मवेशियों की खुराक बनने के लिए छोड़ चुके हैं।
उत्तर सामान्य वन मंडल पन्ना के अंतर्गत धरमपुर रेंज के नरदहा सर्किल की कुड़रा और मैहावा बीट में कराए गए वृक्षारोपणों की स्थिति विभागीय भ्रष्टाचार और लापरवाही की पोल खोल रही है। जिन प्लांटेशन पर लाखों रुपए खर्च किए गए, वे आज खुलेआम मवेशियों के चारागाह में तब्दील हो चुके हैं। सुरक्षा, रखरखाव और निगरानी जैसे कार्य कागजों तक सीमित नजर आते हैं, जबकि जमीन पर पौधों के सूखे डंठल और टूटी फेंसिंग ही नजर आती है। वन विभाग के सूत्रों और मौके पर देखी गई स्थिति से स्पष्ट है कि वृक्षारोपण की सुरक्षा और रखरखाव के लिए निर्धारित राशि का बीटगार्ड से लेकर उच्च अधिकारियों की मिलीभगत से बंदरबांट हो रहा है। परिणाम यह है कि उत्तर वन मण्डल पन्ना अंतर्गत हरित आवरण बढ़ने के बजाए मैदानी अमले से लेकर विभागीय अफसरों की तिजोरी में नोटों की हरियाली का वजन तेजी से बढ़ रहा है।

कहां खर्च हो रही रोपण के रखरखाव की राशि

नरदहा सर्किल की बीट मैहावा में करीब 2 वर्ष पूर्व 40 हेक्टेयर में कराया गया वृक्षारोपण मवेशियों की चराई और समुचित देखरेख के आभाव में उजड़े चमन में तब्दील हो गया।
उल्लेखनीय है कि, कार्य आयोजना एवं कैम्पा सहित अन्य मदों से वन क्षेत्रों में कराए जाने वाले वृक्षारोपण की सुरक्षा और समुचित देखरेख हेतु प्रोजेक्ट रिपोर्ट अनुसार 7 से लेकर 10 वर्ष तक राशि का प्रावधान किया जाता है, ताकि जिस उद्देश्य से वृक्षारोपण कराया गया है वह पूरा हो सके। मध्य प्रदेश राज्य वन सेवा के एक रिटायर अधिकारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि, वृक्षारोपण कार्य में सबसे ज्यादा राशि प्रथम वर्ष क्षेत्र तैयारी के कार्यों पर व्यय होती है। पहले साल स्थल सफाई से लेकर गड्ढों की खुदाई, गड्ढों में गोबर की खाद डालना और सुरक्षा जाली तार फेंसिंग अथवा पत्थर की दीवार (सीपीडब्ल्यू) से प्लांटेशन क्षेत्र का घेराव किया जाता है। दूसरे वर्ष में मानसून सीजन पर गड्ढों में पौधे रोपित किए जाते हैं। स्वीकृत प्लांटेशन प्रोजेक्ट अनुसार दूसरे वर्ष से लेकर सात या दस वर्ष तक पौधों के आसपास निंदाई-गुड़ाई के साथ फेंसिंग और आंतरिक मार्ग मरम्मत आदि कार्यों के लिए राशि का प्रावधान रहता है। जबकि सुरक्षा कार्य प्रथम वर्ष से शुरू होकर परियोजना समाप्ति तक जारी रहता है। वृक्षारोपण की सुरक्षा सुनिश्चित करने बकायदा चौकीदार (सुरक्षा श्रमिक) के पारिश्रमिक राशि का प्रावधान किया जाता है। इन तथ्यों को दृष्टिगत रखते धरमपुर रेन्ज के नरदहा सर्किल अंतर्गत बीट कुड़रा एवं मैहावा में कुछ वर्ष पूर्व कराए गए वृक्षारोपण को देखें तो पता चलता है, लाखों पौधे रोपित करने के बाद धरातल पर उनकी सुरक्षा पूरी तरह से नदारत है। जिम्मेदार अफसर भी रोपण की सुरक्षा और बदहाली पर आंखें बंद करके बैठे हैं। फलस्वरूप वृक्षारोपण के रखरखाव सहित अन्य मदों की राशि फर्जी बिल-वाउचर के जरिए साल दर साल डकारी जा रही है।

30 हेक्टेयर वृक्षारोपण का बुरा हाल

वन परिक्षेत्र धरमपुर की बीट कुड़रा अंतर्गत वन कक्ष क्रमांक-पी 53 में वर्ष 2023-24 में कार्य आयोजना क्रियान्वयन अंतर्गत आरडीएफ वृक्षारोपण 30 हेक्टेयर क्षेत्र में कराया गया था। स्वीकृत प्रोजेक्ट रिपोर्ट अनुसार यह वृक्षारोपण वर्तमान में सुरक्षा के साथ रखरखाव की अवधि में है। विगत दिवस कुड़रा के भ्रमण पर पहुंचे पत्रकारों ने पाया कि वृक्षारोपण की सुरक्षा जाली कई जगह से क्षतिग्रस्त थी और कुछ जगह जाली के नीचे गड्ढा बनने से छोटे साइज के मवेशी आसानी से अंदर प्रवेश कर जाते हैं। यहां रोपित पौधों के गड्ढों के आसपास नियमित रूप से निंदाई-गुड़ाई न होने से खरपतवार उग आए हैं। वृक्षारोपण में कई जगह मवेशी चरते हुए नजर आए। फलस्वरूप अधिकांश रोपित पौधे या तो मवेशी चटकर चुके है या फिर उनके अवशेष रुपी सूखे डंठल रोपण की सुरक्षा का सूरत-ए-हाल बयां कर रहे हैं। रोपण में निर्मित मार्ग मरम्मत के आभाव में झाड़ियों और खरपतवार में गुम हो चुके हैं। सुरक्षा जाली फेंसिंग को मजबूती प्रदान करने के लिए तीन कटीले तार लगाने का प्रावधान किया जाता है। लेकिन मौके पर सिर्फ दो कटीले तार नीचे-ऊपर लगे मिले। बीच का तार लगाया ही नहीं गया।

54 हेक्टेयर वृक्षारोपण में टूटे पड़े पोल

बीट कुड़रा के कक्ष क्रमांक-पी- 53 में कैम्पा मद अंतर्गत आरडीएफ वृक्षारोपण वर्ष 2022-23 में 54 हेक्टेयर रकबा में कराया गया था। कुड़रा पहुंच मार्ग के किनारे स्थित इस रोपण की सुरक्षा जाली फेंसिंग के कई सीमेंट पोल टूट चुके हैं। सपोर्ट पोल भी टूटे पड़े हैं। कुछ जगह पोल के स्थान पर बांस बल्ली को लगाया गया। रोपण के पोल टूटने तथा सुरक्षा जाली क्षतिग्रस्त होने के कारण स्थानीय ग्रामीणों के मवेशी बड़े आराम से अंदर घुसकर चरते रहते हैं। पत्रकारों को रोपण के अंदर दो दर्जन से अधिक भैंसें दिनदहाड़े चरते हुए मिलीं। चूंकि भैंसे रोपण के बड़े क्षेत्र में फैली थी और खरपतवार तथा पुराने वृक्षों की आड़ के कारण उन सबको एक फोटो में दिखा पाना संभव नहीं था। फिर भी कुछ भैंस को एक फोटो क्लिक करने की कोशिश की गई, ताकि करोड़ों रुपए खर्च करके कराए गए सुरक्षा की जमीनी सच्चाई को दिखाया जा सके। फेंसिंग की मजबूती के लिए तीन कतार में लगाई जाने वाली कटीली तार की मौके पर सिर्फ दो कतार ही नजर नहीं आ रही है। 2-3 मीटर के अंतराल में लगाए जाने वाले सीमेंट पोल्स भी सभी जगह एक जैसे नजर नहीं आ रहे हैं। इस रोपण में भी अधिकांश पौधों को मवेशी चट कर चुके हैं। जो शेष बचे हैं उनके सूखे डंठल रुपी अवशेष नजर आ रहे हैं। गड्ढों के आसपास खरपतवार की भरमार से प्रतीत होता है कि पौधरोपण के बाद से निंदाई-गुड़ाई का कार्य कागजों तक ही सीमित है।

40 हेक्टेयर पौधारोपण बना उजड़ा चमन

कुड़रा ग्राम के बाहरी क्षेत्र में कराए गए वृक्षारोपण में मौके पर न तो सूचना बोर्ड लगाया गया और ना ही दीवार लेखन के माध्यम से रोपण की जानकारी प्रदर्शित की गई है। मजेदार बात यह है कि, धरमपुर रेंजर वैभव सिंह चंदेल से जब इस रोपण की बुनियादी जानकारी प्राप्त करने के लिए दो-तीन बार संपर्क करने पर उनके द्वारा अति आवश्यक शासकीय कार्य में व्यस्त होने का हवाला देकर जानकारी देने में आनकानी की गई। वन परिक्षेत्र धरमपुर अंतर्गत वन सुरक्षा की अत्यंत ही लचर स्थिति, विभागीय कार्यों में भारी भ्रष्टाचार के मद्देनजर मीडिया को जानकारी देने से बचने रेंजर साहब द्वारा की जाने वाली बहानेबाजी को समझा जा सकता है। उक्त रोपण के संबंध में विभागीय सूत्रों से मिली अपुष्ट जानकारी के अनुसार मैहावा बीट अंतर्गत 40 हेक्टेयर रकबे में मिश्रित रोपण 2 वर्ष पूर्व कराया गया था। स्थानीय नाले और पहाड़ी के किनारे स्थित इस रोपण में दूर-दूर तक फैले तकरीबन आधा सैंकड़ा मवेशी खुलेआम चरते हुए मिले। पत्रकार रोपण की बदहाली, मवेशियों की अवैध चराई को जब अपने कैमरों कैद कर रहे थे तो वहीं नजदीक खड़े वन विभाग के 3-4 सुरक्षा श्रमिक मवेशियों को रोपण से बाहर निकालने के बजाए तमाशबीन की तरह खड़े थे। इस रोपण की सुरक्षा के लिए बनाई गई पत्थरों की खखरी (सुरक्षा दीवार) जगह-जगह ढह चुकी है। महज तीन फिट ऊंची सुरक्षा दीवार मवेशियों को अंदर घुसने से रोक नहीं पा रही है। मौके पर बनाई गई पत्थर की दीवार मानक आकार में नहीं पाई गई। प्लांटेशन के अधिकांश पौधे मवेशी हजम कर चुके, जो कुछ शेष बचे हैं वे सूखे डंठल में तब्दील होकर उजड़े हुए चमन की गवाही दे रहे हैं।

इनका कहना है-

“आपके द्वारा कुड़रा के जंगल में अवैध कटाई होने के संबंध में पूर्व में प्रकाशित खबर में प्रयोग किया गया कत्लेआम शब्द आपत्तिजनक है। क्योंकि कुड़रा जंगल की जांच उड़नदस्ता दल से कराने पर वहां सिर्फ 4 सटकठा पेड़ों के 3-4 माह पुराने ठूंठ पाए गए। सागौन तो बिल्कुल भी नहीं मिला। अभी आपने प्लांटेशन में मवेशियों की अवैध चराई आदि के जो फोटोग्राफ्स भेजे हैं, मैं पहले उनकी जांच करवाऊंगा उसके बाद ही कुछ कहूंगा।”
धीरेन्द्र प्रताप सिंह, डीएफओ, उत्तर सामान्य वन मण्डल पन्ना।
“प्लांटेशन में यदि मवेशी चराई कर रहे हैं तो यह घोर आपत्तिजनक है, आपके द्वारा भेजे गए फोटोग्राफ्स मैंने मुख्य वन संरक्षक वृत छतरपुर को भेजकर कार्रवाई हेतु निर्देशित किया है। प्रधान मुख्य वन संरक्षक एवं वन बल प्रमुख इस समय खजुराहो में हैं, आप उनसे मिलकर स्थानीय मामलों की विस्तृत जानकारी दे सकते हैं।”
मनोज अग्रवाल, पीसीसीएफ, कैम्पा।