शोकसभा तत्पश्चात पत्रकारों की एक महत्वपूर्ण बैठक आयोजित हुई। जिसमें पत्रकारों के खिलाफ बढ़ती हिंसा और इस तरह की घटनाओं पर शासन-प्रशासन की सहजता के सम्बंध गहन विचार-विमर्श हुआ। शाहगढ़ की घटना पर सभी पत्रकारों ने एक स्वर में गहरा आक्रोश व्यक्त करते हुए इसे भारत के पत्रकारिता इतिहास में दर्ज काला अध्याय बताया। और कहा कि जिस दिन पत्रकार नहीं बचेंगे उस दिन देश में लोकतंत्र नहीं बच पाएगा। इस अवसर वरिष्ठ पत्रकार बालकृष्ण शर्मा ने कहा कि पत्रकारों के खिलाफ बढ़ती हिंसा को देखते हुए हमें कहीं अधिक सतर्कता, सजगता और जिम्मेदारी के साथ अपने कर्तव्य का निर्वहन करने की जरूरत है। हमारा यह प्रयास होना चाहिए कि हम कोई ऐसा काम ना करें जिससे पत्रकार और पत्रकारिता बदनाम हो। हम अपनी हदों को जाने और उसके अंदर रहते हुए जन समस्याओं से लेकर शासन-प्रशासन में व्याप्त भ्रष्टाचार, अपराध आदि की खबरें प्रकाशित करें। खबर प्रकाशन से पूर्व तथ्यों की अच्छी तरह पड़ताल करना बेहद जरूरी है और उसमें सभी पक्षों की बात को समाहित करें। खबर प्रकाशित करने में जल्दबाजी न कर तथ्यपरक और विश्वसनीय खबर देना हमारा दायित्व है। कई बार जल्दबाजी में खबरें देने के चक्कर में तथ्यों की आधी-अधूरी पड़ताल पत्रकार और पत्रकारिता दोनों के लिए घातक साबित होती है।