बिना किसी ठोस कारण के महीनेभर से लागू है निषेधाज्ञा
पन्ना। रडार न्यूज शांति का टापू कहलाने वाले पन्ना जिले में क्या अमन-चैन खतरे में है, या फिर यहां हालात बिगड़ने की आशंका है। यह सवाल इसलिए उठ रहा है क्योंकि सम्पूर्ण जिले में पिछले कई दिनों से प्रतिबंधात्मक धारा – 144 लागू है। जिला मजिस्ट्रेट और पुलिस कप्तान के अलावा यह कोई नहीं जानता कि अचानक ऐसी कौन सी मुश्किल आन पड़ी कि सम्पूर्ण जिले में निषेधाज्ञा लागू कर दी गई। जबकि पूर्व में ऐसी कोई घटना भी नहीं हुई, जिसके मंद्देनजर यह फैसला लेने की आवश्यकता पड़ी। कानूनी रूप से देखें तो प्रतिबंधात्मक धारा-144 लगाने का यही ठोस आधार है। पन्ना जिले में किसी तरह की कोई भी गंभीर परिस्थिति नहीं हुई, इसके बाद भी सीआरपीसी की धारा-144 को महीनेभर के लिए लागू किये जाने के निर्णय पर प्रश्न चिन्ह लग रहा है। क्या किसी जिले में महीनेभर तक निषेधाज्ञा (धारा-144) लागू रहने से उस जिले की छवि धूमिल नहीं होती ? अन्य स्थानों पर रहने वाले लोगों के मन में इस फैसले से पन्ना और यहां के लोगों को लेकर नकारात्मक धारणा क्या नहीं बनेगी ? इससे पन्ना के लोगांे की आपसी समझ, व्यवहार, और शांतिपूर्ण सहअस्तित्व की भावना और कानून के प्रति उनके सम्मान को लेकर क्या सवाल नहीं उठेगें ? लेकिन इन सब बातों की परवाह किसे है। सोशल मीडिया पर रातदिन ज्ञान बांटने वाले विद्वान भी बड़ी ही चतुराई के साथ अपने एजेण्डे को आगे बढ़ाने में लगे है। नेतागणों को तो एक-दूसरे को निपटाने की रणनीति बनाने या फिर उज्जवल भविष्य की शुभकानायें देकर कोरी नेतागिरी चमकाने से फुर्सत नहीं है। जनप्रतिनिधि अर्जुन की तरह टिकिट पर निशाना साधे हुए है। इसके अलावा उन्हें कुछ दिखाई और सुनाई नहीं दे रहा है। इन सबके बीच वह आम इंसान है, जोकि दो जून की रोटी के लिए जद्दोजहद करते और भ्रष्ट व्यवस्था में छोटे-छोटे कामों के लिए दर-दर भटक रहा है। उसे इस बात की खबर ही नहीं है, कि सत्ता लोभी सरकारें उस पर नियंत्रण पाने के लिए किस हद तक अलोकतांत्रिक तरीके अपना रही है। धारा-144 को महीनेभर तक सम्पूर्ण जिले में लागू करना इसकी एक बानगी मात्र है। विदित हो कि विशेष परिस्थितियों में हिंसात्मक अथवा विध्वंसक गतिविधियों को रोककर पुनः शांति एवं व्यवस्था स्थापित करने के लिए इस धारा को लागू किया जाता है। जिम्मेदारों को आगे आकर यह स्पष्ट करना चाहिए कि उनके द्वारा पन्ना में धारा-144 लागू करने का निर्णय आखिर किस आधार पर लिया गया है। बिना किसी उचित कारण के प्रतिबंधात्मक धारा लगाकर जिला प्रशासन कहीं नागरिक अधिकारों का अतिक्रमण नहीं कर रहा है, या फिर आम आदमी की स्वतंत्रता को नियंत्रित करने की मंशा से ऐसा किया गया है। इस आशंका यदि जरा भी सच्चाई तो क्या यह तंत्र द्वारा सुनियोजित तरीके से जन के मूलभूत अधिकारों का हनन नहीं है ?
क्या है धारा-144
न्यूज चैनलों और समाचार पत्रों में हम अक्सर ही यह सुनते – पढ़ते रहते है कि प्रशासन ने शांति व्यवस्था कायम रखने के लिए सीआरपीसी की धारा-144 लगा दी है। कहीं भी, किसी भी शहर में हालात बिगड़ने की संभावना या फिर किसी बड़ी घटना के बाद धारा-144 लगाई जाती है। इस धारा को तत्काल प्रभाव से लागू करने के लिए जिला मजिस्ट्रेट यानि जिलाधिकारी एक नोटिफिकेशन जारी करता है। जिस जगह भी यह धारा लगाई जाती है, वहां चार या उससे ज्यादा लोग इकट्ठे नहीं हो सकते। इस धारा के लागू होने के साथ उस स्थान पर हथियार लेकर आने-जाने पर भी रोक लग जाती है।
क्या है सजा का प्रावधान
सीआरपीसी की धारा-144 का उल्लंघन करने पर संबंधित व्यक्ति को पुलिस गिरफतार कर सकती है। उस व्यक्ति पर धारा-107 या धारा 151 के तहत् कार्यवाही की जा सकती है। इस मामले में अभियुक्त को एक साल कैद की सजा भी हो सकती है। वैसे यह जमानती अपराध है इसमें जमानत हो जाती है। निषेधाज्ञा के उल्लंघन में पुलिस सबंधित व्यक्ति को उठाकर किसी अन्य स्थान में भी पहुंचा सकती है और जिस इलाके में निषेधाज्ञा लगी हो, वहां आने नहीं देती है। निषेधाज्ञा के उल्लंघन पर पुलिस कई बार आईपीसी की धारा-188 (सरकारी आदेश का न मानना) के तहत् केश दर्ज करती है। ऐसे मामले में कैद और जुर्माना दोनों का प्रावधान है।
विरोध को दबाने का अस्त्र
पन्ना जिले में जिस तरह से वर्तमान में और पहले धारा-144 को लम्बे समय तक अकारण प्रभावशील रखा गया, उसे कुछ लोग इसके दुरूपयोग के तौर पर देख रहे है। आम आदमी पार्टी नेता पवन जैन का कहना है कि प्रदेश में आसन्न विधानसभा चुनाव को दृष्टिगत हुए विभिन्न कर्मचारी संगठन एवं विपक्षी दल व नागरिक संगठन अपनी मांगों को लेकर जिस तरह आवाज उठा रहे है, उससे प्रदेश सरकार अत्यंत ही भयभीत है। विरोध में उठते इन स्वरों को दबाने के लिए तथा जन असंतोष को किसी भी रूप में प्रदर्शित न होने देने के लिए ही धारा-144 को हथियार के तौर पर इस्तेमाल करने के लिए नागरिकों की स्वतंत्रता और लोकतांत्रितक अधिकारों को बुरी तरह कुचला जा रहा है। सामाजिक कार्यकर्ता एवं आयोग मित्र सुदीप श्रीवास्तव का मानना है कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में लोगों को सरकार के खिलाफ शांतिपूर्ण तरीके से धरना-प्रदर्शन करने का अधिकार है। इन्हें जनभावना की अभिव्यक्ति के तौर पर देखा जाता है, लेकिन भ्रष्ट और निरंकुश सरकारें यह कभी नहीं चाहते की लोग अपना विरोध दर्ज करायें। इसलिए तरह-तरह के हथकण्डे अपनाकर सत्तासीन नागरिकों के अधिकारों को नियंत्रित करते रहते हैं।
किस खतरे का है अंदेशा
बुन्देलखण्ड अंचल के अतिपिछड़े पन्ना जिले के नागरिकों की शांतिप्रियता और सहनशीलता की मिशाल दी जाती है। यहां कभी इस तरह का बबाल नहीं होता है, कि जिससे शांति या कानून व्यवस्था खतरे में पड़ जाये। यहां के लोग इतने आत्मसंतोषी है, कि अपने हितों पर बार-बार कुठाराघात होने के बाद भी आंदोलित नहीं होते। शासन-प्रशासन की घोर उपेक्षा और तमाम समस्याओं से जूझते लोग शिकायत तो करते है, पर सड़कों पर कभी नहीं उतरते। शायद इन्हीं सब खूबियों के चलते पन्ना जिले को शांति का टापू कहा जाता है। महत्वपूर्ण सवाल यह है कि शांति के इस अभूतपूर्व महौल में प्रशासन को यहां किस तरह की घटना का अंदेशा है, जिसकी रोकथाम के लिए सम्पूर्ण जिले में महीनेभर तक धारा 144 लागू की गई है। जिला मजिस्ट्रेट को यह बताना चाहिए कि धारा-144 लगाने की वजह आखिर क्या है। क्योंकि सवाल पन्ना और यहां के लोगों की शांतिप्रिय छवि व नागरिक अधिकारों की स्वतंत्रता से जुड़ा है।
इनका कहना है….
मैंने अभी तक धारा 144 लागू होने वाला आदेश नहीं देखा कि किन कारणों से उक्त आदेश लागू किया गाय है। यद्यपि बिना न्यायोचित कारण के किसी भी तरह का प्रतिबंधक आदेश का लागू रहना असंवैधानिक तथा तर्कसंगत नहीं हैं।
एस. ऋतम खरे, अधिवक्ता, सुप्रीम कोर्ट नई दिल्ली






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