तेल का खेल! पार्ट-1: जल संसाधन संभाग पन्ना में 29 लाख का घोटाला

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कार्यालय कार्यपालन यंत्री जल संसाधन संभाग पन्ना। (फाइल फोटो)

*     कार्यपालन यंत्री पर नियमों की अनदेखी कर व्यक्ति विशेष को लाभ पहुंचाने का आरोप

*      52 माह तक बिना बिल के डीजल का हुआ भुगतान, ईएनसी के निर्देशों की खुली अवहेलना

*     एक ही कार्यालय में वाहनों के लिए डीजल भुगतान में अपनाई जा रही अलग-अलग प्रक्रिया

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) गुणवत्ताहीन निर्माण कार्यों एवं आर्थिक अनियमितता के लिए बदनाम कार्यालय जल संसाधन संभाग पन्ना में बड़ा घोटाला उजागर हुआ है। कार्यपालन यंत्री सतीष शर्मा पर व्यक्ति विशेष को आर्थिक लाभ पहुंचाने के लिए गंभीर वित्तीय अनियमितता करने के आरोप लगे हैं। विभागीय दस्तावेजों से खुलासा हुआ है कि कार्यपालन यंत्री द्वारा अपने स्वयं के उपयोग के लिए लगाए गए वाहन के भुगतान में शासन के स्पष्ट नियमों और प्रमुख अभियंता के निर्देशों की जानबूझकर अनदेखी कर 29.55 लाख रुपए से अधिक राशि का भुगतान किया गया। जबकि कार्यालयीन अनुविभागीय अधिकारियों (एसडीओ) के लिए लगाए गए वाहनों के डीजल भुगतान में अलग प्रक्रिया अपनाई जा रही है। दस्तावेजों की जांच में यह तथ्य सामने आया है कि कार्यपालन यंत्री द्वारा वाहन के प्रत्येक मासिक भुगतान में डीजल देयकों (बिल) को कार्यालय में उपलब्ध नहीं कराया जाता। बिल प्रस्तुत कराए बिना ही वाहन का कुल भुगतान (मासिक किराया+डीजल) निर्धारित लिमिट के आधार पर लगातार वाहन मालिक के खाते में किया जाता रहा है। यह गड़बड़झाला पिछले 52 माह से चल रहा था।

ईएनसी ने दिशा-निर्देशों की अवहेलना

शासकीय कार्य हेतु टैक्सी/वाहन किराए पर लिए जाने के संबंध में कार्यालय प्रमुख अभियंता, जल संसाधन विभाग, भोपाल (म.प्र.) द्वारा पत्र क्र. 333/4/759/भू. अ./2011 भोपाल, दिनांक 09 सितंबर 2011 को विस्तृत दिशा-निर्देश जारी किए गए हैं। इस पत्र में बताया गया है शासकीय वाहन उपलब्ध न होने पर किराए पर वाहन अधीक्षण यंत्री की अनुमति से लगाए जा सकते हैं। जिसमें कार्यपालन यंत्री तथा अनुविभागीय अधिकारी (एसडीओ) के लिए वाहन पर डीजल एवं किराया का कुल मासिक व्यय की अधिकतम लिमिट क्रमशः 630D/550D निर्धारित की गई है। 24 शर्तों वाले पत्र में स्पष्ट किया गया है कि ‘D’ का अर्थ अधीक्षण यंत्री के मुख्यालय पर उपलब्ध न्यूनतम डीजल दर प्रति लीटर टैक्स सहित है। पत्र के बिंदु क्रमांक 2 में स्पष्ट उल्लेख है, प्रमुख अभियंता एवं शासन के आदेशों में कहीं विरोधाभास होने पर शासन के आदेश का पालन किया जाएगा। इसी तरह बिंदु क्रमांक 6 में कहा गया है ‘वाहन का मालिक विभाग के किसी भी प्रथम अथवा द्वितीय श्रेणी अधिकारी का निकट या दूर का रिश्तेदार नहीं होना चाहिए। यदि रिश्तेदार होना पाया जाता है, तो भुगतान किए गए किराए की दुगुनी राशि सिंचाई राजस्व में उस अधिकारी के वेतन से जमा कराई जाएगी साथ ही दंडित भी किया जाएगा।’

52 माह तक लगातार बिना बिल के 29 लाख का भुगतान

कार्यपालन यंत्री सतीष शर्मा ने जल संसाधन संभाग पन्ना में माह अगस्त 2021 को अपनी पदस्थापना के बाद से ही हद दर्जे की मनमानी करते हुए तेल का खेल शुरू कर दिया था। मुख्य अभियंता कार्यालय सागर के एक विश्वसनीय सूत्र से प्राप्त दस्तावेजों को देखने से पता चलता है शर्मा द्वारा अपने स्वयं के लिए लगाए गए वाहन के प्रत्येक मासिक भुगतान में डीजल के बिलों को कार्यालय में उपलब्ध नहीं कराया जाता। डीजल के बिल प्रस्तुत कराए बगैर ही माह सितंबर 2021 से वाहन का कुल भुगतान (वाहन किराया+डीजल) 630D की लिमिट के आधार पर वाहन मालिक के खाते में माह दिसंबर 2025 तक लगातार किया जाता रहा है। कार्यपालन यंत्री द्वारा अपने लिए लगाए गए वाहन के मासिक भुगतान में प्रमुख अभियंता के निर्देशों की खुली अवहेलना की गई। डीजल के बिल कार्यालय में उपलब्ध कराए बगैर ही 52 माह का कुल भुगतान (वाहन किराया+डीजल) रुपए 29,55,996/- किसी व्यक्ति विशेष (वाहन मालिक) के खाते में किया गया। जबकि नियमानुसार वाहन के डीजल के बिल कार्यालय में उपलब्ध कराए जाने के बाद संबंधित पेट्रोल पम्प मालिक को इसका भुगतान किया जाना चाहिए था। कार्यपालन यंत्री की इस मेहरबानी के मद्देनजर वाहन मालिक उनका नजदीकी या दूर का रिश्तेदार होने की संभावना जताई जा रही है। बता दें कि, शर्मा साहब की ससुराल ग्वालियर क्षेत्र में है, पन्ना में उनकी पदस्थी के बाद से ही जिले के जल संसाधन विभाग में ग्वालियर-चंबल अंचल के ठेकेदारों का दखल लगातार बढ़ता जा रहा है।

भुगतान की अलग-अलग प्रक्रिया पर सवाल

जल संसाधन संभाग पन्ना में किराए पर लगाए गए वाहनों के भुगतान में नियम विरुद्ध अलग-अलग प्रक्रिया अपनाए जाने पर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। कार्यपालन यंत्री द्वारा स्वयं को नियम-निर्देशों से ऊपर रखते हुए अपने लिए लगाए गए वाहन के डीजल बिल कार्यालय में उपलब्ध कराए बिना ही 52 माह का कुल भुगतान (वाहन किराया+डीजल) रुपए 29,55,996/- किसी व्यक्ति विशेष के खाते में लगातार किया जाता रहा है। वहीं कार्यालयीन अनुविभागीय अधिकारियों (एसडीओ) के लिए लगाए गए वाहनों का किराया रुपए 26,950/- प्रतिमाह तथा मासिक डीजल का भुगतान क्रमशः वाहन मालिक और डीजल के बिल कार्यालय में उपलब्ध कराए जाने के उपरांत संबंधित पेट्रोल पम्प मालिक के खाते में किया जा रहा है। अर्थात एक ही कार्यालय में वाहनों के डीजल की भुगतान की अलग-अलग प्रक्रिया अपनाए जाने से नियम-निर्देशों का मजाक उड़ रहा है। कार्यपालन यंत्री द्वारा वाहन मालिक को मासिक किराया के साथ वाहन के डीजल का नियम विरुद्ध भुगतान करके व्यक्ति विशेष (वाहन मालिक) को सीधे तौर पर आर्थिक लाभ पहुंचाया गया। उनका यह कृत्य अनियमित भुगतान के साथ शासकीय निधि के दुरूपयोग की श्रेणी में आता है।

भ्रष्टाचार को नजरअंदाज कर रहे शीर्ष अधिकारी

गंभीर वित्तीय अनियमितता के इस मामले की सबसे ज्यादा हैरान करने वाली बात यह है कि, कार्यपालन यंत्री की कारगुजारी का कच्चा चिट्ठा सप्रमाण जनवरी 2026 में प्रमुख अभियंता भोपाल तथा मुख्य अभियंता सागर को भेजा गया था, लेकिन शीर्ष अधिकारियों ने लाखों रुपए के नियम विरुद्ध भुगतान पर अब तक कोई एक्शन नहीं लिया। शीर्ष अफसरों द्वारा जानबूझकर की जा रही इस अनदेखी से न सिर्फ उनकी भूमिका पर सवाल उठ रहे हैं बल्कि इससे जल संसाधन विभाग में भ्रष्टाचार को बढ़ावा मिल रहा है। उल्लेखनीय है कि, डीजल के अनियमित भुगतान से जुड़े आरोपों पर जल संसाधन संभाग पन्ना के कार्यपालन यंत्री सतीष शर्मा का पक्ष जानने के लिए संपर्क करने पर उनका मोबाइल फोन रिसीव नहीं हुआ। श्री शर्मा ने 4 दिन पूर्व टेक्स्ट मैसेज भेजकर रडार न्यूज़ को बताया था कि शासकीय कार्य और न्यायालीन प्रकरण के सिलसिले में राजधानी भोपाल आया हूं। आपसे फ्री होकर बात करूंगा, लेकिन इसके बाद समाचार लिखे जाने तक न तो उनका फोन आया और ना ही कोई मैसेज आया है।