
* घटिया निर्माण छुपाने मरम्मत की लीपापोती, फंसने के डर में भुगतान से पहले अफसरों की चाल
* मशीनों से कराया निर्माण, मजदूरों के नाम पर फर्जी भुगतान की तैयारी
शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) केन्द्र सरकार की महत्वाकांक्षी अटल भूजल योजना मध्य प्रदेश के पन्ना जिले में भ्रष्टाचार और लापरवाही की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। उत्तर वन मण्डल के तहत अजयगढ़ और धरमपुर वन परिक्षेत्र में लाखों रुपए की लागत से बनाए गए लगभग दो दर्जन नवीन तालाब आज अपनी बदहाली से खुद ही “घटिया निर्माण” की कहानी बयां कर रहे हैं। हालात यह हैं कि जिन तालाबों का उद्देश्य जल संरक्षण और भूजल स्तर सुधारना था, वे गर्मी शुरू होते ही सूखे मैदान में तब्दील हो चुके हैं। वर्तमान में करीब 70 फीसदी तालाब पूरी तरह सूख चुके हैं। गर्मी के मौसम में जब पानी की सबसे ज्यादा जरूरत है, तब इनमें एक बूंद पानी तक नहीं होना करोड़ों की योजना की उपयोगिता पर गंभीर सवाल खड़े करता है। ग्रामीणों और वन्यप्राणियों की प्यास बुझाने के लिए बनाए गए ये तालाब अब सिर्फ कागजी उपलब्धि बनकर रह गए हैं।
मशीनों से काम कराया, मजदूरों के नाम प्रमाणक बनाए

सूत्रों के मुताबिक, अटल भूजल तालाब निर्माण का लगभग शत-प्रतिशत कार्य ठेके पर मशीनों से कराया गया, लेकिन कागजों में मजदूरों के नाम पर फर्जी बिल-बाउचर तैयार किए गए। स्वीकृत राशि का बड़ा हिस्सा निर्माण पर खर्च ही नहीं किया गया, जिससे तालाबों की गुणवत्ता बेहद खराब रही। वनरक्षक से लेकर तत्कालीन डीएफओ तक की मिलीभगत के आरोप चर्चा में हैं। इनकी गुणवत्ता का अंदाजा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि 3 तालाब कुछ माह पूर्व पहली ही बारिश में फूट गए। उस समय तत्कालीन डीएफओ गर्वित गंगवार ने इन्हें “निर्माणाधीन” बताकर मामला दबाने की कोशिश की, जबकि हकीकत में काम पूरा हो चुका था और भुगतान के लिए प्रमाणक भेजे जा चुके थे। हर तालाब पर 14 लाख से 25 लाख रुपए तक खर्च दिखाया गया, लेकिन धरातल पर इनका निर्माण ठेके पर महज 5 से 8 लाख में कराया गया। अधिकांश जलाशय जनवरी महीने में ही सूख गए। गुणवत्ताहीन निर्माण, तकनीकी खामियां, गलत स्थल चयन और भारी लीकेज-सीपेज के कारण पानी ठहर ही नहीं पाया।
भुगतान से पहले मरम्मत की लीपापोती

सबसे चौंकाने वाला पहलू यह है कि तालाब इतने घटिया बने हैं कि उनका भुगतान करने से पहले ही विभाग को फंसने का डर सताने लगा है। इसी डर के चलते महीने भर से नव निर्मित तालाबों की मरम्मत के नाम पर लीपापोती कराई जा रही है, ताकि ऊपर से देखने पर काम ठीक-ठाक नजर आए और भुगतान में कोई बाधा न हो। उत्तर वन मण्डल कार्यालय में पिछले चार माह से करोड़ों रुपए के प्रमाणक लंबित हैं। अब चालू वित्तीय वर्ष 2025-26 समाप्त होने से पहले यानी अगले चार दिनों में इनका भुगतान करने की पूरी तैयारी कर ली गई है।
जांच टीम बनी, लेकिन मंशा पर सवाल

अत्यंत ही घटिया निर्माण का मुद्दा गर्माने पर डीएफओ धीरेन्द्र प्रताप सिंह ने संयुक्त जांच टीम गठित की है, जिसमें उप वनमण्डलाधिकारी विश्रामगंज अंशुल तिवारी (IFS) के साथ ग्रामीण यांत्रिकी सेवा (RES) के तकनीकी विशेषज्ञ शामिल हैं। टीम निरीक्षण भी कर चुकी है, लेकिन सवाल यह है कि क्या यह जांच निष्पक्ष होगी या सिर्फ लाखों के भुगतान को “सुरक्षित” बनाने का जरिया है? सूत्र बताते हैं कि कुछ लोगों द्वारा आरटीआई के जरिए जानकारी निकाली गई और स्थानीय स्तर पर अटल भूजल तालाबों की शिकायतें भी हुईं। यही कारण है कि अधिकारियों ने बैचेनी और डर के चलते सीधे भुगतान करने के बजाय पहले कागजी सुरक्षा कवच तैयार किया, ताकि भविष्य में कार्रवाई से बचा जा सके।

जैसी कि संभावना है, भुगतान के बाद उच्च स्तरीय शिकायत हो सकती है। उस स्थित में अपनी गर्दन सुरक्षित रखने के लिए ही वन विभाग के अफसरों ने संयुक्त जांच टीम गठित करने की तरकीब निकाली है। ताकि सवाल उठने पर इसे ढाल के रूप में उपयोग कर बताया जा सके कि, तकनीकी विशेषज्ञों वाली टीम की रिपोर्ट के आधार पर तालाब निर्माण कार्यों के प्रमाणकों का भुगतान किया गया।
योजना का उद्देश्य ध्वस्त, जवाबदेही तय होना बाकी





