
उत्तर वन मण्डल पन्ना के परिक्षेत्र धरमपुर अंतर्गत सीमवर्ती जंगल का मामला
* सागौन के ताज़ा ठूंठ बने सबूत, वन अमले की भूमिका पर उठे गंभीर सवाल
* ईमानदारी से जंगल सुरक्षा न कर वन अपराधों पर पर्दा डालने में जुटा मैदानी अमला
शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) मध्यप्रदेश के पन्ना जिले में दोनों सामान्य वन मण्डलों उत्तर-दक्षिण से इन दिनों जिस तरह की खबरें बाहर आ रही हैं वे अत्यंत चिंताजनक होने के साथ स्थिति के पूरी तरह से असमान्य होने का संकेत दे रहीं है। वानिकी एवं निर्माण कार्यों से नोट छापने के चक्कर में वन विभाग का मैदानी अमला जंगल और जानवरों की सुरक्षा से मुंह मोड़ चुका है। दक्षिण वन मण्डल के परिक्षेत्र कल्दा अंतर्गत पौधरोपण कार्य के लिए वन क्षेत्र में कथित तौर पर ब्लास्टिंग कराए जाने, जेसीबी मशीन से खुदाई करवाकर पत्थर निकालने और पौधारोपण कार्य करने वाले मेहनतकश मजदूरों की खून-पसीने की कमाई (मजदूरी) हड़पते हुए उनका शोषण करने की खबर सुर्ख़ियों में बनी है। वहीं उत्तर सामान्य वन मण्डल पन्ना की बात करें तो पड़ोसी राज्य उत्तर प्रदेश की सीमा से सटे जंगलों में अवैध कटाई की गतिविधियां जारी होने के गंभीर संकेत मिले हैं। वन परिक्षेत्र धरमपुर अंतर्गत अंतर्गत सर्किल नरदहा की बीट कुड़रा और मैहावा के सीमावर्ती जंगलों में की अवैध कटाई बेरोकटोक चल रही है।



वन अपराध की दृष्टि से अत्यंत ही संवेदनशील कुड़रा के जंगल में अवैध कटाई सहित अन्य गतिविधियों के प्रमाण मिलने से वन विभाग की नियमित गश्त और कड़ी निगरानी के दावे पर कई गंभीर सवाल उठ रहे हैं। मसलन, कुड़रा ग्राम में जहां दो वन रक्षकों के आवास स्थित हैं और लगभग दर्जनभर श्रमिक जंगल की सुरक्षा के नाम पर तैनात हैं वहां वृक्षों की कटाई बिना जानकारी के कैसे संभव हो रही है? क्या विभाग को वाकई इसकी भनक नहीं लगी या फिर जानबूझकर अवैध कटाई की अनदेखी की जा रही है? जानकारों का मानना है, कुड़रा-मैहवा बीट के जंगल की जटिल भौगोलिक स्थिति, कुड़रा एवं धरमपुर में वन अमले की पर्याप्त संख्या में मौजूदगी के मद्देनजर इनकी सहमति अथवा संलिप्तता के बगैर किसी तरह की अवैध गतिविधि संभव ही नहीं है।
वन परिक्षेत्र धरमपुर अंतर्गत विभगीय कार्यों की जमीनी हकीकत जानने पहुंचे पत्रकारों को वन अमले के असहयोग का सामना करना पड़ा। पहले तो वन अमले ने मौके तक ले जाने में अनिच्छा दिखाई गई। पत्रकारों ने जब स्थानीय ग्रामीण बब्बू लोध की मदद ली तो उसे सुरक्षा श्रमिकों के द्वारा चेतावनी दी गई। वृद्ध बब्बू को धमकाते हुए एक सुरक्षा श्रमिक बोला यदि वह पत्रकारों को जंगल के भीतर लेकर गया या विभागीय कार्यों से जुड़ी खबरें कवर करवाईं, तो परिणाम अच्छे नहीं होंगे। सुरक्षा श्रमिकों का यह रवैया कई संदेह खड़े करता है। सवाल यह है कि, यदि सब कुछ पारदर्शी है, तो पत्रकारों को रोकने और स्थानीय व्यक्ति पर दबाव बनाने की जरूरत क्यों पड़ी? क्या यह सब व्यक्तिगत स्तर पर हुआ या फिर किसी वरिष्ठ अधिकारी के निर्देश पर पत्रकारों के भ्रमण को बाधित करने की कोशिश की गई। इसका जबाव तो सुरक्षा श्रमिक, संबंधित सर्किल प्रभारी और परिक्षेत्राधिकारी धरमपुर ही दे सकते हैं। लेकिन इस घटनाक्रम से एक बात पूरी तरह से स्पष्ट है, मैदानी वन अमला अगर निष्ठापूर्वक और ईमानदारी से अपने दायित्वों का निर्वाहन कर रहा होता तो उन्हें पत्रकारों के भ्रमण को रोकने के लिए घटिया हथकंडे आजमाने की जरुरत न पड़ती।
उल्लेखनीय है कि चार दिन पूर्व पत्रकार जब पहली बार कुड़रा जंगल के भ्रमण पहुंचे थे तो धरमपुर रेंजर वैभव सिंह चंदेल ने मैहावा बीट में टाइगर और तेंदुए के मूवमेंट का हवाला देकर पत्रकारों को वहां जाने से रोका था। उन्होंने सुझाव दिया था कि, खतरे को देखते हुए आपको वन अमले को साथ लेकर जाना चाहिए। लेकिन अभी कोई साथ नहीं जा सकता, आप लोग अगली बार जब आएं तो किसी को बोल दूंगा। शनिवार को पुनः कुड़रा पहुंचने से पूर्व रेंजर श्री चंदेल को सूचित किया तो उन्होंने स्टॉफ के गिद्ध गणना में व्यस्त होने का हवाला देकर हाथ खड़े कर दिए। वन अमले की असहजता-असहयोग से उपजीं तमाम शंकाओं के बीच पत्रकारों को भ्रमण के दौरान उसी क्षेत्र में कई चरवाहे भैंस चराते मिले। चरवाहों ने जंगल में टाइगर या लेपर्ड के विचरण को कोरी अफवाह बताया। चरवाहों ने बताया बाहरी लोगों को जंगल में आने से रोकने के लिए टाइगर-तेंदुए की मौजूदगी का भय फैलाया जाता है। यदि विभाग का दावा सही भी माना जाए, तो यह और गंभीर प्रश्न खड़ा करता है,जिस जंगल में टाइगर और तेंदुआ जैसे वन्यजीव मौजूद हों, वहां दिनदहाड़े सागौन की अवैध कटाई कैसे हो रही है? नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर ग्रामीणों ने बताया कि कुड़रा जंगल में अवैध कटाई के साथ अवैध खनन और बेजुबान वन्यजीवों का शिकार भी जारी है। यदि यह सही है, तो यह वन संपदा और वन्यजीवों दोनों के लिए गंभीर खतरा है।

