मध्यप्रदेश के इस जिले में मजदूरों के नाम पर सबसे बड़ा भ्रष्टाचार!

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उत्तर वन मंडल के वन परिक्षेत्र अजयगढ़ अंतर्गत पौधारोपण के लिए मजदूरों के नाम पर ट्रैक्टरों से गड्ढों की खुदाई कराई गई।

*     पौधारोपण के लिए ट्रैक्टर लगाकर खुदवाए करोड़ों गड्ढे, मजदूरों के नाम पर बनाए प्रमाणक

*     उत्तर वन मण्डल पन्ना में व्याप्त भ्रष्टाचार की लगातार खुल रही परतें

*     पूर्व डीएफओ गंगवार जाते-जाते कर गए थे लगभग 50 फीसदी भुगतान

*      वित्तीय वर्ष की समाप्ति से पूर्व शेष भुगतान को लेकर वन अमला सक्रिय

शादिक खान, पन्ना।(www,radarnews.in) मध्य प्रदेश के पन्ना जिले का उत्तर वन मंडल भ्रष्टाचार का पर्याय बन चुका है। यहां विगत कई वर्षों से जंगलराज कायम होने से चौतरफा लूट-खसोट मची है। जिसका अंदाजा सिर्फ इसी बात से लगाया जा सकता है कि विभागीय निर्माण कार्यों की स्वीकृत राशि में बमुश्किल 30-40 फीसदी राशि ही धरातल पर खर्च की जा रही है। परिक्षेत्र अजयगढ़, धरमपुर में अटल भू-जल योजना तथा दूसरे परिक्षेत्रों में अन्य मद से निर्मित तालाबों, पर्कुलेशन टैंक एवं पर्कुलेशन पिट निर्माण की करोड़ों रुपए की राशि को पलीता लगाने के बाद अब पौधारोपण की तैयारी से जुड़े कार्यों में वृहद स्तर पर खेला चल रहा है। उत्तर वन मण्डल के अजयगढ़ परिक्षेत्र में आगामी मानसून सीजन में पौधारोपण कराने के लिए जो कुछ किया गया वह सिर्फ अनियमितता नहीं बल्कि मजदूरों के हक पर खुला डाका है। पौधारोपण के लिए लाखों गड्ढों की खुदाई ट्रैक्टरों (मशीनों) से कराई जबकि कागजों में इन्हें मजदूरों द्वारा खुदवाया जाना दर्शाया गया। उन्हें मजदूरी देने के नाम पर लगभग 50 फीसदी राशि का भुगतान भी किया जा चुका है। अब वित्तीय वर्ष की समाप्ति से पूर्व शेष राशि का भुगतान कराने की तैयारी चल रही है। पौधारोपण कार्यों में भ्रष्टाचार सिर्फ अजयगढ़ रेंज तक सीमित नहीं, वनमण्डल की अन्य रेन्जों में भी इसी तर्ज पर मजदूरों के नाम पर फर्जीवाड़ा किया गया। इस खुलासे के बाद भी अगर शेष बचा मजदूरी भुगतान किया जाता है तो संभवतः यह मध्य प्रदेश में किसी एक वित्तीय वर्ष में मजदूरों के नाम पर होने वाला अब तक का सबसे बड़ा घोटाला हो सकता है।

गड्ढे खुद दे रहे मशीनों के कार्य की गवाही

पौधारोपण के गड्ढों की खुदाई ट्रैक्टरों से कराने के चक्कर में गड्ढे वर्ग की आकृति के बजाए गोलाकार हो गए।
विगत दिवस परिक्षेत्र (रेन्ज) अजयगढ़ की बीट धवारी के वन कक्ष क्रमांक पी-194, बीट टौरिया के कक्ष क्रमांक पी-177 और बीट देवराभापतपुर के भ्रमण पर पहुंचे मीडियाकर्मियों को कई जगह हजारों की तादाद में गोलाकार गड्ढे देखने को मिले। इन अजब-गजब गड्ढों को कैमरों में कैद करने के बाद जब मौके पर उपस्थित वनरक्षक से पूछताछ की तो उन्होंने बिना किसी लाग-लपेट के ऑफ रिकार्ड स्वीकार किया कि गड्ढे ट्रैक्टरों से कराए गए हैं। साथ ही यह भी बताया कि जल्द से जल्द काम कराने के प्रेशर में यह सब करना पड़ा। मजदूरों के नाम पर मशीनों को रोजगार देने का यह फर्जीवाड़ा अजयगढ़ परिक्षेत्र की अन्य बीटों के साथ-साथ वन मण्डल की सभी रेन्जों में हुआ है। इस तरह देखें तो ट्रैक्टर चालकों को ठेके देकर कराए गए गड्ढों की तादाद कई लाखों में पहुंच जाती है। जाहिर है, इतने वृहद पैमाने पर अनियमितता होना रेंजर से लेकर अन्य वरिष्ठ अधिकारियों की संलिप्तता के बगैर संभव ही नहीं है।

वर्ग की आकृति में होते हैं गड्ढे

वन विभाग के एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम प्रकाशित न करने की शर्त पर बताया कि, विभागीय पौधारोपण कार्यों में आमतौर पौधों की प्रजाति के अनुसार वर्ग की आकृति में चार साइज के गड्ढों की खुदाई की जाती है, जिसका उल्लेख वर्किंग प्लान में है। सबसे छोटी साइज का गड्ढा 30x30x30 सेंटीमीटर का होता है अर्थात फिट में देखें तो इसकी लम्बाई, चौड़ाई और गहराई 1 फिट रहती है। इस साइज के गड्ढों में आमतौर पर सागौन (टीक) का रोपण किया जाता है। इन गड्ढों के बीच की दूरी 2 मीटर होती है। दूसरी साइज का गड्ढा 30x30x45 का होता है। इसकी लंबाई, चौड़ाई एक फिट लेकिन गहराई डेढ़ फिट रहती है। इन गड्ढों में रोपित किए जाने वाले पौधों की आपस की दूरी 2.5 या 3 मीटर हो सकती है। तीसरा साइज 45x45x45 सेंटीमीटर का है, यह मध्यम आकार का गड्ढा होता है जिसकी लंबाई, चौड़ाई और गहराई डेढ़ फिट होती है। इनमें छोटे झाड़ वाले पौधे लगाए जाते हैं। मध्यम आकार वाले गड्ढों का आपस में डिस्टेंस 3 मीटर होता है। चौथा गड्ढा सबसे बड़े साइज का 60x60x60 सेंटीमीटर का रहता है। अर्थात इनकी लम्बाई, चौड़ाई और गहराई सब एक सामान 2 फिट की रहती है। बड़े साइज के गड्ढों में बड़े झाड़ वाले पौधे लगाए जाते हैं। इन गड्ढों के बीच की दूरी 4 मीटर हो सकती है। साइज के हिसाब से अगर गड्ढों की खुदाई की राशि को देखें तो प्रत्येक गड्ढे की खुदाई सहित अन्य कार्य के लिए वर्तमान में प्रचलित दरों के अनुसार 13 रुपए लेकर 25 रुपए तक मजदूरी भुगतान करने का प्रावधान है।

अब मजदूर लगाकर गड्ढों में सुधार

पौधारोपण के लिए वन परिक्षेत्र अजयगढ़ अंतर्गत ट्रैक्टर लगाकर ठेके पर कराए गए गोलाकार गड्ढों का कुछ स्थानों पर मजदूर लगाकर सुधार कराया जा रहा है। रुपए बचाने के चक्कर में मशीनों से कराई गई गड्ढों की खुदाई पर पर्दा डालने के लिए अब मजदूर लगाकर उन्हें निर्धारित आकार-साइज देने काम शुरू हो गया है। मीडियाकर्मियों को निरीक्षण के दौरान कुछ स्थानों पर मजदूर गोलाकार गड्ढों को सही आकार देने के साथ मशीन से कराए गए कार्य के साक्ष्यों को मिटाते हुए नजर आए। वन विभाग के जानकारों की मानें तो पौधारोपण गड्ढा खुदाई के दोहरे कार्य के बावजूद प्रत्येक गड्ढे की मजदूरी राशि का अधिकतम 50 फीसदी ही खर्च आएगा। इस तरह गड्ढों की मजदूरी की शेष 50 फीसदी राशि का कार्य प्रभारी वनरक्षक से लेकर भुगतान कर्ता अधिकारी के बीच बंदरबांट हो जाएगा। और गड्ढों में सुधार करते मजदूरों के फोटोग्राफ्स निकालकर कागजों में साबित कर दिया जाएगा कि काम मशीनों ने नहीं बल्कि मजदूरों/श्रमिकों ने ही किया है। दरअसल, जहां पूरा तंत्र ही भ्रष्टाचार में आकण्ठ डूबा हो वहां सब संभव है। मशीनों से लाखों-करोड़ों गड्ढों की खुदाई पर विभागीय अधिकारियों द्वारा सख्ती से रोक न लगाना फर्जीवाड़े में उनकी संलिप्तता का स्पष्ट संकेत है।

सीमेंट पोल में अंदर मिट्टी, ऊपर कंक्रीट

बीट टौरिया में पौधारोपण सुरक्षा जाली लगाने के लिए खड़े किए सीमेंट पोल में सिर्फ ऊपर जमीन की सतह पर कंक्रीट डालकर अंदर मिट्टी भर गई।
पौधारोपण तैयारी कार्य में भ्रष्टाचार सिर्फ गड्ढों की खुदाई तक सीमित नहीं है। स्थल पर इससे जुड़े अब तक जितने भी कार्य हुए हैं सभी में हद दर्जे की लीपापोती की गई। पौधों की सुरक्षा के लिए फेंसिंग जाली लगाने खड़े किये गए सीमेंट पोल के होल से कंक्रीट मसाला गायब है। अभी जिन बीटों में पोल (खम्भे) लगाए गए उनकी फिलिंग प्रोजेक्ट रिपोर्ट अनुसार कंक्रीट मटेरियल से न करके मिट्टी से कर दी गई। सीमेंट पोल के होल में झोल करने वालों ने निरीक्षणकर्ताओं की नजर में धूल झोंकने के लिए जमीन की सतह पर लगभग 10 सेंटीमीटर कंक्रीट मसाला पोल के चारों तरफ डाला है। ताकि ऊपर से देखने पर ऐसा प्रतीत हो कि अंदर भी कंक्रीट मटेरियल लगाया है। जानकारों के मुताबिक, कंक्रीट मसाले की चोरी का सीधा असर सीमेंट पोल की मजबूती पर पड़ना तय है। बता दें कि, सीमेंट पोल को तमाम विषम परिस्थितियों में को सालों-साल तक मजबूती से खड़े रखने के लिए जमीन के अंदर डेढ़ फिट की गहराई तक कंक्रीट मटेरियल से कवर किया जाता है। जबकि जमीन की ऊपरी सतह पर 10 सेंटीमीटर कंक्रीट पोल के चारों तरफ लगाया जाता है। पोल के गड्ढे में कंक्रीट मसाला न डालने से उनके लूज होकर गिरने का खतरा बना रहेगा। पौधारोपण सुरक्षा जाली फेंसिंग भार सीमेंट पोल झेल सकें, इसके लिए प्रत्येक 3 पोल्स के बाद सपोर्टिंग पोल (दो पोल) खड़े किये जाते हैं।

नवागत डीएफओ की कार्रवाई पर रहेगी नजर

उत्तर वन मण्डल कार्यालय पन्ना। (फाइल फोटो)
उत्तर वन मण्डल पन्ना अंतर्गत पौधारोपण कार्य में व्यापक पैमाने पर हुई अनियमितताएं कथित तौर पर पूर्व डीएफओ गर्वित गंगवार के कार्यकाल के अंतिम दिनों में की गई हैं। डीएफओ ऑफिस के सूत्रों की मानें तो गंगवार साहब जाते-जाते पौधारोपण के प्रमाणकों का बड़ी तादाद में भुगतान भी कर गए हैं। अब जो राशि शेष बची है उसका भुगतान चालू वित्तीय वर्ष की समाप्ति के पूर्व कराने के लिए कार्य प्रभारी बीट गार्ड से लेकर संबंधित परिक्षेत्राधिकारी (रेंज ऑफिसर) सक्रिय हैं। पौधारोपण कार्य में फर्जीवाड़ा और कार्य की गुणवत्ता से समझौते का मामला उत्तर वन मण्डल के नवागत धीरेन्द्र प्रताप सिंह डीएफओ के संज्ञान में है। ऐसे में अब आने वाले दिनों में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि नवागत डीएफओ लंबित भुगतान करके इस भ्रष्टाचार को आगे बढ़ाते हैं या फिर फर्जी प्रमाणकों के भुगतान पर रोक लगाकर तत्परता से गहन जांच उपरांत दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई सुनिश्चित करते हैं।

इनका कहना है-

“पौधारोपण कार्य में अनियमितताएं होने का मामला संज्ञान में आने पर जांच के आदेश दिए हैं। आप सोमवार को कार्यालय आएं बैठकर बात करते हैं, आप जहां भी मेरे वन मण्डल के कार्यों को देखना चाहते हैं मेरे साथ मेरी गाड़ी से चलिए, मैं स्वयं आपको लेकर चलूंगा।”

धीरेन्द्र प्रताप सिंह, वनमण्डलाधिकारी, उत्तर वन मण्डल, पन्ना।