ब्रह्मा बाबा के जीवन पर प्रकाश डालते हुए बताया कि, बाबा का जीवन बहुत सात्विक एवं दिव्य गुण मूरत था वे भक्ति भावना और नियम के पक्के थे। सिंध हैदराबाद में दादा लेखराज का जन्म 15 दिसंबर 1876 को एक साधारण परिवार में हुआ। दादा लेखराज अपनी विशेष बौद्धिक प्रतिभा, व्यापारिक कुशलता, व्यावहारिक शिष्टता, अथक परिश्रम और सरल स्वभाव के बल पर सफल प्रसिद्ध जौहरी बने।बाबा में बचपन से ही भक्ति भाव के संस्कार थे। विपुल धन संपदा और मान प्रतिष्ठा पाकर भी उनके स्वभाव में नम्रता, मधुरता और परोपकार की भावना बनी रहे।
बहन जी ने बताया कि, बाबा (दादा लेखराज) को परम सत्य की तलाश थी, अचानक एक दिन सन् 1936 में जब उन्हें ज्योति स्वरूप परमात्मा शिव का दिव्य साक्षात्कार हुआ, उनमें दिव्य परिवर्तन आया जब परमात्मा शिव की उनके तन में प्रवेशता हुई तो उन्होंने अपना सब कुछ तन, मन, धन विश्व कल्याण के लिए समर्पित कर दिया। दादा के मुख द्वारा परमात्मा शिव ने बताया कि सभी दुखों एवं समस्याओं का मूल कारण देह अभिमान एवं मनोविकार काम, क्रोध,लोभ, मोह, अहंकार, आलस्य है। इन पर विजय पाना जरूरी है, इन विकारों के त्याग से ही सृष्टि पुन: सतयुगी दुनिया (रामराज्य) बनेगी। सन् 1969 में 18 जनवरी को पिता श्री ब्रह्मा बाबा ने दैहिक कलेवर का परित्याग कर संपूर्णता को प्राप्त किया। उनके अव्यक्त सहयोग से ईश्वरीय सेवा में पहले से और अधिक विस्तार हो रहा है। ब्रह्माकुमारी संस्था विश्व भर में आज 140 देश में फैल चुकी है, सूक्ष्म रूप में आज भी बाबा हर बच्चे को अपने साथ का अनुभव कराते हुए कदम-कदम पर सहयोग, स्नेह, प्रेरणा प्रदान कर रहे हैं।