केन-बेतवा लिंक परियोजना: प्रचार-प्रसार में अनियमित खर्च, ऑडिट रिपोर्ट ने खड़े किए गंभीर सवाल

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पन्ना जिले के पवई क़स्बा में स्थित केन-बेतवा लिंक परियोजना जल संसाधन संभाग क्र.-1 का कार्यालय।

*     बिना निविदा प्रचार कार्य, छोटे बिलों में भुगतान और अयोग्य एजेंसियों के चयन पर एजी की आपत्ति

   कार्यपालन यंत्री पवई के निर्णय और जल संसाधन विभाग के उच्चाधिकारियों की भूमिका जांच के घेरे में

शादिक खान, पन्ना।(www.radarnews.in) देश की महत्वाकांक्षी केन–बेतवा लिंक राष्ट्रीय परियोजना, जिसे बुंदेलखंड के लिए जीवनरेखा बताया जा रहा है, वह निर्माण से पहले ही भ्रष्टाचार की भेंट चढ़ती नजर आ रही है। परियोजना संभाग क्रमांक–1 पवई (जिला पन्ना) में प्रचार-प्रसार और दीवार लेखन के नाम पर लाखों रुपये के नियम विरुद्ध भुगतान का मामला महालेखाकार, ग्वालियर की ऑडिट रिपोर्ट 2024-25 में उजागर हुआ है। ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार परियोजना के प्रचार कार्य के लिए न तो कोई निविदा आमंत्रित की गई, न ही शासन के निर्धारित नियमों का पालन किया गया। इसके बावजूद कार्यपालन यंत्री उमा गुप्ता द्वारा अपने स्तर पर निर्णय लेते हुए चहेते ठेकेदारों/एजेंसियों से कार्य कराया गया।

फ्लैक्स-बैनर पर 4,54,574 रुपए का अनियमित खर्च

एजी की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, फ्लैक्स एवं बैनर प्रिंट से संबंधित यह प्रचार कार्य 109 टुकड़ों में विभाजित कर कराया गया। प्रत्येक बिल की राशि  जानबूझकर 5,000 से कम रखी गई, जिससे निविदा प्रक्रिया से बचा जा सके। रिपोर्ट में दर्ज है कि यह कार्य मेसर्स टीकम सिंह, अदिति स्टेशनरी एवं प्रिंटिंग तथा स्टूडियो चित्र मंदिर से कराया गया। ऑडिट में यह भी स्पष्ट किया गया है कि नियमानुसार ऐसे कार्यों के लिए कम से कम तीन सक्षम संविदाकारों को चिन्हित कर निविदा आमंत्रित की जानी चाहिए थी, लेकिन ऐसा किए जाने का कोई प्रमाण उपलब्ध नहीं है। एजी ने यह भी दर्ज किया है कि कराया गया यह प्रचार कार्य केन–बेतवा लिंक परियोजना के स्वीकृत स्कोप से बाहर है, जिससे परियोजना लागत में अनावश्यक वृद्धि हुई और व्यय को अनियमित माना गया।

5,000 से कम के 117 बिल पर 5 लाख का भुगतान

ऑडिट में यह तथ्य सामने आया कि प्रचार-प्रसार का कार्य जानबूझकर 117 अलग-अलग बिलों में विभाजित किया गया। प्रत्येक बिल की राशि 5,000 से कम रखी गई ताकि निविदा प्रक्रिया से बचा जा सके। इन बिलों के माध्यम से मेसर्स टीकम सिंह एवं अमर कंस्ट्रक्शन एंड सप्लायर को कुल 5,36,552/- का भुगतान किया गया। एजी ने इस व्यय को “नियमविरुद्ध एवं गंभीर वित्तीय अनियमितता” की श्रेणी में दर्ज किया है। ऑडिट रिपोर्ट में स्पष्ट उल्लेख है कि जिन एजेंसियों से दीवार लेखन और प्रचार कराया गया, उनका जीएसटी पंजीकरण निर्माण सामग्री- सीमेंट, लोहा, ईंट, माइलस्टोन आदि के लिए है। प्रचार-प्रसार, दीवार लेखन एवं बैनर प्रिंटिंग जैसे कार्य उनके पंजीकृत कार्यक्षेत्र में शामिल नहीं हैं। इसके बावजूद उनसे कार्य कराना नियमों की अनदेखी और पद के दुरुपयोग की ओर संकेत करता है। विभागीय सूत्रों की मानें तो प्रचार-प्रसार पर दर्शाए गए खर्च की तुलना में धरातल पर कार्य महज 20 या 30 प्रतिशत ही कराया गया। ठेकेदारों और अधिकारियों की सांठगांठ से फर्जीवाड़ा कर करीब 70 प्रतिशत राशि का गबन किए जाने की आशंका है।

जीएसटी कटौती न करने से शासन को नुकसान

ऑडिट रिपोर्ट में उल्लेख है कि प्रचार-प्रसार कार्य के लिए ठेकेदारों/एजेंसियों को 9.91 लाख रुपए के भुगतान के दौरान 2 प्रतिशत की दर से कुल 19,818/- GST की कटौती नहीं की गई, जिससे शासन को प्रत्यक्ष तौर पर वित्तीय क्षति हुई। यह लापरवाही सीधे तौर पर आहरण-संवितरण अधिकारी की जिम्मेदारी में आती है। लेखा परीक्षा के दौरान ऑडिटरों के द्वारा निविदा आमंत्रित करने की नस्ती तथा उक्त राशि व्यय हेतु सक्षम अधिकारी की स्वीकृति मांगे जाने पर न तो लेखा परीक्षा को उपलब्ध कराई गई और ना ही उत्तर के साथ संलग्न किया गया। जोकि यह दर्शाता है, कार्य सक्षम अधिकारी की स्वीकृति के बगैर कराया गया तथा कार्यपालन यंत्री ने 9 लाख 91 हजार रुपए का संदेहास्पद भुगतान किया है। उल्लेखनीय है कि यह प्रचार-प्रसार कार्य वर्ष 2024 के लोकसभा चुनाव से ठीक पहले कराया गया था। जिसके चलते इस कवायद को परियोजना से भविष्य में होने वाले लाभों का चुनावी माहौल में प्रचार कर सत्ताधारी दल को राजनीतिक लाभ पहुंचाने वाले कदम के तौर पर देखा गया।

गंभीर ऑडिट आपत्ति के बाद भी संरक्षण?

केन-बेतवा लिंक परियोजना के प्रचार-प्रसार में नियम-पारदर्शी प्रक्रिया को दरकिनार करने के साथ कागजों में खर्च राशि और धरातल पर कराए में है बड़ा अंतर।
केन-बेतवा लिंक परियोजना (केबीएलपी) के प्रचार-प्रसार कार्य पर हुए लाखों रुपए के व्यय को लेकर एजी की स्पष्ट आपत्तियों के बावजूद न तो संबंधित कार्यपालन यंत्री और न ही अन्य जिम्मेदार अधिकारियों पर अब तक कोई विभागीय कार्रवाई की गई है। जल संसाधन विभाग के उच्च स्तर पर इस गंभीर ऑडिट आपत्ति को नजरअंदाज किया जाना, पूरे विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े करता है। केन-बेतवा जैसी राष्ट्रीय परियोजना, जो लाखों लोगों की उम्मीदों से जुड़ी है, उसमें दीवारों पर लिखे नारे अब भ्रष्टाचार की कहानी बयां कर रहे हैं। सवाल प्रचार का नहीं, बल्कि मनमाने निर्णय और जवाबदेही का है। जल संसाधन विभाग में वित्तीय अनियमितताओं तथा गुणवत्ता विहीन कार्यों से जुड़े मामलों को शीर्ष स्तर पर सालों-साल ठंडे बस्ते में रखकर रफा-दफा करने की अघोषित नीति से घपले-घोटाले करने वालों के हौसले बुलंद हैं।

इनका कहना है-

“मुझे कुछ भी नहीं कहना है, आप जो भी चाहें लिखने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं, मुझे इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। वैसे आपको बता दूं, प्रचार-प्रसार कार्य प्रधानमंत्री जी के कार्यक्रम के समय हुआ था। जब आपसे कोई कार्य 10-12 दिन में करने को कहा जाएगा तो वह इसी तरह होगा। निविदा आमंत्रित करके कार्य कराने की प्रक्रिया में कम से कम एक से डेढ़ माह का समय लगता है। प्रचार-प्रसार कार्य तत्कालीन कलेक्टर के निर्देश पर और नोटशीट पर उनसे स्वीकृति लेकर कराया गया। ऑडिट की आपत्तियों का शीर्ष स्तर से जवाब देकर निराकरण किया जा चुका है। ऑडिट क्लीयरेंस का प्रमाण पत्र प्रस्तुत करने के बाद केन्द्र सरकार राज्य को राशि आवंटित करती है।”

उमा गुप्ता, कार्यपालन यंत्री, केबीएलपी, जल संसाधन संभाग क्र.-1 पवई, जिला पन्ना।