आधुनिक भारत में महिला शिक्षा की अलख जगाने वालीं महिलावादी और शिक्षिका फातिमा शेख की जयंती मनाई

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पन्ना जिले के गुनौर क़स्बा में महात्मा फुले समता परिषद द्वारा महिलावादी और शिक्षिका फातिमा शेख की 192वीं जयंती धूमधाम से मनाई गई।

*     महिला सशक्तिकरण के लिए शिक्षा को मानती थीं सबसे जरुरी

*     सावित्री बाई फुले के साथ मिलकर पुणे में खोला था देश का पहला स्कूल

राजेन्द्र कुमार लोध, पन्ना/ जीतेन्द्र रजक, गुनौर । (www.radarnews.in) मध्यप्रदेश के पन्ना जिले के गुनौर विधानसभा मुख्यालय में सोमवार 9 जनवरी 2023 को छत्रपति शाहूजी सभागार गुनौर में महात्मा फुले समता परिषद द्वारा महिलावादी और शिक्षिका फातिमा शेख की 192वीं जयंती धूमधाम से मनाई गई। इस अवसर पर उनके छाया चित्र पर पुष्पांजलि अर्पित की गई। वक्ताओं ने अपने उद्बोधन में समाज सुधारक फातिमा शेख के योगदान और महिला शिक्षा के क्षेत्र में क्रांतिकारी कदमों की व्याख्या करते हुए उनके प्रति कृतज्ञता ज्ञापित की। फातिमा शेख सावित्री बाई फुले मिशन की सबसे मजबूत सहयोगी और साथी शिक्षिका थीं। आधुनिक भारत के इतिहास में जहां पहला स्कूल खोलने का श्रेय महात्मा ज्योतिबा फुले को दिया जाता है तो वहीं पहली शिक्षिका में नाम सावित्री बाई फुले और उनकी सहयोगी फ़ातिमा शेख़ को भी याद किया जाता है। फ़ातिमा शेख़ ने तकरीबन 175 साल पहले समाज के सबसे कमजोर लोगों और विशेषकर महिलाओं की शिक्षा के लिए सावित्री बाई फुले के साथ कंधे से कंधा मिलाकर क्रांतिकारी काम किया। महाराष्ट्र के पुणे में एक जनवरी सन् 1848 जब पहला स्कूल खोला गया तो सावित्री बाई के साथ फ़ातिमा शेख़ भी वहाँ पढ़ाती थीं।

परंपरावादी रूढ़िवादियों ने किया था विरोध

कार्यक्रम के मुख्य अतिथि देशपाल पटेल ने अपने उद्बोधन में माता फातिमा शेख और सावित्रीबाई फूले के द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में उठाए गए क्रांतिकारी क़दमों के संबंध में जानकारी देते हुए बताया कि आजादी के पहले देश में महिलाओं को शिक्षा से वंचित रखा गया था। परंपरावादी रूढ़िवादी लोगों के द्वारा महिलाओं को घर के अंदर ही रहने के लिए विवश किया गया ताकि उनकी हुकूमत (पितृ सत्ता वर्चस्व) कायम रहे। समाज सुधारक माता फातिमा शेख और सावित्री बाई फुले ने संयुक्त रूप से इसका जबरदस्त विरोध करते हुए देश की बालिकाओं-महिलाओं को शिक्षा दिलाने का बीड़ा उठाते हुए देश में पहला बालिका विद्यालय महाराष्ट्र के पुणे शहर में 1848 को खोला गया। क्योंकि इनका मानना था कि शिक्षा से ही महिलाओं का सशक्तिकरण सम्भव हो सकता है।

भारी विरोध के बीच फुले दंपत्ति को दिया आश्रय

मुख्य अतिथि देशराज पटेल ने बताया, आगे चलकर इन दोनों विदुषी महिलाओं ने अंग्रेजी हुकूमत से मिलकर बालिकाओं के लिए एक नई शिक्षा नीति देश में लागू कराया। परिणामस्वरूप आज देश में महिलाएं शिक्षा प्राप्त कर प्रत्येक क्षेत्र में अपना योगदान देने के साथ सफलता के नए कीर्तिमान स्थापित कर परिवार, समाज और देश को गौरांवित कर रहीं है। महिला-बालिका शिक्षा की मशाल रोशन करने वालीं फातिमा शेख और सावित्री बाई फुले को अपने जीवनकाल में कदम कदम-कदम पर परंपरावादी कट्टरपंथियों के विरोध और षडयंत्र का सामना करना पड़ा। कथित परंपरवादियों द्वारा महिलाओं को शिक्षित करने की इस मुहिम को पसंद नहीं किया जिसके कारण ज्योतिबा फुले और सावित्रीबाई फुले को घर से निकाल दिया गया था। इन विषम परिस्थितियों में फतिमा शेख ने तमाम विरोध को दरकिनार कर न सिर्फ उनको अपने घर में जगह दी बल्कि उनकी इस मुहिम को पूरी तरह समर्थन करते हुए इस मुहिम में मजबूती के साथ जुड़कर महिला-बालिका एवं कमजोर वर्गों की शिक्षा में अहम भूमिका निभाते हुए अतुल्यनीय-अविस्मरणीय योगदान दिया।

देश की महिलाएं हैं आभारी

श्री पटेल ने कहा कि, आज भारत की प्रत्येक वर्ग की महिलाएं इनके द्वारा किए गए शैक्षिक कार्य व समाज सुधार कार्यों के प्रति आभारी हैं। समाज सुधारक और शिक्षिका फातिमा शेख के प्रयासों से प्रेरणा लेते हुए महात्मा फूले परिषद के सभी सदस्यों ने संकल्प लिया कि आने वाले समय में देश के सभी समाज के महापुरुष, समाज सुधारकों की जयंती धूमधाम से मनाएंगे। कार्यक्रम के अंत सुधीर कुशवाहा, अध्यक्ष महात्मा क्षमता फुले परिषद द्वारा सभी उपस्थितों का आभार व्यक्त किया गया। जयंती कार्यक्रम में बड़ी संख्या उपस्थित लोगों द्वारा माता सावित्री बाई फुले अमर रहे, माता फातिमा शेख अमर रहे के नारे लगाए गए।

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